बीते सप्ताह कई घटनाओं पर उर्दू समाचार पत्रों ने जो चर्चा की है। उसने निश्चय ही पाठकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कराया है। पेश है इस बाबत कुछ उर्दू अखबारों की राय एवं रिपोर्ट। दैनिक `जदीद मेल' ने जमाअत इस्लामी द्वारा नवगठित राजनीतिज्ञ पार्टी जिसका नाम `वैलफेयर पार्टी' है में `जबरदस्त टकराव' के शीर्षक से लिखा है कि वैसे तो यह पार्टी अपनी स्थापना के दिन से ही विवादित रही है लेकिन इन दिनों बाहरी विवाद के अलावा पार्टी में भीतरी विवाद अपनी चरमसीमा पर है। उल्लेखनीय है कि पार्टी गठन के दिन ही पार्टी को भाजपा के लोगों ने आशीर्वाद देकर भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के राष्ट्रीय संयोजक डॉ. जेके जैन ने कहा था कि `जमाअत इस्लामी के अधीन वैलफेयर पार्टी जो काम करेगी वही काम मैं पार्टी के अल्पसंख्यक मोर्चा से करूंगा।' इस बात पर पार्टी सुप्रीमो मुजतुबा फारुक नाराज भी हुए थे लेकिन जानकारों के अनुसार पार्टी के महासचिव डॉ. कासिम रसूल इलियास के सामने वह बिल्कुल बेबस थे। समाचार के मुताबिक इन दिनों पार्टी में मौजूद कुछ राजनैतिक लोग वैलफेयर पार्टी से नाराज हैं। उनका कहना है कि यदि उन्हें मालूम होता कि पार्टी गैर राजनैतिक लोगों के हाथों की कठपुतली बन जाएगी तो वह पार्टी में शामिल नहीं होते। और तो और जो बैठक दिल्ली में होनी थी, वह हैदराबाद में हो रही है और जो लखनऊ में होनी थी वह दिल्ली में हो रही है। आखिर जब उत्तर प्रदेश में चुनाव नजदीक आ रहे हैं तो पार्टी के लोग साउथ पर इतना फोकस क्यों कर रहे हैं, यह समझ से परे है।
अल्पसंख्यकों के साथ होने वाले भेदभाव पर जुर्माना और कैद की सजा पर सरकार द्वारा प्रस्तावित कानून का स्वागत करते हुए उसे समय की पुकार बताया है। `जदीद मेल' ने जमाअत इस्लामी हिन्दी के अध्यक्ष मौलाना सैयद जलालउद्दीन उभरी, कांग्रेस प्रवक्ता डॉ. शकील अहमद और जमीअत उलेमा हिन्द (अरशद मदनी) के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी सहित नेशनल काउंसिल फार प्रमोशन ऑफ उर्दू लैंग्वेज के डायरेक्टर हमाद उल्ला भट्ट के विचारों को प्रमुखता से प्रकाशित किया है। भट्ट के अनुसार समान अवसर आयोग की बात सच्चर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में भी कही थी। उन्होंने कहा कि भेदभाव खत्म करने के लिए केवल प्रशासनिक आदेश काफी नहीं हैं बल्कि मुसलमानों के लिए अलग से कानून बनना चाहिए। पहले यदि विश्वविद्यालयों में दाखिला अथवा नौकरी नहीं मिलती और अपराध साबित हो जाता कि मुसलमान के साथ भेदभाव हुआ है तो सिर्प माफी से काम चल जाता लेकिन आशा है कि ऐसा करने वालों को सजा मिलेगी, देश उन्नति करेगा। संविधान ने अल्पसंख्यकों को जो अधिकार दिए हैं, वह उन्हें मिलेंगे और इससे देश मजबूत होगा।
`अल्पसंख्यकों के फण्ड को दबाए बैठी है सरकार' के शीर्षक से दैनिक `सहाफत' ने पहले पेज पर रिपोर्ट प्रकाशित की है। इसके मुताबिक अल्पसंख्यक मंत्रालय के विभिन्न योजनाओं की मंजूरी के लिए सरकार के पास अब भी 431.77 करोड़ रुपये बचे हुए हैं। इस मंत्रालय में जो आंकड़े उपलब्ध हैं उनके मुताबिक 43780.40 करोड़ रुपये मंजूर किए गए जबकि इस योजना के तहत अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में मंजूर हुई योजनाओं की लागत 3348.62 करोड़ रुपये है। इसमें से इस वर्ष 31 मार्च तक केंद्र को जो पूरा हिस्सा दिया जा चुका है वह 3111.55 करोड़ रुपये है। अल्पसंख्यक मंत्रालय ने 31 मार्च तक 2162.02 करोड़ रुपए जारी किए हैं।
अल्पसंख्यकों के विकास हेतु यह योजना 2008-09 में शुरू की गई थी और देश की 20 राजधानी सहित केंद्र शासित राज्यों में अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों वाले 90 जिलों में इस काम काम हो रहा है। दिल्ली हज कमेटी का गठन एक ऐसा मामला है जो पिछले पांच सालों से फाइलों में बन्द है। गत दो महीने से यह आशा हो चली थी कि शायद अब कमेटी का गठन हो जाए लेकिन सदस्यों के नामों पर न केवल जनता में विरोध हो रहा है बल्कि खुद राज्य सरकार भी कुछ नामों पर अड़ी हुई है जिसके कारण यह मसला उलझा हुआ है। `महमूद जिया के विरोध में रुकी हुई है फाइल, हज कमेटी में सदस्यों को लेकर राज्य सरकार और कांग्रेस संगठन आमने-सामने' के शीर्षक से दैनिक `हमारा समाज' ने लिखा है कि यदि स्रोतों की मानें तो पार्टी हाई कमान सभी मरहले पूरे कर सात नामों पर मोहर लगा चुकी है और दिल्ली हज कमेटी के चेयरमैन के लिए नकी मल्होत्रा का नाम तय हो चुका है लेकिन अब सारा मामला सीताराम बाजार के पार्षद महमूद जिया पर आकर रुक गया है। राज्य सरकार पार्षद कोटे के लिए महिला सदस्य की जिद पकड़े हुए हैं जबकि कांग्रेस संगठन की ओर से महमूद जिया का नाम दिया गया है। बताया जाता है कि संबंधित मंत्री डॉ. अशोक कुमार वालिया और मुख्यमंत्री में भी सदस्यों के नामों को लेकर मतभेद पाए जा रहे हैं। इस तरह और भी कई अन्य कारण हैं जो हज कमेटी को एक बार फिर लूली-लंगड़ी बनाने पर तुले हैं। ऑल इंडिया रेडियो के उर्दू कार्यक्रमों के गिरते स्तर के लिए अंजुमन तरक्की उर्दू (हिन्द) के महासचिव डॉ. खलीक अंजुम ने उर्दू न जानने वाले कार्यकर्ताओं को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया है। इसी महीने दिल्ली से प्रकाशित होने वाले दैनिक `इंकलाब' ने उनके विचारों को पेश करते हुए लिखा है कि ऑल इंडिया रेडियो के उर्दू कार्यक्रमों से मेरा संबंध गत 30 वर्षों से है और जिस जमाने में रेडियो वाले मुझे कार्यक्रम में बुलाते थे तो मैं बड़े उत्साह से जाता था लेकिन अब मैं वहां नहीं जाता। क्योंकि वहां का स्तर उर्दू कार्यक्रम को चलाने वाले उर्दू न जानने वाले कार्यकर्ताओं के कारण काफी गिर चुका है। उनका कहना है कि उर्दू सर्विस में उर्दू के कार्यक्रम वे लोग चला रहे हैं जो उर्दू के साहित्य से भी परिचित नहीं हैं। यहां तक उर्दू साहित्यकारों और शायरों को भी नहीं जानते। अपने संबंध वालों को गेस्ट के तौर पर कार्यक्रम में बुलाते हैं और उनको चेक थमा देते हैं। उन्होंने केंद्रीय प्रसारण मंत्री अम्बिका सोनी पर निशाना साधते हुए कहा कि उर्दू रेडियो और उर्दू टीवी के संबंध में संबंधित मंत्री भी भाषायी भेदभाव रखती हैं। क्योंकि कई बार उनको पत्र लिखे कि आप ऑल इंडिया रेडियो के कार्यक्रमों में उर्दू जानने वालों की नियुक्ति करें लेकिन अम्बिका सोनी के कान पर जूं तक नहीं रेंगी।
इस सवाल पर कि आप प्रधानमंत्री से अपनी फरियाद क्यों नहीं करते, के जवाब में डॉ. अंजुम ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रधानमंत्री उर्दू दोस्त हैं, उर्दू में भाषण देते हैं, उर्दू लिखते-पढ़ते हैं, लेकिन जिस महिला को यह जिम्मेदारी दी गई है वह इसे ठीक से अंजाम नहीं दे रही है।
A Blog is specially build for minorities. Where you can find a latest article as well as Issues. there is no need to recognize a muslim but there is a lot of work for humanity.
Friday, June 24, 2011
Friday, June 17, 2011
बाबा रामदेव का `षड्यंत्र बेनकाब'
योग गुरु बाबा रामदेव द्वारा काला धन देश वापस लाने और राष्ट्रीय सम्पत्ति घोषित करने की मांग को लेकर रामलीला मैदान में अमरण अनशन के दौरान आधी रात को उन्हें और उनके समर्थकों को प्रशासन द्वारा खदेड़ दिया गया। उस पर चारों ओर से तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की गई। उर्दू अखबारों ने भी इस पर अपना नजरिया पेश किया। कोलकाता, दिल्ली और झारखंड से एक साथ प्रकाशित होने वाले उर्दू दैनिक `अखबारे मशरिक' ने `बाबा रामदेव पर केक डाउन करके सरकार ने अपनी राहों में कांटें बिछा लिए' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखा है। सच पूछा जाए तो इस मामले में सरकार ने मुंह की खाई है। बाबा रामदेव चाहे फ्रॉड हों या आरएसएस के इशारे पर मैदान में कूदे हों लेकिन वह एक ऐसे मुद्दे (काला धन) को लेकर सामने आए हैं जिसका पूरे देश में समर्थन किया जा रहा है। सरकार ने आ बैल मुझे मार वाली नीति अपनाकर स्वयं अपनी राहों में कांटें बिछा लिए हैं। अल्लाह ही खैर करे।
उर्दू दैनिक `जदीद खबर' ने `सरकार के तेवर' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखा है कि बाबा रामदेव का आंदोलन पूरी तरह राजनीति से प्रेरित था और इसे संघ परिवार का समर्थन प्राप्त था लेकिन इसके बावजूद सरकार ने बाबा रामदेव से संवाद किया और केंद्रीय मंत्रिमंडल के कई मंत्री उनसे बात करने एयरपोर्ट गए। विदेशी बैंकों में जमा काला धन को वापस लाकर गरीबों में बांटने, हजार और पांच सौ रुपये के नोटों को बन्द करने जैसी अव्यवहारिक मांगों पर सरकार ने रामदेव के साथ लम्बी बातचीत का भूत सवार था और वह खुद को अफलातून समझ बैठे थे। सरकार ने बातचीत की नाकामी और बाबा द्वारा वादा तोड़ने के बाद प्रशासनिक कार्यवाही को प्राथमिकता दी, जो ऐसे हालात में जरूरी होती है। बाबा रामदेव की कायरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वह रामलीला मैदान में पुलिस का मुकाबला करने के बजाय वहां मौजूद महिलाओं के बीच घुस गए और एक महिला का लिबास पहनकर भागने की कोशिश करते हुए पकड़े गए। अखबार आगे लिखता है कि कांग्रेस वास्तव में इस मामले में गंभीर है और उसने सांप्रदायिक ताकतों से लड़ने का फैसला किया है तो कोई कारण नहीं कि इन तत्वों को कमजोर न किया जा सके क्योंकि कांग्रेस की कमजोरियों और अनदेखी ने ही इन तत्वों को इतना ताकतवर बनाया है कि वह आज देश की व्यवस्था को चुनौती दे रही है। सांप्रदायिक ताकतों से लड़ने के लिए राजनैतिक इच्छाशक्ति बहुत जरूरी है।
दैनिक `हिन्दुस्तान एक्सप्रेस' ने `मोदी यदि मुख्यमंत्री नहीं होते' पर चर्चा करते हुए लिखा है। सुना है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपने पद की गरिमा का बड़ा ध्यान रहता है, वह अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों को समझते हैं। उनका कहना है कि यदि वह मुख्यमंत्री नहीं होते तो नई दिल्ली में आज इतना बड़ा तूफान खड़ा कर देते कि कांग्रेस भी क्या याद रखती, बाबा रामदेव के साथ रामलीला मैदान में रविवार की रात जो सुलूक किया गया, जिम्मेदारों को इसका मजा चखा देते। अखबार आगे लिखता है कि वो समय रहते सरकार और दिल्ली पुलिस को खतरे का अंदाजा हो गया और उसने रामलीला मैदान को जलियांवाला बाग बनने से बचा लिया। लेकिन वह जो कहते हैं कि चोर चोरी से जाए, हेराफेरी से न जाए। कहां तो इसे बाबा की हरकतों पर शर्म के मारे जमीन में गढ़ जाना चाहिए लेकिन कहां यह कि वह उलटे सरकार को ही कटघरे में खड़ा कर रही है।
दैनिक `हमारा मकसद' ने `षड्यंत्र बेनकाब' में लिखा है कि असल में सरकार और रामदेव के बीच जो गोपनीय समझौता हुआ था वह यह था कि रामदेव अन्ना हजारे के कैम्प को कमजोर करने का काम करेंगे जो प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सहित पूरे सरकारी तंत्र को लोकपाल के दायरे में लाए जाने पर जोर दे रहा है। दिल्ली के एक पांच सितारा होटल में रामदेव और दो केंद्रीय मंत्री दिनभर इस रणनीति पर विचार करते रहे। रामेदव जिन मांगों को लेकर दिल्ली आए थे उनमें 90 फीसदी को तुरन्त मान लिया गया और रामदेव को जो कुछ करना या वह सांकेतिक था। कहानी उस समय बिगड़ गई जब सरकार को अचानक याद आया कि जब अन्ना हजारे ने भूख हड़ताल शुरू की थी तो सरकार ऐसे झुक गई थी जैसे कोई अपराधी कानून के सामने झुक जाता है। रामदेव के साथ अन्दरखाते संधि हुई थी लेकिन आम लोगों में यही संदेश जाता कि कोई भी इस सरकार को झुका सकता है। इसके बाद जो कुछ हुआ, वह दुनिया के सामने है।
हैदराबाद से प्रकाशित दैनिक `मुनसिफ' ने `बाबा रामदेव बनाम सरकार' में लिखा है कि अन्ना हजारे हों या बाबा रामदेव, उनका राजनीति से कोई संबंध नहीं है। इनका सामाजिक कार्यकर्ता और योग गुरु की हैसियत से सीमित सम्पर्प जरूर है लेकिन इन दोनों ने एक के बाद एक अपना एजेंडा पेश किया तो सरकार के कदम लड़खड़ाने लगे। इसकी एक वजह यह हो सकती है कि व्यक्तियों का अपने तौर पर कोई वजूद नहीं है बल्कि इसके पीछे आरएसएस की अगुवाई कर रही संघ परिवार के विभिन्न संगठन हैं जो दिल्ली के तख्त पर बैठने के लिए विचलित नजर आती है। इसका इजहार कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह ने भी किया है। बाबा रामदेव अपने को नेक और सादा जिन्दगी गुजारने वाला ऋषि-मुनि के तौर पर पेश करना चाहते हैं लेकिन सच्चाई इसके विपरीत है। वह एक अरबपति हैं, वो चार्टर्ड जहाजों से यात्रा करते हैं। धरना-प्रदर्शन के लिए रामलीला मैदान में जो पांच सितारा व्यवस्था की गई वह बुद्धि को हैरान कर देती है कि एक साधु के पास इतनी दौलत कहां से आई। सरकार को ऐसे व्यक्ति से भयभीत होने के बजाय जनता से सीधे बात करनी चाहिए। सरकार यदि निडरता से आरएसएस के ऐसे एजेंडों का मुकाबला करने से बचती है तो सरकार पर से जनता के विश्वास को चोट पहुंचेगी।
उर्दू दैनिक `जदीद खबर' ने `सरकार के तेवर' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखा है कि बाबा रामदेव का आंदोलन पूरी तरह राजनीति से प्रेरित था और इसे संघ परिवार का समर्थन प्राप्त था लेकिन इसके बावजूद सरकार ने बाबा रामदेव से संवाद किया और केंद्रीय मंत्रिमंडल के कई मंत्री उनसे बात करने एयरपोर्ट गए। विदेशी बैंकों में जमा काला धन को वापस लाकर गरीबों में बांटने, हजार और पांच सौ रुपये के नोटों को बन्द करने जैसी अव्यवहारिक मांगों पर सरकार ने रामदेव के साथ लम्बी बातचीत का भूत सवार था और वह खुद को अफलातून समझ बैठे थे। सरकार ने बातचीत की नाकामी और बाबा द्वारा वादा तोड़ने के बाद प्रशासनिक कार्यवाही को प्राथमिकता दी, जो ऐसे हालात में जरूरी होती है। बाबा रामदेव की कायरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वह रामलीला मैदान में पुलिस का मुकाबला करने के बजाय वहां मौजूद महिलाओं के बीच घुस गए और एक महिला का लिबास पहनकर भागने की कोशिश करते हुए पकड़े गए। अखबार आगे लिखता है कि कांग्रेस वास्तव में इस मामले में गंभीर है और उसने सांप्रदायिक ताकतों से लड़ने का फैसला किया है तो कोई कारण नहीं कि इन तत्वों को कमजोर न किया जा सके क्योंकि कांग्रेस की कमजोरियों और अनदेखी ने ही इन तत्वों को इतना ताकतवर बनाया है कि वह आज देश की व्यवस्था को चुनौती दे रही है। सांप्रदायिक ताकतों से लड़ने के लिए राजनैतिक इच्छाशक्ति बहुत जरूरी है।
दैनिक `हिन्दुस्तान एक्सप्रेस' ने `मोदी यदि मुख्यमंत्री नहीं होते' पर चर्चा करते हुए लिखा है। सुना है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपने पद की गरिमा का बड़ा ध्यान रहता है, वह अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों को समझते हैं। उनका कहना है कि यदि वह मुख्यमंत्री नहीं होते तो नई दिल्ली में आज इतना बड़ा तूफान खड़ा कर देते कि कांग्रेस भी क्या याद रखती, बाबा रामदेव के साथ रामलीला मैदान में रविवार की रात जो सुलूक किया गया, जिम्मेदारों को इसका मजा चखा देते। अखबार आगे लिखता है कि वो समय रहते सरकार और दिल्ली पुलिस को खतरे का अंदाजा हो गया और उसने रामलीला मैदान को जलियांवाला बाग बनने से बचा लिया। लेकिन वह जो कहते हैं कि चोर चोरी से जाए, हेराफेरी से न जाए। कहां तो इसे बाबा की हरकतों पर शर्म के मारे जमीन में गढ़ जाना चाहिए लेकिन कहां यह कि वह उलटे सरकार को ही कटघरे में खड़ा कर रही है।
दैनिक `हमारा मकसद' ने `षड्यंत्र बेनकाब' में लिखा है कि असल में सरकार और रामदेव के बीच जो गोपनीय समझौता हुआ था वह यह था कि रामदेव अन्ना हजारे के कैम्प को कमजोर करने का काम करेंगे जो प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सहित पूरे सरकारी तंत्र को लोकपाल के दायरे में लाए जाने पर जोर दे रहा है। दिल्ली के एक पांच सितारा होटल में रामदेव और दो केंद्रीय मंत्री दिनभर इस रणनीति पर विचार करते रहे। रामेदव जिन मांगों को लेकर दिल्ली आए थे उनमें 90 फीसदी को तुरन्त मान लिया गया और रामदेव को जो कुछ करना या वह सांकेतिक था। कहानी उस समय बिगड़ गई जब सरकार को अचानक याद आया कि जब अन्ना हजारे ने भूख हड़ताल शुरू की थी तो सरकार ऐसे झुक गई थी जैसे कोई अपराधी कानून के सामने झुक जाता है। रामदेव के साथ अन्दरखाते संधि हुई थी लेकिन आम लोगों में यही संदेश जाता कि कोई भी इस सरकार को झुका सकता है। इसके बाद जो कुछ हुआ, वह दुनिया के सामने है।
हैदराबाद से प्रकाशित दैनिक `मुनसिफ' ने `बाबा रामदेव बनाम सरकार' में लिखा है कि अन्ना हजारे हों या बाबा रामदेव, उनका राजनीति से कोई संबंध नहीं है। इनका सामाजिक कार्यकर्ता और योग गुरु की हैसियत से सीमित सम्पर्प जरूर है लेकिन इन दोनों ने एक के बाद एक अपना एजेंडा पेश किया तो सरकार के कदम लड़खड़ाने लगे। इसकी एक वजह यह हो सकती है कि व्यक्तियों का अपने तौर पर कोई वजूद नहीं है बल्कि इसके पीछे आरएसएस की अगुवाई कर रही संघ परिवार के विभिन्न संगठन हैं जो दिल्ली के तख्त पर बैठने के लिए विचलित नजर आती है। इसका इजहार कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह ने भी किया है। बाबा रामदेव अपने को नेक और सादा जिन्दगी गुजारने वाला ऋषि-मुनि के तौर पर पेश करना चाहते हैं लेकिन सच्चाई इसके विपरीत है। वह एक अरबपति हैं, वो चार्टर्ड जहाजों से यात्रा करते हैं। धरना-प्रदर्शन के लिए रामलीला मैदान में जो पांच सितारा व्यवस्था की गई वह बुद्धि को हैरान कर देती है कि एक साधु के पास इतनी दौलत कहां से आई। सरकार को ऐसे व्यक्ति से भयभीत होने के बजाय जनता से सीधे बात करनी चाहिए। सरकार यदि निडरता से आरएसएस के ऐसे एजेंडों का मुकाबला करने से बचती है तो सरकार पर से जनता के विश्वास को चोट पहुंचेगी।
Monday, June 13, 2011
उर्दू प्रेस की माफियागिरी
बीते दिनों उर्दू समाचार पत्रों ने विभिन्न विषयों पर रिपोर्ट प्रकाशित कर पाठकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कराया है। दिल्ली, मुम्बई और लखनऊ से एक साथ प्रकाशित उर्दू दैनिक `सहाफत' में मोहम्मद आतिफ ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि पिछले कुछ दिनों से ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के हवाले से जिस तरह की खबरें आ रही हैं उससे ऐसा महसूस हो रहा है कि बोर्ड में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है और जो खबरें भी आ रही हैं वह असल मामले में 10 फीसदी से ज्यादा नहीं हैं। जानकार मानते हैं कि बोर्ड के अन्दर पाई जाने वाली यह बेचैनी व्यक्तिगत हितों के लिए है तभी तो इस पूरे में राजनीति हो रही है। कहने को तो बोर्ड महासचिव की गतिविधियों को लेकर उन्हें कठघरे में खड़ा किया जा रहा है लेकिन यदि बिटविन द लाइन जाकर समीक्षा की जाए तो यह सच्चाई सामने आती है कि वह एक तीर से दो शिकार करना चाहते हैं। किसी भी संस्था में यदि महासचिव पर से भरोसा खत्म हो जाए अथवा उसकी कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में आ जाए तो निश्चित रूप से केवल महासचिव को ही इसके लिए आरोपी नहीं ठहराया जा सकता बल्कि इस संस्था का अध्यक्ष भी इस आरोप में इनके साथ शरीक माना जाएगा। ऐसी स्थिति में यदि महासचिव को उसके पद से मुक्त किया जाता है तो बोर्ड अध्यक्ष अपने पद पर कैसे बने रह सकेंगे। बुनियादी सवाल यह है कि अचानक ऐसी क्या बात हो गई कि महासचिव की योग्यता और कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे और जो लोग सवाल उठा रहे हैं, वह कौन हैं और क्या चाहते हैं?
उर्दू दैनिक `हमारा समाज' में सादिक शेरवानी ने `उर्दू प्रेस क्लब की बेबुनियाद हवाबाजी, पदाधिकारी पत्रकार नहीं, कोई पत्रकार नहीं, कार्यालय का पता नहीं, सरपरस्तों का उर्दू का कोई अखबार नहीं, फिर भी नाम है उर्दू प्रेस क्लब' पर चर्चा करते हुए लिखा है कि आए दिन खबरें आती हैं कि फ्लां नकली कम्पनी से ठगी का मामला सामने आया है। उर्दू की यह संस्था भी ऐसी है जो अपने नाम से कोसों दूर मेल नहीं खाती लेकिन इसकी कागजी कार्यवाहियां चलती रहती हैं जिससे इनके सरपरस्तों का भला होता रहता है। इसका नाम उर्दू प्रेस क्लब है लेकिन इस संस्था का उर्दू पत्रकारिता से कुछ भी लेना-देना नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि उर्दू प्रेस क्लब में किसी उर्दू अखबार का कोई पत्रकार सदस्य नहीं है, इसके पदाधिकारियों में किसी का संबंध वर्तमान उर्दू पत्रकारिता से नहीं है। लगभग तीन वर्ष पूर्व कांस्टीट्यूशन क्लब में आयोजित इसके एक कार्यक्रम में एक गैर उर्दू पत्रकार ने न केवल पैगम्बर इस्लाम की शान में गुस्ताखी की थी बल्कि यहां तक कह दिया कि कुरान से सूरा जिहाद और सूरा तलाक को निकाल दिया जाए। इस पर काफी हंगामा हुआ था। उर्दू प्रेस क्लब इन दिनों उर्दू माफिया बना हुआ है और अब वह देश में पत्रकारिता का शोषण करते हुए विदेश भी पहुंच गया है। सूचना के अनुसार इन दिनों दुबई में इसकी माफियागिरी चल रही है।
दिल्ली, कोलकाता और रांची से एक साथ प्रकाशित होने वाला उर्दू दैनिक `अखबारे मशरिक' ने अपने पहले पेज पर रहस्योद्घाटन करते हुए यह रिपोर्ट छापी है। `मौलाना अरशद मदनी के अतिविश्वास पात्र ने 50 लाख का चूना लगाया, फजलुर रहमान ने सऊदी उच्चायोग से मिली रकम जमा नहीं की। रिपोर्ट के अनुसार जमीयत उलेमा हिन्द (मौलाना अरशद मदनी) की कार्यकारिणी सदस्य और मुख्यालय के एक अहम जिम्मेदार मालना फजलुर रहमान के बारे में यह चर्चा है कि उन्होंने जमीयत उलेमा हिन्द का 50 लाख रुपया हजम कर लिया है। मौलाना अरशद मदनी के विश्वास पात्र समझे जाने वाले मौलाना फजलुर रहमान का संबंध मुंबई से है जहां वह टेवल एजेंसी चलाते हैं लेकिन गत दो वर्ष से जमीयत उलेमा मुख्यालय में रह रहे थे और जमीयत उलेमा हिन्द की आंतरिक और विदश नीतियों में अहम भूमिका निभा रहे थे। गत दिनों पैगम्बर इस्लाम के महान साथियों (सहाबा) की महानता पर कांफ्रेंस के सिलसिले में दिल्ली स्थित सऊदी अरब उच्चायुक्त से मामला इनके ही द्वारा चल रहा था। इस कांफ्रेंस के बारे में आम धारणा थी कि सऊदी सरकार पूरी दुनिया में इस तरह की कांफ्रेंस कर रही है और वही इसका सारा खर्च वहन करती है। सऊदी उच्चायुक्त से अपने सम्पर्प के चलते कांफ्रेंस के अवसर पर अखबार में प्रकाशित विज्ञापन का 50 लाख रुपया मिला था जिसे मौलाना फजलुर रहमान ने जमा नहीं किया और वापस अपने वतन चले गए जिसकी वजह से उनके और मौलाना अरशद मदनी के बीच विवाद पैदा हो गया है।'
उर्द दैनिक `हिन्दुस्तान एक्सप्रेस' में हज कमेटी में घोटाले और भर्तियों में घपले पर हज कमेटी उपाध्यक्ष हसन अहमद से बात करते हुए लिखा है कि फाइनेंस के मामले में सूरत-ए-हाल काफी खराब है और सदस्यों को पूरी तरह अंधेरे में रखा जाता है। हज कमेटी में हाजियों के भेजे हुए लगभग डेढ़ करोड़ रुपये के ड्राफ्ट ऐसे पड़े हैं जिन्हें हज खाते में जमा नहीं कराया गया और न ही सदस्यों को इस बारे में कुछ बताया गया, उन्होंने सवाल किया कि यह रुपया कहां जाएगा। यह हाजियों का रुपया है और यदि इसमें घपला होता है तो उसका जिम्मेदार कौन होगा? हसन अहमद ने कहा कि चीफ एक्जीक्यूटिव प्रशासन के मुखिया हैं और उन्होंने भी एक साल से यह नहीं देखा कि इतनी बड़ी रकम के ड्राफ्ट हज कमेटी के खाते में जमा नहीं हुए। उनके अनुसार पिछले कुछ वर्षों के दौरान हुई भर्तियों की जांच होनी चाहिए और यह देखना चाहिए कि भर्ती में तय मानकों का पालन हुआ या नहीं? इस बाबत एक कमेटी गठित करने का फैसला किया गया है जो तीन महीने में अपनी रिपोर्ट पेश करेगी। जहां तक एक सऊदी अरब में हाजियों के लिए मकान हासिल करने का मामला है। कहने को तो हज कमेटी के सदस्य बिल्डिंग सैलेक्शन कमेटी (बीएससी) वहां जाते हैं, उन्हें कुछ मकान दिखाए जाते हैं और इनमें कुछ सदस्य यदि कुछ मकान बना लेते हैं तो वहां कौंसल जनरल और कौंसल हज इसकी संधि तुरन्त नहीं करते और कह देते हैं कि अभी देखेंगे, हज कमेटी के सदस्य वापस भी आ जाते हैं और मकान की संधि नहीं होती है। उनका कहना था कि बीएससी सदस्यों का सऊदी अरब भेजने का क्या फायदा? इसलिए मकान लेने की पूरी जिम्मेदारी वहां के कौंसल जनरल और कौंसल हज पर ही डाल दी जाए और उन्हें ही जवाबदेह बनाया जाए।
उर्दू दैनिक `हमारा समाज' में सादिक शेरवानी ने `उर्दू प्रेस क्लब की बेबुनियाद हवाबाजी, पदाधिकारी पत्रकार नहीं, कोई पत्रकार नहीं, कार्यालय का पता नहीं, सरपरस्तों का उर्दू का कोई अखबार नहीं, फिर भी नाम है उर्दू प्रेस क्लब' पर चर्चा करते हुए लिखा है कि आए दिन खबरें आती हैं कि फ्लां नकली कम्पनी से ठगी का मामला सामने आया है। उर्दू की यह संस्था भी ऐसी है जो अपने नाम से कोसों दूर मेल नहीं खाती लेकिन इसकी कागजी कार्यवाहियां चलती रहती हैं जिससे इनके सरपरस्तों का भला होता रहता है। इसका नाम उर्दू प्रेस क्लब है लेकिन इस संस्था का उर्दू पत्रकारिता से कुछ भी लेना-देना नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि उर्दू प्रेस क्लब में किसी उर्दू अखबार का कोई पत्रकार सदस्य नहीं है, इसके पदाधिकारियों में किसी का संबंध वर्तमान उर्दू पत्रकारिता से नहीं है। लगभग तीन वर्ष पूर्व कांस्टीट्यूशन क्लब में आयोजित इसके एक कार्यक्रम में एक गैर उर्दू पत्रकार ने न केवल पैगम्बर इस्लाम की शान में गुस्ताखी की थी बल्कि यहां तक कह दिया कि कुरान से सूरा जिहाद और सूरा तलाक को निकाल दिया जाए। इस पर काफी हंगामा हुआ था। उर्दू प्रेस क्लब इन दिनों उर्दू माफिया बना हुआ है और अब वह देश में पत्रकारिता का शोषण करते हुए विदेश भी पहुंच गया है। सूचना के अनुसार इन दिनों दुबई में इसकी माफियागिरी चल रही है।
दिल्ली, कोलकाता और रांची से एक साथ प्रकाशित होने वाला उर्दू दैनिक `अखबारे मशरिक' ने अपने पहले पेज पर रहस्योद्घाटन करते हुए यह रिपोर्ट छापी है। `मौलाना अरशद मदनी के अतिविश्वास पात्र ने 50 लाख का चूना लगाया, फजलुर रहमान ने सऊदी उच्चायोग से मिली रकम जमा नहीं की। रिपोर्ट के अनुसार जमीयत उलेमा हिन्द (मौलाना अरशद मदनी) की कार्यकारिणी सदस्य और मुख्यालय के एक अहम जिम्मेदार मालना फजलुर रहमान के बारे में यह चर्चा है कि उन्होंने जमीयत उलेमा हिन्द का 50 लाख रुपया हजम कर लिया है। मौलाना अरशद मदनी के विश्वास पात्र समझे जाने वाले मौलाना फजलुर रहमान का संबंध मुंबई से है जहां वह टेवल एजेंसी चलाते हैं लेकिन गत दो वर्ष से जमीयत उलेमा मुख्यालय में रह रहे थे और जमीयत उलेमा हिन्द की आंतरिक और विदश नीतियों में अहम भूमिका निभा रहे थे। गत दिनों पैगम्बर इस्लाम के महान साथियों (सहाबा) की महानता पर कांफ्रेंस के सिलसिले में दिल्ली स्थित सऊदी अरब उच्चायुक्त से मामला इनके ही द्वारा चल रहा था। इस कांफ्रेंस के बारे में आम धारणा थी कि सऊदी सरकार पूरी दुनिया में इस तरह की कांफ्रेंस कर रही है और वही इसका सारा खर्च वहन करती है। सऊदी उच्चायुक्त से अपने सम्पर्प के चलते कांफ्रेंस के अवसर पर अखबार में प्रकाशित विज्ञापन का 50 लाख रुपया मिला था जिसे मौलाना फजलुर रहमान ने जमा नहीं किया और वापस अपने वतन चले गए जिसकी वजह से उनके और मौलाना अरशद मदनी के बीच विवाद पैदा हो गया है।'
उर्द दैनिक `हिन्दुस्तान एक्सप्रेस' में हज कमेटी में घोटाले और भर्तियों में घपले पर हज कमेटी उपाध्यक्ष हसन अहमद से बात करते हुए लिखा है कि फाइनेंस के मामले में सूरत-ए-हाल काफी खराब है और सदस्यों को पूरी तरह अंधेरे में रखा जाता है। हज कमेटी में हाजियों के भेजे हुए लगभग डेढ़ करोड़ रुपये के ड्राफ्ट ऐसे पड़े हैं जिन्हें हज खाते में जमा नहीं कराया गया और न ही सदस्यों को इस बारे में कुछ बताया गया, उन्होंने सवाल किया कि यह रुपया कहां जाएगा। यह हाजियों का रुपया है और यदि इसमें घपला होता है तो उसका जिम्मेदार कौन होगा? हसन अहमद ने कहा कि चीफ एक्जीक्यूटिव प्रशासन के मुखिया हैं और उन्होंने भी एक साल से यह नहीं देखा कि इतनी बड़ी रकम के ड्राफ्ट हज कमेटी के खाते में जमा नहीं हुए। उनके अनुसार पिछले कुछ वर्षों के दौरान हुई भर्तियों की जांच होनी चाहिए और यह देखना चाहिए कि भर्ती में तय मानकों का पालन हुआ या नहीं? इस बाबत एक कमेटी गठित करने का फैसला किया गया है जो तीन महीने में अपनी रिपोर्ट पेश करेगी। जहां तक एक सऊदी अरब में हाजियों के लिए मकान हासिल करने का मामला है। कहने को तो हज कमेटी के सदस्य बिल्डिंग सैलेक्शन कमेटी (बीएससी) वहां जाते हैं, उन्हें कुछ मकान दिखाए जाते हैं और इनमें कुछ सदस्य यदि कुछ मकान बना लेते हैं तो वहां कौंसल जनरल और कौंसल हज इसकी संधि तुरन्त नहीं करते और कह देते हैं कि अभी देखेंगे, हज कमेटी के सदस्य वापस भी आ जाते हैं और मकान की संधि नहीं होती है। उनका कहना था कि बीएससी सदस्यों का सऊदी अरब भेजने का क्या फायदा? इसलिए मकान लेने की पूरी जिम्मेदारी वहां के कौंसल जनरल और कौंसल हज पर ही डाल दी जाए और उन्हें ही जवाबदेह बनाया जाए।
Wednesday, April 13, 2011
जमात ए इस्लामी की नई पार्टी सवालों के घेरे मे
इन दिनों मुसलिम राजनीति नए परीक्षण के दौर से गुजर रही है। कहीं मुसलिम पार्टियां एक मंच पर एकत्र होने का प्रयास कर रह हैं, तो कहीं राष्ट्रीय स्तर पर मुसलिम राजनैतिक पार्टियां वजूद में आ रही हैं। पीपुल्स डैमोक्रेटिक फ्रंट के गठन के साथ ही जमाअत इसलामी ने एक नई सियासी पार्टी की रूपरेखा तैयार कर ली है। इसकी औपचारिक घोषणा 18 अप्रैल को नई दिल्ली के फिक्की सभागागर में आयोजित एक कार्यक्रम में की जाएगी। इस प्रसंग में जमाअत-ए-इसलामी हिंद का सियासी सफर बहुत दिलचस्प है। इसमें कई उतार-चढ़ाव हैं। जमाअत पहले राजनीति में हिस्सा लेने की ही विरोधी रही है। लेकिन आपातकाल में जिस तरह तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया और जमाअत इसलामी पर बैलेंस करने की नीयत से प्रतिबंध लगाकर इसके सदस्यों को जेल भेज दिया था, उससे उसे बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया। जमाअत का यह आत्मंथन ही था कि उसने पहली बार मतदान में भाग लेने का फैसला किया। इसके सदस्यों ने खुलकर 1977 के आम चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ वोट किया था। इस फैसले के बाद ही जमाअत के अंदर राजनीति में उतरने का सवाल चर्चा में रहा। कुछ सदस्यों का मानना था कि जमाअत को राजनीति में कूद जाना चाहिए, जबकि कुछ सदस्य यह तो मानते थे कि वे राजनीति में तो आए, लेकिन अभी इसका माहौल नहीं है। इसलिए हमें माहौल बनाना चाहिए और समय आने पर अपनी योग्यता दिखानी चाहिए।
इसको लेकर जमाअत के अंदर काफी आत्मंथन हुआ और चुनाव में जमाअत के भाग न लेने की वकालत करने वाले सदस्यों ने अपनी बात पर अडिग रहते हुए जमाअते इसलामी हिंद से स्वयं को अलग कर लिया। इस प्रकार जमाअत इसलामी हिंद से वह लोग निकल गए, जो अपने विचारों को लेकर कट्टर थे। अब जमाअत में बहुसंख्यक उन लोगों की थी, जो वर्तमान में जमाअत के राजनीति के आने के अनुकूल नहीं मान रहे थे और समय का इंतजार करने की बात कर रहे थे। जमाअत ने अपने एक महत्वपर्ण फैसले के तहत निर्णय लिया कि राजनीति, जिसमें आमतौर पर लोग ऊपर से नीचे जाते हैं और वह अपनी जमीनी सच्चाई की अनदेखी करते हैं, यदि नीचे से सफर शुरू किया जाए तो लक्ष्य की प्राप्ति में आसानी होगी।
इस उद्देश्य के तहत जमाअत ने निकाय चुनाव द्वारा राजनीति में आने का फैसला किया। पहले चरण में जमाअत अच्छी छवि वाले उम्मीदवारों को सामने लाएगी, ताकि निकाय चुनाव में उन लोगों की उपस्थिति से बेहतर माहौल बन सके। निकाय संस्थान, जो जनता के हित एवं विकास की शुरुआती श्रंखला है, में यदि सही लोग आएंगे और काम करेंगे तो निश्चय ही जन-जन तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। और मानव सेवा का दायित्व भी पूरा होगा। इसी योजना के तहत उसने केरल और तमिलनाडु में गत दिनों हुए नगर निकाय चुनावों में हिस्सा लिया। उसने लगभग दो हजार उम्मीदवारों को मैदान में उतारा, लेकिन दस उम्मीदवार भी नहीं जीत सके । वर्तमान में जमाअत के अंदर व्यवाहारिक राजनीति के सोच रखने वाले तत्व पूरे देश का भ्रमण कर रहे हैं और नई राजनैतिक पार्टी के हक में माहौल बनाने का प्रयास कर रहे हैं। पूरी कवायद के बाद मुसलमानों में इसको लेकर कोई उत्साह नहीं है। यह एक वैचारिक जमाअत है। इस लिहाज से उसकी कोई राजनैतिक पृष्ठभूमि नहीं है, जिससे वह लोगों को अपनी ओर आकृषित कर सके।
जमाअत के इस फैसले से अभी तक किसी राजनैतिक पार्टी ने किसी तरह की परेशानी का इजहार नहीं किया है। जहां तक मुसलमानों में पायी जाने वाली राजनैतिक पार्टियों अथवा राजनैतिक गतिविधियों का मामला है, बाबरी मसजिद गिराए जाने के बाद कांग्रेस से उसका मोह भंग हो गया था। तब वह उनसे दूर हो गया था और तीसरे मोर्चे को एक विकल्प के तौर पर चुना था, लेकिन तीसरे मोर्चे के बिखरने और कांग्रेस एवं भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टियों द्वारा दो पार्टी व्यवस्था को आगे बढ़ाने के उपाय के बाद मुसलिम दानिश्वरों का रुख कांग्रेस की ओर हो गया। ऐसे में जमाअत की राजनैतिक गतिविधियां क्या इस सोच के विपरीत होेंगी? यदि ऐसा हुआ तो क्या वह मुसलमानों के लिए लाभदायक साबित होगी, जैसे अनेक सवाल भविष्य के गर्भ में छिपे हुए हैं। जमाअत में धारणा प्रबल होती जा रही है कि जमाअत के उद्देश्यों की पूर्ति और उसके उत्थान के लिए संघर्षशील कार्यकर्ता और पदााधिकारी नेताओं की श्रेणी में शामिल होने के लिए व्याकुल हैं। इससे राजनीतिक स्वरूप तो जमाअत का किसी न किसी स्तर से देश के समक्ष आ जाएगा। लेकिन संगठन ने जिन उद्देश्यों और लक्ष्यों को लेकर आगे बढ़ा था, वह लुप्त होते जा रहे हैं। जमाअत इसलामी हिंद की राजनैतिक शाखा की ‘वैलयफेयर पार्टी’ क्या करती है, इसका सभी को इंतजार है। क्या यह भी अन्य मुसलिम पार्टियों की तरह अपना वजूद खो देगी ?
इसको लेकर जमाअत के अंदर काफी आत्मंथन हुआ और चुनाव में जमाअत के भाग न लेने की वकालत करने वाले सदस्यों ने अपनी बात पर अडिग रहते हुए जमाअते इसलामी हिंद से स्वयं को अलग कर लिया। इस प्रकार जमाअत इसलामी हिंद से वह लोग निकल गए, जो अपने विचारों को लेकर कट्टर थे। अब जमाअत में बहुसंख्यक उन लोगों की थी, जो वर्तमान में जमाअत के राजनीति के आने के अनुकूल नहीं मान रहे थे और समय का इंतजार करने की बात कर रहे थे। जमाअत ने अपने एक महत्वपर्ण फैसले के तहत निर्णय लिया कि राजनीति, जिसमें आमतौर पर लोग ऊपर से नीचे जाते हैं और वह अपनी जमीनी सच्चाई की अनदेखी करते हैं, यदि नीचे से सफर शुरू किया जाए तो लक्ष्य की प्राप्ति में आसानी होगी।
इस उद्देश्य के तहत जमाअत ने निकाय चुनाव द्वारा राजनीति में आने का फैसला किया। पहले चरण में जमाअत अच्छी छवि वाले उम्मीदवारों को सामने लाएगी, ताकि निकाय चुनाव में उन लोगों की उपस्थिति से बेहतर माहौल बन सके। निकाय संस्थान, जो जनता के हित एवं विकास की शुरुआती श्रंखला है, में यदि सही लोग आएंगे और काम करेंगे तो निश्चय ही जन-जन तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। और मानव सेवा का दायित्व भी पूरा होगा। इसी योजना के तहत उसने केरल और तमिलनाडु में गत दिनों हुए नगर निकाय चुनावों में हिस्सा लिया। उसने लगभग दो हजार उम्मीदवारों को मैदान में उतारा, लेकिन दस उम्मीदवार भी नहीं जीत सके । वर्तमान में जमाअत के अंदर व्यवाहारिक राजनीति के सोच रखने वाले तत्व पूरे देश का भ्रमण कर रहे हैं और नई राजनैतिक पार्टी के हक में माहौल बनाने का प्रयास कर रहे हैं। पूरी कवायद के बाद मुसलमानों में इसको लेकर कोई उत्साह नहीं है। यह एक वैचारिक जमाअत है। इस लिहाज से उसकी कोई राजनैतिक पृष्ठभूमि नहीं है, जिससे वह लोगों को अपनी ओर आकृषित कर सके।
जमाअत के इस फैसले से अभी तक किसी राजनैतिक पार्टी ने किसी तरह की परेशानी का इजहार नहीं किया है। जहां तक मुसलमानों में पायी जाने वाली राजनैतिक पार्टियों अथवा राजनैतिक गतिविधियों का मामला है, बाबरी मसजिद गिराए जाने के बाद कांग्रेस से उसका मोह भंग हो गया था। तब वह उनसे दूर हो गया था और तीसरे मोर्चे को एक विकल्प के तौर पर चुना था, लेकिन तीसरे मोर्चे के बिखरने और कांग्रेस एवं भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टियों द्वारा दो पार्टी व्यवस्था को आगे बढ़ाने के उपाय के बाद मुसलिम दानिश्वरों का रुख कांग्रेस की ओर हो गया। ऐसे में जमाअत की राजनैतिक गतिविधियां क्या इस सोच के विपरीत होेंगी? यदि ऐसा हुआ तो क्या वह मुसलमानों के लिए लाभदायक साबित होगी, जैसे अनेक सवाल भविष्य के गर्भ में छिपे हुए हैं। जमाअत में धारणा प्रबल होती जा रही है कि जमाअत के उद्देश्यों की पूर्ति और उसके उत्थान के लिए संघर्षशील कार्यकर्ता और पदााधिकारी नेताओं की श्रेणी में शामिल होने के लिए व्याकुल हैं। इससे राजनीतिक स्वरूप तो जमाअत का किसी न किसी स्तर से देश के समक्ष आ जाएगा। लेकिन संगठन ने जिन उद्देश्यों और लक्ष्यों को लेकर आगे बढ़ा था, वह लुप्त होते जा रहे हैं। जमाअत इसलामी हिंद की राजनैतिक शाखा की ‘वैलयफेयर पार्टी’ क्या करती है, इसका सभी को इंतजार है। क्या यह भी अन्य मुसलिम पार्टियों की तरह अपना वजूद खो देगी ?
Monday, April 11, 2011
Tuesday, April 5, 2011
जामिया मिलिया इस्लामिया: अल्पसंख्यक चरित्र बहाल
नेशनल कम्वेंशन फॉर माइनारीटीज एजूकेशनल इंस्टीट्यूट (एनसीएमईआई) द्वारा जामिया मिलिया इस्लाािमया का अल्पसंख्यक चरित्र बहाल करने के फैसले को एक ऐतिहासिक निर्णय के रूप में लिया जा रहा है। इस फैसले से जामिया में मुस्लिम छात्रों को दाखिले में 50 फीसदी आरक्षण का हक हासिल हो गया है।
जामिया मिलिया इस्लामिया के अल्पसंख्यक चरित्र का मामला उस समय पैदा हुआ था जब 1955 में केन्द्रीय सरकार ने संसद से एक कानून पारित कर इसे सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी का दर्जा दिया था। उस समय उसका अल्पसंख्यक चरित्र खत्म कर दिया गया था। 1955 के उस कानून के अनुसार यह एक सामान्य यूनिवर्सिटी थी। मामले में उस समय मोड़ आया जब 2006 में केन्द्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने एक आदेश जारी कर जामिया मिलिया इस्लाािमया को अपने यहां 27 फीसदी ओबीसी कोटा लागू करने का निर्देश दिया। जामिया ने इस आदेश के खिलाफ नेशनल कमीशन फॉर माइनारीटीज एजूकेशनल इंस्टीट्यूट में अपील दायर की। जामिया में पहले के ही 22.5 फीसदी सीटें एससी/एसटी 25 फीसदी इन्टरनल और तीन फीसदी सीटें विक्लांग छात्रों के लिए आरक्षित थीं। ओबीसी कोटा लागू करने से यह कोटा 50 फीसदी से बढ़ जाता जो सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित सीमा से ज्यादा था।
18 सुनवाई के बाद एनसीएमईआई ने 22 फीसदी 2011 को अपने फैसले में स्पष्ट किया कि उसे यह मानने में कोई संकोच नहीं है कि जामिया मिलिया इस्लामिया को मुसलमानों के फायदे के लिए मुसलमानों ने ही कायम किया था और कभी भी इसने अपना मुस्लिम चरित्र नहीं खोया है। कमीशन चेयरमैन जस्टिस सुहैल एज़ाज़ सिद्दीकी ने फैसला सुनाते हुए कहा कि संविधान की धारा 30(1) के तहत जामिया मिलिया इस्लामिया एक अल्पसंख्यक संस्था है। इसलिए इसे अल्पसंख्यक संस्था घोषित किया जाए।
फैसले के बाद जामिया मिलिया इस्लामिया के कुलपति नजदिव जंग ने इसे अगले शैक्षिक सत्र में लागू करने का भरोसा दिलाया है और कहा कि 2012-12 के प्रोस्पैक्टस आदि सामग्री छप चुकी है। इसके अतिरिक्त इसे लागू करने में जो बाधायें हैं उन्हें भी दूर किया जाएगा। इसलिए यह आगामी सत्र से लागू हो पाएगा। फैसले के अनुसार जहां 50 फीसदी सीटें मुस्लिम समुदाय के लिए आरक्षित होंगी वहां 50 फीसदी सीटें सामान्य कोटे के तहत भरी जाएगी। तब एससी/एसटी आरक्षण बांकी नहीं रहेगा। जामिया कुलपति का बयान अखबारों में सुरक्षित है जिसमें उन्होंने कहा कि जामिया का सेकुलर चरित्र बरकरार रहेगा। सवाल यह है कि किसी शैक्षिक संस्था में सेकुलर चरित्र का अर्थ क्या है और जामिया मिलिया में यह कहां से आया?
1988 में जामिया को सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी का दर्जा देते समय उसकी अंजुमन (संस्था) का उर्दू से अंग्रेजी अनुवाद किया गया और तब जामिया के मेमोरेण्डम ऑफ एसोसिएशन में दर्ज दीनी और पुनभावी शिक्षा की जगह अंग्रेजी में धार्मिक और सेकुलर अनुवार किया गया, यहीं से सेकुलर चरित्र की बात चल पड़ी जबकि इसके पूर्व लगता है कि कोई बात नहीं थी। फाना वाच डाट काम के संपादक एवं दिल्ली मामलों के जानकार क्यू आसिफ कहते हैं कि दुन्त्यावी शब्द का अंग्रेजी में सेकुलर अनुवाद किसी तरह सही नहीं है। उनका कहना था कि एनएमसीईआई के फैसले के बाद जिस तरह कुछ लोगों में क्रेडिट लेने की होड़ मची है वह उस समय कहां थे जब संसद में इस पर जोरदार बहस चल रही थी। तब अकेले जिस व्यक्ति की आवाज सुनी गई वह कोई और नहीं बल्कि वरिष्ठ भाजपा नेता एवं पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे। उनकी मांग थी कि जामिया का जो विधेयक चर्चा का विषय है उसमें जामिया के ऐतिहासिक चरित्र का कोई जिक्र नहीं है। जाहिर सी बात है कि जामिया का यह ऐतिहासिक चरित्र इसके अतिरिक्त कुछ नहीं था कि 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को यूनिवर्सिटी का दर्जा दिए जाने के बाद तत्कालीन मुस्लिम नेतृत्व विशेषकर खिलाफत आंदोलन की अगुवाई कर रहे अलीग बंधुओं को यह एहसास था कि एएमयू अब पूरी तरह अंग्रेजों के कंट्रोल में चला जाएगा और यहां से स्वतंत्रता संग्राम के मतवालों को भी आवाज उठाने की अनुमति नहीं होगी। यही वह सोच थी जिसके तहत एक अलग मुस्लिम शिक्षण संस्था की 29 अक्टूबर, 1920 को स्थापना हुई, जिसका नाम जामिया मिलिया इस्लामिया पड़ा। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय कैम्पस में शुरू होने वाली जामिया को दिल्ली के करोल बाग लाया गया, बाद में ओखला। यहीं यह यूनिवर्सिटी स्थापित है।
ख्याति प्राप्त आलिम दीन और स्वतंत्र सेनानी जो नालंदा की जेल से रिहा हुए थे ने इसकी बुनियाद रखते हुए कहा कि इसका मकसद मुसलमानों की शिक्षा मुसलमानों के हाथों में रख्ना है। जामिया की स्थापना से लेकर 1938 तक जामिया के प्रॉस्पेक्टस में उसका यह उद्देश्य लिखा जाता रहा लेकिन 1939 में डॉ. जाकिर हुसैन ने जामिया कुलपति बनने के बाद जामिया की अंजुमन के पंजीकृत के समय उसके उद्देश्य में थोड़ा संशोधन कर दिया। तब उसमें यह बात दर्ज की गई कि इसकी स्थापना का असल मकसद हिंदुस्तानी विशेषकर मुसलमानों को दोनी एवं दुनभावी शिक्षा देना है।
2006 के अंत में जब प्रोफेसर मुशीहल हसन जामिया के कुलपति थे। जब जामिया टीचर्स एसोसिएशन, जामिया स्टुडेन्टस यूनियन और जामिया ओल्ड ब्वायज़ एसोसिएशन ने अलग-अलग याचिका दायर कर इस कमीशन से अनुरोध किया कि जामिया मिलिया को अल्पसंख्यक होने का दर्जा प्रदान करे। तत्काली रजिस्ट्रार एस.एम. अफजल ने इसका विरोध किया क्योंकि मुशीहल हसन इसका विरोध कर चुके थे। लेकिन वर्तमान रजिस्ट्रार एस.एम. साजिद ने अपने शपथ-पत्र में स्वीकार किया कि जामिया अल्पसंख्यक संस्था था और है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने कमीशन में याचिका दाखिल कर मांग की कि इस मामले की सुनवाई उस समय तक स्थगित रखी जाए। जब तक सुप्रीम कोर्ट अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के अल्पसंख्यक चरित्र से सम्बन्धित इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ इसकी और यूनिवर्सिटी की अपील पर कोई फैसला न दे।
कमीशन ने अपने फैसले में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की जामिया मिलिया से तुलना करते हुए कहा कि 1920 में जब एक एक्ट के तहत मुस्लिम यूनिवर्सिटी की स्थापना हुई थी उस समय एमएओ कॉलेज तो था, लेकिन मुस्लिम यूनिवर्सिटी का वजूद नहीं था। इसलिए यह कहा जाएगा कि यूनिवर्सिटी एक्ट के तहत कायम हुई है जबकि जामिया मिलिया के मामले में यह सूरते हाल नहीं थी। इस आधार पर कमीशन ने इस आपत्ति को निरस्त कर दिया कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक इंतजार किया जाए। लेकिन इससे यह नहीं समझना चाहिए कि मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक संस्था होने में इस आधार पर कोई ज्वेंट नहीं किया जा सकता। इसका चरित्र और प्रबंध शुरू दिन से मुसलमानों के हाथों में है। कई धारा वजूद में आने वाली यूनिवर्सिटी इसी एमएओओ कॉलेज की नई शक्ल है जो अल्पसंख्यक संस्था है।
एनसीएमईआई ने अपने फैसले में जामिया की स्थापना पर चर्चा करते हुए लिखा है कि किस तरह पहले अलीगढ़ में 1920 में जामिया को कायम किया गया, फिर दिल्ली लाया गया। 1939 में इसे सोसाइटी एक्ट के तहत पंजीकृत कराया गया। इस बात का विशेष तौर से जिक्र किया है कि जामिया कालेजा की ब्रिटिश सरकार से मदद हासिल थी जबकि जामिया मिलिया इस्लामिया खिलाफत आंदोलन और असहयोग आंदोलन के नतीजे में कायम हुआ। जामिया के संस्थापक संस्था के प्रबंध को सरकारी हस्तक्षेप से आजाद अपने हाथ में रखना चाहते थे।
जामिया मिलिया इस्लामिया इस प्रसंग में अकेली यूनिवर्सिटी है जहां अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और बनारस विश्वविद्यालय की तरह किसी एक संस्थापक के बजाए संस्थापकों की शब्दावली प्रचलित है। जबकि वास्तविकता यह है कि 29 अक्टूबर, 1920 को जामिया की स्थापना के समय 92 सदस्यीय फाउडेशन कमेटी गइित हुई थी। जिसमें सर्व सम्मति से प्रस्ताव पारित कर मौलाना मोहम्मद अली जौहर को इसका संस्थापक बताया गया था। कमेटी सदस्यों में शेरवुल हिंद मौलाना महमूद हसन, हकीम अजमल खां, डॉ. मुखतार अहमद अंसारी, अब्दुल मजीद ख्वाजा, मुफ्ती किफायत उल्ला, मौलाना हुसैन अहमद मदनी, मौलाना अबुल कलाम आजाद और महात्मा गांधी के नाम उल्लेखनीय हैं। 1920 से 1938 तक मौलाना जौहर का नाम संस्थापक के तौर पर आता रहा लेकिन बाद में संस्थापकों की शब्दावली का इस्तेमाल कर उसमें डॉ. जाकिर हुसैन का नाम शामिल कर दिया गया।
डॉ. जाकिर हुसैन 1925 में जर्मनी से आए थे। निःसंदेह उन्होंने जामिया को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। जामिया को आर्थिक संकट से निकालने के लिए संस्था सदस्यों ने एक शपथ-पत्र पर हस्ताक्षर किया जिस पर लिखा था कि वह 20 साल तक 150 रुपए मासिक से ज्यादा वेतन नहीं लेंगे और जामिया मिलिया इस्लामिया में पढ़ाएंगे। स्वयं डॉ. जाकिर हुसैन ने अपना वेतन 150 रुपए से कम कर 40 रुपए मासिक कर वह कुर्बानी दी जिसकी मिसाल शायद ही किसी संस्था में देखने को मिले। उनका नाम सुनहरे अक्षरों में लिखने लायक है लेकिन इसके बावजूद वह उसके संस्थापकों की सूची में शामिल नहीं हो सकते।
आश्चर्य तो इस बात पर है कि जामिया के कुछ अपने हित के चलते मोहम्मद अली जौहर जैसे स्वतंत्र सेनानी जिन्हें महात्मा गांधी ने भारत की आजादी दिलाने से सम्बन्धित लंदन की गोल मेज कांफ्रेंस में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए भेजा था। वहां उन्होंने अपने भाषण में कहा कि ब्रिटेन हमें आजादी का परवाना दे अन्यथा हम गुलाम देश में मरना पसंद नहीं करेंगे। कांफ्रेंस के दौरान ही उनकी मृत्यु हो गई उन्हें फिलीस्तीन में दफन किया गया, की भूमिका को नकारने में लगे हैं वहीं मुंबई से प्रकाशित ‘उर्दू टाइम्स’ ने भी जामिया का संस्थापक डॉ. जाकिर हुसैन और उनके साथियों को बताकर सच्चाई के छुपाने की जो कोशिश की है वह निश्चय ही निंदनीय है और पत्रकारिता मूल्यों के विरुद्ध भी है।
जामिया मिलिया इस्लामिया के अल्पसंख्यक चरित्र का मामला उस समय पैदा हुआ था जब 1955 में केन्द्रीय सरकार ने संसद से एक कानून पारित कर इसे सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी का दर्जा दिया था। उस समय उसका अल्पसंख्यक चरित्र खत्म कर दिया गया था। 1955 के उस कानून के अनुसार यह एक सामान्य यूनिवर्सिटी थी। मामले में उस समय मोड़ आया जब 2006 में केन्द्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने एक आदेश जारी कर जामिया मिलिया इस्लाािमया को अपने यहां 27 फीसदी ओबीसी कोटा लागू करने का निर्देश दिया। जामिया ने इस आदेश के खिलाफ नेशनल कमीशन फॉर माइनारीटीज एजूकेशनल इंस्टीट्यूट में अपील दायर की। जामिया में पहले के ही 22.5 फीसदी सीटें एससी/एसटी 25 फीसदी इन्टरनल और तीन फीसदी सीटें विक्लांग छात्रों के लिए आरक्षित थीं। ओबीसी कोटा लागू करने से यह कोटा 50 फीसदी से बढ़ जाता जो सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित सीमा से ज्यादा था।
18 सुनवाई के बाद एनसीएमईआई ने 22 फीसदी 2011 को अपने फैसले में स्पष्ट किया कि उसे यह मानने में कोई संकोच नहीं है कि जामिया मिलिया इस्लामिया को मुसलमानों के फायदे के लिए मुसलमानों ने ही कायम किया था और कभी भी इसने अपना मुस्लिम चरित्र नहीं खोया है। कमीशन चेयरमैन जस्टिस सुहैल एज़ाज़ सिद्दीकी ने फैसला सुनाते हुए कहा कि संविधान की धारा 30(1) के तहत जामिया मिलिया इस्लामिया एक अल्पसंख्यक संस्था है। इसलिए इसे अल्पसंख्यक संस्था घोषित किया जाए।
फैसले के बाद जामिया मिलिया इस्लामिया के कुलपति नजदिव जंग ने इसे अगले शैक्षिक सत्र में लागू करने का भरोसा दिलाया है और कहा कि 2012-12 के प्रोस्पैक्टस आदि सामग्री छप चुकी है। इसके अतिरिक्त इसे लागू करने में जो बाधायें हैं उन्हें भी दूर किया जाएगा। इसलिए यह आगामी सत्र से लागू हो पाएगा। फैसले के अनुसार जहां 50 फीसदी सीटें मुस्लिम समुदाय के लिए आरक्षित होंगी वहां 50 फीसदी सीटें सामान्य कोटे के तहत भरी जाएगी। तब एससी/एसटी आरक्षण बांकी नहीं रहेगा। जामिया कुलपति का बयान अखबारों में सुरक्षित है जिसमें उन्होंने कहा कि जामिया का सेकुलर चरित्र बरकरार रहेगा। सवाल यह है कि किसी शैक्षिक संस्था में सेकुलर चरित्र का अर्थ क्या है और जामिया मिलिया में यह कहां से आया?
1988 में जामिया को सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी का दर्जा देते समय उसकी अंजुमन (संस्था) का उर्दू से अंग्रेजी अनुवाद किया गया और तब जामिया के मेमोरेण्डम ऑफ एसोसिएशन में दर्ज दीनी और पुनभावी शिक्षा की जगह अंग्रेजी में धार्मिक और सेकुलर अनुवार किया गया, यहीं से सेकुलर चरित्र की बात चल पड़ी जबकि इसके पूर्व लगता है कि कोई बात नहीं थी। फाना वाच डाट काम के संपादक एवं दिल्ली मामलों के जानकार क्यू आसिफ कहते हैं कि दुन्त्यावी शब्द का अंग्रेजी में सेकुलर अनुवाद किसी तरह सही नहीं है। उनका कहना था कि एनएमसीईआई के फैसले के बाद जिस तरह कुछ लोगों में क्रेडिट लेने की होड़ मची है वह उस समय कहां थे जब संसद में इस पर जोरदार बहस चल रही थी। तब अकेले जिस व्यक्ति की आवाज सुनी गई वह कोई और नहीं बल्कि वरिष्ठ भाजपा नेता एवं पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे। उनकी मांग थी कि जामिया का जो विधेयक चर्चा का विषय है उसमें जामिया के ऐतिहासिक चरित्र का कोई जिक्र नहीं है। जाहिर सी बात है कि जामिया का यह ऐतिहासिक चरित्र इसके अतिरिक्त कुछ नहीं था कि 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को यूनिवर्सिटी का दर्जा दिए जाने के बाद तत्कालीन मुस्लिम नेतृत्व विशेषकर खिलाफत आंदोलन की अगुवाई कर रहे अलीग बंधुओं को यह एहसास था कि एएमयू अब पूरी तरह अंग्रेजों के कंट्रोल में चला जाएगा और यहां से स्वतंत्रता संग्राम के मतवालों को भी आवाज उठाने की अनुमति नहीं होगी। यही वह सोच थी जिसके तहत एक अलग मुस्लिम शिक्षण संस्था की 29 अक्टूबर, 1920 को स्थापना हुई, जिसका नाम जामिया मिलिया इस्लामिया पड़ा। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय कैम्पस में शुरू होने वाली जामिया को दिल्ली के करोल बाग लाया गया, बाद में ओखला। यहीं यह यूनिवर्सिटी स्थापित है।
ख्याति प्राप्त आलिम दीन और स्वतंत्र सेनानी जो नालंदा की जेल से रिहा हुए थे ने इसकी बुनियाद रखते हुए कहा कि इसका मकसद मुसलमानों की शिक्षा मुसलमानों के हाथों में रख्ना है। जामिया की स्थापना से लेकर 1938 तक जामिया के प्रॉस्पेक्टस में उसका यह उद्देश्य लिखा जाता रहा लेकिन 1939 में डॉ. जाकिर हुसैन ने जामिया कुलपति बनने के बाद जामिया की अंजुमन के पंजीकृत के समय उसके उद्देश्य में थोड़ा संशोधन कर दिया। तब उसमें यह बात दर्ज की गई कि इसकी स्थापना का असल मकसद हिंदुस्तानी विशेषकर मुसलमानों को दोनी एवं दुनभावी शिक्षा देना है।
2006 के अंत में जब प्रोफेसर मुशीहल हसन जामिया के कुलपति थे। जब जामिया टीचर्स एसोसिएशन, जामिया स्टुडेन्टस यूनियन और जामिया ओल्ड ब्वायज़ एसोसिएशन ने अलग-अलग याचिका दायर कर इस कमीशन से अनुरोध किया कि जामिया मिलिया को अल्पसंख्यक होने का दर्जा प्रदान करे। तत्काली रजिस्ट्रार एस.एम. अफजल ने इसका विरोध किया क्योंकि मुशीहल हसन इसका विरोध कर चुके थे। लेकिन वर्तमान रजिस्ट्रार एस.एम. साजिद ने अपने शपथ-पत्र में स्वीकार किया कि जामिया अल्पसंख्यक संस्था था और है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने कमीशन में याचिका दाखिल कर मांग की कि इस मामले की सुनवाई उस समय तक स्थगित रखी जाए। जब तक सुप्रीम कोर्ट अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के अल्पसंख्यक चरित्र से सम्बन्धित इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ इसकी और यूनिवर्सिटी की अपील पर कोई फैसला न दे।
कमीशन ने अपने फैसले में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की जामिया मिलिया से तुलना करते हुए कहा कि 1920 में जब एक एक्ट के तहत मुस्लिम यूनिवर्सिटी की स्थापना हुई थी उस समय एमएओ कॉलेज तो था, लेकिन मुस्लिम यूनिवर्सिटी का वजूद नहीं था। इसलिए यह कहा जाएगा कि यूनिवर्सिटी एक्ट के तहत कायम हुई है जबकि जामिया मिलिया के मामले में यह सूरते हाल नहीं थी। इस आधार पर कमीशन ने इस आपत्ति को निरस्त कर दिया कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक इंतजार किया जाए। लेकिन इससे यह नहीं समझना चाहिए कि मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक संस्था होने में इस आधार पर कोई ज्वेंट नहीं किया जा सकता। इसका चरित्र और प्रबंध शुरू दिन से मुसलमानों के हाथों में है। कई धारा वजूद में आने वाली यूनिवर्सिटी इसी एमएओओ कॉलेज की नई शक्ल है जो अल्पसंख्यक संस्था है।
एनसीएमईआई ने अपने फैसले में जामिया की स्थापना पर चर्चा करते हुए लिखा है कि किस तरह पहले अलीगढ़ में 1920 में जामिया को कायम किया गया, फिर दिल्ली लाया गया। 1939 में इसे सोसाइटी एक्ट के तहत पंजीकृत कराया गया। इस बात का विशेष तौर से जिक्र किया है कि जामिया कालेजा की ब्रिटिश सरकार से मदद हासिल थी जबकि जामिया मिलिया इस्लामिया खिलाफत आंदोलन और असहयोग आंदोलन के नतीजे में कायम हुआ। जामिया के संस्थापक संस्था के प्रबंध को सरकारी हस्तक्षेप से आजाद अपने हाथ में रखना चाहते थे।
जामिया मिलिया इस्लामिया इस प्रसंग में अकेली यूनिवर्सिटी है जहां अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और बनारस विश्वविद्यालय की तरह किसी एक संस्थापक के बजाए संस्थापकों की शब्दावली प्रचलित है। जबकि वास्तविकता यह है कि 29 अक्टूबर, 1920 को जामिया की स्थापना के समय 92 सदस्यीय फाउडेशन कमेटी गइित हुई थी। जिसमें सर्व सम्मति से प्रस्ताव पारित कर मौलाना मोहम्मद अली जौहर को इसका संस्थापक बताया गया था। कमेटी सदस्यों में शेरवुल हिंद मौलाना महमूद हसन, हकीम अजमल खां, डॉ. मुखतार अहमद अंसारी, अब्दुल मजीद ख्वाजा, मुफ्ती किफायत उल्ला, मौलाना हुसैन अहमद मदनी, मौलाना अबुल कलाम आजाद और महात्मा गांधी के नाम उल्लेखनीय हैं। 1920 से 1938 तक मौलाना जौहर का नाम संस्थापक के तौर पर आता रहा लेकिन बाद में संस्थापकों की शब्दावली का इस्तेमाल कर उसमें डॉ. जाकिर हुसैन का नाम शामिल कर दिया गया।
डॉ. जाकिर हुसैन 1925 में जर्मनी से आए थे। निःसंदेह उन्होंने जामिया को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। जामिया को आर्थिक संकट से निकालने के लिए संस्था सदस्यों ने एक शपथ-पत्र पर हस्ताक्षर किया जिस पर लिखा था कि वह 20 साल तक 150 रुपए मासिक से ज्यादा वेतन नहीं लेंगे और जामिया मिलिया इस्लामिया में पढ़ाएंगे। स्वयं डॉ. जाकिर हुसैन ने अपना वेतन 150 रुपए से कम कर 40 रुपए मासिक कर वह कुर्बानी दी जिसकी मिसाल शायद ही किसी संस्था में देखने को मिले। उनका नाम सुनहरे अक्षरों में लिखने लायक है लेकिन इसके बावजूद वह उसके संस्थापकों की सूची में शामिल नहीं हो सकते।
आश्चर्य तो इस बात पर है कि जामिया के कुछ अपने हित के चलते मोहम्मद अली जौहर जैसे स्वतंत्र सेनानी जिन्हें महात्मा गांधी ने भारत की आजादी दिलाने से सम्बन्धित लंदन की गोल मेज कांफ्रेंस में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए भेजा था। वहां उन्होंने अपने भाषण में कहा कि ब्रिटेन हमें आजादी का परवाना दे अन्यथा हम गुलाम देश में मरना पसंद नहीं करेंगे। कांफ्रेंस के दौरान ही उनकी मृत्यु हो गई उन्हें फिलीस्तीन में दफन किया गया, की भूमिका को नकारने में लगे हैं वहीं मुंबई से प्रकाशित ‘उर्दू टाइम्स’ ने भी जामिया का संस्थापक डॉ. जाकिर हुसैन और उनके साथियों को बताकर सच्चाई के छुपाने की जो कोशिश की है वह निश्चय ही निंदनीय है और पत्रकारिता मूल्यों के विरुद्ध भी है।
Saturday, April 2, 2011
सहाबा की महानता पर अमेरिकी हितों का संरक्षण
इमाम हरम के भारत आगमन पर उर्दू अखबारों ने काफी कुछ लिखा है। जिस तरह उनका प्रचार-प्रसार किया जा रहा था उस पर चर्चा करते हुए एक अखबार ने लिखा है कि यह सुनामी है। सुनामी गुजर जाने के बाद देखिएगा, कैसे-कैसे दृश्य नजर आते हैं। पेश है इस बाबत उर्दू के कुछ अखबारों की राय।
`इमाम हरम का दौरा देवबंद' के शीर्षक दैनिक `उर्दू नेट' में सम्पादक असगर अंसारी ने लिखा है कि मक्का और मदीना की मस्जिद में इमामत के लिए योग्य होना ऐसा ही है जैसा दिल्ली की शाही मस्जिद का मामला है, बाप के बाद बेटा उसके बाद पोता। जिस तरह जामा मस्जिद के शाही इमाम की योग्यता पूर्व इमाम का बेटा होना है उसी तरह मक्का में स्थित हरम का इमाम होना मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब के रिश्तेदारों से होना है। सऊदी अरब ने अपने यहां जारी आंदोलन की लहर को टालने के लिए मसलकी रंग दे दिया है और अमेरिका के इशारे पर इस्राइली हितों को संरक्षण देने हेतु बहरीन में सैनिक हस्तक्षेप कर दिया है। दूसरी ओर सऊदी अरब के धार्मिक विभाग के मंत्रालय ने आम मुसलमानों को यह समझाने की जिम्मेदारी दी है कि सऊदी अरब में इस्लाम के अनुसार शरई सरकार है और इसके खिलाफ गतिविधियां इस्लाम के खिलाफ और गैर शरई हैं। सभी इमामों से कहा गया है कि वह आंदोलनकारियों को शिया करार देकर इस्लामी जगत के लिए खतरा करार दें ताकि सुन्नी मुसलमान इस आंदोलन के खिलाफ एकजुट हो जाएं। सऊदी अरब के सामने सबसे बड़ा मिशन यही है और उसके मंत्री, दूत एवं धार्मिक व्यक्ति इस समय दुनियाभर के दौरे पर हैं। शेख अबुर्दुरहमान बिन अब्दुल अजीज असुदैस का दौरा भी इसी सिलसिले की कड़ी मालूम होता है। कांफ्रेंस के लिए विषय का चयन भी ऐसा है जो मुसलमानों में बहरहाल विवादित है।
`और कितना नीचे उतरेंगे अरशद मियां?' के शीर्षक से वरिष्ठ पत्रकार हफीज नोमानी ने `जदीद' खबर में लिखा है कि उनके प्रेस में सैयद सालार मसूद गाजी के उर्स का पोस्टर छपवाने एक साहब आते थे। एक बार जब वह आए तो उन्होंने कहा कि इस बार पोस्टर में आधे में मेरा फोटो और तीन इंच की मोटी पट्टी में नाम सहित आधे में उर्स का विवरण और कैलेंडर होगा। इसकी संख्या एक लाख होगी। यह पूछने पर कि इस बार ऐसा अलग क्यों हैं, उन्होंने कहा कि वह चुनाव लड़ना चाहते हैं इसीलिए आधे में फोटो और आधे में कैलेंडर है ताकि लोगों के घर में लगा रहे और सालभर लोग मुझे देखकर याद करते रहें। इस उदाहरण को देने के बाद वह लिखते हैं अगर हमारी बात गलत है तो माफ कर दीजिएगा। हमें बिल्कुल ऐसा लग रहा है कि जैसे हमारे दोस्त सैयद सालार मसूद गाजी की गोद में बैठकर संसद में पहुंचना चाहते हैं। मौलाना अरशद मदनी बिना जरूरत और बिना किसी कारण पैगम्बर मोहम्मद के महान साथियों (सहाबा) को जमीअत उलेमा के लिए इस्ताल कर रहे हैं। दिल्ली में लाख दो लाख मुसलमानों को जमा करके अपनी लोकप्रियता का प्रदर्शन कर राज्यसभा की सदस्यता के लिए रास्ता साफ कर रहे हैं।
`सहाबा की महानता के नाम पर अमेरिकी हितों का संरक्षण' के तहत डॉ. मुजफ्फर हुसैन गजाली ने `सेकुलर कयादत' में लिखा है। हिन्दुस्तानी मुसलमान यह महसूस करते हैं कि ऐसे समय में सहाबा की महानता पर कांफ्रेंस करना जबकि मुस्लिम देशों में तानाशाहों के खिलाफ लोकतंत्र के हक में एक जबरदस्त इंकलाब आया हुआ है जिसकी शुरुआत ईरान से हुई थी। इत्तेहाद मिल्लत (मुस्लिम एकता) को नुकसान पहुंचाना है। मुस्लिम दुनिया में जो हालात पैदा हो रहे हैं उनसे ईरान के लिए मुसलमानों में गुंजाइश पैदा हुई है और शिया-सुन्नी करीब आए हैं। अरशद मदनी की सहाबा की महानता कांफ्रेंस मुस्लिम हित की नहीं बल्कि इस्राइल एवं अमेरिका के हित के संरक्षण की कांफ्रेंस है। सऊदी अरब में लोकतांत्रिक सरकार अमेरिका के हित में नहीं है। ऐसा करने से उसकी पकड़ कमजोर पड़ जाएगी। हो सकता है कि मौलाना मिल्ली इत्तेहाद को नुकसान पहुंचाकर इस अवसर का फायदा उठाने की रणनीति के तहत मैदान में उतरे हों। इससे मौलाना के दो मकसद पूरे हो सकते हैं। एक कांग्रेस उन्हें राज्यसभा में भेज दे तो उनकी मंजिल है दूसरे उन्हें आने वाले चुनावों में मुसलमानों का वोट कांग्रेस के हक में डलवाने का ठेका मिल जाए। `हमारा समाज' में सालिक धामपुरी ने `देखने हम भी पर तमाशा न हुआ' के शीर्षक से लिखा है। इमाम हरम के हमारे देश में आने की सूचना कारोबारी मकसद से निकलन वाले अखबारात में दीनी व मिल्ली जमाअतों बल्कि हमारे उलेमा की ओर से दिए गए लाखों रुपये के विज्ञापनों से पढ़ने को मिली। इमाम हरम का हमारे देश में आने का मकसद क्या है यह हम नहीं जानते, लेकिन इनके आगमन पर हमारी मिल्ली जमाअतों ने अपनी पब्लिसटी का कोई मौका हाथ से नहीं जाने दिया। 26 मार्च को इमाम हरम को जमाअत इस्लामी हिन्द के मुख्यालय स्थित गुबंद वाली मस्जिद में जोहर की नमाज पढ़ानी थी इसके लिए एक दिन पहले से ही रिक्शे पर ऐलान कराया गया और अखबारों में विज्ञापन दिया गया जिसके कारण भीड़ इतनी हो गई कि वह मस्जिद के अन्दर नहीं जा सके और उन्हें बिना नमाज पढ़ाए ही वापस जाना पड़ा। माना कि भीड़ के कारण वह नमाज नहीं पढ़ा सके लेकिन जमाअत इस्लामी हिन्द कैडर आधारित संगठन होने का दावा करती है। देश की व्यवस्था की तब्दीली की इच्छा रखने वाली जमाअत एक मामूली से कार्यक्रम को कंट्रोल नहीं कर सकी। सुबह से इमाम हरम के जोहर की नमाज अदा कराने का एक मुबारक तमाशे का जो ऐलान हो रहा था, अफसोस कि वह तमाशा न हो सका। `इमाम हरम के दौरे पर सियासी रोटियां सेकने की कोशिश तेज' के तहत देवबंद से रिजवान सलमानी ने `हमारा समाज' में लिखा है कि राजनैतिक विशेषज्ञों का मानना है कि केंद्र की यूपीए सरकार विशेषकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अमेरिका की ओर झुकाव से कांग्रेस की मुसलमानों और सेकुलर लोगों में जो छवि बनी है, इमाम हरम के दौरे से इसमें बदलाव आएगा। कांग्रेस और ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने आगे बढ़कर इस कार्यक्रम में भाग लिया और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने उनके लिए अशोका होटल में भोज दिया। उससे कांग्रेस के इरादे किसी से छिपे नहीं रह सके। विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि गत कुछ समय से उत्तर प्रदेश के मुसलमानों को समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी से तोड़ने में जीजान से कांग्रेस लगी है। वर्तमान कार्यक्रम को कांग्रेस की इसी नीति का हिस्सा माना जा रहा है।
`इमाम हरम की राजनीति' के शीर्षक से दैनिक `हमारा समाज' में ख्वाजा मजनू ने लिखा है। राजधानी वालों के लिए यह सप्ताह काफी मुबारक था। हर तरफ पवित्र हलचल थी। लोग जा-ए-नमाज (जमीन पर बिछाकर नमाज पढ़ने का कपड़ा) लेकर भागते नजर आ रहे थे। जिन्होंने कभी खुदा का घर नहीं देखा वह भी भगवान राम के मैदान सिजदा करने के लिए बेचैन थे। कोई इसे आधा हज का दर्जा दे रहा था तो कोई हज से भी ज्यादा महत्व देने में लगा था। दिल्ली में इमाम साहब कहां जाएंगे और कहां नहीं जाएंगे इसके लिए अन्दर ही अन्दर खूब खींचातानी हुई। आईटीओ स्थित मस्जिद अब्दुल नबी से 24 घंटे कंट्रोलिंग की कोशिश की जा रही थी।
यहां मुंबई के एक साहब हैं, जिन्हें कुछ लोग मोबाइल आफिस भी कहते हैं। वह एक ट्रेवल एजेंट हैं लेकिन छोटे बाबू की सेवा करना अपना कर्तव्य समझते हैं। छोटे बाबू ने वह कर दिखाया जिससे उनके पूर्वज वर्षों से नहीं करना चाहते थे। सऊदी सरकार के खिलाफ अपनी आवाज उठाने के लिए मशहूर इनके पूर्वजों की आत्मा को कितनी तकलीफ हुई होगी जब एक सरकारी इमाम के लिए शेखुल इस्लाम का नारा लगा रहे हों। एक ऐसा व्यक्ति कदमों में एक कर्मचारी के गिर पड़ा हो जिनके पूर्वजों के कदमों में पूरा शासन नतमस्तक हुआ हो और उन्होंने उसे ठोकर मार दी हो। खैर, यह तो समय-समय की बात है। हालात सदैव एक जैसे नहीं रहते और बुद्धिजीवी वही है जो हालात के अनुसार फैसला करे, जो अपनी बरतरी के लिए किसी का कदम चूमें और किसी के दर पर माथा टेके।
`इमाम हरम का दौरा देवबंद' के शीर्षक दैनिक `उर्दू नेट' में सम्पादक असगर अंसारी ने लिखा है कि मक्का और मदीना की मस्जिद में इमामत के लिए योग्य होना ऐसा ही है जैसा दिल्ली की शाही मस्जिद का मामला है, बाप के बाद बेटा उसके बाद पोता। जिस तरह जामा मस्जिद के शाही इमाम की योग्यता पूर्व इमाम का बेटा होना है उसी तरह मक्का में स्थित हरम का इमाम होना मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब के रिश्तेदारों से होना है। सऊदी अरब ने अपने यहां जारी आंदोलन की लहर को टालने के लिए मसलकी रंग दे दिया है और अमेरिका के इशारे पर इस्राइली हितों को संरक्षण देने हेतु बहरीन में सैनिक हस्तक्षेप कर दिया है। दूसरी ओर सऊदी अरब के धार्मिक विभाग के मंत्रालय ने आम मुसलमानों को यह समझाने की जिम्मेदारी दी है कि सऊदी अरब में इस्लाम के अनुसार शरई सरकार है और इसके खिलाफ गतिविधियां इस्लाम के खिलाफ और गैर शरई हैं। सभी इमामों से कहा गया है कि वह आंदोलनकारियों को शिया करार देकर इस्लामी जगत के लिए खतरा करार दें ताकि सुन्नी मुसलमान इस आंदोलन के खिलाफ एकजुट हो जाएं। सऊदी अरब के सामने सबसे बड़ा मिशन यही है और उसके मंत्री, दूत एवं धार्मिक व्यक्ति इस समय दुनियाभर के दौरे पर हैं। शेख अबुर्दुरहमान बिन अब्दुल अजीज असुदैस का दौरा भी इसी सिलसिले की कड़ी मालूम होता है। कांफ्रेंस के लिए विषय का चयन भी ऐसा है जो मुसलमानों में बहरहाल विवादित है।
`और कितना नीचे उतरेंगे अरशद मियां?' के शीर्षक से वरिष्ठ पत्रकार हफीज नोमानी ने `जदीद' खबर में लिखा है कि उनके प्रेस में सैयद सालार मसूद गाजी के उर्स का पोस्टर छपवाने एक साहब आते थे। एक बार जब वह आए तो उन्होंने कहा कि इस बार पोस्टर में आधे में मेरा फोटो और तीन इंच की मोटी पट्टी में नाम सहित आधे में उर्स का विवरण और कैलेंडर होगा। इसकी संख्या एक लाख होगी। यह पूछने पर कि इस बार ऐसा अलग क्यों हैं, उन्होंने कहा कि वह चुनाव लड़ना चाहते हैं इसीलिए आधे में फोटो और आधे में कैलेंडर है ताकि लोगों के घर में लगा रहे और सालभर लोग मुझे देखकर याद करते रहें। इस उदाहरण को देने के बाद वह लिखते हैं अगर हमारी बात गलत है तो माफ कर दीजिएगा। हमें बिल्कुल ऐसा लग रहा है कि जैसे हमारे दोस्त सैयद सालार मसूद गाजी की गोद में बैठकर संसद में पहुंचना चाहते हैं। मौलाना अरशद मदनी बिना जरूरत और बिना किसी कारण पैगम्बर मोहम्मद के महान साथियों (सहाबा) को जमीअत उलेमा के लिए इस्ताल कर रहे हैं। दिल्ली में लाख दो लाख मुसलमानों को जमा करके अपनी लोकप्रियता का प्रदर्शन कर राज्यसभा की सदस्यता के लिए रास्ता साफ कर रहे हैं।
`सहाबा की महानता के नाम पर अमेरिकी हितों का संरक्षण' के तहत डॉ. मुजफ्फर हुसैन गजाली ने `सेकुलर कयादत' में लिखा है। हिन्दुस्तानी मुसलमान यह महसूस करते हैं कि ऐसे समय में सहाबा की महानता पर कांफ्रेंस करना जबकि मुस्लिम देशों में तानाशाहों के खिलाफ लोकतंत्र के हक में एक जबरदस्त इंकलाब आया हुआ है जिसकी शुरुआत ईरान से हुई थी। इत्तेहाद मिल्लत (मुस्लिम एकता) को नुकसान पहुंचाना है। मुस्लिम दुनिया में जो हालात पैदा हो रहे हैं उनसे ईरान के लिए मुसलमानों में गुंजाइश पैदा हुई है और शिया-सुन्नी करीब आए हैं। अरशद मदनी की सहाबा की महानता कांफ्रेंस मुस्लिम हित की नहीं बल्कि इस्राइल एवं अमेरिका के हित के संरक्षण की कांफ्रेंस है। सऊदी अरब में लोकतांत्रिक सरकार अमेरिका के हित में नहीं है। ऐसा करने से उसकी पकड़ कमजोर पड़ जाएगी। हो सकता है कि मौलाना मिल्ली इत्तेहाद को नुकसान पहुंचाकर इस अवसर का फायदा उठाने की रणनीति के तहत मैदान में उतरे हों। इससे मौलाना के दो मकसद पूरे हो सकते हैं। एक कांग्रेस उन्हें राज्यसभा में भेज दे तो उनकी मंजिल है दूसरे उन्हें आने वाले चुनावों में मुसलमानों का वोट कांग्रेस के हक में डलवाने का ठेका मिल जाए। `हमारा समाज' में सालिक धामपुरी ने `देखने हम भी पर तमाशा न हुआ' के शीर्षक से लिखा है। इमाम हरम के हमारे देश में आने की सूचना कारोबारी मकसद से निकलन वाले अखबारात में दीनी व मिल्ली जमाअतों बल्कि हमारे उलेमा की ओर से दिए गए लाखों रुपये के विज्ञापनों से पढ़ने को मिली। इमाम हरम का हमारे देश में आने का मकसद क्या है यह हम नहीं जानते, लेकिन इनके आगमन पर हमारी मिल्ली जमाअतों ने अपनी पब्लिसटी का कोई मौका हाथ से नहीं जाने दिया। 26 मार्च को इमाम हरम को जमाअत इस्लामी हिन्द के मुख्यालय स्थित गुबंद वाली मस्जिद में जोहर की नमाज पढ़ानी थी इसके लिए एक दिन पहले से ही रिक्शे पर ऐलान कराया गया और अखबारों में विज्ञापन दिया गया जिसके कारण भीड़ इतनी हो गई कि वह मस्जिद के अन्दर नहीं जा सके और उन्हें बिना नमाज पढ़ाए ही वापस जाना पड़ा। माना कि भीड़ के कारण वह नमाज नहीं पढ़ा सके लेकिन जमाअत इस्लामी हिन्द कैडर आधारित संगठन होने का दावा करती है। देश की व्यवस्था की तब्दीली की इच्छा रखने वाली जमाअत एक मामूली से कार्यक्रम को कंट्रोल नहीं कर सकी। सुबह से इमाम हरम के जोहर की नमाज अदा कराने का एक मुबारक तमाशे का जो ऐलान हो रहा था, अफसोस कि वह तमाशा न हो सका। `इमाम हरम के दौरे पर सियासी रोटियां सेकने की कोशिश तेज' के तहत देवबंद से रिजवान सलमानी ने `हमारा समाज' में लिखा है कि राजनैतिक विशेषज्ञों का मानना है कि केंद्र की यूपीए सरकार विशेषकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अमेरिका की ओर झुकाव से कांग्रेस की मुसलमानों और सेकुलर लोगों में जो छवि बनी है, इमाम हरम के दौरे से इसमें बदलाव आएगा। कांग्रेस और ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने आगे बढ़कर इस कार्यक्रम में भाग लिया और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने उनके लिए अशोका होटल में भोज दिया। उससे कांग्रेस के इरादे किसी से छिपे नहीं रह सके। विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि गत कुछ समय से उत्तर प्रदेश के मुसलमानों को समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी से तोड़ने में जीजान से कांग्रेस लगी है। वर्तमान कार्यक्रम को कांग्रेस की इसी नीति का हिस्सा माना जा रहा है।
`इमाम हरम की राजनीति' के शीर्षक से दैनिक `हमारा समाज' में ख्वाजा मजनू ने लिखा है। राजधानी वालों के लिए यह सप्ताह काफी मुबारक था। हर तरफ पवित्र हलचल थी। लोग जा-ए-नमाज (जमीन पर बिछाकर नमाज पढ़ने का कपड़ा) लेकर भागते नजर आ रहे थे। जिन्होंने कभी खुदा का घर नहीं देखा वह भी भगवान राम के मैदान सिजदा करने के लिए बेचैन थे। कोई इसे आधा हज का दर्जा दे रहा था तो कोई हज से भी ज्यादा महत्व देने में लगा था। दिल्ली में इमाम साहब कहां जाएंगे और कहां नहीं जाएंगे इसके लिए अन्दर ही अन्दर खूब खींचातानी हुई। आईटीओ स्थित मस्जिद अब्दुल नबी से 24 घंटे कंट्रोलिंग की कोशिश की जा रही थी।
यहां मुंबई के एक साहब हैं, जिन्हें कुछ लोग मोबाइल आफिस भी कहते हैं। वह एक ट्रेवल एजेंट हैं लेकिन छोटे बाबू की सेवा करना अपना कर्तव्य समझते हैं। छोटे बाबू ने वह कर दिखाया जिससे उनके पूर्वज वर्षों से नहीं करना चाहते थे। सऊदी सरकार के खिलाफ अपनी आवाज उठाने के लिए मशहूर इनके पूर्वजों की आत्मा को कितनी तकलीफ हुई होगी जब एक सरकारी इमाम के लिए शेखुल इस्लाम का नारा लगा रहे हों। एक ऐसा व्यक्ति कदमों में एक कर्मचारी के गिर पड़ा हो जिनके पूर्वजों के कदमों में पूरा शासन नतमस्तक हुआ हो और उन्होंने उसे ठोकर मार दी हो। खैर, यह तो समय-समय की बात है। हालात सदैव एक जैसे नहीं रहते और बुद्धिजीवी वही है जो हालात के अनुसार फैसला करे, जो अपनी बरतरी के लिए किसी का कदम चूमें और किसी के दर पर माथा टेके।
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