Sunday, February 6, 2011

...लेकिन सारे आतंकवादी संघी क्यों हैं?

बीते सप्ताह की राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक घटनाओं को परम्परानुसार उर्दू अखबारों ने चर्चा का विषय बनाया है। इसके बावजूद वहां भाजपा के दो दिवसीय सम्मेलन सहित सारे आतंकवादी संघी क्यों हैं, बम धमाकों की जांच के लिए विशेष ट्रिब्यूनल की मांग और कश्मीर में फौज की कमी करने जैसे मुद्दों को प्राथमिकता दी गई है। पेश है इस बाबत उर्दू अखबारों की राय।

हैदराबाद से प्रकाशित दैनिक सियासत में फैसल जाफरी ने भाजपा का दो दिवसीय सम्मेलन ः नकारात्मक राजनीतिक का शानदार प्रदर्शन में लिखा है। भाजपा ने बजट अधिवेशन से पहले कांग्रेस पर दबाव डालने के उद्देश्य से अपने दो दिवसीय सम्मेलन की घोषणा कर दी। यह सम्मेलन गत दिनों गोहाटी असम में आयोजित हुआ है। हमने बिना कारण इसे नकारात्मक राजनीति का प्रदर्शन नहीं कहा है। होना यह चाहिए था कि अपने दो दिवसीय सम्मेलन में भाजपा खुद को कांग्रेस के विकल्प के तौर पर पेश करती। पार्टी नेता जनता को बताते कि उनके पास देश विकास की कौन सी योजनाएं हैं। सत्ता में आने की सूरत में वह देश की 70 फीसदी जनता को गरीबी, अज्ञानता और भुखमरी से मुक्ति दिलाने के लिए क्या करना चाहते हैं।

लेकिन गोहाटी सम्मेलन में इस तरह की कोई बहस नही हुई, हां, तीन बातों पर विशेष ध्यान दिया गया। भ्रष्टाचार, सोनिया गांधी का व्यक्तित्व और नेतृत्व एवं महंगाई भ्रष्टाचार निश्चय ही एक गंभीर मसला हैं। भाजपा इस भ्रम में है कि इस मामले पर वह कांग्रेस को लोकसभा भंग करने और नए चुनाव कराने पर विवश कर सकती है आडवाणी ने पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि वर्तमान सरकार ज्यादा समय तक नहीं चल सकती, आप लोग चुनाव की तैयारी कीजिए। जो बात वह नहीं कह सके कि वह बहुत जल्द भारत के प्रधानमंत्री बनने वाले हैं। इससे हटकर हमें अच्छी तरह याद है कि जो बात आडवाणी ने गोहाटी में कही बिल्कुल वही बात अटल बिहारी वाजपेयी ने जनवरी 2006 में मुंबई में भाजपा अधिवेशन में कही थी राजनाथ सिंह को नया अध्यक्ष मनोनीत किया गया था। जहां तक भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी का संबंध है वह दो चार भोंडे शब्दों का इस्तेमाल किए बिना भाषण नहीं दे सकते। उन्होंने सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कहा, वाह रे राजा, कांग्रेस का बजाया बाजा। स्पष्ट रहे कि यह भाषा राजनीतिक नेताओं की नहीं मुंबई की सड़कों पर आवारागर्दी करने वाले युवाओं की हो सकती है जिसे स्थानीय भाषा में टपोरी कहा जाता है।

दैनिक मुनसिफ ने जनता समर्थन की प्राप्ति के लिए पहले के शीर्षक से लिखा है। 2जी स्पेक्ट्रम में राजा, कामनवेल्थ खेलों में कलमाड़ी और आदर्श सोसायटी में अशोक चौहान से किनारा करके केंद्र और कांग्रेस ने खुद का दामन साफ रखने की कोशिश तो की है लेकिन दो दशक पूर्व बोफोर्स दलाली वाले मामले में इन्कम टैक्स ट्रिब्यूनल के फैसले ने तो सब कुछ बेनकाब कर दिया है। सरकार और कांग्रेस शुरू से कहती रही है कि बोफोर्स सौदे में न तो मध्य व्यक्ति या और न ही कमीशन दिया गया लेकिन जब केंद्रीय सरकार के ही एक प्रतिष्ठित संस्था ने कहा कि बोफोर्स सौदे में बिन चड्ढा को कमीशन मिला है लेकिन उन्होंने नियम के अनुसार इसका टैक्स नहीं दिया। इस रहस्योद्घाटन पर जिस तरह केंद्र सरकार ने कोई पहल नहीं की और सीबीआई अदालत में मामला बन्द करने की अपील पर कायम रही है, इससे साफ है कि पालिसी और नीयत भ्रष्टाचार रोकने की नहीं बल्कि उनके बचाव की है। ऐसे में निश्चय ही भ्रष्टाचार यदि सबसे अहम नहीं तो कमरतोड़ महंगाई के सामने मसला जरूर बनना चाहिए। वर्तमान में महंगाई और भ्रष्टाचार दो ऐसे मुद्दे हैं जो किसी भी राजनीतिक पार्टी के एजेंडे में सर्वप्रथम होने चाहिए। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि उसका दामन साफ हो, दुर्भाग्य से भाजपा इस कसौटी पर खरी नहीं उतरती। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की बाकी का तार कोल घोटाला तो पुराना हो गया, लेकिन कर्नाटक में मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा का जमीन घोटाला और इनकी सरकार में शामिल रेड्डी भाइयों का माफिया तो ताजा मामला है जिसे भाजपा हाई कमान नजरंदाज करने के अलावा कुछ नहीं कर पा रही है। भ्रष्टाचार के खिलाफ भाजपा की मुहिम को जनता का समर्थन तभी मिलेगा जब वह पहले अपने दामन को बेदाग बनाए।

राष्ट्रीय सहारा में सईद हमीद ने लेकिन सारे आतंकवादी संघी क्यों हैं? के शीर्षक से लिखा है कि इन सभी बम धमाकों के टारगेट कौन थे? मुसलमान या मुस्लिम इलाके या मुस्लिम उपासक स्थल, पहले राउंड में इन सभी बम धमाकों के लिए मुसलमानों को ही आरोपी ठहराया गया। वास्तव में यह हिन्दुत्व आतंकवादियों को बचाने की एक साजिश थी। विशाल परिदृश्य में देखा जाए तो हिन्दुत्ववादी आतंकवादियों ने जिस तरह मुसलमानों को मारो और उन्हीं को आरोपित करने की रणनीति अपनाई थीं उस पर क्रियान्वित करने वाले दो षड्यंत्रकारियों (1) वह हिन्दुत्ववादी जो बम धमाके किया करते थे (2) वह हिन्दुत्ववादी जो इन बम धमाकों के आरोप में बेगुनाह मुसलमानों को जेलों में बन्द कर देते थे, उनको यातनाएं देते थे और हिन्दुत्ववादी आतंकवादियों का आरोप अपने ऊपर लेने के लिए मजबूर करते थे। हम ने हिन्दुत्ववादियों की जिस दूसरी श्रेणी की ओर इशारा किया है, यह खाकी ड्रेस पहनते हैं, लेकिन अन्दर से यह भगवा मानसिकता में डूबे रहते हैं। इन दो वर्षों (2006-2008) में हिन्दुत्ववादी आतंकवादियों ने अपना मिशन बड़ी हद तक कामयाब कर लिया है और हर व्यक्ति मुसलमानों पर कटाक्ष करने लगा है कि हर मुसलमान आतंकवादी नहीं है, लेकिन हर आतंकवादी मुसलमान क्यों है? आज ठाकरे, तोगड़िया, आडवाणी, मुंडे, सिंघल से यह पूछा जाना चाहिए कि सारे संघी आतंकवादी नहीं, लेकिन सारे आतंकवादी संघी क्यों हैं।

पटना से प्रकाशित साप्ताहिक नकीब ने विशेष ट्रिब्यूनल के गठन का प्रस्ताव में लिखा है। अजमेर, मक्का मस्जिद, मालेगांव बम धमाका और समझौता एक्सप्रेस पर हुए धमाकों की जांच जल्द से जल्द पूरी कर ली जाए और जो लोग इसमें लिप्त हैं उनके खिलाफ ठोस सबूत के साथ अदालत में चार्जशीट पेश कर दी जाए ताकि आतंकी सजा पा सकें। इस सिलसिले में जितनी भी देर की जाएगी इससे नुकसान का संदेह है। हो सकता है कि इस बीच सुबूत को मिटाने की कोशिश की जाए और इसी के साथ मामले को नया रुख देने की कोशिश की जाने की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता। इस सिलसिले में आरएसएस अध्यक्ष मोहन भागवत के उस बयान से संकेत मिलता है जिसमें उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया है कि सरकार हिन्दुओं के पीछे पड़ी है और इसके खिलाफ तरह-तरह के आरोप लगा रही है। निश्चय ही भागवत का इशारा असीमानंद की गिरफ्तारी और उनसे पूछताछ की तरफ ही है। इस संदर्भ में इस प्रस्ताव का जिक्र करना भी जरूरी है जो अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कानून विभाग की ओर से हेने वाली कांफ्रेंस में सर्वसम्मति से पारित किया गया कि 1998 से लेकर अब तक देश के विभिन्न भागों में बम धमाकों की जो घटनाएं हुई हैं, केंद्र सरकार उसकी जांच कराए और इसके लिए एक विशेष अदालती आयोग गठित करे और उसकी रिपोर्ट एवं सुझावों की रोशनी में दोषियों के खिलाफ जरूरी कार्रवाई करे।

कश्मीर में फौज की संख्या घटाने का सवाल, वादी में वातावरण उचित, अहम फैसले लिए जा सकते हैं, के तहत अखबारे मशरिक ने लिखा है। जब से केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम और प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने कश्मीर के मामले में दिलचस्पी लेनी शुरू की है। वादी के हालात धीरे-धीरे बेहतर होते जा रहे हैं। पत्थर फेंकने का सिलसिला भी बन्द हो गया है जो कुछ माह पूर्व वादी की परम्परा बन गई थी। विख्यात पत्रकार और बुद्धिजीवी दिलीप पडगांवकर की अगुवाई में भारत सरकार ने कश्मीर के लिए जिन वार्ताकारों का चयन किया है वह भी अपना काम बड़ी अच्छी तरह से कर रहे हैं और लोगों से मिलकर उनका दुखदर्द बांट रहे हैं। इन हालातों में यदि घाटी में फौज में कमी की जाए तो इसमें कोई हर्ज नहीं है। इससे लोगों तक यह पैगाम जाएगा कि सरकार उनकी भावनाओं से न केवल परिचित है बल्कि उसका सम्मान करते हुए ऐसी सूरत निकाली जाए कि उनके हृदय का कांटा जाता रहे। घाटी के हवाले से इस समय कुछ अहम फैसले करने का अच्छा समय है। आश्चर्य नहीं कि इससे हवा का रुख इधर से उधर हो जाए और वहां की काया पलट हो जाए।

Saturday, February 5, 2011

'बेगुनाह मुसलमानों की रिहाई का मामला'

बम धमाकों में लिप्त असीमानंद के इकबालिया बयान को लेकर उर्दू अखबारों ने सम्पादकीय लिखे और आलेख प्रकाशित किया है। इसी के साथ आरएसएस द्वारा इस दाग को मिटाने की मुहिम पर भी विशेष रूप से चर्चा की है। पेश है इस बाबत उर्दू अखबारों की राय।

हैदराबाद से प्रकाशित दैनिक `ऐतमाद' ने `आतंकवाद के दाग को मिटाने की आरएसएस की मुहिम' के शीर्षक से लिखा है। स्वामी असीमानंद के बम धमाकों से संबंधित इकबालिया बयान से आरएसएस को मानसिक रूप से इतना परेशान कर दिया है कि हिन्दू समाज में इस संगठन की छवि मिट्टी में मिल गई है। इसलिए अब उसने अपनी छवि सुधारने के लिए घर-घर दस्तक देने और इन धमाकों के बारे में अपनी गढ़ी हुई कहानी सुनने का फैसला किया है। आरएसएस और इसकी सहयोगी संगठनों सहित भाजपा के कार्यकर्ता बुकलेट वितरित कर यह बताने की कोशिश करेंगे कि किस तरह कांग्रेस अगुवाई वाली यूपीए सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ भाजपा के नेतृत्व में संघ परिवार की मुहिम का बदला लेने के लिए प्रचारकों और स्वयंसेवकों की गिरफ्तारी और उनकी तफ्तीश द्वारा आरएसएस पर आतंकवाद का ठप्पा लगाने की कोशिश कर रही है। लेकिन आरएसएस ने तथाकथित देश प्रेम और कौम परस्ती के नाम पर दंगों द्वारा जो अराजकता फैलाई और घृणा के बीज बोए हैं उनके खिलाफ आज भी कोई इसके मुकाबले के लिए मैदान में नहीं उतर रहा है।

आरएसएस प्रवक्ता राम माधव आज अगर यह प्रचार करते हैं कि आरएसएस का आतंकवाद से कोई संबंध नहीं है और राजनीति के चलते उसे बदनाम किया जा रहा है तो दुनिया में हिन्दू धर्म की छवि गलत बन रही है। जाहिर है कि राम माधव का इस तरह का बयान हिन्दुओं को कांग्रेस सरकार से दूर कर सकता है लेकिन यदि सरकार इन बिन्दुओं को विचारणीय नहीं समझती और खुद दूसरी सेकुलर पार्टियों के साथ संघ परिवार की आतंकी गतिविधियों से जनता को अवगत नहीं कराती तो फंदा कांग्रेस के गले में पड़ सकता है।

मुंबई से प्रकाशित दैनिक `इंकलाब' में मुब्बशिर मुशताक ने `मालेगांव मामले में सीबीआई उधेड़बुन की शिकार, इसे कंफ्यूज्ड ब्यूरो ऑफ इंवेस्टीगेशन भी कहा जा सकता है' के अपने आलेख में लिखा है। 17वीं सदी में ईसाई विचारधारा के मशहूर स्तम्भकार एन होसटन ने लिखा था कि कंफ्यूजन मानसिक बिगाड़ का एक संकेत है। मानसिक उधेड़बुन साफ और तुरन्त सोच को अपंग बना देती है जबकि मानसिक बिगाड़ भय और उधेड़बुन के साथ धोखे की ओर ले जाता है। इसी मानसिक बीमारी का शिकार कंफ्यूजन ब्यूरो ऑफ इंवेस्टीगेशन (सीबीआई का पूरा नाम) ने 9 आरोपियों की जमानत का विरोध करते हुए इंसाफ को और पेचीदा बना दिया है। सीबीआई के वकील राज ठाकरे ने मकोका कोर्ट में एक आम कानूनी बिन्दु उठाते हुए कहा कि आरोपियों ने कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया है जिसकी बुनियाद पर जमानत अर्जी पर विचार किया जा सके, इसलिए जमानत अर्जी निरस्त की जाए। सीबीआई के इस दृष्टिकोण में `कानूनी बिन्दु' छिपा है कि केवल असीमानंद के इकबाले जुर्म की बुनियाद पर जमानत नहीं दी जा सकती लेकिन सीबीआई के पास कोई ठोस सबूत नहीं जिसकी बुनियाद पर जमानत अर्जी निरस्त करने की बात की जाए। इससे पूर्व मुंबई हाई कोर्ट में सीबीआई कह चुकी है कि इसके पास आरोपियों के संबंध में कुछ सबूत नहीं हैं।

ऐसे हालात में कांग्रेस की सियासी चालाकी उल्लेखनीय है। सभी बातें दिग्विजय सिंह से कहलाती है और दिग्विजय सिंह वह अब बातें कहने के बाद उसे `व्यक्तिगत विचार' करारे देते हैं। मुस्लिम वोट बैंक पर पकड़ के लिए यह अच्छा तरीका है। किसी भी राजनैतिक पार्टी को सेकुलरिज्म पर खरा उतरने के लिए कथनी और करनी में विरोधाभास नहीं होना चाहिए लेकिन कांग्रेस हमेशा से यही करती आई है।

`बेगुनाह मुसलमानों की रिहाई का मामला' के तहत दैनिक `राष्ट्रीय सहारा' ने लिखा है। 2006 में मालेगांव में मुसलमानों के बीच धमाके करके 36 मुसलमानों को शहीद कर दिया गया था और 100 से अधिक व्यक्ति जख्मी हो गए थे लेकिन पुलिस और खुफिया विभाग ने इन धमाकों में मुसलमानों को ही फंसा दिया और उन पर अत्याचार कर इकबाले जुर्म भी करा लिया। इस बाबत शनिवार को टाइम्स ऑफ इंडिया ने सामाजिक संगठन अनहद द्वारा जारी किए वह बयानात प्रकाशित किए हैं जिनमें उन मुस्लिम युवाओं की आप बीती बयान की गई है जो विभिन्न मामलों में गिफ्तार किए गए और उनको अलग-अलग राज्यों की पुलिस ने यातना पहुंचाकर इकबाले जुर्म पर मजबूर किया। हिन्दुस्तान के इस विशाल भाग में ऐसी न जाने कितनी दास्तानें हैं जिनके बारे में अभी तक मीडिया को भी कोई जानकारी नहीं मिली है और न जाने कितने बेगुनाह ऐसे हैं जो केवल अपने धर्म के आधार का प्रड़तारित किए जा रहे हैं लेकिन केंद्र एवं राज्य सरकारों की तरफ से इनके बारे में कोई बात नहीं की जा रही है, उल्टे कोर्ट में सीबीआई इनकी जमानत का विरोध कर रही है। आतंकवादियों के एक मुखिया की ओर से अपने जुर्म का इकबाल कर लेने के बाद क्या सीबीआई जैसी जिम्मेदार संस्था से यह आशा की जा सकती है क विह यदि अभी केस वापस नहीं ले सकता तो कम से कम इनकी जमानत की राह में रोड़े न अटकाए।

`सहरोजा दावत' ने `कसूरवार जब बेनकाब हो गए तो बेकसूरों को सजा क्यों' के शीर्षक से लिखा है। जब सूरते हाल बदल चुकी है कि आतंकवाद के आरोप में जो मुसलमान जेलों में बंद हैं वह बेकसूर हैं तो उनको रिहा कर देना चाहिए। सवाल सिर्प रिहाई का नहीं है बल्कि उनके मुआवजे और कसूरवार पुलिस वालों को सजा दिलाने का भी है ताकि भविष्य में फिर से ऐसी गलतियां न हों।

बेहतर तो यही होता कि पोटा और टाडा की तरह कोई समीक्षा कमेटी गठित करने की मांग देश के मुसलमान शांतिप्रिय लोगों के साथ मिलकर करते क्योंकि यह रिहाई भी इतनी आसान नहीं है जितनी समझ में आती है, इसके लिए कानूनी प्रक्रिया से गुजरना होगा लेकिन यदि समीक्षा कमेटी गठित कर दी जाए तो शायद इससे इस काम में कुछ आसानी हो जाए। आतंकवाद की हकीकत सामने आने के बाद अब मुसलमानों को इसे प्रभावी ढंग से उठाना चाहिए। यह कोई नया मामला नहीं है बल्कि ऐसा होता रहता है, जुर्म कोई और करता है और गिरफ्तारी किसी और की हो जाती है। बाद में जब कसूरवाद पकड़े जाते हैं तो वह भी इसी तरह जेलों में रहते हैं जिस तरह बेकसूरवार पहले से हैं। बेकसूरों की रिहाई के लिए बहुत से कानूनी स्तरों से गुजरना पड़ता है। यह काम जितना आसान नजर आता है, वास्तव में नहीं है। लेकिन कोशिश की जाए तो कामयाबी जरूर मिलती है और मुसलमानों को इस समय यही काम करना होगा।

दैनिक `जदीद खबर' ने `मालेगांव के बेकसूर' में लिखा है। मालेगांव बम धमाकों के सिलसिले में गिरफ्तार किए गए मुसलमानों की समस्या यह है कि वह अपने नहीं किए गुनाह की सजा काट रहे हैं। 2008 में शहीद हेमंत करकरे की अगुवाई में जब मालेगांव बम धमाकों के सिलसिले में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर एण्ड कम्पनी को गिरफ्तार कर लिया गया तो इंसाफ की बात थी कि इन बेकसूर मुसलमानों को रिहा कर दिया जाता। भगवा आतंकवादियों की गिरफ्तारी और इनके खिलाफ मकोका अदालत में कायम किए गए मुकदमों के बाद अब स्वामी असीमानंद के इकबाले जुर्म के बाद इस बात की पूरी आशा थी कि तफ्तीशी एजेंसियां और विशेष मकोका अदालत जमीनी सच्चाई पर विचार करते हुए बेकसूरों की रिहाई के आदेश जारी करेगी। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण इन आरोपियों की रिहाई के रास्ते में रोड़े अटका दिए गए जिस पर मानवाधिकार संगठनों और मुसलमानों की ओर से तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की जा रही है। क्या अदालत और जांच एजेंसियां जमीनी सच्चाई को स्वीकार करते हुए इन आरोपियों को रिहा करने का आदेश जारी करेंगी।

`मालेगांव धमाका 2006 ः सीबीआई ने शुरू किया नया खेल' में सईद हमीद लिखते हैं। दिल्ली में सीबीआई की भूमिका कुछ और है...लेकिन महाराष्ट्र में सीबीआई कुछ और ही रंग दिखा रही है। ऐसा क्यों?

यह कहा जाता है कि वेस्टर्न जोन की सीबीआई के अधिकार क्षेत्र में महाराष्ट्र के साथ गुजरात भी शामिल है तो क्या मुंबई मुख्यालय की सीबीआई पर नरेन्द्र मोदी का ज्यादा प्रभाव है... या महाराष्ट्र और केंद्र सरकार की ओर से मुंबई में कुछ दिल्ली में कुछ और खेल दिखाया जा रहा है...?

Wednesday, February 2, 2011

राजनीति का मोहरा बना दारुल उलूम

दारुल उलूम देवबंद के नए मोहतमिम (कुलपति) मौलाना गुलाम मोहम्मद वस्तानवी द्वारा यह कहने के बाद कि नरेंद्र मोदी राज्य में मुसलमान भी अन्य संप्रदाय की तरह विकास की ओर अग्रसर हैं और उनके खिलाफ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाता है, उन पर उंगली उठने लगी है। मौलाना वस्तानवी को दारुल उलूम देवबंद की मजलिस शूरा (कार्यकारिणी) ने गत 10 जनवरी को बहुमत के आधार पर मोहतमिम बनाया था। मजलिस शूरा में 21 सदस्य हैं, जिनमें चार सदस्यों का निधन हो जाने के कारण उनकी जगह खाली है। बैठक में तीन सदस्य उपस्थित नहीं हुए थे। कुल 14 सदस्यों ने अपने मत का प्रयोग किया था, जिनमें चार सदस्यों ने दारुल उलूम के शिक्षक और जमीअत उलेमा हिंद के एक धड़े के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी को, दो सदस्यों ने दारुल उलूम के नायब मोहतमिम मौलाना अब्दुल खालिक मदरासी और आठ सदस्यों ने मौलाना वस्तानवी के पक्ष में मतदान किया। तब फैसले से बौखलाकर अशरद मदनी के करीबी रिश्तेदार मौलाना अब्दुल अलीम फारुकी ने यह शिगूफा छोड़ दिया कि वस्तानवी कासमी नहीं हैं, जबकि दारुल उलूम के संविधान में इस बाबत कोई दिशा-निर्देश नहीं है। यहीं से वस्तानवी को विरोध शुरू हो गया, लेकिन इसकी शक्ल वह नहीं थी, जो मोदी के संदर्भ में दिए गए बयान के बाद पैदा हुई है।
आम मुसलमानों सहित बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मौलाना वस्तानवी के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की, जिसके बाद वस्तानवी ने अपनी स्थिति स्पष्ट की। लेकिन उनके स्पष्टीकरण से बात बनी नहीं और यह आग दारुल उलूम तक पहुंच गई। फिलहाल दारुल उलूम में माहौल अपने हित में नहीं होने की बात स्वीकार कर वस्तानवी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है और गुजरात चले गए हैं। और इधर सबकी नजरें 23 फरवरी को होने वाली मजलिस शूरा की बैठक पर टिक गई है।
अनहद की ट्रस्टी और संस्थापक शबनम हाशमी कहती हैं कि मौलाना वस्तानवी का बयान इतनी छोटी घटना नहीं है, जिसे नजरंदाज किया जाए। उनके अनुसार, वस्तानवी ने जिस दिन मोदी से संबंधित बयान दिया, उसके अगले दिन गुजरात नरसंहार पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होने वाली थी। इसके अलावा वस्तानवी को कनाडा जाने के लिए वीजा चाहिए था, जो उन्हें नहीं मिल रहा था। शबनम का कहना है कि मोदी राज्य में मुसलमान के विकास करने की पोल एनएसएसओ की रिपोर्ट ने ही खोल दी है, जिसमें बताया गया है कि राज्य में 2005 के मुकाबले मुसलिम युवाओं की बेरोजगारी का ग्राफ बढ़ा है और उनकी शिक्षा में भी कमी आई है।
बहरहाल, इस पूरे घटनाक्रम का दुखद पहलू यह है कि मोदी को लेकर मुसलमानों को दो खेमों में बांटा जा रहा है और इसे सीधे तौर पर एक शैक्षणिक संस्था से जोड़ दिया गया है। मोदी का विरोध करने वालों को कट्टरपंथी और समर्थन करने वालों को उदारवादी मुसलमान के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है। इसी फॉरमूले के तहत सांप्रदायिक ताकतें दारुल उलूम की छवि कट्टरवाद के तौर पर पेश करती हैं। मदनी परिवार द्वारा दारुल उलूम का अपने हित में इस्तेमाल करने का जो आरोप वस्तानवी लगा रहे हैं, उससे वह खुद भी शिकार हैं। नरेंद्र मोदी के संबंध में की गई उनकी टिप्पणी उसी का हिस्सा है।
बीते दिनों एक मंत्री को मूर्ति भेंट करने की घटना पर वस्तानवी का कहना है कि वह तसवीर थी, पर जब एक उर्दू दैनिक ने मूर्ति के साथ उनकी तसवीर छाप दी, तो वह मौन हो गए। वस्तानवी के अनुसार, मूर्ति का मामला शूरा में भी आया था और वह उनके जवाब से संतुष्ट है। अगर यह सच है, तो यह सवाल लाजिमी है कि शूरा पर किसी तरह का दबाव था कि वह मूर्ति और तसवीर में फर्क नहीं कर पाई या फिर जानबूझकर इसकी अनदेखी की गई?
बहरहाल, मौलान अशरद मदनी की प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात के बाद यह कयास तेज हो गए हैं कि कांग्रेस ने मौलाना मदनी को इस पद पर लाने की योजना बना ली है। संभव है कि इसके लिए शूरा की खाली जगह पर ऐसे व्यक्तियों को लाया जाएगा, जो इस मिशन को पूरा करने में सहयोग देगा।

Monday, January 31, 2011

मौलाना वस्तानवी मोदी समर्थक और बाल ठाकरे के मुरीद हैं

बीते सप्ताह इस लिहाज से काफी महत्वपूर्ण रहा कि सभी ज्वलंत मुद्दों पर दारुल उलूम के नए मोहतामिम (वाइस चांसलर) मौलाना गुलाम वस्तानवी का गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के सन्दर्भ में दिया गया बयान एवं उनके द्वारा गत दिनों महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को मूर्ति पेश किए जाने का आरोप सब पर हावी रहा। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कुछ उर्दू अखबारों ने तो इस प्रकरण से पूरा पेज ही भर दिया जबकि कुछ अन्य ने इसे अपने अखबार की पहली खबर बनाई।

हैदराबाद से प्रकाशित दैनिक `मुनसिफ' ने अखबार की पहली खबर लगाकर तीन फोटो के साथ चार कॉलम में पुरी की है। पहला फोटो गुलाम वस्तानवी और दूसरा फोटो नरेन्द्र मोदी का है जिन्हें प्रसन्न मुद्रा में दिखाया गया है जबकि बीच में लगे फोटो में दंगे से प्रभावित रोते हुए हाथ जोड़े हुए एक मुसलमान को दिखाया गया है। एक एजेंसी द्वारा वस्तानवी से लिए गए साक्षात्कार के हवाले से कहा गया है कि गुजरात दंगों में दोनों समुदाय का नुकसान हुआ है किसी का कम, किसी का ज्यादा। अब अदालत का काम है कि पीड़ितों को इंसाफ दिलाए और उन्हें मुआवजा दिलाए। मोदी सरकार को चाहिए कि वह हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच सद्भाव पैदा करने की कोशिश करें। मौलाना ने भाजपा को यह कहते हुए प्रमाणपत्र दे दिया कि इस पार्टी की सोच में तब्दीली हो रही है विशेषकर गुजरात के सन्दर्भ में उसने यह महसूस कर लिया है कि मुसलमानों को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने अपनी इस बात के तर्प में कहा कि गत दिनों निकाय चुनावों में भाजपा ने 100 मुस्लिमों को निर्वाचित कराया। मौलाना गुलाम मोहम्मद वस्तानवी के इस बयान को मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने निरस्त कर दिया। मौलाना वस्तानवी इसके पूर्व यह कह चुके हैं कि गुजरात में मुसलमान खुश हैं और उनके साथ किसी तरह का भेदभाव नहीं किया जा रहा है। उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी है। इस पर पूरे देश में उलेमा सहित अन्य की ओर से तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की गई। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सदस्य एवं लखनऊ स्थित ऐश बाग ईदगाह के नायब इमाम मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने कहा कि नरेन्द्र मोदी ने ही मुसलमानों का नरसंहार कराया। उनके इस अपराध पर अमेरिका ने मोदी को अपने यहां का वीजा देने से इंकार कर दिया। सेकुलर हिन्दू भी पीड़ितों के इंसाफ के लिए लड़ रहे हैं। उनका कहना था कि मौलाना वस्तानवी ने गुजरात के जिस विकास का जिक्र किया है वह अल्पसंख्यकों के नरसंहार की कीमत पर हुआ है। हम ऐसे किसी विकास का गुणगान नहीं कर सकते जिसके लिए बेकसूरों का खून बहा हो, इस्लाम में यह हराम है। दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व चेयरमैन कमाल फारुकी ने कहा कि मौलाना वस्तानवी का काम फतवों को जारी करना है न कि मोदी को क्लीन चिट देना। सेकुलर भारत में कोई भी हिन्दू मौलाना के इस बयान की प्रशंसा नहीं करेगा। जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी ने सचेत किया कि मोहतामिम दारुल उलूम ने तुरन्त क्षमा नहीं मांगी तो अन्य उलेमाओं की सहायता से उनका मुकाबला किया जाएगा।

सोनिया गांधी के राजनीतिज्ञ सलाहकार अहमद पटेल की प्रतिक्रिया को दैनिक `सहाफत' ने लिखा कि `मोहतामिम के लायक नहीं वस्तानवी, मौलाना वस्तानवी की पाचन क्रिया सही नहीं।' अहमद पटेल ने मौलाना वस्तानवी से अपने किसी संबंध का खंडन किया है। उनका कहना है कि जिस तरह आम मुसलमान मुझसे मिलने आते हैं उसी तरह वस्तानवी आए थे। मौलाना वस्तानवी के सुपुत्र मुफ्ती हुजैफा ने अहमद पटेल को अपना नाना बताते हुए राजनीतिक स्तर पर कई दावे कर डाले थे। उनका दावा था कि गुजरात और महाराष्ट्र की कांग्रेस इकाई में जो चाहते वही होता। टिकट के बंटवारे से लेकर अन्य प्रशानिक कार्य में इनकी कोई अनदेखी नहीं कर सकता। अखबार के अनुसार आज यह सभी दावे बेनकाब हो गए। मौलाना वस्तानवी के मोहतामिम बनने के बाद अहमद पटेल से मिलने उनके निवास पर गए थे जिससे यह समझा जा रहा था कि मौलाना वस्तानवी का कांग्रेस और अहमद पटेल से गहरा रिश्ता है। लेकिन जब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के हक में बयान आया तो अंदाजा हुआ कि दाल में कुछ काला जरूर है। अखबार के मुताबिक अहमद पटेल ने कहा कि जिस आलिम का संबंध मुसलमानों के कातिल नरेन्द्र मोदी से हो, वह भला हमारा कैसे हो सकता है। इतनी बड़ी संख्या दारुल उलूम के लिए किसी योग्य व्यक्ति को जिम्मेदारी देनी चाहिए, क्योंकि मौलाना वस्तानवी दारुल उलूम देवबंद के मोहतामिम बनने योग्य नहीं हैं।

मौलाना वस्तानवी द्वारा अपने बयान का स्पष्टीकरण दिए जाने पर दैनिक `जदीद खबर' ने दारुल उलूम को बचाइए के शीर्षक से पहले पेज पर सम्पादक मासूम मुरादाबादी ने अपने विशेष सम्पादकीय में लिखा है कि मौलाना वस्तानवी की इस क्षमा याचना और स्पष्टीकरण के आ जाने के बाद होना तो यह चाहिए था कि इस विवादित अध्याय को यहीं बन्द कर दिया जाता। लेकिन अफसोस की बात यह है कि वह तत्व जो मौलाना वस्तानवी के दारुल उलूम के मोहतामिम बनाए जाने से नाराज थे, उन्होंने इस विवाद की आग पर लगातार तेल डालने का काम जारी रखा और इसके नतीजे में जो शोले भड़के वह दारुल उलूम तक जा पहुंचे। पत्रकारिता के नाम पर गंदगी फैलाने वाले कुछ बदनाम अखबार इस विवाद को मिल्लत में बेचैनी, अविश्वास फैलाने का कारण बना रहे हैं। इन अखबारों का संरक्षण वही ताकतें कर रही हैं, जिन्होंने हमेशा पेट्रोल उपलब्ध कराया है। ऐसा लगता है कि इन लोगों को मौलाना वस्तानवी की नियुक्ति से दारुल उलूम पर अपनी पारिवारिक पकड़ खत्म होती हुई नजर आती है। मौलाना वस्तानवी के दारुल उलूम के मोहतामिम पद से त्यागपत्र पर दैनिक `सहाफत' ने अपनी पहली खबर लगाई। `कौम व मिल्लत के सौदागर मौलाना वस्तानवी का त्यागपत्र, मौलाना मुस्तकीम आजमी की प्रतिक्रिया, दारुल उलूम की कार्यकारिणी के फैसले का इंतजार किए बिना मोहतामिम की कुर्सी छोड़कर इज्जत बचाने का सुझाव।' अखबार लिखता है कि समाचार के अनुसार आगामी 15 दिन में कार्यकारिणी की आपातकाल बैठक बुलाकर नए मोहतामिम की घोषणा कर दी जाएगी। मौलाना मुस्तकीम के हवाले से अखबार ने लिखा है कि उन्हें मौलाना वास्तानवी की इस बात पर सख्त आपत्ति है कि यदि कार्यकारिणी कहेगी तो त्यागपत्र दूंगा। उनका कहना है कि मौलाना वस्तानवी को चाहिए कि वह कार्यकारिणी के फैसले का इंतजार किए बिना कार्यकारिणी और मोहतामिम के पद से त्यागपत्र देकर यहां से चले जाएं। मौलाना आजमी का कहना है कि मौलाना वस्तानवी बुनियादी तौर पर तालीम के कारोबारी हैं जैसे महाराष्ट्र में बहुत सारे मंत्रियों ने इंजीनियरिंग और मेडिकल की शिक्षा के कॉलेज खोल रखे हैं उसी तरह से मौलाना वस्तानवी भी हैं। वह डोनेशन लेकर अपने कॉलेजों में दाखिला कराते हैं और यदि कोई गरीब हो तो उसके साथ दो फीसदी की भी छूट नहीं देते। शमा रहबर महाराष्ट्र के हवाले से लिखा है `मोदी समर्थक वस्तानवी अब हिन्दू हृदय सम्राट बाल ठाकरे की गोद में, कट्टर मुस्लिम दुश्मन शिवसेना मुख पत्र `सामना' में उमर बिन खत्ताब वैलफेयर ट्रस्ट की ओर से शिवसेना सुप्रीमो की वर्षगांठ पर मुबारकबाद।' औरंगाबाद (महाराष्ट्र) से फहमी अहमद कादरी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है `24 जनवरी 2011 के शिवसेना मुख पत्र `सामना' में वस्तानवी की एक संस्था उमर बिन खताब वैलफेयर ट्रस्ट का एक विज्ञापन प्रकाशित हुआ है। इस संस्था के नाजिम फारुक वस्तानवी मौलाना गुलाम वस्तानवी के भतीजे हैं। यह एक डीएड कॉलेज है। आमतौर पर शैक्षिक संस्थानों में दाखिला एवं जरूरी सूचना, आदि प्रकाशित की जाती है लेकिन वस्तानवी के इस अमूबाई अल्लाना वुमेन्स डीएड कॉलेज के विज्ञापन में इस बाबत कुछ नहीं है इसमें शिवसेना सुप्रीमो को उनकी वर्षगांठ पर बधाई दी गई है। अखबार ने `सामना' में छपे विज्ञापन को छापकर सवाल किया है कि इस विज्ञापन का मकसद क्या है...?? काबिलेगौर बात यह है कि मौलाना गुलाम वस्तानवी के सुपुत्र मौलाना सईद अहमद वस्तानवी उमर बिन खताब वैलफेयर ट्रस्ट के उपाध्यक्ष हैं और मौलाना फारुक वस्तानवी जो मौलाना गुलाम वस्तानवी के भतीजे हैं, इस ट्रस्ट के अध्यक्ष हैं। इस ट्रस्ट के अधीन दो और मदरसे चल रहे हैं जिनके जिम्मेदार मौलाना फारुक वस्तानवी हैं। रिपोर्ट में आगे है कि इससे स्पष्ट है कि वस्तानवी न केवल मोदी समर्थक हैं बल्कि वह बाल ठाकरे के मुरीद भी हैं।

Friday, January 21, 2011

मदरसों में अमेरिकी शिक्षक!

मदरसे आतंकवाद के अड्डे नहीं हैं और न ही भारतीय मुसलमानों का आतंकवादी संगठन अल-कायदा से कोई संबंध है। लेकिन अब यहां के मदरसों में पढ़ाने के लिए अमेरिका अपने शिक्षक भेजना चाहता है। इस संदर्भ में उसने एक परियोजना तैयार की है, जो विदेश मंत्रालय में विचाराधीन है। मदरसों में अमेरिकी शिक्षकों की भरती का कारण है। दरअसल महाशक्ति देश अपने प्रति मुसलमानों की गलत छवि दूर करना चाहता है। लेकिन क्या मामला इतने तक ही सीमित है या फिर यह मदरसों के पाठ्यक्रम में किसी परिवर्तन का संकेत है? या मदरसों की विचारधारा में, जिसका स्रोत कुरआन व हदीस है, संशोधन करने अथवा उसे प्रभावित करने की मंशा है?

यह प्रस्ताव ओबामा की भारत यात्रा से कोई चार महीने पहले बना था। तब अमेरिकी सरकार के विशेष दूत राशद हुसैन भारत आए थे। यहां उन्होंने पटना, मुंबई, दिल्ली और हैदराबाद सहित अन्य शहरों का भ्रमण करते हुए कॉलेजों, विश्वविद्यालयों का दौरा किया और लोगों को संबोधित भी किया। उन्होंने सरकारी अधिकारियों और बुद्धिजीवियों से मुलाकातें कर आतंकवाद के विरूद्ध लड़ाई, वैश्विक स्वास्थ्य सहित शिक्षा और उद्यम क्षेत्र पर विस्तृत चर्चा की थी। यह प्रस्ताव उनके दौरे के बाद ही सामने आया।

अब यह मामला बेशक विदेश मंत्रालय के अधीन है, लेकिन विशेषज्ञ इस पूरी प्रक्रिया को केंद्रीय मदरसा बोर्ड के गठन के बदले स्वरूप के तौर पर देख रहे हैं। उनका कहना है कि मदरसा बोर्ड का प्रस्ताव सरकार ने अमेरिका के इशारे पर पेश किया था, जिसका मदरसों सहित उलेमा ने विरोध किया था। ऑल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने तो इसके खिलाफ बाकायदा मुहिम भी चलाई थी, जिसकेचलते सरकार की यह मुहिम परवान न चढ़ सकी। इस नाकामी के बाद अमेरिका ने अपने शिक्षकों को मदरसों में पढ़ाने हेतु भरती करने की योजना बनाई है।

ओबामा के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिकी प्रशासन में भारतीय मूल की फराह पंडित, रशद हुसैन एवं उमर खालिदी ने यहां का दौरा कर मुसलमानों से संवाद किया, लेकिन ये सभी अपने मिशन में नाकाम रहे। ओबामा के ये दूत अपने दौरे के दौरान हमारे देश के मुसलमानों को इराक पर हमला, अफगानिस्तान पर बमबारी और फलस्तीन मामले में अमेरिकी नीति को लेकर पूछे गए सवालों का कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सके। उलटे कई जगहों पर ये खुद संकोच का शिकार नजर आए, जिसके चलते मुसलिम समाज ने उनके विचारों को कोई महत्व नहीं दिया।

तसवीर का दूसरा पहलू भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। इन दोनों कड़ियों को जोड़ने से जो समीकरण बनता है, वह काफी चौंकाने वाला है। मदरसा बोर्ड को लेकर दारुल उलूम सहित सभी बड़े मदरसों ने इसका विरोध किया था। दारुल उलूम, देवबंद के मोहतामिम के निधन के बाद वहां की कार्यकारिणी (मजलिस शुरा) ने शुरा सदस्य मौलाना गुलाम मोहम्मद वस्तानवी को मोहतामिम बनाया है। मौलाना वस्तानवी दीनी शिया के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा प्राप्त हैं और गुजरात के रहने वाले हैं। वह कई मदरसों का संचालन करते हैं। बताया जाता है कि उन पर हवाला मामले को लेकर भी आरोप लगे हैं। कहते हैं कि उनके कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल से भी करीबी रिश्ते हैं। मौलाना वस्तानवी ने मोहतामिम का पद संभालने के बाद कहा है कि आने वाले दिनों में शिक्षा का एक नया चेहरा सामने होगा।

बाबरी विध्वंस के बाद से कांग्रेस लगातार मुसलमानों की नाराजगी झेल रही थी और बार-बार उसे अपने करीब लाने की कोशिश में लगी थी। बताते हैं कि ‘मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा अधिकार कानून’ से मदरसों को बाहर रखने का सुझाव अहमद पटेल का ही था। इसके द्वारा कांग्रेस ने मुसलमानों को अपने करीब लाने की कोशिश की थी। तब तो वह कोशिश नाकाम हो गई, लेकिन मौलाना वस्तानवी के मोहतामिम बनने के बाद कांग्रेस की मदरसों पर कब्जा करने की पुरानी इच्छा पूरी हो गई हो, तो आश्चर्य नहीं। अब यह देखना दिलचस्प है कि मदरसों में अमेरिकी शिक्षकों की भरती मामले में नए मोहतामिम मौलाना वस्तानवी की अगुवाई में दारुल उलूम, देवबंद इसे निरस्त करता है या बदले हुए परिदृश्य में दोनों एक दूसरे को गले लगाते हैं।

Monday, January 3, 2011

अफगानिस्तान को बांटने की नापाक कोशिश

क्या अमेरिका ने अफगानिस्तान को बांटने की योजना बना ली है? अमेरिकी राष्ट्रपति का अफगान का गुप्त दौरा इस सिलसिले की कड़ी है या नहीं, इस बहस को किनारे भी कर दें, तो भी इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि तालिबान के साथ अमेरिका और नाटो के बीच गुप्त बातचीत हो रही है। लेकिन इस बातचीत में तालिबान के वास्तविक प्रतिनिधि शामिल हैं या नहीं, इसे लेकर अब तक संदेह बना हुआ है। यह वार्ता उसी रणनीति का हिस्सा है, जिसकी घोषणा अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने जनवरी, 2010 में की थी। इसका आधार कट्टर विचार रखने वाले लड़ाकुओं के बीच फूट डालने और नरमपंथी वर्ग से उन्हें विभाजित करना था। पेंटागन की रणनीति है कि नरमपंथियों को नागरिक जीवन में वापस लाया जाए, ताकि अफगान सरकार के साथ उनका समझौता हो सके।
इसके तहत सरकार और नरमपंथी वर्ग के बीच बातचीत शुरू हुई है। स्वयं अफगानी राष्ट्रपति हामिद करजई ने स्वीकार किया कि ‘अकसर’ तालिबान नेताओं के साथ उनकी बातचीत हो रही है। उन्होंने एक सरकारी ‘शांति परिषद’ का भी गठन किया है, जिसमें पूर्व अफगान गुटों एवं विभिन्न वर्गों को प्रतिनिधित्व दिया गया है। हालांकि इस परिषद के गठन की घोषणा के तुरंत बाद विद्रोही वर्गों ने इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया था, बावजूद अक्तूबर में काबुल के सेरेना होटल में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच शुरुआती दौर की बात हुई। यह बातचीत 2009 में सऊदी अरब के नेतृत्व में रियाद शहर में हुई बातचीत जैसी थी। फर्क इतना है कि रियाद की वार्ता में तालिबान के वास्तविक प्रतिनिधि मौजूद थे। जानकारों का मानना है कि तालिबान पर पाकिस्तान का प्रभाव होने के कारण वर्तमान बातचीत में सफलता नहीं मिल रही है। अफगान सरकार इसलामाबाद के प्रभाव से मुक्ति दिलाने की कोशिश कर रही है। अमेरिकी योजना है कि नाटो किसी तरह तालिबान को पराजित करे, ताकि वह राजनीतिक प्रक्रिया में भाग लेने के लिए तैयार हो जाए।
दूसरी ओर तालिबान ने अमेरिका के अलावा किसी से बात करने के प्रस्ताव को निरस्त कर दिया है। वह अफगान सरकार या किसी और से बात नहीं करना चाहता, क्योंकि वह करजई सरकार को गैरकानूनी मानते हुए उसे निरस्त करता है। वह अमेरिका से भी इस शर्त पर बात करना चाहता है कि अमेरिका पहले अफगानिस्तान से वापसी की समय सीमा की घोषणा कर दे। अरबी पत्रिका ‘अल-मुजल्ला’ के अनुसार, नाटो के एक अधिकारी ने बताया कि तालिबान जैसे ढांचे के साथ बात करना बहुत कठिनाई वाला काम है, क्योंकि उनका कोई परिचित ढांचा नहीं है। उनके लड़ाकुओं को डर है कि यदि उन्होंने केंद्रीय नेतृत्व की आज्ञा का पालन नहीं किया, तो उन्हें उसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। वहीं अन्य जानकारों का मानना है कि तालिबान फौज में नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी के बीच मतभेद है। पुराने नेता शांति संधि के हक में हैं, लेकिन युवा इसके खिलाफ।
राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिका तालिबान के साथ बात करने के प्रति गंभीर नहीं है और बातचीत को नाकाम बनाने का आरोप तालिबान के सिर मढ़ना चाहता है, ताकि पश्चिमी ताकतें अफगानिस्तान को टुकड़ों में बांटने की योजना पूरी कर सके। एक दैनिक अपनी समीक्षा में लिखता है, यदि पश्चिम की ओर से अफगानिस्तान को कई भागों में विभाजित किया जाता है, तो इससे ईरान, पाकिस्तान और अन्य देशों के विभाजन का दरवाजा खुल जाएगा। विभाजन की यह लहर मध्य एशिया में फैलकर चीन को अपनी लपेट में ले सकती है। उज्बेक, ताजिक और इराकी तुर्क अपनी आजादी की मांग कर रहे हैं, यदि ऐसा हुआ, तो इसलामी कट्टरपंथ अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाएगा, जो पश्चिमी ताकतों के हित में नहीं होगा।
अब जबकि यह स्पष्ट हो गया है कि बातचीत करने वाले तालिबान के वास्तविक प्रतिनिधि नहीं हैं, इससे पश्चिमी ताकतें सांसत में हैं। अब अगर अफगानिस्तान को बांटने की कोशिश हुई, तो इससे तालिबान या इसलाम समर्थकों का तो ज्यादा नुकसान नहीं होगा, लेकिन पश्चिमी ताकतों के लिए यह घाटे का सौदा साबित हो सकता है।

Monday, December 6, 2010

बिहार चुनाव से मुसलमानों को नई राह

बिहार विधानसभा चुनाव में राजग गठबंधन की शानदार जीत केबाद अब भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड को मिले मुसलिम वोटों का विश्लेषण जारी है। इस पूरे परिप्रेक्ष्य में सबसे ज्यादा दिक्कत मुसलिम जमाअतों और मिल्ली नेताओं को हो रही है, क्योंकि राज्य के मुसलमानों ने उनकी फासिज्म थ्योरी को खारिज कर विकास को अपना एजेंडा बनाया।
बिहार में करीब 16 फीसदी मुसलिम मतदाता हैं। तकरीबन 50 विधानसभा क्षेत्रों में इनकी तादाद 40 फीसदी है, जबकि 102 विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं, जहां मुसलिम वोट नतीजों को प्रभावित करने का माद्दा रखते हैं। इसकेबावजूद केवल 19 मुसलिम उम्मीदवार कामयाब हुए, जिनमें तीन महिलाएं शामिल हैं। वहीं 37 मुसलिम उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहे। अधिकतर मुसलिम क्षेत्रों में राजग की सफलता को विकास से जोड़कर देखा जा रहा है, जो एक अहम फैक्टर है, लेकिन राजग की सफलता में वोटों के विभाजन ने भी अहम भूमिका निभाई। विधानसभा पहुंचने वाली तीन मुसलिम महिलाओं में एक राज्य के मुख्य सचिव अफजल अमानुल्ला की पत्नी परवीन अमानुल्ला भी हैं, जो ऑल इंडिया मुसलिम मजलिस मुशावरत के सदस्य शहाबुद्दीन की बेटी हैं। परवीन जदयू के टिकट पर विजयी हुई हैं। उनके पिता पूरे देश में भाजपा की सांप्रदायिकता के खिलाफ अभियान छेड़े हुए हैं और मुसलमानों को भाजपा के करीब जाने से रोकने में अहम भूमिका निभा रहे हैं, लेकिन खुद उनकी बेटी उनके खिलाफ चली गई। इसलिए यह सवाल बहुत अहम हो जाता है कि क्या मुशावरत का भाजपा के प्रति दृष्टिकोण बदल गया है। मुसलिम जमाअतें जो हर मौके पर मुसलमानों को नसीहत देना अपना परम कर्तव्य समझती हैं, इस चुनाव में उनकी ओर से कोई अपील नहीं की गई। नतीजों के बाद जिन मुसलिम नेताओं ने अपनी जुबान खोली भी, उन्होंने सेक्यूलर पार्टियों को तो नसीहत दी, लेकिन किसी ने कांग्रेस को कठघरे में नहीं खड़ा किया कि उसने मुसलिम वोटों को प्रभावहीन करने के लिए इतनी बड़ी संख्या में अपने उम्मीदवार क्यों खड़े किए, जिसकेकारण राजग गठबंधन को अप्रत्याशित जीत हासिल हुई। निश्चय ही इससे कांग्रेस ने एक तीर से कई शिकार किए। लालू प्रसाद यादव और राम विलास पासवान को हाशिये पर पहुंचाया और मुसलमानों को प्रभावहीन कर उनको जोर का झटका दिया। राजग गठबंधन को 2005 के विधानसभा चुनावों की तुलना में तीन फीसदी ज्यादा वोट मिले, लेकिन उसे 63 सीटों का फायदा हुआ, जबकि राजद-लोजपा गठबंधन को नौ फीसदी कम वोट मिले, लेकिन उनकी सीटों की संख्या घटकर आधी रह गई। वहीं दो फीसदी ज्यादा वोट मिलने केबावजूद कांग्रेस की सीटें 2005 विधानसभा चुनाव की तुलना में आधी रह गईं। इससे साफ है कि वोटों के बिखराव ने राजग की शानदार जीत में अहम भूमिका निभाई। बिहार चुनाव में एक अहम बात यह भी रही कि जदयू ने भाजपा से गठबंधन के बावजूद भाजपा के कट्टर हिंदुत्व की छवि वाले नेता और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी व सांसद वरुण गांधी को चुनाव प्रचार के लिए राज्य में नहीं आने दिया। इसका फायदा यह हुआ कि जदयू पहले से मजबूत पार्टी बनकर उभरी और उसे 27 सीटों का फायदा हुआ। अब नीतीश की सरकार भाजपा के रहमोकरम पर नहीं रहेगी और न ही उसकेदबाव में काम करेगी। जदयू को समर्थन जारी रखना भाजपा की मजबूरी होगी, नहीं तो अन्य विधायकों का समर्थन हासिल करना जदयू केलिए कोई बड़ा काम नहीं होगा। एक न्यूज पोर्टल ने इन चुनावों में भाजपा को मिले मुसलिम वोट फीसदी का विश्लेषण करकेबताया कि भाजपा को मुसलिम वोट मिलने की बात करना सचाई के विपरीत है। इसके बावजूद यह बात अपनी जगह सही है कि भाजपा ने एक मुसलिम उम्मीदवार को टिकट दिया और वह कामयाब हो गया। इसी तरह गुजरात के पंचायत चुनाव में भाजपा ने 100 मुसलिम उम्मीदवारों को टिकट दिया और वे सभी कामयाब हो गए, जो ऐतिहासिक सचाई है। इसे यह कहकर खारिज नहीं किया जा सकता कि ऐसा करने के लिए मुसलमान मजबूर थे, क्योंकि वे भाजपा शासित गुजरात में मानसिक रूप से सहमे थे। दरअसल, कुछ मुसलिम बुद्घिजीवियों और मुसलिम नेताओं का यह स्वीकार्य नहीं है कि मुसलमान कांग्रेस केजाल से बाहर निकल आएं। कुछ भी हो, लेकिन बिहार के चुनावी नतीजों ने देश के मुसलमानों को एक नई राह दिखाई है।