यूनाइटेड लेबरेशन फ्रंट (उल्फा) के चेयरमैन राजखोवा को जमानत पर रिहा कर उत्तर पूर्व भाग में चल रहे आतंकवाद को खत्म करने की ओर एक अहम प्रयास किया है और इससे क्षेत्र में उम्मीद की आशा दिखाई पड़ती है।
अंग्रेजों ने यहां चाय बागान में चीनी मजदूरों को हटाकर मध्य भारत के मैदानी क्षेत्र से मजदूर लाना शुरू किया जिससे यहां की जनसंख्या का संतुलन बिगड़ गया और स्थानीय लोगों में बेचैनी पैदा होने लगी। उन्नीसवीं सदी के आखिर में भुखमरी और सूखे के कारण बहुत से लोगों की जानें गईं और यहां के क्षेत्र में स्थानीय आबादी कम हो गई जिसको मुहाजिर मजदूरों द्वारा पूरा किया गया। शुरू में अंग्रेजों ने असम को बंगला प्रेसीडेंसी का हिस्सा बनाकर रखा। बाद में यह भारत सरकार का एक राज्य हो गया। अंग्रेजों के जाने के बाद यहां कई साल तक शांति रही लेकिन स्थानीय आबादी और असमी नागरिकों के बीच घृणा जोर पकड़ती गई और असमी नागरिकों को यह लगता रहा कि देश के अन्य भागों विशेषकर बांगल से आए हुए लोगों ने इनको आर्थिक कंगाली पर पहुंचा दिया है। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बीच पूर्वी पाकिस्तान में चल रहे बंगलादेश आंदोलन के कराण लाखों बंगाली अपना देश छोड़कर यहां पनाह लेने पर विवश हुए उनको बहाना बनाकर यहां के स्थानीय नागरिकों ने यह कहना शुरू कर दिया कि बंगलादेश बन जाने के बावजूद लाखों मुहाजिर असम से वापस नहीं गए हैं जिसके कारण यहां की जनसंख्या का संतुलन बिगड़ गया है। असम के स्थानीय नागरिकों ने असम में बसने वाले सभी बंगालियों को विदेशी कहकर बाहर निकालने की मांग शुरू कर दी और कुछ ही वर्षों बाद यह घृणित आंदोलन सांप्रदायिक रुख अख्तियार कर गया क्योंकि ज्यादातर बंगाली बोलने वाले नागरिक मुसलमान थे। 1979 में पहले ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन और बाद में असम गण परिषद नामी संगठनों ने काफी हिंसात्मक आंदोलन चलाए। राज खोवा ने अपनी रिहाई के बाद कहा कि जब तक इनके सभी साथी रिहा नहीं हो जाते तब तक बातचीत शुरू नहीं हो सकती। भारत सरकार के नरम रुख को देखते हुए ऐसा लगने लगा है कि जल्द ही अन्या नेता भी रिहा हो जाएंगे और असम समस्या का कोई राजनीतिक हल निकलेगा। उल्फा की ओर से बातचीत की मेज पर आने के बाद देशवासी कश्मीरी चरमपंथियों से भी यही आशा करते हैं कि वह बन्दूक छोड़कर बातचीत की मेज पर आने के सिलसिले में पहल करेंगे ताकि साउथ एशिया के इस अहम क्षेत्र में पूर्ण रूप से शांति व्यवस्था स्थापित हो सके। दैनिक `अखबारे मशरिक' ने `श्रीकृष्णा कमेटी की रिपोर्ट की रोशनी में आंध्र प्रदेश में राजनैतिक संकट' में लिखा है कि पृथक तेलंगाना राज्य की स्थापना के सवाल पर इस समय आंध्र प्रदेश में जबरदस्त राजनैतिक भूचाल मचा हुआ है और सरकार अन्दर से डरी हुई है कि यह मामला हाथ से बेहाथ न हो जाए। 1953 में जब जस्टिस फजल अली की अगुवाई में राज्यों के पुनर्गठन का आयोग बनाया गया तो उस समय भी तेलंगाना का मसला खड़ा हुआ था। उस समय राज्य के एक वर्ग ने संयुक्त आंध्र प्रदेश के हक में राय दी थी जिस पर प्रजा राज्यम, सीपीआईएम और मज्लिस इत्तेहादुल मुसलमान आज भी कायम हैं। इसी के साथ पृथक तेलंगाना राज्य की मांग भी उठी थी।
इतना तो तय है कि श्रीकृष्णा रिपोर्ट पर विभिन्न पार्टियों की ओर से भिन्न और एक दूसरे के विपरीत प्रतिक्रिया सामने आएंगी। ऐसे में कोई स्पष्ट फैसला करना केंद्र के लिए एक टेढ़ी खीर साबित होगा। यदि सरकार पृथक तेलंगाना की मांग मान लेती है तो कांग्रेस निश्चित रूप से दो भागों में विभाजित हो जाएगी और विद्रोही कांग्रेसी में जगन रेड्डी की स्थिति मजबूत हो जाएगी। पृथक तेलंगाना राज्य के हक में फैसला देश के विभिन्न भागों में छोटे राज्यों की मांग को समर्थन मिलेगा। कांग्रेस एक तूफानी संकट से गुजर रही है। देखना है कि वह इस संकट से कैसे उबरती है। `इंसाफ की डगर' मैं दैनिक `हमारा समाज' ने लिखा है कि 18 वर्ष बाद मुंबई दंगों के 10 मुस्लिम युवक बरी हो चुके हैं लेकिन यह अपने पीछे कई ऐसे सवाल छोड़ गई है जिनका हर दिमाग में आना स्वाभाविक है। सबसे आश्चर्यजनक पहलू यह है कि 18 वर्ष बाद ऐसे मुकदमे का फैसला आया है जो प्रथमदृष्टि में पुलिस पक्षपात को जाहिर कर रहा था। इसलिए कि गवाह कोई और नहीं बल्कि कुरला पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर शिंदे और इनके सहायक थे। दोनों के बयानात में विरोधाभास पाया जा रहा था और सुबूत के तौर पर ऐसी चीजें पेश की गईं जो बाजार में आसानी से उपलब्ध हैं। मतलब यह है कि पुलिस की फर्जी कहानी पहले दिन से उजागर थी फिर भी इतने लम्बे समय के बाद फैसला क्यों आया, आश्चर्यजनक है। 18 वर्ष में एक बच्चा जवान, जवान बूढ़ा और बूढ़ा मौत की दहलीज पर पहुंच जाता है। बहरहाल 18 वर्ष बाद ही सही मुस्लिम युवाओं की बेगुनाही साबित हो गई, पुलिस की भेदभाव वाली भूमिका और मुस्लिम दुश्मनी उजागर हो गई। इस मुकदमे में यह तीन पहलू विचारणीय हैं। हैदराबाद से प्रकाशित दैनिक `मुनसिफ' ने `पुलिस प्रशासन में सुधार' में लिखा है। कनाडा में उच्च पद पर भारतीय मूल के टोरंटो पुलिस बोर्ड चेयरमैन आलोक मुखर्जी ने अपने एक साक्षात्कार में कहा है कि भारतीय पुलिस प्रशासन में तेजी के साथ सुधार स्वयं भारत के हित में है। उन्होंने भारतीय पुलिस शासन को उपनिवेशवाद (अंग्रेजों) शासकों का बरसा करार देते हुए कहा कि उपनिवेशवाद शासन जनता को अपना दुश्मन समझते थे। इसलिए पुलिस फोर्स को उनके खिलाफ इस्तेमाल किया जाता था। उन्होंने कहा कि भारतीय पुलिस राजनेताओं के अधीन है और इस तरह की पुलिस कार्यवाहियों पर रोक लगा देनी चाहिए। उन्होंने भारतीय पुलिस अधिकारियों को अच्छा व्यवहार न करने और कांस्टेबल की कम पगार को पुलिस विभाग में घूस का कारण बताया। भारतीय पुलिस व्यवस्था में सुधार निश्चय ही देश एवं कौम के हित में होगा। यदि पुलिस फोर्स को राजनैतिक शासकों के प्रभाव से आजाद कर दिया जाता है तो देश में 60 साल से अधिक समय से जारी भ्रष्टाचारी पर रोक संभव है। क्योंकि भ्रष्टाचार में लिप्त राजनेता/शासकों को अपने खिलाफ पुलिस कार्यवाही का डर पैदा हो जाएगा, यही वह मोड़ है जहां से भ्रष्टाचार के खात्मे के शुरुआत होगी। दैनिक `हिन्दुस्तान एक्सप्रेस' ने `मुस्लिम वोट की जंग' के शीर्षक से लिखा है कि बिहार के बाद अब उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोट की जंग छिड़ गई है। विधानसभा चुनाव के दिन जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं यह जंग तेज होती जा रही है। सवाल यह नहीं कि यह जंग किस-किस रूप में सामने आ रही है और चुनाव का समय करीब आने पर क्या गुल खिलाएगी? सवाल यह भी है कि इस जंग में खुद मुसलमान कहां खड़े हैं और क्या वह सिर्प मैदान जंग या इस्तेमाल ही होते रहेंगे? मुस्लिम नेताओं व कार्यकर्ताओं की भूमिका केवल शतरंज के मोहरों और बादशाह के सिपाहियों की ही रहेगी या फिर वह सियासी पार्टियों की इस जंग से कोई फायदा भी उठाएंगे? इनकी अपनी आवाज भी जगह हासिल कर सकेगी और इनका नेतृत्व भी अपनी भूमिका निभा सकेगी? राज्य में हर वर्ग और हर जाति की सियासत और उसका रुख स्पष्ट है। यादव मुलायम के साथ हैं।
ब्राह्मण राजपूत, भाजपा और कांग्रेस में विभाजित हैं। बनिये, कायस्थ, भूमिहार और अन्य जातियां भाजपा के साथ हैं, जाट अजीत सिंह के साथ हैं। हिन्दुओं की अन्य जातियों की भी अपनी पार्टी है। ले-दे कर केवल मुसलमान मुफ्त माल हैं। इसलिए उन पर हर तरफ से जाल डाला जा रहा है लेकिन मुसलमान है कि हल्के फुल्के दाने या फिर भावुक नारों में आ जाते हैं। जब तक वह अपने आपको नहीं बदलते, वह खुद ठोस समस्याओं और विकास एवं सत्ता में साझेदारी के एजेंडे पर नहीं आते, मुस्लिम वोट की जंग सकारात्मक रुख अख्तियार नहीं कर सकती।
A Blog is specially build for minorities. Where you can find a latest article as well as Issues. there is no need to recognize a muslim but there is a lot of work for humanity.
Tuesday, February 8, 2011
Monday, February 7, 2011
करकरे की हत्या, सच्चाई सामने आनी चाहिए
कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह द्वारा हेमंत करकरे से मौत से पूर्व बात करने सहित अमेरिकी दबाव में संधि एवं चीनी प्रधानमंत्री की भारत यात्रा, आशाएं और जैसे अनेक मुद्दों को उर्दू अखबारों ने चर्चा का विषय बनाया है।
दैनिक `हिन्दुस्तान एक्सप्रेस' ने `दिग्विजय सिंह की कथनी और खंडन' के तहत लिखा है कि जिस तरह यह चर्चा का विषय बना हुआ है वह बहुत अफसोसजनक है। उन्होंने चंद दिन पूर्व नई दिल्ली के इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में एक सम्मेलन में भाषण देते हुए यह रहस्योद्घाटन किया था कि हेमंत करकरे ने अपने कत्ल से सिर्प दो घंटे पूर्व फोन पर उनसे बात की थी और बताया था कि वह बेहद परेशान हैं और गंभीर परिणाम भुगतने की धमकियां दी जा रही हैं। उन्होंने कहा था कि षड्यंत्र करना और झूठे प्रचार करना आरएसएस के लोगों की पुरानी आदत है। यह किताब के लोकार्पण पर आयोजित गोष्ठी थी और जिस किताब का उन्होंने विमोचन किया उसका नाम है। `आरएसएस की साजिश 26/11?' उनका यह बयान अगले दिन केवल उर्दू समाचार पत्रों में स्थान पा सका था लेकिन उसके चार दिन बाद जब एक अंग्रेजी दैनिक ने इनके इस बयान को पहली खबर बना दी तो हंगामा हो गया और अब कांग्रेस यह कह कर अपना दामन बचा रही है कि यह उनका व्यक्तिगत बयान है इससे जार्टी का कुछ लेना-देना नहीं है। वहीं स्वयं दिग्विजय सिंह सफाई दे रहे हैं कि मैंने यह कब कहा कि करकरे के कत्ल में उन ताकतों का हाथ है जो मालेगांव बम धमाके की तहकीकात से परेशान थे। मैंने तो केवल यह कहा है कि करकरे से इस दिन मेरी बात हुई थी और वह बहुत परेशान थे। वह अब इससे भी इंकार कर रहे हैं कि करकरे ने उनको फोन किया था। कह रहे हैं कि मैंने करकरे को फोन किया था। सवाल यह है कि जब अपनी बातचीत के बारे में इतने दिनों तक मौन रहे, कभी जरूरत नहीं समझी कि इसका रहस्योद्घाटन करें तो फिर इतने सनसनी अंदाज में आज इसका जिक्र करने की जरूरत क्यों पेश आ गई? वह अब कह रहे हैं कि न ही इस वारदात समझा जाए? क्या है जो 6 दिसम्बर के दिन इस कार्यक्रम में भारी संख्या में मौजूद थे।
`हेमंत करकरे की मौत' पर दैनिक `सियासत' ने अपने संपादकीय में लिखा है कि मुंबई हमलों के समय करकरे की मौत से ही कई सवाल उठने लगे थे। यह सवाल किया जा रहा था कि इतने गंभीर आतंकवादी हमलों के स्थान पर करकरे और उनके साथी किसी सूचना के बिना अचानक क्यों पहुंच गए? उनकी जैकेट भी लापता हो गई थी। यह वह सवालात थे जो उस समय उठे थे लेकिन तब उनको जुबान नहीं मिल सकी। अब कांग्रेस के एक जिम्मेदार महासचिव दिग्विजय सिंह ने स्वयं यह संदेह व्यक्त किया है कि हिन्दू आतंकवादी संगठन करकरे की मौत के जिम्मेदार हो सकते हैं क्योंकि इन संगठनों से खतरे की बात स्वयं करकरे ने बताई थी। दिग्विजय सिंह के रहस्योद्घाटन इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इस समय दुनिया भर में तहलका मचाने वाले वीकीलेक्स के रहस्योद्घाटन से यह सच्चाई सामने आई है कि कांग्रेस पार्टी ने मुंबई में हुए आतंकवाद हमलों के बाद धार्मिक राजनीति की है। जबकि दिग्विजय सिंह की तरह वीकीलेक्स दस्तावेजों में किए गए रहस्योद्घाटन को भी बेबुनियाद करार देते हुए उन्हें नजर अंदाज किया जा रहा है। इसलिए जरूरत इस बात की है कि इस पूरे घटना की सच्चाई को सारी हिन्दुस्तानी कौम के सामने लाया जाए। सच्चाई को सामने लाने के लिए केंद्र और महाराष्ट्र दोनों ही सरकारों को इन आरोपों की छानबीन का आदेश देना चाहिए।
दैनिक `उर्दू टाइम्स' ने `हेमंत करकरे पर राजनीति अफसोसनाक' में लिखा है कि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि करकरे ऐसे ईमानदार अधिकारी साबित हुए हैं जिन्होंने बम धमाके के आरोपियों को बेनकाब किया और पहली बार हिन्दू आतंकवादियों को मालेगांव बम धमाके में लिप्त होने के आरोप में गिरफ्तार किया था जिसके कारण भगवा संगठन हेमंत करकरे की मुखालिफ हो गई। यदि हेमंत करकरे के दिमाग में हिन्दू-मुस्लिम की भावना होती तो यह संभव नहीं था। वह एक सेकुलर और मजबूत इरादों के मालिक थे। उन्होंने कभी हिन्दू बनकर काम नहीं किया बल्कि एक सच्चे और ईमानदार अधिकारी के तौर पर काम किया और इसी में है वह सही नहीं है। नेताओं को इस तरह की बयानबाजी से करना चाहिए ताकि आम आदमी के शरीर पर लगे जख्म ठीक हो सकें।
`अमेरिका के दबाव में संधि' के तहत दैनिक `सहाफत' ने लिखा है कि मीडिया विशेषकर अंग्रेजी मीडिया को जब यह पता चलता है कि कोई काम अमेरिकी दबाव में आकर किया गया है तो उसकी तेजी खत्म हो जाती है, तेवर नरम पड़ जाते हैं और हाथ-पांव ठंडे पड़ जाते हैं। यही कारण है कि तुर्पमानिस्तान से गैस पाइप लाइन पर कोई चर्चा तो दूर उसे कोई महत्व भी देने की जरूरत नहीं समझी गई। यदि यही संधि ईरान से हुई होती तो चारों तरफ चेतावनी और खतरे वाले भोंपू बजने लगते। अब एक और खबर आई है जो इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसका प्रभाव छोटे-छोटे उद्योगों पर भी पड़ सकता है। भारत में बहुत से ऐसे छोटे-छोटे उद्योग हैं जिनमें कोयले का इस्तेमाल किया जाता है और कोयले के इस्तेमाल की वजह से बड़ी संख्या में कार्बन डाई आक्साइड निकलती है। इसी आधार पर भारत इस संधि पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर रहा था। पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश इसी आश्वासन के साथ कानकुन गए थे लेकिन वहां पहुंचकर उन्होंने भाषण के बीच अपना लहजा बदल दिया जिससे अंदाजा हुआ कि उन्होंने अमेरिकी दबाव कुबूल कर लिया है। राष्ट्रपति बराक ओबामा शुरू से कह रहे थे कि भारत को इस संधि पर हस्ताक्षर करना ही होगा। जयराम रमेश के बदले लहजे पर यहां के राजनैतिक हलकों और मीडिया में काफी हंगामा हुआ, लेकिन अब वही समाचार पत्र जो कल तक ऐसी किसी संधि के खिलाफ थे, अब अपने संपादकीय धारा हमें यह समझा रहे हैं कि स्वास्थ्य और पर्यावरण आर्थिक उन्नति से ज्यादा अहम है।
इसलिए यदि यह संधि हो जाती है तो हमें इस संधि का विरोध नहीं करना चाहिए। इसमें कोई दो राय नहीं कि पर्यावरण की बेहतरी हम सबके हित में है लेकिन इसके लिए जरूरी है कि कोयले की मदद से चलने वाले उद्योगों को विकल्प दिया जाए, अन्यथा यह उद्योग दम तोड़ देंगे। शायद यही कारण है कि स्टाक एक्सचेंज के विशेषज्ञ सुझाव देने लगे हैं कि छोटे उद्योगों के शयेर न खरीदे जाएं।
`राष्ट्रीय सहारा' ने चीनी प्रधानमंत्री की भारत यात्रा ः आशा एवं संभावनाएं में लिखा है कि भारत-चीन संबंधों के लिए कभी गर्म और कभी नरम की शब्दावली का इस्तेमाल किया जाए तो गलत न होगा। चीनी प्रधानमंत्री 400 व्यापारियों का एक बड़ा प्रतिनिधि मंडल अपने साथ लेकर आ रहे हैं और वह भारत-चीन कंपनियों के बीच बिजली से लेकर दवाओं के विभिन्न क्षेत्रों में 20 अरब डालर के 45 से अधिक व्यापारिक समझौते के इच्छुक हैं। दोनों देशों के नेतृत्व को जनता के संपर्प को बढ़ावा देना चाहिए और सीमा विवाद के स्वीकार हल तलाश करने में गंभीरतापूरक कोशिश करनी चाहिए।
दैनिक `हिन्दुस्तान एक्सप्रेस' ने `दिग्विजय सिंह की कथनी और खंडन' के तहत लिखा है कि जिस तरह यह चर्चा का विषय बना हुआ है वह बहुत अफसोसजनक है। उन्होंने चंद दिन पूर्व नई दिल्ली के इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में एक सम्मेलन में भाषण देते हुए यह रहस्योद्घाटन किया था कि हेमंत करकरे ने अपने कत्ल से सिर्प दो घंटे पूर्व फोन पर उनसे बात की थी और बताया था कि वह बेहद परेशान हैं और गंभीर परिणाम भुगतने की धमकियां दी जा रही हैं। उन्होंने कहा था कि षड्यंत्र करना और झूठे प्रचार करना आरएसएस के लोगों की पुरानी आदत है। यह किताब के लोकार्पण पर आयोजित गोष्ठी थी और जिस किताब का उन्होंने विमोचन किया उसका नाम है। `आरएसएस की साजिश 26/11?' उनका यह बयान अगले दिन केवल उर्दू समाचार पत्रों में स्थान पा सका था लेकिन उसके चार दिन बाद जब एक अंग्रेजी दैनिक ने इनके इस बयान को पहली खबर बना दी तो हंगामा हो गया और अब कांग्रेस यह कह कर अपना दामन बचा रही है कि यह उनका व्यक्तिगत बयान है इससे जार्टी का कुछ लेना-देना नहीं है। वहीं स्वयं दिग्विजय सिंह सफाई दे रहे हैं कि मैंने यह कब कहा कि करकरे के कत्ल में उन ताकतों का हाथ है जो मालेगांव बम धमाके की तहकीकात से परेशान थे। मैंने तो केवल यह कहा है कि करकरे से इस दिन मेरी बात हुई थी और वह बहुत परेशान थे। वह अब इससे भी इंकार कर रहे हैं कि करकरे ने उनको फोन किया था। कह रहे हैं कि मैंने करकरे को फोन किया था। सवाल यह है कि जब अपनी बातचीत के बारे में इतने दिनों तक मौन रहे, कभी जरूरत नहीं समझी कि इसका रहस्योद्घाटन करें तो फिर इतने सनसनी अंदाज में आज इसका जिक्र करने की जरूरत क्यों पेश आ गई? वह अब कह रहे हैं कि न ही इस वारदात समझा जाए? क्या है जो 6 दिसम्बर के दिन इस कार्यक्रम में भारी संख्या में मौजूद थे।
`हेमंत करकरे की मौत' पर दैनिक `सियासत' ने अपने संपादकीय में लिखा है कि मुंबई हमलों के समय करकरे की मौत से ही कई सवाल उठने लगे थे। यह सवाल किया जा रहा था कि इतने गंभीर आतंकवादी हमलों के स्थान पर करकरे और उनके साथी किसी सूचना के बिना अचानक क्यों पहुंच गए? उनकी जैकेट भी लापता हो गई थी। यह वह सवालात थे जो उस समय उठे थे लेकिन तब उनको जुबान नहीं मिल सकी। अब कांग्रेस के एक जिम्मेदार महासचिव दिग्विजय सिंह ने स्वयं यह संदेह व्यक्त किया है कि हिन्दू आतंकवादी संगठन करकरे की मौत के जिम्मेदार हो सकते हैं क्योंकि इन संगठनों से खतरे की बात स्वयं करकरे ने बताई थी। दिग्विजय सिंह के रहस्योद्घाटन इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इस समय दुनिया भर में तहलका मचाने वाले वीकीलेक्स के रहस्योद्घाटन से यह सच्चाई सामने आई है कि कांग्रेस पार्टी ने मुंबई में हुए आतंकवाद हमलों के बाद धार्मिक राजनीति की है। जबकि दिग्विजय सिंह की तरह वीकीलेक्स दस्तावेजों में किए गए रहस्योद्घाटन को भी बेबुनियाद करार देते हुए उन्हें नजर अंदाज किया जा रहा है। इसलिए जरूरत इस बात की है कि इस पूरे घटना की सच्चाई को सारी हिन्दुस्तानी कौम के सामने लाया जाए। सच्चाई को सामने लाने के लिए केंद्र और महाराष्ट्र दोनों ही सरकारों को इन आरोपों की छानबीन का आदेश देना चाहिए।
दैनिक `उर्दू टाइम्स' ने `हेमंत करकरे पर राजनीति अफसोसनाक' में लिखा है कि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि करकरे ऐसे ईमानदार अधिकारी साबित हुए हैं जिन्होंने बम धमाके के आरोपियों को बेनकाब किया और पहली बार हिन्दू आतंकवादियों को मालेगांव बम धमाके में लिप्त होने के आरोप में गिरफ्तार किया था जिसके कारण भगवा संगठन हेमंत करकरे की मुखालिफ हो गई। यदि हेमंत करकरे के दिमाग में हिन्दू-मुस्लिम की भावना होती तो यह संभव नहीं था। वह एक सेकुलर और मजबूत इरादों के मालिक थे। उन्होंने कभी हिन्दू बनकर काम नहीं किया बल्कि एक सच्चे और ईमानदार अधिकारी के तौर पर काम किया और इसी में है वह सही नहीं है। नेताओं को इस तरह की बयानबाजी से करना चाहिए ताकि आम आदमी के शरीर पर लगे जख्म ठीक हो सकें।
`अमेरिका के दबाव में संधि' के तहत दैनिक `सहाफत' ने लिखा है कि मीडिया विशेषकर अंग्रेजी मीडिया को जब यह पता चलता है कि कोई काम अमेरिकी दबाव में आकर किया गया है तो उसकी तेजी खत्म हो जाती है, तेवर नरम पड़ जाते हैं और हाथ-पांव ठंडे पड़ जाते हैं। यही कारण है कि तुर्पमानिस्तान से गैस पाइप लाइन पर कोई चर्चा तो दूर उसे कोई महत्व भी देने की जरूरत नहीं समझी गई। यदि यही संधि ईरान से हुई होती तो चारों तरफ चेतावनी और खतरे वाले भोंपू बजने लगते। अब एक और खबर आई है जो इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसका प्रभाव छोटे-छोटे उद्योगों पर भी पड़ सकता है। भारत में बहुत से ऐसे छोटे-छोटे उद्योग हैं जिनमें कोयले का इस्तेमाल किया जाता है और कोयले के इस्तेमाल की वजह से बड़ी संख्या में कार्बन डाई आक्साइड निकलती है। इसी आधार पर भारत इस संधि पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर रहा था। पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश इसी आश्वासन के साथ कानकुन गए थे लेकिन वहां पहुंचकर उन्होंने भाषण के बीच अपना लहजा बदल दिया जिससे अंदाजा हुआ कि उन्होंने अमेरिकी दबाव कुबूल कर लिया है। राष्ट्रपति बराक ओबामा शुरू से कह रहे थे कि भारत को इस संधि पर हस्ताक्षर करना ही होगा। जयराम रमेश के बदले लहजे पर यहां के राजनैतिक हलकों और मीडिया में काफी हंगामा हुआ, लेकिन अब वही समाचार पत्र जो कल तक ऐसी किसी संधि के खिलाफ थे, अब अपने संपादकीय धारा हमें यह समझा रहे हैं कि स्वास्थ्य और पर्यावरण आर्थिक उन्नति से ज्यादा अहम है।
इसलिए यदि यह संधि हो जाती है तो हमें इस संधि का विरोध नहीं करना चाहिए। इसमें कोई दो राय नहीं कि पर्यावरण की बेहतरी हम सबके हित में है लेकिन इसके लिए जरूरी है कि कोयले की मदद से चलने वाले उद्योगों को विकल्प दिया जाए, अन्यथा यह उद्योग दम तोड़ देंगे। शायद यही कारण है कि स्टाक एक्सचेंज के विशेषज्ञ सुझाव देने लगे हैं कि छोटे उद्योगों के शयेर न खरीदे जाएं।
`राष्ट्रीय सहारा' ने चीनी प्रधानमंत्री की भारत यात्रा ः आशा एवं संभावनाएं में लिखा है कि भारत-चीन संबंधों के लिए कभी गर्म और कभी नरम की शब्दावली का इस्तेमाल किया जाए तो गलत न होगा। चीनी प्रधानमंत्री 400 व्यापारियों का एक बड़ा प्रतिनिधि मंडल अपने साथ लेकर आ रहे हैं और वह भारत-चीन कंपनियों के बीच बिजली से लेकर दवाओं के विभिन्न क्षेत्रों में 20 अरब डालर के 45 से अधिक व्यापारिक समझौते के इच्छुक हैं। दोनों देशों के नेतृत्व को जनता के संपर्प को बढ़ावा देना चाहिए और सीमा विवाद के स्वीकार हल तलाश करने में गंभीरतापूरक कोशिश करनी चाहिए।
`जेपीसी और आरएसएस का आतंकवाद सिक्के के दो रुख'
बीते सप्ताह जहां 2जी स्पेक्ट्रम और महंगाई का मुद्दा छाया रहा वहां अजमेर बम धमाके के आरोपी स्वामी असीमानंद का इकबालिया बयान सभी मुद्दों पर हावी पड़ गया और इकबालिया बयान के विभिन्न पहलुओं की समीक्षा का सिलसिला शुरू हो गया है। पेश है इस बाबत उर्दू अखबारों की राय।
हैदराबाद से प्रकाशित दैनिक `एतमाद' ने `जेपीसी और आरएसएस का आतंकवाद एक सिक्के के दो रुख' के शीर्षक से लिखा है। आरएसएस का आतंकवाद जैसे-जैसे बेनकाब होने लगा है और आतंकवाद में लिप्त इसके नेता गण इकबाले जुर्म करने लगे हैं। 2जी स्पेक्ट्रम की ज्वाइंट पार्लियामेंटरी कमेटी (जेपीसी) द्वारा कराने की जांच के लिए भाजपा की मांग जोर पकड़ती जा रही है। महसूस यह होता है कि आरएसएस का आतंकवाद और जेपीसी के लिए भाजपा की मांग में कोई आपसी संबंध है। आरएसएस नेताओं को जो आतंकवाद में लिप्त हैं। भाजपा कानून के शिकंजे से छुटकारा दिलाना चाहती हैं ताकि `हिन्दू राष्ट्रभक्त' आरएसएस का शरीर जो खून से भरा है है उसे दूध से नहलाया जा सके। गोहाटी में भाजपा कार्यकारिणी में पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने जिस भाषा का प्रयोग किया है वह यह जाहिर करता है कि आरएसएस को आतंकवाद के आरोप से मुक्ति दिलाने के लिए भाजपा सरकार से सौदेबाजी करना चाहती है। असम में गडकरी ने मक्का मस्जिद और समझौता एक्सप्रेस धमाकों के बारे में असीमानंद के रहस्योद्घाटन को सोनिया और राहुल गांधी के संरक्षण में एक षड्यंत्र करार दिया और कहा कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले से ध्यान हटाने के लिए हिन्दू आतंकवाद का हव्वा खड़ा किया जा रहा है और जो भी हो रहा है, वह सोनिया और राहुल गांधी का षड्यंत्र है।
`हिन्दू आतंकवाद का नेटवर्प' के तहत दैनिक `सियासत' ने लिखा है। भारत में हिन्दू आतंकवाद के विषय पर संघ परिवार ने खुद को पाक साफ और राष्ट्रीय होने का दावा किया था। संघ परिवार के सभी छोटे-बड़े कार्यकर्ता भारत को अपनी जागीर समझते हुए अन्य नागरिकों विशेषकर अल्पसंख्यकों को निशाना बनाते हुए अपना दबदबा कायम करने की कोशिश की। सरकार की आंख में धूल झोंक कर आतंकवादी हमलों का आरोप अल्पसंख्यकों के सिर थोपने में सफल हुआ। इस घटना से कई मुस्लिम बच्चे जेल में हैं और उनका भविष्य अंधकारमय बन चुका है। मक्का मस्जिद बम धमाके में खुफिया एजेंसियों की कार्यवाहियों ने संघ परिवार के काले चेहरे को बेनकाब कर दिया है। मक्का मस्जिद के आरोपी असीमानंद के इकबाले जुर्म के साथ यह सच्चाई भी उजागर हुई है कि आतंकवाद गतिविधियों के पीछे संघ परिवार का बड़ा नेटवर्प काम कर रहा है। देश में आतंकवाद फैलाने और भय के साथ-साथ मुसलमानों को संदिग्ध बनाने के लिए एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत नेटवर्प सक्रिय है। मस्जिस्ट्रेट के सामने भारतीय दंड संहिता की धारा 164 के तहत कलमबंद बयान में असीमानंद ने संघ परिवार के हिन्दुत्व आतंकवादी नेटवर्प को बेनकाब किया है तो सरकार का यह दायिव है कि इस मामले में पूरी जांच कर संघ परिवार पर पाबंदी लगाए।
सह रोजा `दावत' ने `आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त होने के नाम पर गिरफ्तारियों की हककीत' में लिखा है। देश की खुफिया एजेंसियों की तफ्तीश से यह राज् ा खुलने लगा है कि गत कुछ वर्ष से देश के अंदर जो आतंकी गतिविधियां हुई हैं उन सबके पीछे सलमानों का हाथ नहीं था। न केवल उन्हें रिहा कर दिया जाना चाहिए बल्कि इनकी इज्जत पर जो दाग लगा है उसको धोने की भी व्यवस्था की जानी चाहिए एवं उन्हें उचित मुआवजा भी दिया जाना चाहिए ताकि वहअपना भविष्य संवार सकें। `खबरो नजर' के अपने स्तंभ में परवाज रहमानी ने `दो बिन्दु विचारणीय हैं' के शीर्षक से लिखा है। असीमानंद के इस बयान की मूल प्रति मीडिया को पुलिस ने उपलबध कराई है, अर्थात् मीडिया से स्वामी की बात सीधे तौर पर नहीं हुई है अन्यथा शायद और भी बहुत विस्तृत विवरण सामने आता। लेकिन जो कुछ बताया गया है वह भी अत्यंत महत्वपूर्ण और कई पहलुओं से विचारणीय है। दो बिन्दु विशेष तौर पर विचारणीय हैं। (1) कलीम का प्रशंसीय कार्य जो निश्चिय ही उसके मुस्लिम पारिवारिक पृष्ठभूमि का नतीजा था। इस कार्य ने स्वामी के सामने दावते हक (सत्यता) का काम किया। (2) एक कट्टर स्वामी का हृदय जिससे यह हकीकत उजागर थी कि हर व्यक्ति के हृदय में कहीं न कहीं मानवता, शराफत और अल्लाह से डर छिपा होता है जो किसी भी घटना के नतीजे में उभकर सामने आ सकती है। अभी पूरे विश्वास से कुछ नहीं कहा जा सकता कि स्वामी असीमानंद का यह इकबालिया बयान आने वाले दिनों में क्या रूप लेगा, क्या रंग लाएगा। हृदय स्वामी को अपने बया न पर कायम रहने देगा या आंतरिक दबाव अपना काम कर जाएगा। इसके बावजूद (1) यह घटना अपनी तरह की पहली घटना नहीं है। (2) `मुस्लिम आतंकवाद' के शोर में यह बयान बहरहाल अच्छा काम करेगा चाहे इसे दबाने या नजरंदाज करने की कितनी ही कोशिशें की जाएं। स्वामी के वकील ने बयान का खंडन करने की कोशिश की है लेकिन खंडन से सच्चाई का पहलू निकल रहा है।
दिल्ली, कोलकाता और रांची से एक साथ प्रकाशित होने वाले दैनिक `अखबारे मशरिफ' में डॉ. परवेज अहमद `असीमानंद का इकबालिया जुर्म ः वास्तविकता का द्योतक' में लिखते हैं। पाप का घड़ा भर कर फूट पड़ता है अब पता नहीं आतंकवाद के मामलों में गिरफ्तार असीमानंद के इकबालिया बयान से हिन्दू आतंकवादी और उसके संरक्षणकर्ताओं के पापों का घड़ा भर चुका है या सेकुलरिज्म के नाम पर सांप्रदायिकता के पापों को दूध पिलाने वालों का घड़ा फूट रहा है लेकिन यह तो तय है कि भगवा आतंकवादी और आरएसएस के संबंध में स्वामी असीमानंद के इकबालिया बयान से खुल रहा है कि हमलों के लिए इन्द्रsश कुमार प्रचारकों का चयन और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराता था। सेकुलरिज्म के हंगामे के दौरान अक्सर सुनता रहा हूं कि सरकार सांप्रदायिकता को बर्दाश्त नहीं करेगी लेकिन सच्चाई इसके विपरीत है।
हैदराबाद से प्रकाशित दैनिक `एतमाद' ने `जेपीसी और आरएसएस का आतंकवाद एक सिक्के के दो रुख' के शीर्षक से लिखा है। आरएसएस का आतंकवाद जैसे-जैसे बेनकाब होने लगा है और आतंकवाद में लिप्त इसके नेता गण इकबाले जुर्म करने लगे हैं। 2जी स्पेक्ट्रम की ज्वाइंट पार्लियामेंटरी कमेटी (जेपीसी) द्वारा कराने की जांच के लिए भाजपा की मांग जोर पकड़ती जा रही है। महसूस यह होता है कि आरएसएस का आतंकवाद और जेपीसी के लिए भाजपा की मांग में कोई आपसी संबंध है। आरएसएस नेताओं को जो आतंकवाद में लिप्त हैं। भाजपा कानून के शिकंजे से छुटकारा दिलाना चाहती हैं ताकि `हिन्दू राष्ट्रभक्त' आरएसएस का शरीर जो खून से भरा है है उसे दूध से नहलाया जा सके। गोहाटी में भाजपा कार्यकारिणी में पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने जिस भाषा का प्रयोग किया है वह यह जाहिर करता है कि आरएसएस को आतंकवाद के आरोप से मुक्ति दिलाने के लिए भाजपा सरकार से सौदेबाजी करना चाहती है। असम में गडकरी ने मक्का मस्जिद और समझौता एक्सप्रेस धमाकों के बारे में असीमानंद के रहस्योद्घाटन को सोनिया और राहुल गांधी के संरक्षण में एक षड्यंत्र करार दिया और कहा कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले से ध्यान हटाने के लिए हिन्दू आतंकवाद का हव्वा खड़ा किया जा रहा है और जो भी हो रहा है, वह सोनिया और राहुल गांधी का षड्यंत्र है।
`हिन्दू आतंकवाद का नेटवर्प' के तहत दैनिक `सियासत' ने लिखा है। भारत में हिन्दू आतंकवाद के विषय पर संघ परिवार ने खुद को पाक साफ और राष्ट्रीय होने का दावा किया था। संघ परिवार के सभी छोटे-बड़े कार्यकर्ता भारत को अपनी जागीर समझते हुए अन्य नागरिकों विशेषकर अल्पसंख्यकों को निशाना बनाते हुए अपना दबदबा कायम करने की कोशिश की। सरकार की आंख में धूल झोंक कर आतंकवादी हमलों का आरोप अल्पसंख्यकों के सिर थोपने में सफल हुआ। इस घटना से कई मुस्लिम बच्चे जेल में हैं और उनका भविष्य अंधकारमय बन चुका है। मक्का मस्जिद बम धमाके में खुफिया एजेंसियों की कार्यवाहियों ने संघ परिवार के काले चेहरे को बेनकाब कर दिया है। मक्का मस्जिद के आरोपी असीमानंद के इकबाले जुर्म के साथ यह सच्चाई भी उजागर हुई है कि आतंकवाद गतिविधियों के पीछे संघ परिवार का बड़ा नेटवर्प काम कर रहा है। देश में आतंकवाद फैलाने और भय के साथ-साथ मुसलमानों को संदिग्ध बनाने के लिए एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत नेटवर्प सक्रिय है। मस्जिस्ट्रेट के सामने भारतीय दंड संहिता की धारा 164 के तहत कलमबंद बयान में असीमानंद ने संघ परिवार के हिन्दुत्व आतंकवादी नेटवर्प को बेनकाब किया है तो सरकार का यह दायिव है कि इस मामले में पूरी जांच कर संघ परिवार पर पाबंदी लगाए।
सह रोजा `दावत' ने `आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त होने के नाम पर गिरफ्तारियों की हककीत' में लिखा है। देश की खुफिया एजेंसियों की तफ्तीश से यह राज् ा खुलने लगा है कि गत कुछ वर्ष से देश के अंदर जो आतंकी गतिविधियां हुई हैं उन सबके पीछे सलमानों का हाथ नहीं था। न केवल उन्हें रिहा कर दिया जाना चाहिए बल्कि इनकी इज्जत पर जो दाग लगा है उसको धोने की भी व्यवस्था की जानी चाहिए एवं उन्हें उचित मुआवजा भी दिया जाना चाहिए ताकि वहअपना भविष्य संवार सकें। `खबरो नजर' के अपने स्तंभ में परवाज रहमानी ने `दो बिन्दु विचारणीय हैं' के शीर्षक से लिखा है। असीमानंद के इस बयान की मूल प्रति मीडिया को पुलिस ने उपलबध कराई है, अर्थात् मीडिया से स्वामी की बात सीधे तौर पर नहीं हुई है अन्यथा शायद और भी बहुत विस्तृत विवरण सामने आता। लेकिन जो कुछ बताया गया है वह भी अत्यंत महत्वपूर्ण और कई पहलुओं से विचारणीय है। दो बिन्दु विशेष तौर पर विचारणीय हैं। (1) कलीम का प्रशंसीय कार्य जो निश्चिय ही उसके मुस्लिम पारिवारिक पृष्ठभूमि का नतीजा था। इस कार्य ने स्वामी के सामने दावते हक (सत्यता) का काम किया। (2) एक कट्टर स्वामी का हृदय जिससे यह हकीकत उजागर थी कि हर व्यक्ति के हृदय में कहीं न कहीं मानवता, शराफत और अल्लाह से डर छिपा होता है जो किसी भी घटना के नतीजे में उभकर सामने आ सकती है। अभी पूरे विश्वास से कुछ नहीं कहा जा सकता कि स्वामी असीमानंद का यह इकबालिया बयान आने वाले दिनों में क्या रूप लेगा, क्या रंग लाएगा। हृदय स्वामी को अपने बया न पर कायम रहने देगा या आंतरिक दबाव अपना काम कर जाएगा। इसके बावजूद (1) यह घटना अपनी तरह की पहली घटना नहीं है। (2) `मुस्लिम आतंकवाद' के शोर में यह बयान बहरहाल अच्छा काम करेगा चाहे इसे दबाने या नजरंदाज करने की कितनी ही कोशिशें की जाएं। स्वामी के वकील ने बयान का खंडन करने की कोशिश की है लेकिन खंडन से सच्चाई का पहलू निकल रहा है।
दिल्ली, कोलकाता और रांची से एक साथ प्रकाशित होने वाले दैनिक `अखबारे मशरिफ' में डॉ. परवेज अहमद `असीमानंद का इकबालिया जुर्म ः वास्तविकता का द्योतक' में लिखते हैं। पाप का घड़ा भर कर फूट पड़ता है अब पता नहीं आतंकवाद के मामलों में गिरफ्तार असीमानंद के इकबालिया बयान से हिन्दू आतंकवादी और उसके संरक्षणकर्ताओं के पापों का घड़ा भर चुका है या सेकुलरिज्म के नाम पर सांप्रदायिकता के पापों को दूध पिलाने वालों का घड़ा फूट रहा है लेकिन यह तो तय है कि भगवा आतंकवादी और आरएसएस के संबंध में स्वामी असीमानंद के इकबालिया बयान से खुल रहा है कि हमलों के लिए इन्द्रsश कुमार प्रचारकों का चयन और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराता था। सेकुलरिज्म के हंगामे के दौरान अक्सर सुनता रहा हूं कि सरकार सांप्रदायिकता को बर्दाश्त नहीं करेगी लेकिन सच्चाई इसके विपरीत है।
Sunday, February 6, 2011
`कांग्रेस की नई मुस्लिम रिझाऊ नीति'
बीते कांग्रेस अधिवेशन की गतिविधियों और दिग्विजय सिंह के बयान पर बढ़ता वाद-विवाद, चीनी प्रधानमंत्री की भारत यात्रा सहित 2जी स्पेक्ट्रम मामले पर ए. राजा की बढ़ती मुसीबतें, भाजपा अध्यक्ष नीतिन गडकरी का अपनी टीम के साथ इस्राइल भ्रमण एवं बढ़ती महंगाई जैसे अनेक मुद्दे उर्दू समाचार पत्रों में छाये रहे।
`कांग्रेस का दूरगामी और साहसी कदम' के तहत दैनिक `राष्ट्रीय सहारा' ने लिखा है। सांप्रदायिकता, भ्रष्टाचार, आतंकवाद एवं नक्सली व माओ हिंसा कुछ ऐसी समस्याएं हैं जिनके कारण हमारी उन्नति और खुशहाली को ब्रेक लग गया है। यह हमारी राष्ट्रीय एकता एवं सद्भाव को भी जहरीले नाग की तरह डस रहा है। कोई भी देश विकास की सीढ़ी पर चढ़कर खुशहाल तभी हो पाता है जब देश में शांति व्यवस्था, आपसी भाईचारा और राष्ट्रीय एकता एवं सद्भाव का वातावरण बना रहे। इसे हम अपने देश का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि सरकार के हजार प्रयासों के बावजूद कुछ भ्रष्ट एवं अपना हित साधने वाले सांप्रदायिक तत्व कानून की कमियां एवं लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत नागरिकों को प्राप्त अधिकारों का फायदा उठाकर लोगों के दिलों में धार्मिककरण एवं सांप्रदायिकता का जहर घोलकर देश को हिंसा और बर्बादी की ओर ले जाने के इच्छुक हैं। दिल्ली में कांग्रेस के 83वें अधिवेशन में पार्टी ने न केवल भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का बिगुल बजाया है बल्कि संघ और भाजपा पर देश को तोड़ने का आरोप लगाते हुए इनसे सतर्प रहने और अपने कार्यकर्ताओं एवं उच्चाधिकारियों से पूरी ताकत से इनका मुकाबला करने की अपील भी की है।
`मुसलमानों को अब संरक्षण एवं विकास दोनों चाहिए' में जफर आगा ने लिखा है कि कांग्रेस अधिवेशन ने संघ परिवार के खिलाफ जो बयानात और प्रस्ताव पारित किए हैं वह स्वागत योग्य हैं, लेकिन सवाल यह है कि कांग्रेस पार्टी आरएसएस के सभी षड्यंत्रों के खिलाफ सत्ता में आने के 6-7 वर्षों के बाद ही क्यों सक्रिय हो रही है? क्या कारण है कि उसके खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर एक राजनैतिक मुहिम की जरूरत है?
कांग्रेस की यह नई मुस्लिम रिझाऊ (तुष्टिकरण) रणनीति यदि बयानबाजी की हद तक ही सीमित रहती है तो इसमें कांग्रेस को तो शायद कुछ फायदा हो जाए लेकिन मुस्लिम हित में कुछ नहीं होने वाला है। सभी आतंकवादी कार्यवाहियों में जो बेगुनाह मुस्लिम युवक पकड़े गए हैं वह आज भी जेल में बन्द हैं।
इन मासूमों को तुरन्त रिहाई मिलनी चाहिए। सरकार को इस सिलसिले में आतंकवादी घटनाओं के नए पुराने सभी मामलों की छानबीन करके मुस्लिम आतंकवाद का जो झूठा हव्वा खड़ा किया गया है उसको तुरन्त खत्म करना चाहिए।
हैदराबाद से प्रकाशित दैनिक `सियासत' ने कांग्रेस और हिन्दुत्व में लिखा है। भारत में पिछले दो दशकों से या कुछ अधिक से हिन्दुत्व ने जोर पकड़ना शुरू किया था। आरएसएस ने सबसे पहले हिन्दुत्व के समर्थन में मुहिम चलानी शुरू की जिसे बाद में राजनीति के मैदान में भाजपा ने आगे बढ़ाया। इसके बाद दूसरे संगठनों जैसे विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, हिन्दू महासभा और इसी तरह के अन्य छोटे-मोटे संगठनों ने हिन्दुत्व को आगे बढ़ाने का काम शुरू किया। गत दिनों इस संबंध में अभिनव भारत नामी संगठन का नाम भी सामने आया। इस पूरी प्रक्रिया में यह बात महसूस की जा सकती है कि भारत में हिन्दुत्व को सियासी घाटे में एक जगह मिल गई है। भाजपा द्वारा शुरू किए गए हिन्दुत्व मुहिम को अन्य संगठनों ने भी अख्तियार किया लेकिन उनका तरीका और अंदाज अलग था। भाजपा ने खुलेआम हिन्दुत्व की पैरवी की लेकिन अन्य संगठन इस मामले में भाजपा की बराबरी नहीं कर सकती कुछ नीतियों में अवश्य ही हिन्दुत्व को ध्यान में रखा गया। इन संगठनों में अब कांग्रेस भी शामिल होती नजर आती है क्योंकि इसने धीरे-धीरे हिन्दुत्व अख्तियार किया है। इसका रहस्योद्घाटन न केवल मीडिया द्वारा किया जाता रहा है बल्कि विकिलीक्स द्वारा उजागर किए गए दस्तावेज से भी होता है।
दिग्विजय सिंह और राहुल गांधी के रहस्योद्घाटन पर पार्टी ने जो दृष्टिकोण अख्तियार किया है उससे स्पष्ट हो जाता है कि पार्टी की रणनीति यह नहीं बल्कि इससे अलग है। पार्टी दोनों के बयान को निरस्त कर रही है लेकिन वह राहुल या दिग्विजय सिंह, दोनों में से किसी एक के बयान की जांच की मांग नहीं करती और न ही इसकी मांग करने वालों का समर्थन करती है। यही दृष्टिकोण इस व्यवहार को संदेह पैदा करने के लिए काफी है। कांग्रेस पार्टी को यह समझ लेना चाहिए कि हिन्दुत्व चाहे वह `नरम' हो `कट्टर', हिन्दुस्तानी समाज, हिन्दुस्तानी जनता और हिन्दुस्तान के भविष्य के लिए ठीक नहीं है और इससे स्वयं कांग्रेस पार्टी के भविष्य पर भी प्रश्नचिन्ह लग सकता है।
`प्याज की मार' में दैनिक `हमारा समाज' ने लिखा है कि शरद पवार ने बहुत आसानी के साथ यह कह दिया कि अगले कई सप्ताह तक प्याज की कीमत सामान्य मूल्य पर नहीं आएगी अर्थात् जानबूझ कर इतना माल एक्सपोर्ट कर दिया गया कि अचानक प्याज की कीमत आसमान छूने लगी जबकि वर्तमान मौसम में सभी सब्जियों की कीमत गत वर्षों कम हुआ करती थीं। सब्जियों के मौसम में इतनी महंगाई समझ से परे हैं। इसके कारण लोगों को सोचने पर मजबूर होना पड़ रहा है कि सरकार की सोचे-समझे षड्यंत्र के कारण महंगाई का यह हाल है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों का फैसला करने को कम्पनियों को पूरी तरह छूट दे गई है। केंद्र को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। इस पर जल्द काबू नहीं पाया गया तो आने वाले दिन इसे सख्त हालात से जूझना पड़ेगा जिसका प्रभाव कई राज्यों में होने वाले चुनाव पर निश्चय ही पड़ेगा। बिहार के नतीजों से सरकार को सबक लेना चाहिए।
ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल ने भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के इस्राइल दौरे पर संदेह व्यक्त करते हुए कहा है कि कहीं उनका यह दौरा भारत में आतंकवाद में लिप्त पाए जाने वाले हिन्दुत्व तत्वों को राहत दिलाने से संबंधित तो नहीं है? काउंसिल के अनुसार यह सवाल इसलिए उठता है कि गत कुछ वर्षों से इन तत्वों द्वारा जिस तरह आतंकवादी घटनाओं को अंजाम दिया जा रहा है, उनका तरीका वही है जिसका इस्तेमाल इस्राइल, फलस्तीन के खिलाफ करता है। काउंसिल महासचिव डॉ. मोहम्मद मंजूर आलम ने अपने बयान में कहा कि यहां की गोपनीय एजेंसियों के कुछ ईमानदार अधिकारियों ने अपने फर्ज का निर्वाह करते हुए हिन्दुत्व तत्वों को बेनकाब कर दिया है जिसके कारण यह बुरी तरह जाल में फंस गए हैं और अब इससे बाहर निकलने की तरकीब मालूम करने के लिए इस्राइल गए हैं एवं क्या उनका यह दौरा मुसलमानों को फंसाने के लिए कोई नया फार्मूला हासिल करने से संबंधित तो नहीं है।
`कांग्रेस का दूरगामी और साहसी कदम' के तहत दैनिक `राष्ट्रीय सहारा' ने लिखा है। सांप्रदायिकता, भ्रष्टाचार, आतंकवाद एवं नक्सली व माओ हिंसा कुछ ऐसी समस्याएं हैं जिनके कारण हमारी उन्नति और खुशहाली को ब्रेक लग गया है। यह हमारी राष्ट्रीय एकता एवं सद्भाव को भी जहरीले नाग की तरह डस रहा है। कोई भी देश विकास की सीढ़ी पर चढ़कर खुशहाल तभी हो पाता है जब देश में शांति व्यवस्था, आपसी भाईचारा और राष्ट्रीय एकता एवं सद्भाव का वातावरण बना रहे। इसे हम अपने देश का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि सरकार के हजार प्रयासों के बावजूद कुछ भ्रष्ट एवं अपना हित साधने वाले सांप्रदायिक तत्व कानून की कमियां एवं लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत नागरिकों को प्राप्त अधिकारों का फायदा उठाकर लोगों के दिलों में धार्मिककरण एवं सांप्रदायिकता का जहर घोलकर देश को हिंसा और बर्बादी की ओर ले जाने के इच्छुक हैं। दिल्ली में कांग्रेस के 83वें अधिवेशन में पार्टी ने न केवल भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का बिगुल बजाया है बल्कि संघ और भाजपा पर देश को तोड़ने का आरोप लगाते हुए इनसे सतर्प रहने और अपने कार्यकर्ताओं एवं उच्चाधिकारियों से पूरी ताकत से इनका मुकाबला करने की अपील भी की है।
`मुसलमानों को अब संरक्षण एवं विकास दोनों चाहिए' में जफर आगा ने लिखा है कि कांग्रेस अधिवेशन ने संघ परिवार के खिलाफ जो बयानात और प्रस्ताव पारित किए हैं वह स्वागत योग्य हैं, लेकिन सवाल यह है कि कांग्रेस पार्टी आरएसएस के सभी षड्यंत्रों के खिलाफ सत्ता में आने के 6-7 वर्षों के बाद ही क्यों सक्रिय हो रही है? क्या कारण है कि उसके खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर एक राजनैतिक मुहिम की जरूरत है?
कांग्रेस की यह नई मुस्लिम रिझाऊ (तुष्टिकरण) रणनीति यदि बयानबाजी की हद तक ही सीमित रहती है तो इसमें कांग्रेस को तो शायद कुछ फायदा हो जाए लेकिन मुस्लिम हित में कुछ नहीं होने वाला है। सभी आतंकवादी कार्यवाहियों में जो बेगुनाह मुस्लिम युवक पकड़े गए हैं वह आज भी जेल में बन्द हैं।
इन मासूमों को तुरन्त रिहाई मिलनी चाहिए। सरकार को इस सिलसिले में आतंकवादी घटनाओं के नए पुराने सभी मामलों की छानबीन करके मुस्लिम आतंकवाद का जो झूठा हव्वा खड़ा किया गया है उसको तुरन्त खत्म करना चाहिए।
हैदराबाद से प्रकाशित दैनिक `सियासत' ने कांग्रेस और हिन्दुत्व में लिखा है। भारत में पिछले दो दशकों से या कुछ अधिक से हिन्दुत्व ने जोर पकड़ना शुरू किया था। आरएसएस ने सबसे पहले हिन्दुत्व के समर्थन में मुहिम चलानी शुरू की जिसे बाद में राजनीति के मैदान में भाजपा ने आगे बढ़ाया। इसके बाद दूसरे संगठनों जैसे विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, हिन्दू महासभा और इसी तरह के अन्य छोटे-मोटे संगठनों ने हिन्दुत्व को आगे बढ़ाने का काम शुरू किया। गत दिनों इस संबंध में अभिनव भारत नामी संगठन का नाम भी सामने आया। इस पूरी प्रक्रिया में यह बात महसूस की जा सकती है कि भारत में हिन्दुत्व को सियासी घाटे में एक जगह मिल गई है। भाजपा द्वारा शुरू किए गए हिन्दुत्व मुहिम को अन्य संगठनों ने भी अख्तियार किया लेकिन उनका तरीका और अंदाज अलग था। भाजपा ने खुलेआम हिन्दुत्व की पैरवी की लेकिन अन्य संगठन इस मामले में भाजपा की बराबरी नहीं कर सकती कुछ नीतियों में अवश्य ही हिन्दुत्व को ध्यान में रखा गया। इन संगठनों में अब कांग्रेस भी शामिल होती नजर आती है क्योंकि इसने धीरे-धीरे हिन्दुत्व अख्तियार किया है। इसका रहस्योद्घाटन न केवल मीडिया द्वारा किया जाता रहा है बल्कि विकिलीक्स द्वारा उजागर किए गए दस्तावेज से भी होता है।
दिग्विजय सिंह और राहुल गांधी के रहस्योद्घाटन पर पार्टी ने जो दृष्टिकोण अख्तियार किया है उससे स्पष्ट हो जाता है कि पार्टी की रणनीति यह नहीं बल्कि इससे अलग है। पार्टी दोनों के बयान को निरस्त कर रही है लेकिन वह राहुल या दिग्विजय सिंह, दोनों में से किसी एक के बयान की जांच की मांग नहीं करती और न ही इसकी मांग करने वालों का समर्थन करती है। यही दृष्टिकोण इस व्यवहार को संदेह पैदा करने के लिए काफी है। कांग्रेस पार्टी को यह समझ लेना चाहिए कि हिन्दुत्व चाहे वह `नरम' हो `कट्टर', हिन्दुस्तानी समाज, हिन्दुस्तानी जनता और हिन्दुस्तान के भविष्य के लिए ठीक नहीं है और इससे स्वयं कांग्रेस पार्टी के भविष्य पर भी प्रश्नचिन्ह लग सकता है।
`प्याज की मार' में दैनिक `हमारा समाज' ने लिखा है कि शरद पवार ने बहुत आसानी के साथ यह कह दिया कि अगले कई सप्ताह तक प्याज की कीमत सामान्य मूल्य पर नहीं आएगी अर्थात् जानबूझ कर इतना माल एक्सपोर्ट कर दिया गया कि अचानक प्याज की कीमत आसमान छूने लगी जबकि वर्तमान मौसम में सभी सब्जियों की कीमत गत वर्षों कम हुआ करती थीं। सब्जियों के मौसम में इतनी महंगाई समझ से परे हैं। इसके कारण लोगों को सोचने पर मजबूर होना पड़ रहा है कि सरकार की सोचे-समझे षड्यंत्र के कारण महंगाई का यह हाल है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों का फैसला करने को कम्पनियों को पूरी तरह छूट दे गई है। केंद्र को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। इस पर जल्द काबू नहीं पाया गया तो आने वाले दिन इसे सख्त हालात से जूझना पड़ेगा जिसका प्रभाव कई राज्यों में होने वाले चुनाव पर निश्चय ही पड़ेगा। बिहार के नतीजों से सरकार को सबक लेना चाहिए।
ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल ने भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के इस्राइल दौरे पर संदेह व्यक्त करते हुए कहा है कि कहीं उनका यह दौरा भारत में आतंकवाद में लिप्त पाए जाने वाले हिन्दुत्व तत्वों को राहत दिलाने से संबंधित तो नहीं है? काउंसिल के अनुसार यह सवाल इसलिए उठता है कि गत कुछ वर्षों से इन तत्वों द्वारा जिस तरह आतंकवादी घटनाओं को अंजाम दिया जा रहा है, उनका तरीका वही है जिसका इस्तेमाल इस्राइल, फलस्तीन के खिलाफ करता है। काउंसिल महासचिव डॉ. मोहम्मद मंजूर आलम ने अपने बयान में कहा कि यहां की गोपनीय एजेंसियों के कुछ ईमानदार अधिकारियों ने अपने फर्ज का निर्वाह करते हुए हिन्दुत्व तत्वों को बेनकाब कर दिया है जिसके कारण यह बुरी तरह जाल में फंस गए हैं और अब इससे बाहर निकलने की तरकीब मालूम करने के लिए इस्राइल गए हैं एवं क्या उनका यह दौरा मुसलमानों को फंसाने के लिए कोई नया फार्मूला हासिल करने से संबंधित तो नहीं है।
...लेकिन सारे आतंकवादी संघी क्यों हैं?
बीते सप्ताह की राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक घटनाओं को परम्परानुसार उर्दू अखबारों ने चर्चा का विषय बनाया है। इसके बावजूद वहां भाजपा के दो दिवसीय सम्मेलन सहित सारे आतंकवादी संघी क्यों हैं, बम धमाकों की जांच के लिए विशेष ट्रिब्यूनल की मांग और कश्मीर में फौज की कमी करने जैसे मुद्दों को प्राथमिकता दी गई है। पेश है इस बाबत उर्दू अखबारों की राय।
हैदराबाद से प्रकाशित दैनिक सियासत में फैसल जाफरी ने भाजपा का दो दिवसीय सम्मेलन ः नकारात्मक राजनीतिक का शानदार प्रदर्शन में लिखा है। भाजपा ने बजट अधिवेशन से पहले कांग्रेस पर दबाव डालने के उद्देश्य से अपने दो दिवसीय सम्मेलन की घोषणा कर दी। यह सम्मेलन गत दिनों गोहाटी असम में आयोजित हुआ है। हमने बिना कारण इसे नकारात्मक राजनीति का प्रदर्शन नहीं कहा है। होना यह चाहिए था कि अपने दो दिवसीय सम्मेलन में भाजपा खुद को कांग्रेस के विकल्प के तौर पर पेश करती। पार्टी नेता जनता को बताते कि उनके पास देश विकास की कौन सी योजनाएं हैं। सत्ता में आने की सूरत में वह देश की 70 फीसदी जनता को गरीबी, अज्ञानता और भुखमरी से मुक्ति दिलाने के लिए क्या करना चाहते हैं।
लेकिन गोहाटी सम्मेलन में इस तरह की कोई बहस नही हुई, हां, तीन बातों पर विशेष ध्यान दिया गया। भ्रष्टाचार, सोनिया गांधी का व्यक्तित्व और नेतृत्व एवं महंगाई भ्रष्टाचार निश्चय ही एक गंभीर मसला हैं। भाजपा इस भ्रम में है कि इस मामले पर वह कांग्रेस को लोकसभा भंग करने और नए चुनाव कराने पर विवश कर सकती है आडवाणी ने पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि वर्तमान सरकार ज्यादा समय तक नहीं चल सकती, आप लोग चुनाव की तैयारी कीजिए। जो बात वह नहीं कह सके कि वह बहुत जल्द भारत के प्रधानमंत्री बनने वाले हैं। इससे हटकर हमें अच्छी तरह याद है कि जो बात आडवाणी ने गोहाटी में कही बिल्कुल वही बात अटल बिहारी वाजपेयी ने जनवरी 2006 में मुंबई में भाजपा अधिवेशन में कही थी राजनाथ सिंह को नया अध्यक्ष मनोनीत किया गया था। जहां तक भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी का संबंध है वह दो चार भोंडे शब्दों का इस्तेमाल किए बिना भाषण नहीं दे सकते। उन्होंने सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कहा, वाह रे राजा, कांग्रेस का बजाया बाजा। स्पष्ट रहे कि यह भाषा राजनीतिक नेताओं की नहीं मुंबई की सड़कों पर आवारागर्दी करने वाले युवाओं की हो सकती है जिसे स्थानीय भाषा में टपोरी कहा जाता है।
दैनिक मुनसिफ ने जनता समर्थन की प्राप्ति के लिए पहले के शीर्षक से लिखा है। 2जी स्पेक्ट्रम में राजा, कामनवेल्थ खेलों में कलमाड़ी और आदर्श सोसायटी में अशोक चौहान से किनारा करके केंद्र और कांग्रेस ने खुद का दामन साफ रखने की कोशिश तो की है लेकिन दो दशक पूर्व बोफोर्स दलाली वाले मामले में इन्कम टैक्स ट्रिब्यूनल के फैसले ने तो सब कुछ बेनकाब कर दिया है। सरकार और कांग्रेस शुरू से कहती रही है कि बोफोर्स सौदे में न तो मध्य व्यक्ति या और न ही कमीशन दिया गया लेकिन जब केंद्रीय सरकार के ही एक प्रतिष्ठित संस्था ने कहा कि बोफोर्स सौदे में बिन चड्ढा को कमीशन मिला है लेकिन उन्होंने नियम के अनुसार इसका टैक्स नहीं दिया। इस रहस्योद्घाटन पर जिस तरह केंद्र सरकार ने कोई पहल नहीं की और सीबीआई अदालत में मामला बन्द करने की अपील पर कायम रही है, इससे साफ है कि पालिसी और नीयत भ्रष्टाचार रोकने की नहीं बल्कि उनके बचाव की है। ऐसे में निश्चय ही भ्रष्टाचार यदि सबसे अहम नहीं तो कमरतोड़ महंगाई के सामने मसला जरूर बनना चाहिए। वर्तमान में महंगाई और भ्रष्टाचार दो ऐसे मुद्दे हैं जो किसी भी राजनीतिक पार्टी के एजेंडे में सर्वप्रथम होने चाहिए। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि उसका दामन साफ हो, दुर्भाग्य से भाजपा इस कसौटी पर खरी नहीं उतरती। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की बाकी का तार कोल घोटाला तो पुराना हो गया, लेकिन कर्नाटक में मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा का जमीन घोटाला और इनकी सरकार में शामिल रेड्डी भाइयों का माफिया तो ताजा मामला है जिसे भाजपा हाई कमान नजरंदाज करने के अलावा कुछ नहीं कर पा रही है। भ्रष्टाचार के खिलाफ भाजपा की मुहिम को जनता का समर्थन तभी मिलेगा जब वह पहले अपने दामन को बेदाग बनाए।
राष्ट्रीय सहारा में सईद हमीद ने लेकिन सारे आतंकवादी संघी क्यों हैं? के शीर्षक से लिखा है कि इन सभी बम धमाकों के टारगेट कौन थे? मुसलमान या मुस्लिम इलाके या मुस्लिम उपासक स्थल, पहले राउंड में इन सभी बम धमाकों के लिए मुसलमानों को ही आरोपी ठहराया गया। वास्तव में यह हिन्दुत्व आतंकवादियों को बचाने की एक साजिश थी। विशाल परिदृश्य में देखा जाए तो हिन्दुत्ववादी आतंकवादियों ने जिस तरह मुसलमानों को मारो और उन्हीं को आरोपित करने की रणनीति अपनाई थीं उस पर क्रियान्वित करने वाले दो षड्यंत्रकारियों (1) वह हिन्दुत्ववादी जो बम धमाके किया करते थे (2) वह हिन्दुत्ववादी जो इन बम धमाकों के आरोप में बेगुनाह मुसलमानों को जेलों में बन्द कर देते थे, उनको यातनाएं देते थे और हिन्दुत्ववादी आतंकवादियों का आरोप अपने ऊपर लेने के लिए मजबूर करते थे। हम ने हिन्दुत्ववादियों की जिस दूसरी श्रेणी की ओर इशारा किया है, यह खाकी ड्रेस पहनते हैं, लेकिन अन्दर से यह भगवा मानसिकता में डूबे रहते हैं। इन दो वर्षों (2006-2008) में हिन्दुत्ववादी आतंकवादियों ने अपना मिशन बड़ी हद तक कामयाब कर लिया है और हर व्यक्ति मुसलमानों पर कटाक्ष करने लगा है कि हर मुसलमान आतंकवादी नहीं है, लेकिन हर आतंकवादी मुसलमान क्यों है? आज ठाकरे, तोगड़िया, आडवाणी, मुंडे, सिंघल से यह पूछा जाना चाहिए कि सारे संघी आतंकवादी नहीं, लेकिन सारे आतंकवादी संघी क्यों हैं।
पटना से प्रकाशित साप्ताहिक नकीब ने विशेष ट्रिब्यूनल के गठन का प्रस्ताव में लिखा है। अजमेर, मक्का मस्जिद, मालेगांव बम धमाका और समझौता एक्सप्रेस पर हुए धमाकों की जांच जल्द से जल्द पूरी कर ली जाए और जो लोग इसमें लिप्त हैं उनके खिलाफ ठोस सबूत के साथ अदालत में चार्जशीट पेश कर दी जाए ताकि आतंकी सजा पा सकें। इस सिलसिले में जितनी भी देर की जाएगी इससे नुकसान का संदेह है। हो सकता है कि इस बीच सुबूत को मिटाने की कोशिश की जाए और इसी के साथ मामले को नया रुख देने की कोशिश की जाने की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता। इस सिलसिले में आरएसएस अध्यक्ष मोहन भागवत के उस बयान से संकेत मिलता है जिसमें उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया है कि सरकार हिन्दुओं के पीछे पड़ी है और इसके खिलाफ तरह-तरह के आरोप लगा रही है। निश्चय ही भागवत का इशारा असीमानंद की गिरफ्तारी और उनसे पूछताछ की तरफ ही है। इस संदर्भ में इस प्रस्ताव का जिक्र करना भी जरूरी है जो अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कानून विभाग की ओर से हेने वाली कांफ्रेंस में सर्वसम्मति से पारित किया गया कि 1998 से लेकर अब तक देश के विभिन्न भागों में बम धमाकों की जो घटनाएं हुई हैं, केंद्र सरकार उसकी जांच कराए और इसके लिए एक विशेष अदालती आयोग गठित करे और उसकी रिपोर्ट एवं सुझावों की रोशनी में दोषियों के खिलाफ जरूरी कार्रवाई करे।
कश्मीर में फौज की संख्या घटाने का सवाल, वादी में वातावरण उचित, अहम फैसले लिए जा सकते हैं, के तहत अखबारे मशरिक ने लिखा है। जब से केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम और प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने कश्मीर के मामले में दिलचस्पी लेनी शुरू की है। वादी के हालात धीरे-धीरे बेहतर होते जा रहे हैं। पत्थर फेंकने का सिलसिला भी बन्द हो गया है जो कुछ माह पूर्व वादी की परम्परा बन गई थी। विख्यात पत्रकार और बुद्धिजीवी दिलीप पडगांवकर की अगुवाई में भारत सरकार ने कश्मीर के लिए जिन वार्ताकारों का चयन किया है वह भी अपना काम बड़ी अच्छी तरह से कर रहे हैं और लोगों से मिलकर उनका दुखदर्द बांट रहे हैं। इन हालातों में यदि घाटी में फौज में कमी की जाए तो इसमें कोई हर्ज नहीं है। इससे लोगों तक यह पैगाम जाएगा कि सरकार उनकी भावनाओं से न केवल परिचित है बल्कि उसका सम्मान करते हुए ऐसी सूरत निकाली जाए कि उनके हृदय का कांटा जाता रहे। घाटी के हवाले से इस समय कुछ अहम फैसले करने का अच्छा समय है। आश्चर्य नहीं कि इससे हवा का रुख इधर से उधर हो जाए और वहां की काया पलट हो जाए।
हैदराबाद से प्रकाशित दैनिक सियासत में फैसल जाफरी ने भाजपा का दो दिवसीय सम्मेलन ः नकारात्मक राजनीतिक का शानदार प्रदर्शन में लिखा है। भाजपा ने बजट अधिवेशन से पहले कांग्रेस पर दबाव डालने के उद्देश्य से अपने दो दिवसीय सम्मेलन की घोषणा कर दी। यह सम्मेलन गत दिनों गोहाटी असम में आयोजित हुआ है। हमने बिना कारण इसे नकारात्मक राजनीति का प्रदर्शन नहीं कहा है। होना यह चाहिए था कि अपने दो दिवसीय सम्मेलन में भाजपा खुद को कांग्रेस के विकल्प के तौर पर पेश करती। पार्टी नेता जनता को बताते कि उनके पास देश विकास की कौन सी योजनाएं हैं। सत्ता में आने की सूरत में वह देश की 70 फीसदी जनता को गरीबी, अज्ञानता और भुखमरी से मुक्ति दिलाने के लिए क्या करना चाहते हैं।
लेकिन गोहाटी सम्मेलन में इस तरह की कोई बहस नही हुई, हां, तीन बातों पर विशेष ध्यान दिया गया। भ्रष्टाचार, सोनिया गांधी का व्यक्तित्व और नेतृत्व एवं महंगाई भ्रष्टाचार निश्चय ही एक गंभीर मसला हैं। भाजपा इस भ्रम में है कि इस मामले पर वह कांग्रेस को लोकसभा भंग करने और नए चुनाव कराने पर विवश कर सकती है आडवाणी ने पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि वर्तमान सरकार ज्यादा समय तक नहीं चल सकती, आप लोग चुनाव की तैयारी कीजिए। जो बात वह नहीं कह सके कि वह बहुत जल्द भारत के प्रधानमंत्री बनने वाले हैं। इससे हटकर हमें अच्छी तरह याद है कि जो बात आडवाणी ने गोहाटी में कही बिल्कुल वही बात अटल बिहारी वाजपेयी ने जनवरी 2006 में मुंबई में भाजपा अधिवेशन में कही थी राजनाथ सिंह को नया अध्यक्ष मनोनीत किया गया था। जहां तक भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी का संबंध है वह दो चार भोंडे शब्दों का इस्तेमाल किए बिना भाषण नहीं दे सकते। उन्होंने सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कहा, वाह रे राजा, कांग्रेस का बजाया बाजा। स्पष्ट रहे कि यह भाषा राजनीतिक नेताओं की नहीं मुंबई की सड़कों पर आवारागर्दी करने वाले युवाओं की हो सकती है जिसे स्थानीय भाषा में टपोरी कहा जाता है।
दैनिक मुनसिफ ने जनता समर्थन की प्राप्ति के लिए पहले के शीर्षक से लिखा है। 2जी स्पेक्ट्रम में राजा, कामनवेल्थ खेलों में कलमाड़ी और आदर्श सोसायटी में अशोक चौहान से किनारा करके केंद्र और कांग्रेस ने खुद का दामन साफ रखने की कोशिश तो की है लेकिन दो दशक पूर्व बोफोर्स दलाली वाले मामले में इन्कम टैक्स ट्रिब्यूनल के फैसले ने तो सब कुछ बेनकाब कर दिया है। सरकार और कांग्रेस शुरू से कहती रही है कि बोफोर्स सौदे में न तो मध्य व्यक्ति या और न ही कमीशन दिया गया लेकिन जब केंद्रीय सरकार के ही एक प्रतिष्ठित संस्था ने कहा कि बोफोर्स सौदे में बिन चड्ढा को कमीशन मिला है लेकिन उन्होंने नियम के अनुसार इसका टैक्स नहीं दिया। इस रहस्योद्घाटन पर जिस तरह केंद्र सरकार ने कोई पहल नहीं की और सीबीआई अदालत में मामला बन्द करने की अपील पर कायम रही है, इससे साफ है कि पालिसी और नीयत भ्रष्टाचार रोकने की नहीं बल्कि उनके बचाव की है। ऐसे में निश्चय ही भ्रष्टाचार यदि सबसे अहम नहीं तो कमरतोड़ महंगाई के सामने मसला जरूर बनना चाहिए। वर्तमान में महंगाई और भ्रष्टाचार दो ऐसे मुद्दे हैं जो किसी भी राजनीतिक पार्टी के एजेंडे में सर्वप्रथम होने चाहिए। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि उसका दामन साफ हो, दुर्भाग्य से भाजपा इस कसौटी पर खरी नहीं उतरती। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की बाकी का तार कोल घोटाला तो पुराना हो गया, लेकिन कर्नाटक में मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा का जमीन घोटाला और इनकी सरकार में शामिल रेड्डी भाइयों का माफिया तो ताजा मामला है जिसे भाजपा हाई कमान नजरंदाज करने के अलावा कुछ नहीं कर पा रही है। भ्रष्टाचार के खिलाफ भाजपा की मुहिम को जनता का समर्थन तभी मिलेगा जब वह पहले अपने दामन को बेदाग बनाए।
राष्ट्रीय सहारा में सईद हमीद ने लेकिन सारे आतंकवादी संघी क्यों हैं? के शीर्षक से लिखा है कि इन सभी बम धमाकों के टारगेट कौन थे? मुसलमान या मुस्लिम इलाके या मुस्लिम उपासक स्थल, पहले राउंड में इन सभी बम धमाकों के लिए मुसलमानों को ही आरोपी ठहराया गया। वास्तव में यह हिन्दुत्व आतंकवादियों को बचाने की एक साजिश थी। विशाल परिदृश्य में देखा जाए तो हिन्दुत्ववादी आतंकवादियों ने जिस तरह मुसलमानों को मारो और उन्हीं को आरोपित करने की रणनीति अपनाई थीं उस पर क्रियान्वित करने वाले दो षड्यंत्रकारियों (1) वह हिन्दुत्ववादी जो बम धमाके किया करते थे (2) वह हिन्दुत्ववादी जो इन बम धमाकों के आरोप में बेगुनाह मुसलमानों को जेलों में बन्द कर देते थे, उनको यातनाएं देते थे और हिन्दुत्ववादी आतंकवादियों का आरोप अपने ऊपर लेने के लिए मजबूर करते थे। हम ने हिन्दुत्ववादियों की जिस दूसरी श्रेणी की ओर इशारा किया है, यह खाकी ड्रेस पहनते हैं, लेकिन अन्दर से यह भगवा मानसिकता में डूबे रहते हैं। इन दो वर्षों (2006-2008) में हिन्दुत्ववादी आतंकवादियों ने अपना मिशन बड़ी हद तक कामयाब कर लिया है और हर व्यक्ति मुसलमानों पर कटाक्ष करने लगा है कि हर मुसलमान आतंकवादी नहीं है, लेकिन हर आतंकवादी मुसलमान क्यों है? आज ठाकरे, तोगड़िया, आडवाणी, मुंडे, सिंघल से यह पूछा जाना चाहिए कि सारे संघी आतंकवादी नहीं, लेकिन सारे आतंकवादी संघी क्यों हैं।
पटना से प्रकाशित साप्ताहिक नकीब ने विशेष ट्रिब्यूनल के गठन का प्रस्ताव में लिखा है। अजमेर, मक्का मस्जिद, मालेगांव बम धमाका और समझौता एक्सप्रेस पर हुए धमाकों की जांच जल्द से जल्द पूरी कर ली जाए और जो लोग इसमें लिप्त हैं उनके खिलाफ ठोस सबूत के साथ अदालत में चार्जशीट पेश कर दी जाए ताकि आतंकी सजा पा सकें। इस सिलसिले में जितनी भी देर की जाएगी इससे नुकसान का संदेह है। हो सकता है कि इस बीच सुबूत को मिटाने की कोशिश की जाए और इसी के साथ मामले को नया रुख देने की कोशिश की जाने की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता। इस सिलसिले में आरएसएस अध्यक्ष मोहन भागवत के उस बयान से संकेत मिलता है जिसमें उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया है कि सरकार हिन्दुओं के पीछे पड़ी है और इसके खिलाफ तरह-तरह के आरोप लगा रही है। निश्चय ही भागवत का इशारा असीमानंद की गिरफ्तारी और उनसे पूछताछ की तरफ ही है। इस संदर्भ में इस प्रस्ताव का जिक्र करना भी जरूरी है जो अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कानून विभाग की ओर से हेने वाली कांफ्रेंस में सर्वसम्मति से पारित किया गया कि 1998 से लेकर अब तक देश के विभिन्न भागों में बम धमाकों की जो घटनाएं हुई हैं, केंद्र सरकार उसकी जांच कराए और इसके लिए एक विशेष अदालती आयोग गठित करे और उसकी रिपोर्ट एवं सुझावों की रोशनी में दोषियों के खिलाफ जरूरी कार्रवाई करे।
कश्मीर में फौज की संख्या घटाने का सवाल, वादी में वातावरण उचित, अहम फैसले लिए जा सकते हैं, के तहत अखबारे मशरिक ने लिखा है। जब से केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम और प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने कश्मीर के मामले में दिलचस्पी लेनी शुरू की है। वादी के हालात धीरे-धीरे बेहतर होते जा रहे हैं। पत्थर फेंकने का सिलसिला भी बन्द हो गया है जो कुछ माह पूर्व वादी की परम्परा बन गई थी। विख्यात पत्रकार और बुद्धिजीवी दिलीप पडगांवकर की अगुवाई में भारत सरकार ने कश्मीर के लिए जिन वार्ताकारों का चयन किया है वह भी अपना काम बड़ी अच्छी तरह से कर रहे हैं और लोगों से मिलकर उनका दुखदर्द बांट रहे हैं। इन हालातों में यदि घाटी में फौज में कमी की जाए तो इसमें कोई हर्ज नहीं है। इससे लोगों तक यह पैगाम जाएगा कि सरकार उनकी भावनाओं से न केवल परिचित है बल्कि उसका सम्मान करते हुए ऐसी सूरत निकाली जाए कि उनके हृदय का कांटा जाता रहे। घाटी के हवाले से इस समय कुछ अहम फैसले करने का अच्छा समय है। आश्चर्य नहीं कि इससे हवा का रुख इधर से उधर हो जाए और वहां की काया पलट हो जाए।
Saturday, February 5, 2011
'बेगुनाह मुसलमानों की रिहाई का मामला'
बम धमाकों में लिप्त असीमानंद के इकबालिया बयान को लेकर उर्दू अखबारों ने सम्पादकीय लिखे और आलेख प्रकाशित किया है। इसी के साथ आरएसएस द्वारा इस दाग को मिटाने की मुहिम पर भी विशेष रूप से चर्चा की है। पेश है इस बाबत उर्दू अखबारों की राय।
हैदराबाद से प्रकाशित दैनिक `ऐतमाद' ने `आतंकवाद के दाग को मिटाने की आरएसएस की मुहिम' के शीर्षक से लिखा है। स्वामी असीमानंद के बम धमाकों से संबंधित इकबालिया बयान से आरएसएस को मानसिक रूप से इतना परेशान कर दिया है कि हिन्दू समाज में इस संगठन की छवि मिट्टी में मिल गई है। इसलिए अब उसने अपनी छवि सुधारने के लिए घर-घर दस्तक देने और इन धमाकों के बारे में अपनी गढ़ी हुई कहानी सुनने का फैसला किया है। आरएसएस और इसकी सहयोगी संगठनों सहित भाजपा के कार्यकर्ता बुकलेट वितरित कर यह बताने की कोशिश करेंगे कि किस तरह कांग्रेस अगुवाई वाली यूपीए सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ भाजपा के नेतृत्व में संघ परिवार की मुहिम का बदला लेने के लिए प्रचारकों और स्वयंसेवकों की गिरफ्तारी और उनकी तफ्तीश द्वारा आरएसएस पर आतंकवाद का ठप्पा लगाने की कोशिश कर रही है। लेकिन आरएसएस ने तथाकथित देश प्रेम और कौम परस्ती के नाम पर दंगों द्वारा जो अराजकता फैलाई और घृणा के बीज बोए हैं उनके खिलाफ आज भी कोई इसके मुकाबले के लिए मैदान में नहीं उतर रहा है।
आरएसएस प्रवक्ता राम माधव आज अगर यह प्रचार करते हैं कि आरएसएस का आतंकवाद से कोई संबंध नहीं है और राजनीति के चलते उसे बदनाम किया जा रहा है तो दुनिया में हिन्दू धर्म की छवि गलत बन रही है। जाहिर है कि राम माधव का इस तरह का बयान हिन्दुओं को कांग्रेस सरकार से दूर कर सकता है लेकिन यदि सरकार इन बिन्दुओं को विचारणीय नहीं समझती और खुद दूसरी सेकुलर पार्टियों के साथ संघ परिवार की आतंकी गतिविधियों से जनता को अवगत नहीं कराती तो फंदा कांग्रेस के गले में पड़ सकता है।
मुंबई से प्रकाशित दैनिक `इंकलाब' में मुब्बशिर मुशताक ने `मालेगांव मामले में सीबीआई उधेड़बुन की शिकार, इसे कंफ्यूज्ड ब्यूरो ऑफ इंवेस्टीगेशन भी कहा जा सकता है' के अपने आलेख में लिखा है। 17वीं सदी में ईसाई विचारधारा के मशहूर स्तम्भकार एन होसटन ने लिखा था कि कंफ्यूजन मानसिक बिगाड़ का एक संकेत है। मानसिक उधेड़बुन साफ और तुरन्त सोच को अपंग बना देती है जबकि मानसिक बिगाड़ भय और उधेड़बुन के साथ धोखे की ओर ले जाता है। इसी मानसिक बीमारी का शिकार कंफ्यूजन ब्यूरो ऑफ इंवेस्टीगेशन (सीबीआई का पूरा नाम) ने 9 आरोपियों की जमानत का विरोध करते हुए इंसाफ को और पेचीदा बना दिया है। सीबीआई के वकील राज ठाकरे ने मकोका कोर्ट में एक आम कानूनी बिन्दु उठाते हुए कहा कि आरोपियों ने कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया है जिसकी बुनियाद पर जमानत अर्जी पर विचार किया जा सके, इसलिए जमानत अर्जी निरस्त की जाए। सीबीआई के इस दृष्टिकोण में `कानूनी बिन्दु' छिपा है कि केवल असीमानंद के इकबाले जुर्म की बुनियाद पर जमानत नहीं दी जा सकती लेकिन सीबीआई के पास कोई ठोस सबूत नहीं जिसकी बुनियाद पर जमानत अर्जी निरस्त करने की बात की जाए। इससे पूर्व मुंबई हाई कोर्ट में सीबीआई कह चुकी है कि इसके पास आरोपियों के संबंध में कुछ सबूत नहीं हैं।
ऐसे हालात में कांग्रेस की सियासी चालाकी उल्लेखनीय है। सभी बातें दिग्विजय सिंह से कहलाती है और दिग्विजय सिंह वह अब बातें कहने के बाद उसे `व्यक्तिगत विचार' करारे देते हैं। मुस्लिम वोट बैंक पर पकड़ के लिए यह अच्छा तरीका है। किसी भी राजनैतिक पार्टी को सेकुलरिज्म पर खरा उतरने के लिए कथनी और करनी में विरोधाभास नहीं होना चाहिए लेकिन कांग्रेस हमेशा से यही करती आई है।
`बेगुनाह मुसलमानों की रिहाई का मामला' के तहत दैनिक `राष्ट्रीय सहारा' ने लिखा है। 2006 में मालेगांव में मुसलमानों के बीच धमाके करके 36 मुसलमानों को शहीद कर दिया गया था और 100 से अधिक व्यक्ति जख्मी हो गए थे लेकिन पुलिस और खुफिया विभाग ने इन धमाकों में मुसलमानों को ही फंसा दिया और उन पर अत्याचार कर इकबाले जुर्म भी करा लिया। इस बाबत शनिवार को टाइम्स ऑफ इंडिया ने सामाजिक संगठन अनहद द्वारा जारी किए वह बयानात प्रकाशित किए हैं जिनमें उन मुस्लिम युवाओं की आप बीती बयान की गई है जो विभिन्न मामलों में गिफ्तार किए गए और उनको अलग-अलग राज्यों की पुलिस ने यातना पहुंचाकर इकबाले जुर्म पर मजबूर किया। हिन्दुस्तान के इस विशाल भाग में ऐसी न जाने कितनी दास्तानें हैं जिनके बारे में अभी तक मीडिया को भी कोई जानकारी नहीं मिली है और न जाने कितने बेगुनाह ऐसे हैं जो केवल अपने धर्म के आधार का प्रड़तारित किए जा रहे हैं लेकिन केंद्र एवं राज्य सरकारों की तरफ से इनके बारे में कोई बात नहीं की जा रही है, उल्टे कोर्ट में सीबीआई इनकी जमानत का विरोध कर रही है। आतंकवादियों के एक मुखिया की ओर से अपने जुर्म का इकबाल कर लेने के बाद क्या सीबीआई जैसी जिम्मेदार संस्था से यह आशा की जा सकती है क विह यदि अभी केस वापस नहीं ले सकता तो कम से कम इनकी जमानत की राह में रोड़े न अटकाए।
`सहरोजा दावत' ने `कसूरवार जब बेनकाब हो गए तो बेकसूरों को सजा क्यों' के शीर्षक से लिखा है। जब सूरते हाल बदल चुकी है कि आतंकवाद के आरोप में जो मुसलमान जेलों में बंद हैं वह बेकसूर हैं तो उनको रिहा कर देना चाहिए। सवाल सिर्प रिहाई का नहीं है बल्कि उनके मुआवजे और कसूरवार पुलिस वालों को सजा दिलाने का भी है ताकि भविष्य में फिर से ऐसी गलतियां न हों।
बेहतर तो यही होता कि पोटा और टाडा की तरह कोई समीक्षा कमेटी गठित करने की मांग देश के मुसलमान शांतिप्रिय लोगों के साथ मिलकर करते क्योंकि यह रिहाई भी इतनी आसान नहीं है जितनी समझ में आती है, इसके लिए कानूनी प्रक्रिया से गुजरना होगा लेकिन यदि समीक्षा कमेटी गठित कर दी जाए तो शायद इससे इस काम में कुछ आसानी हो जाए। आतंकवाद की हकीकत सामने आने के बाद अब मुसलमानों को इसे प्रभावी ढंग से उठाना चाहिए। यह कोई नया मामला नहीं है बल्कि ऐसा होता रहता है, जुर्म कोई और करता है और गिरफ्तारी किसी और की हो जाती है। बाद में जब कसूरवाद पकड़े जाते हैं तो वह भी इसी तरह जेलों में रहते हैं जिस तरह बेकसूरवार पहले से हैं। बेकसूरों की रिहाई के लिए बहुत से कानूनी स्तरों से गुजरना पड़ता है। यह काम जितना आसान नजर आता है, वास्तव में नहीं है। लेकिन कोशिश की जाए तो कामयाबी जरूर मिलती है और मुसलमानों को इस समय यही काम करना होगा।
दैनिक `जदीद खबर' ने `मालेगांव के बेकसूर' में लिखा है। मालेगांव बम धमाकों के सिलसिले में गिरफ्तार किए गए मुसलमानों की समस्या यह है कि वह अपने नहीं किए गुनाह की सजा काट रहे हैं। 2008 में शहीद हेमंत करकरे की अगुवाई में जब मालेगांव बम धमाकों के सिलसिले में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर एण्ड कम्पनी को गिरफ्तार कर लिया गया तो इंसाफ की बात थी कि इन बेकसूर मुसलमानों को रिहा कर दिया जाता। भगवा आतंकवादियों की गिरफ्तारी और इनके खिलाफ मकोका अदालत में कायम किए गए मुकदमों के बाद अब स्वामी असीमानंद के इकबाले जुर्म के बाद इस बात की पूरी आशा थी कि तफ्तीशी एजेंसियां और विशेष मकोका अदालत जमीनी सच्चाई पर विचार करते हुए बेकसूरों की रिहाई के आदेश जारी करेगी। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण इन आरोपियों की रिहाई के रास्ते में रोड़े अटका दिए गए जिस पर मानवाधिकार संगठनों और मुसलमानों की ओर से तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की जा रही है। क्या अदालत और जांच एजेंसियां जमीनी सच्चाई को स्वीकार करते हुए इन आरोपियों को रिहा करने का आदेश जारी करेंगी।
`मालेगांव धमाका 2006 ः सीबीआई ने शुरू किया नया खेल' में सईद हमीद लिखते हैं। दिल्ली में सीबीआई की भूमिका कुछ और है...लेकिन महाराष्ट्र में सीबीआई कुछ और ही रंग दिखा रही है। ऐसा क्यों?
यह कहा जाता है कि वेस्टर्न जोन की सीबीआई के अधिकार क्षेत्र में महाराष्ट्र के साथ गुजरात भी शामिल है तो क्या मुंबई मुख्यालय की सीबीआई पर नरेन्द्र मोदी का ज्यादा प्रभाव है... या महाराष्ट्र और केंद्र सरकार की ओर से मुंबई में कुछ दिल्ली में कुछ और खेल दिखाया जा रहा है...?
हैदराबाद से प्रकाशित दैनिक `ऐतमाद' ने `आतंकवाद के दाग को मिटाने की आरएसएस की मुहिम' के शीर्षक से लिखा है। स्वामी असीमानंद के बम धमाकों से संबंधित इकबालिया बयान से आरएसएस को मानसिक रूप से इतना परेशान कर दिया है कि हिन्दू समाज में इस संगठन की छवि मिट्टी में मिल गई है। इसलिए अब उसने अपनी छवि सुधारने के लिए घर-घर दस्तक देने और इन धमाकों के बारे में अपनी गढ़ी हुई कहानी सुनने का फैसला किया है। आरएसएस और इसकी सहयोगी संगठनों सहित भाजपा के कार्यकर्ता बुकलेट वितरित कर यह बताने की कोशिश करेंगे कि किस तरह कांग्रेस अगुवाई वाली यूपीए सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ भाजपा के नेतृत्व में संघ परिवार की मुहिम का बदला लेने के लिए प्रचारकों और स्वयंसेवकों की गिरफ्तारी और उनकी तफ्तीश द्वारा आरएसएस पर आतंकवाद का ठप्पा लगाने की कोशिश कर रही है। लेकिन आरएसएस ने तथाकथित देश प्रेम और कौम परस्ती के नाम पर दंगों द्वारा जो अराजकता फैलाई और घृणा के बीज बोए हैं उनके खिलाफ आज भी कोई इसके मुकाबले के लिए मैदान में नहीं उतर रहा है।
आरएसएस प्रवक्ता राम माधव आज अगर यह प्रचार करते हैं कि आरएसएस का आतंकवाद से कोई संबंध नहीं है और राजनीति के चलते उसे बदनाम किया जा रहा है तो दुनिया में हिन्दू धर्म की छवि गलत बन रही है। जाहिर है कि राम माधव का इस तरह का बयान हिन्दुओं को कांग्रेस सरकार से दूर कर सकता है लेकिन यदि सरकार इन बिन्दुओं को विचारणीय नहीं समझती और खुद दूसरी सेकुलर पार्टियों के साथ संघ परिवार की आतंकी गतिविधियों से जनता को अवगत नहीं कराती तो फंदा कांग्रेस के गले में पड़ सकता है।
मुंबई से प्रकाशित दैनिक `इंकलाब' में मुब्बशिर मुशताक ने `मालेगांव मामले में सीबीआई उधेड़बुन की शिकार, इसे कंफ्यूज्ड ब्यूरो ऑफ इंवेस्टीगेशन भी कहा जा सकता है' के अपने आलेख में लिखा है। 17वीं सदी में ईसाई विचारधारा के मशहूर स्तम्भकार एन होसटन ने लिखा था कि कंफ्यूजन मानसिक बिगाड़ का एक संकेत है। मानसिक उधेड़बुन साफ और तुरन्त सोच को अपंग बना देती है जबकि मानसिक बिगाड़ भय और उधेड़बुन के साथ धोखे की ओर ले जाता है। इसी मानसिक बीमारी का शिकार कंफ्यूजन ब्यूरो ऑफ इंवेस्टीगेशन (सीबीआई का पूरा नाम) ने 9 आरोपियों की जमानत का विरोध करते हुए इंसाफ को और पेचीदा बना दिया है। सीबीआई के वकील राज ठाकरे ने मकोका कोर्ट में एक आम कानूनी बिन्दु उठाते हुए कहा कि आरोपियों ने कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया है जिसकी बुनियाद पर जमानत अर्जी पर विचार किया जा सके, इसलिए जमानत अर्जी निरस्त की जाए। सीबीआई के इस दृष्टिकोण में `कानूनी बिन्दु' छिपा है कि केवल असीमानंद के इकबाले जुर्म की बुनियाद पर जमानत नहीं दी जा सकती लेकिन सीबीआई के पास कोई ठोस सबूत नहीं जिसकी बुनियाद पर जमानत अर्जी निरस्त करने की बात की जाए। इससे पूर्व मुंबई हाई कोर्ट में सीबीआई कह चुकी है कि इसके पास आरोपियों के संबंध में कुछ सबूत नहीं हैं।
ऐसे हालात में कांग्रेस की सियासी चालाकी उल्लेखनीय है। सभी बातें दिग्विजय सिंह से कहलाती है और दिग्विजय सिंह वह अब बातें कहने के बाद उसे `व्यक्तिगत विचार' करारे देते हैं। मुस्लिम वोट बैंक पर पकड़ के लिए यह अच्छा तरीका है। किसी भी राजनैतिक पार्टी को सेकुलरिज्म पर खरा उतरने के लिए कथनी और करनी में विरोधाभास नहीं होना चाहिए लेकिन कांग्रेस हमेशा से यही करती आई है।
`बेगुनाह मुसलमानों की रिहाई का मामला' के तहत दैनिक `राष्ट्रीय सहारा' ने लिखा है। 2006 में मालेगांव में मुसलमानों के बीच धमाके करके 36 मुसलमानों को शहीद कर दिया गया था और 100 से अधिक व्यक्ति जख्मी हो गए थे लेकिन पुलिस और खुफिया विभाग ने इन धमाकों में मुसलमानों को ही फंसा दिया और उन पर अत्याचार कर इकबाले जुर्म भी करा लिया। इस बाबत शनिवार को टाइम्स ऑफ इंडिया ने सामाजिक संगठन अनहद द्वारा जारी किए वह बयानात प्रकाशित किए हैं जिनमें उन मुस्लिम युवाओं की आप बीती बयान की गई है जो विभिन्न मामलों में गिफ्तार किए गए और उनको अलग-अलग राज्यों की पुलिस ने यातना पहुंचाकर इकबाले जुर्म पर मजबूर किया। हिन्दुस्तान के इस विशाल भाग में ऐसी न जाने कितनी दास्तानें हैं जिनके बारे में अभी तक मीडिया को भी कोई जानकारी नहीं मिली है और न जाने कितने बेगुनाह ऐसे हैं जो केवल अपने धर्म के आधार का प्रड़तारित किए जा रहे हैं लेकिन केंद्र एवं राज्य सरकारों की तरफ से इनके बारे में कोई बात नहीं की जा रही है, उल्टे कोर्ट में सीबीआई इनकी जमानत का विरोध कर रही है। आतंकवादियों के एक मुखिया की ओर से अपने जुर्म का इकबाल कर लेने के बाद क्या सीबीआई जैसी जिम्मेदार संस्था से यह आशा की जा सकती है क विह यदि अभी केस वापस नहीं ले सकता तो कम से कम इनकी जमानत की राह में रोड़े न अटकाए।
`सहरोजा दावत' ने `कसूरवार जब बेनकाब हो गए तो बेकसूरों को सजा क्यों' के शीर्षक से लिखा है। जब सूरते हाल बदल चुकी है कि आतंकवाद के आरोप में जो मुसलमान जेलों में बंद हैं वह बेकसूर हैं तो उनको रिहा कर देना चाहिए। सवाल सिर्प रिहाई का नहीं है बल्कि उनके मुआवजे और कसूरवार पुलिस वालों को सजा दिलाने का भी है ताकि भविष्य में फिर से ऐसी गलतियां न हों।
बेहतर तो यही होता कि पोटा और टाडा की तरह कोई समीक्षा कमेटी गठित करने की मांग देश के मुसलमान शांतिप्रिय लोगों के साथ मिलकर करते क्योंकि यह रिहाई भी इतनी आसान नहीं है जितनी समझ में आती है, इसके लिए कानूनी प्रक्रिया से गुजरना होगा लेकिन यदि समीक्षा कमेटी गठित कर दी जाए तो शायद इससे इस काम में कुछ आसानी हो जाए। आतंकवाद की हकीकत सामने आने के बाद अब मुसलमानों को इसे प्रभावी ढंग से उठाना चाहिए। यह कोई नया मामला नहीं है बल्कि ऐसा होता रहता है, जुर्म कोई और करता है और गिरफ्तारी किसी और की हो जाती है। बाद में जब कसूरवाद पकड़े जाते हैं तो वह भी इसी तरह जेलों में रहते हैं जिस तरह बेकसूरवार पहले से हैं। बेकसूरों की रिहाई के लिए बहुत से कानूनी स्तरों से गुजरना पड़ता है। यह काम जितना आसान नजर आता है, वास्तव में नहीं है। लेकिन कोशिश की जाए तो कामयाबी जरूर मिलती है और मुसलमानों को इस समय यही काम करना होगा।
दैनिक `जदीद खबर' ने `मालेगांव के बेकसूर' में लिखा है। मालेगांव बम धमाकों के सिलसिले में गिरफ्तार किए गए मुसलमानों की समस्या यह है कि वह अपने नहीं किए गुनाह की सजा काट रहे हैं। 2008 में शहीद हेमंत करकरे की अगुवाई में जब मालेगांव बम धमाकों के सिलसिले में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर एण्ड कम्पनी को गिरफ्तार कर लिया गया तो इंसाफ की बात थी कि इन बेकसूर मुसलमानों को रिहा कर दिया जाता। भगवा आतंकवादियों की गिरफ्तारी और इनके खिलाफ मकोका अदालत में कायम किए गए मुकदमों के बाद अब स्वामी असीमानंद के इकबाले जुर्म के बाद इस बात की पूरी आशा थी कि तफ्तीशी एजेंसियां और विशेष मकोका अदालत जमीनी सच्चाई पर विचार करते हुए बेकसूरों की रिहाई के आदेश जारी करेगी। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण इन आरोपियों की रिहाई के रास्ते में रोड़े अटका दिए गए जिस पर मानवाधिकार संगठनों और मुसलमानों की ओर से तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की जा रही है। क्या अदालत और जांच एजेंसियां जमीनी सच्चाई को स्वीकार करते हुए इन आरोपियों को रिहा करने का आदेश जारी करेंगी।
`मालेगांव धमाका 2006 ः सीबीआई ने शुरू किया नया खेल' में सईद हमीद लिखते हैं। दिल्ली में सीबीआई की भूमिका कुछ और है...लेकिन महाराष्ट्र में सीबीआई कुछ और ही रंग दिखा रही है। ऐसा क्यों?
यह कहा जाता है कि वेस्टर्न जोन की सीबीआई के अधिकार क्षेत्र में महाराष्ट्र के साथ गुजरात भी शामिल है तो क्या मुंबई मुख्यालय की सीबीआई पर नरेन्द्र मोदी का ज्यादा प्रभाव है... या महाराष्ट्र और केंद्र सरकार की ओर से मुंबई में कुछ दिल्ली में कुछ और खेल दिखाया जा रहा है...?
Wednesday, February 2, 2011
राजनीति का मोहरा बना दारुल उलूम
दारुल उलूम देवबंद के नए मोहतमिम (कुलपति) मौलाना गुलाम मोहम्मद वस्तानवी द्वारा यह कहने के बाद कि नरेंद्र मोदी राज्य में मुसलमान भी अन्य संप्रदाय की तरह विकास की ओर अग्रसर हैं और उनके खिलाफ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाता है, उन पर उंगली उठने लगी है। मौलाना वस्तानवी को दारुल उलूम देवबंद की मजलिस शूरा (कार्यकारिणी) ने गत 10 जनवरी को बहुमत के आधार पर मोहतमिम बनाया था। मजलिस शूरा में 21 सदस्य हैं, जिनमें चार सदस्यों का निधन हो जाने के कारण उनकी जगह खाली है। बैठक में तीन सदस्य उपस्थित नहीं हुए थे। कुल 14 सदस्यों ने अपने मत का प्रयोग किया था, जिनमें चार सदस्यों ने दारुल उलूम के शिक्षक और जमीअत उलेमा हिंद के एक धड़े के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी को, दो सदस्यों ने दारुल उलूम के नायब मोहतमिम मौलाना अब्दुल खालिक मदरासी और आठ सदस्यों ने मौलाना वस्तानवी के पक्ष में मतदान किया। तब फैसले से बौखलाकर अशरद मदनी के करीबी रिश्तेदार मौलाना अब्दुल अलीम फारुकी ने यह शिगूफा छोड़ दिया कि वस्तानवी कासमी नहीं हैं, जबकि दारुल उलूम के संविधान में इस बाबत कोई दिशा-निर्देश नहीं है। यहीं से वस्तानवी को विरोध शुरू हो गया, लेकिन इसकी शक्ल वह नहीं थी, जो मोदी के संदर्भ में दिए गए बयान के बाद पैदा हुई है।
आम मुसलमानों सहित बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मौलाना वस्तानवी के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की, जिसके बाद वस्तानवी ने अपनी स्थिति स्पष्ट की। लेकिन उनके स्पष्टीकरण से बात बनी नहीं और यह आग दारुल उलूम तक पहुंच गई। फिलहाल दारुल उलूम में माहौल अपने हित में नहीं होने की बात स्वीकार कर वस्तानवी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है और गुजरात चले गए हैं। और इधर सबकी नजरें 23 फरवरी को होने वाली मजलिस शूरा की बैठक पर टिक गई है।
अनहद की ट्रस्टी और संस्थापक शबनम हाशमी कहती हैं कि मौलाना वस्तानवी का बयान इतनी छोटी घटना नहीं है, जिसे नजरंदाज किया जाए। उनके अनुसार, वस्तानवी ने जिस दिन मोदी से संबंधित बयान दिया, उसके अगले दिन गुजरात नरसंहार पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होने वाली थी। इसके अलावा वस्तानवी को कनाडा जाने के लिए वीजा चाहिए था, जो उन्हें नहीं मिल रहा था। शबनम का कहना है कि मोदी राज्य में मुसलमान के विकास करने की पोल एनएसएसओ की रिपोर्ट ने ही खोल दी है, जिसमें बताया गया है कि राज्य में 2005 के मुकाबले मुसलिम युवाओं की बेरोजगारी का ग्राफ बढ़ा है और उनकी शिक्षा में भी कमी आई है।
बहरहाल, इस पूरे घटनाक्रम का दुखद पहलू यह है कि मोदी को लेकर मुसलमानों को दो खेमों में बांटा जा रहा है और इसे सीधे तौर पर एक शैक्षणिक संस्था से जोड़ दिया गया है। मोदी का विरोध करने वालों को कट्टरपंथी और समर्थन करने वालों को उदारवादी मुसलमान के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है। इसी फॉरमूले के तहत सांप्रदायिक ताकतें दारुल उलूम की छवि कट्टरवाद के तौर पर पेश करती हैं। मदनी परिवार द्वारा दारुल उलूम का अपने हित में इस्तेमाल करने का जो आरोप वस्तानवी लगा रहे हैं, उससे वह खुद भी शिकार हैं। नरेंद्र मोदी के संबंध में की गई उनकी टिप्पणी उसी का हिस्सा है।
बीते दिनों एक मंत्री को मूर्ति भेंट करने की घटना पर वस्तानवी का कहना है कि वह तसवीर थी, पर जब एक उर्दू दैनिक ने मूर्ति के साथ उनकी तसवीर छाप दी, तो वह मौन हो गए। वस्तानवी के अनुसार, मूर्ति का मामला शूरा में भी आया था और वह उनके जवाब से संतुष्ट है। अगर यह सच है, तो यह सवाल लाजिमी है कि शूरा पर किसी तरह का दबाव था कि वह मूर्ति और तसवीर में फर्क नहीं कर पाई या फिर जानबूझकर इसकी अनदेखी की गई?
बहरहाल, मौलान अशरद मदनी की प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात के बाद यह कयास तेज हो गए हैं कि कांग्रेस ने मौलाना मदनी को इस पद पर लाने की योजना बना ली है। संभव है कि इसके लिए शूरा की खाली जगह पर ऐसे व्यक्तियों को लाया जाएगा, जो इस मिशन को पूरा करने में सहयोग देगा।
आम मुसलमानों सहित बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मौलाना वस्तानवी के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की, जिसके बाद वस्तानवी ने अपनी स्थिति स्पष्ट की। लेकिन उनके स्पष्टीकरण से बात बनी नहीं और यह आग दारुल उलूम तक पहुंच गई। फिलहाल दारुल उलूम में माहौल अपने हित में नहीं होने की बात स्वीकार कर वस्तानवी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है और गुजरात चले गए हैं। और इधर सबकी नजरें 23 फरवरी को होने वाली मजलिस शूरा की बैठक पर टिक गई है।
अनहद की ट्रस्टी और संस्थापक शबनम हाशमी कहती हैं कि मौलाना वस्तानवी का बयान इतनी छोटी घटना नहीं है, जिसे नजरंदाज किया जाए। उनके अनुसार, वस्तानवी ने जिस दिन मोदी से संबंधित बयान दिया, उसके अगले दिन गुजरात नरसंहार पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होने वाली थी। इसके अलावा वस्तानवी को कनाडा जाने के लिए वीजा चाहिए था, जो उन्हें नहीं मिल रहा था। शबनम का कहना है कि मोदी राज्य में मुसलमान के विकास करने की पोल एनएसएसओ की रिपोर्ट ने ही खोल दी है, जिसमें बताया गया है कि राज्य में 2005 के मुकाबले मुसलिम युवाओं की बेरोजगारी का ग्राफ बढ़ा है और उनकी शिक्षा में भी कमी आई है।
बहरहाल, इस पूरे घटनाक्रम का दुखद पहलू यह है कि मोदी को लेकर मुसलमानों को दो खेमों में बांटा जा रहा है और इसे सीधे तौर पर एक शैक्षणिक संस्था से जोड़ दिया गया है। मोदी का विरोध करने वालों को कट्टरपंथी और समर्थन करने वालों को उदारवादी मुसलमान के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है। इसी फॉरमूले के तहत सांप्रदायिक ताकतें दारुल उलूम की छवि कट्टरवाद के तौर पर पेश करती हैं। मदनी परिवार द्वारा दारुल उलूम का अपने हित में इस्तेमाल करने का जो आरोप वस्तानवी लगा रहे हैं, उससे वह खुद भी शिकार हैं। नरेंद्र मोदी के संबंध में की गई उनकी टिप्पणी उसी का हिस्सा है।
बीते दिनों एक मंत्री को मूर्ति भेंट करने की घटना पर वस्तानवी का कहना है कि वह तसवीर थी, पर जब एक उर्दू दैनिक ने मूर्ति के साथ उनकी तसवीर छाप दी, तो वह मौन हो गए। वस्तानवी के अनुसार, मूर्ति का मामला शूरा में भी आया था और वह उनके जवाब से संतुष्ट है। अगर यह सच है, तो यह सवाल लाजिमी है कि शूरा पर किसी तरह का दबाव था कि वह मूर्ति और तसवीर में फर्क नहीं कर पाई या फिर जानबूझकर इसकी अनदेखी की गई?
बहरहाल, मौलान अशरद मदनी की प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात के बाद यह कयास तेज हो गए हैं कि कांग्रेस ने मौलाना मदनी को इस पद पर लाने की योजना बना ली है। संभव है कि इसके लिए शूरा की खाली जगह पर ऐसे व्यक्तियों को लाया जाएगा, जो इस मिशन को पूरा करने में सहयोग देगा।
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