अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय संस्थापक सर सैयद अहमद के जन्म दिवस पर 17 अक्तूबर 2011 को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में आयोजित समारोह में केंद्रीय कानून एवं इंसाफ मंत्री सलमान खुर्शीद को शरीक नहीं होने दिया गया, पर चर्चा करते हुए दैनिक `अखबारे मशरिक' ने अखबार की पहली खबर बनाई है। अलीगढ़ के संवाददाता ए. समन सवॉ के हवाले से अखबार ने लिखा है कि सर सैयद का 194वां जन्म दिवस पारम्परिक जोश खरोश से मनाया जाना था। इस कार्यक्रम में मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति ने सलमान खुर्शीद को विशेष मेहमान क sतौर पर बुलाया था लेकिन उनका सपना एक डरावने ख्वाब की तरह बिखर गया। छात्र और शिक्षक संघ ने इसका विरोध करते हुए पहले ही घोषणा कर दी थी कि वह किसी भी कीमत पर सलमान खुर्शीद को इस समारोह में शरीक नहीं होने देंगे। सर सैयद कार्यक्रम शाम चार बजे शुरू होना था लेकिन वीसी लाज पर छात्र और शिक्षकों की भीड़ काले झंडे लिए हुए सलमान खुर्शीद मुर्दाबाद और वाइस चांसलर मुर्दाबाद के नारे लगा रही थी। जिला और प्रशासन ने स्थिति को देखते हुए केंद्रीय मंत्री को एक होटल में ठहरा दिया और इनको यूनिवर्सिटी में दाखिल होने की इजाजत नहीं दी। जिसके नतीजे में साम साढ़े छह बजे अर्थात् दो घंटे बाद वाइस चांसलर और रजिस्ट्रार किसी गोपनीय रास्ते से समारोह स्थल पर आए जहां रजिस्ट्रार ने बताया कि पुलिस ने सलमान खुर्शीद को यहां आने से रोक दिया है।
आल इंडिया उलेमा मशाएख के बैनर तले मौलाना मोहम्मद अशरफ द्वारा मुसलमानों के एक सप्रदाय को निशाना बनाए जाने पर दैनिक `हमारा समाज' में आमिर सलीम खां ने अपनी विशेष रिपोर्ट में लिखा है कि एमएलबी की सीट और कुछ विधानसभा टिकटों के लिए मौलाना मिल्लत में फूट डाल रहे हैं इसके लिए उन्होंने उत्तर प्रदेश की एक अहम राजनैतिक पार्टी के बड़े नेता से गोपनीय संधि भी की है। कुर्सी और कुछ टिकटों के बदले पूरे मुस्लिम समुदाय को बांटने की नीति अपना सकते हैं। गत दिनों दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस और फिर बाद में बरेली की महापंचायत को इसी पार्टी ने स्पांसर किया था। मौलाना अशरफ ने प्रेस कांफ्रेंस और महापंचायत में मिल्लत इस्लामिया के संबंध में जो विचार जाहिर किए हैं उससे सुन्नी उलेमा भी हैरान हैं। इस बात से हैरान नहीं होना चाहिए कि वह राजनैतिक कद बढ़ाने के लिए वहाबी विचारधारा के खिलाफ काम कर रहे हैं। सूत्रों के अनुसार प्रेस कांफ्रेंस के लिए दिल्ली का चयन भी इन नेता जी की गोपनीय बैठक और निर्देश का नतीजा था क्योंकि दिल्ली से जो बात चलेगी वह दूर तक चलेगी। दूसरी ओर मुरादाबाद में भी हुई महापंचायत में भी वही बातें सामने आई हैं जिससे मुसलमानों में काफी गुस्सा पाया जा रहा है।
मुरादाबाद की महापंचायत में वक्ताओं द्वारा अनॉप-शनॉप बातें करने पर मुसलमानों द्वारा तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की जारी है। दैनिक `सहाफत' ने अपनी पहली खबर में जमीअत उलेमा हिन्द (अरशद ग्रुप) के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी, दिल्ली उर्दू अकादमी के वाइस चेयरमैन प्रोफेसर अखतारुल वासे, जमाअत इस्लामी हिन्द सचिव मौलाना रफीक कासमी, जमीअत अहले हदीस के महासचिव मौलाना असगर इमाम मेहंदी खलफी और मुस्लिम मजलिस अमल के महासचिव राहत मदमूद चौधरी सहित अनेक बुद्धिजीवियों के विचारों को प्रमुखता से प्रकाशित कर उनकी निन्दा की है और उन्हें कुरआन एवं हदीस की शिक्षा से अनभिज्ञ बताया है। मुरादाबाद की मुस्लिम महापंचायत में जिस तरह मुसलमानों को सुन्नी वहाबी में विभाजित कर वहाबी सप्रदाय पर आरोप लगाया गया है, वह बिल्कुल बेबुनियाद हैं। राहत महमूद चौधरी के अनुसार इस तरह का आरोप तो आरएसएस, भाजपा, शिवसेना, बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद भी आज तक नहीं लगा सकी है। उन्होंने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया कि इस महापंचायत में सऊदी अरब में कब्रिस्तान और मस्जिद की अवमानना का तो जिक्र किया गया लेकिन देश में वीरान पड़ी मस्जिदों और बाबरी मस्जिद तक का कोई जिक्र नहीं किया गया।
मौलाना अरशद मदनी ने महापंचयात के आरोप को नकारते हुए स्पष्ट किया कि इस्लाम दुनिया में मुसलमानों को जोड़ने के लिए आया है, तोड़ने के लिए नहीं। इसलिए दारुल उलूम देवबंद से कभी कोई आवाज मिल्लत के किसी सप्रदाय को तोड़ने के लिए नहीं उठाई जाती है। जोड़ने की यह कोशिश 150 साल से जारी है और हम इसमें पूरी तरह कामयाब हैं।
`सूचना अधिकार पर तलवार' के शीर्षक से दैनिक `जदीद मेल' ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि सूचना का अधिकार एक बार फिर चर्चा में है और इसके कुछ बिन्दुओं पर फिर से विचार-विमर्श की बात की जा रही है। इस बार यह चिन्ता स्वयं प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा की ओर से की जा रही है। उनका कहना है कि इस कानून का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि इसके द्वारा ईमानदारी और सही ढंग से काम करने वाले लोग परेशान हों। प्रधानमंत्री की चिन्ता इसलिए है कि गत दिनों आरटीआई कार्यकर्ता द्वारा इस कानून के तहत प्रधानमंत्री कार्यालय से वह पत्र हासिल कर लिया गया था जो 2जी मामले में वित्त मंत्रालय ने उन्हें लिखा था जिसके बाद केंद्र सरकार संकट में पड़ गई थी। इसके अतिरिक्त जितने बड़े घोटाले सामने आए हैं उसमें सूचना अधिकार कानून का बड़ा योगदान है इसलिए सरकार अब इस कानून को कमजोर करना चाहती है। नौकरशाही व्यवस्था पर लगाम कसने वाला यह कानून अब सरकार के निशाने पर है।
दैनिक `प्रताप' में सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने `अन्ना और उनकी टीम पर चौतरफा हमला' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखा है कि अन्ना हजारे और उनकी टीम गत कुछ दिनों से चारों ओर से समस्याओं से घिरती जा रही है। एक-एक करके कई समस्याएं खड़ी हो गई हैं। उत्तर प्रदेश में अन्ना का संदेश लेकर दौरा कर रहे उनके सिपाहसालार अरविन्द केजरीवाल पर हमला हुआ। टीम अन्ना के दो वरिष्ठ सदस्य पीवी राजगोपाल और राजेन्द्र सिंह ने मुहिम के राजनैतिक रंग लेने पर कोर कमेटी से त्यागपत्र दे दिया है। कांग्रेस से सुलह कराने के प्रयासों पर उस समय पानी फिर गया जब समय देकर राहुल गांधी अन्ना के प्रतिनिधियों से नहीं मिले। रामदेव ने प्रशांत भूषण के खिलाफ मामला दर्ज करने की बात कही। अन्त में टीम अन्ना को एक झटका उस समय लगा जब सुप्रीम कोर्ट ने अन्ना के हिन्द स्वराज ट्रस्ट को मिलने वाले सरकारी पैसे का गलत इस्तेमाल की छानबीन के लिए सीबीआई की अर्जी को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया। अन्ना खुद तो बेदाग हैं लेकिन उनके साथी निश्चित रूप से अन्ना आंदोलन को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
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Wednesday, October 26, 2011
Tuesday, March 15, 2011
इंसाफ के इंतजार में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय
बीते दिनों कई मुद्दों ने अपनी ओर ध्यान आकर्षित कराया है। अयोध्या विध्वंस मामले में आरोपियों के विरुद्ध षड्यंत्र का मामला और दिल्ली की एक अदालत द्वारा बोफोर्स तोप सौदे में दलाली पाने वाले कथित आरोपी क्वात्रोची के खिलाफ फाइल बन्द करने पर मुहर और जामिया मिलिया इस्लामिया को अल्पसंख्यक संस्था का दर्जा मिलने के बाद अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के अल्पसंख्यक दर्जा से तुलना जैसे अनेक मुद्दे अखबारों में छाये रहे। पेश है इस बाबत उर्दू के कुछ अखबारों की राय।
`सहरोजा दावत' ने `अयोध्या विध्वंस में आरोपियों के खिलाफ आपराधिक षड्यंत्र का मामला' के शीर्षक से लिखा है। गोधरा घटना में जहां षड्यंत्र को कोई पहलू नजर नहीं आ रहा था और यदि होगा तो यह दंगाइयों का ही किया कराया होगा ताकि वह इस बहाने मुसलमानों का नरसंहार कर सकें। रेलवे की ओर से गठित यूसी बनर्जी कमेटी ने उसे एक अचानक घटना बताया था और पोटा पुनर्विचार कमेटी ने पोटा हटाने की सिफारिश करके आरोपियों को फंसाने की सरकार के षड्यंत्र को बेनकाब कर दिया था। अहमदाबाद की विशेष अदालत ने इस घटना में 31 मुसलमानों को षड्यंत्रकारी मान कर उन्हें सजा सुना दी और जिस बाबरी मस्जिद का विध्वंस षड्यंत्र के तहत ही हुआ था, इस बाबत योजनाएं और प्लानिंग की रिपोर्टें खुफिया एजेंसियों ने विध्वंस से पहले भी दी थीं और विध्वंस के बाद भी विध्वंस से पूर्व राजनैतिक पार्टियों ने पूरी स्थिति का जायजा लेकर संदेह व्यक्त कर तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव सरकार से उचित कार्यवाही और बाबरी मस्जिद को बचाने की मांग की। इस सबके बावजूद विध्वंस के 18 वर्षों बाद षड्यंत्र का मामला कानूनी दांव पेंच में उलझा हुआ है और यह फैसला नहीं हो पा रहा है कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के षड्यंत्र के आरोप में छोटे-बड़े सभी आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चलाया जाए या बड़ों के खिलाफ केवल मुकदमें की खानापूरी हो और छोटे लोगों को अंजाम तक पहुंचाया जाए।
सारा मामला मुकदमें में एक तकनीकी खामी का है जिसमें सुधार नहीं किया जा रहा है। निश्चय ही इसका फायदा आरोपियों को मिल रहा है। मुकदमा रस्मी बनकर रह गया है, जिस घटना को देश में सेकुलरिज्म, लोकतंत्र और संविधान का खून और अदालत की अवमानना कहा गया, उसके आरोपियों के खिलाफ एक फुसफुसा मुकदमा चलाना घटना से ज्यादा शर्मनाक है। लेकिन गत 18 वर्षों से यही हो रहा है। उत्तर प्रदेश की कोई भी सरकार इस तकनीकी खामी को दूर करने के लिए तैयार नहीं है। `बोफोर्स केस में एक नया मोड़' के शीर्षक से उपरोक्त अखबार ने अपने सम्पादकीय में लिखा है। बोफोर्स तोप सौदे में बड़े पैमाने पर हेने वाली हेराफेरी का मामला उस समय एक नए मोड़ में दाखिल हो गया जब दिल्ली की तीस हजारी अदालत ने इस मामले के एक अहम आरोपी इटली व्यवसायी क्वात्रोची को घूस के आरोप से बरी कर दिया। इस तरह उसे सजा दिलाने की सभी कोशिशों पर पानी फिर गया और इस उद्देश्य से क्वात्रोची को भारत लाने का तर्प भी खत्म हो गया। इस तरह 25 साल की मेहनत और लगभग 250 करोड़ रुपये से देश हाथ धो बैठा। क्वात्रोची को अदालत के सामने पेश करने की कोशिशें उस समय से हो रही हैं जब वह 1993 में देश से फरार होने में कामयाब हो गया था। यह एक अलग किस्सा है कि वह यहां से भागने में कैसे कामयाब हुआ। इसके लिए पहले मलेशिया के साथ बातचीत की गई इसके बाद अर्जेंटीना से बात की गई, लेकिन दोनों कोशिशें बुरी तरह नाकाम रहीं। अब सीबीआई ने अपनी असफलता को स्वीकार करते हुए अदालत को भी इससे सहमत करने की अपील की कि इसका कोई फायदा नहीं इसलिए इसको बन्द कर दिया जाए। ठीक यही मामला यूनियन कार्बाइड के अधिकारियों के साथ किया गया, वह भी इसी देश से फरार होने में कामयाब हो गया था। अब यह सच्चाई भी सामने आ चुकी है कि उसको देश से भागने में किन-किन व्यक्तियों ने मदद की और कौन-सी ताकतें इसमें लिप्त हैं। अब यह कहा जा रहा है कि बोफोर्स मामले का अध्याय बन्द हो गया और बड़ी बात यह है कि अदालत इसका रास्ता आसान कर रही है। यदि राष्ट्रीय दौलत के बर्बाद होने का अदालत को इतना ही गम है तो उसे इस तरह के दूसरे मामलों पर भी ध्यान देना चाहिए। दैनिक `राष्ट्रीय सहारा' ने `दस्तावेज' के स्तंभ में अल्पसंख्यकों की शैक्षिक समस्याएं और उनकी संस्थानों के अधिकार पर विस्तारपूर्वक चर्चा की है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के डीन फैकलटी ऑफ लॉ प्रोफेसर एम. शब्बीर लिखते हैं। 2006 में एएमयू के अल्पसंख्यक दर्जा को खत्म करने वाले फैसले को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चैलेंज किया गया, लेकिन इस मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले की रोशनी में अल्पसंख्यक संस्था मानने से इंकार कर दिया। अदालत के सामने एएमयू (संशोधित) कानून 1981 की पृष्ठभूमि को बयान किया गया कि यह एक अल्पसंख्यक संस्था है और इस अधिकार को बहाल करने के लिए यह कानून बनाया गया था। लेकिन इस सब के बावजूद इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अजीज पाशा के मामले पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को महत्व दिया। उसका कहना था कि हम सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनदेखी नहीं कर सकते हैं। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि एएमयू (संशोधित) कानून 1981 में यह कहीं नहीं कहा गया कि इस कानून को बनाने का किसी को कोई अधिकार नहीं दिया गया। टंडन ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी बनाम डॉ. नरेश अग्रवाल केस में स्पष्ट कर दिया कि संसद को यह अधिकार हासिल नहीं है कि वह एएमयू (संशोधित) एक्ट 1981 कानून बनाए क्योंकि उस समय अजीज पाशा मामले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ चुका है। इसलिए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एएमयू को अल्पसंख्यक संस्था नहीं माना। एएमयू को अल्पसंख्यक संस्था करार देने और अजीज पाशा केस के प्रभाव से मुक्ति दिलाने के लिए याचिका दाखिल करनी पड़ी। यह याचिका सुप्रीम कोर्ट के सामने विचाराधीन है। इसको कम से कम पांच जजों से अधिक की खंडपीठ के सामने पेश होना चाहिए क्योंकि अजीज पाशा केस पर जो फैसला आया था वह पांच जजों की खंडपीठ का था। `गोधरा अदालती फैसला कुछ उभरते सवालात' के शीर्षक से दैनिक `सहाफत' में ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल महासचिव डॉ. मोहम्मद मंजूर आलम ने लिखा है कि यह सवाल भी अहम है कि जब मुकदमे में पोटा लगाना ही षड्यंत्र साबित हो चुका और उसकी बुनियाद पर आगे की कानूनी कार्यवाही पर भरोसा कैसे किया जा सकता है। आश्चर्य की बात तो यह है कि विशेष अदालत ने गोधरा घटना के पूरे मामले में उन 59 कारसेवकों जिनकी मौत का दावा किया जाता है, के नाम और परिजनों का पता नहीं मालूम कर पाई और न ही साबरमती एक्सप्रेस की जलाई गई एस-6 बोगी के आरक्षण चार्ट को हासिल कर पाई लेकिन इनकी हत्या के आरोप में सुनवाई पूरी कर डाली और एक सौ लोगों की जिन्दगी से खिलवाड़ किया। यह फैसला हाई कोर्ट/सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया जाना चाहिए ताकि पूरा मामला जो पहेली बन गया है, सुलझाया जा सके और सही सूरते हाल सामने आ सके। `बिहार 2459 मदरसों की मंजूरी या मुसलमानों की ठगी' के शीर्षक से साप्ताहिक `चौथी दुनिया' में अशरफ अस्थानवी ने लिखा है। 2459 मदरसों के सिलसिले में जारी खुलासे में यह फर्प पैदा कर दिया गया है जिसे कमजोर पाएगी या कहना अभी जल्दबाजी है। अध्यादेश में मदरसों को मंजूरी देने और उनके शिक्षक एवं कर्मचारियों को सरकारी स्कूलों के शिक्षकों के बराबर पगार देने के लिए 108 करोड़ रुपये की मंजूरी की बात कही गई है। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। सबसे पहली बात यह कि सभी 2459 मदरसों को इस फैसले से मंजूरी हासिल नहीं होगी। इनकी जांच जिला शिक्षा अधिनियम के तहत निर्धारित दिशानिर्देश के तहत करेंगे।
`सहरोजा दावत' ने `अयोध्या विध्वंस में आरोपियों के खिलाफ आपराधिक षड्यंत्र का मामला' के शीर्षक से लिखा है। गोधरा घटना में जहां षड्यंत्र को कोई पहलू नजर नहीं आ रहा था और यदि होगा तो यह दंगाइयों का ही किया कराया होगा ताकि वह इस बहाने मुसलमानों का नरसंहार कर सकें। रेलवे की ओर से गठित यूसी बनर्जी कमेटी ने उसे एक अचानक घटना बताया था और पोटा पुनर्विचार कमेटी ने पोटा हटाने की सिफारिश करके आरोपियों को फंसाने की सरकार के षड्यंत्र को बेनकाब कर दिया था। अहमदाबाद की विशेष अदालत ने इस घटना में 31 मुसलमानों को षड्यंत्रकारी मान कर उन्हें सजा सुना दी और जिस बाबरी मस्जिद का विध्वंस षड्यंत्र के तहत ही हुआ था, इस बाबत योजनाएं और प्लानिंग की रिपोर्टें खुफिया एजेंसियों ने विध्वंस से पहले भी दी थीं और विध्वंस के बाद भी विध्वंस से पूर्व राजनैतिक पार्टियों ने पूरी स्थिति का जायजा लेकर संदेह व्यक्त कर तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव सरकार से उचित कार्यवाही और बाबरी मस्जिद को बचाने की मांग की। इस सबके बावजूद विध्वंस के 18 वर्षों बाद षड्यंत्र का मामला कानूनी दांव पेंच में उलझा हुआ है और यह फैसला नहीं हो पा रहा है कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के षड्यंत्र के आरोप में छोटे-बड़े सभी आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चलाया जाए या बड़ों के खिलाफ केवल मुकदमें की खानापूरी हो और छोटे लोगों को अंजाम तक पहुंचाया जाए।
सारा मामला मुकदमें में एक तकनीकी खामी का है जिसमें सुधार नहीं किया जा रहा है। निश्चय ही इसका फायदा आरोपियों को मिल रहा है। मुकदमा रस्मी बनकर रह गया है, जिस घटना को देश में सेकुलरिज्म, लोकतंत्र और संविधान का खून और अदालत की अवमानना कहा गया, उसके आरोपियों के खिलाफ एक फुसफुसा मुकदमा चलाना घटना से ज्यादा शर्मनाक है। लेकिन गत 18 वर्षों से यही हो रहा है। उत्तर प्रदेश की कोई भी सरकार इस तकनीकी खामी को दूर करने के लिए तैयार नहीं है। `बोफोर्स केस में एक नया मोड़' के शीर्षक से उपरोक्त अखबार ने अपने सम्पादकीय में लिखा है। बोफोर्स तोप सौदे में बड़े पैमाने पर हेने वाली हेराफेरी का मामला उस समय एक नए मोड़ में दाखिल हो गया जब दिल्ली की तीस हजारी अदालत ने इस मामले के एक अहम आरोपी इटली व्यवसायी क्वात्रोची को घूस के आरोप से बरी कर दिया। इस तरह उसे सजा दिलाने की सभी कोशिशों पर पानी फिर गया और इस उद्देश्य से क्वात्रोची को भारत लाने का तर्प भी खत्म हो गया। इस तरह 25 साल की मेहनत और लगभग 250 करोड़ रुपये से देश हाथ धो बैठा। क्वात्रोची को अदालत के सामने पेश करने की कोशिशें उस समय से हो रही हैं जब वह 1993 में देश से फरार होने में कामयाब हो गया था। यह एक अलग किस्सा है कि वह यहां से भागने में कैसे कामयाब हुआ। इसके लिए पहले मलेशिया के साथ बातचीत की गई इसके बाद अर्जेंटीना से बात की गई, लेकिन दोनों कोशिशें बुरी तरह नाकाम रहीं। अब सीबीआई ने अपनी असफलता को स्वीकार करते हुए अदालत को भी इससे सहमत करने की अपील की कि इसका कोई फायदा नहीं इसलिए इसको बन्द कर दिया जाए। ठीक यही मामला यूनियन कार्बाइड के अधिकारियों के साथ किया गया, वह भी इसी देश से फरार होने में कामयाब हो गया था। अब यह सच्चाई भी सामने आ चुकी है कि उसको देश से भागने में किन-किन व्यक्तियों ने मदद की और कौन-सी ताकतें इसमें लिप्त हैं। अब यह कहा जा रहा है कि बोफोर्स मामले का अध्याय बन्द हो गया और बड़ी बात यह है कि अदालत इसका रास्ता आसान कर रही है। यदि राष्ट्रीय दौलत के बर्बाद होने का अदालत को इतना ही गम है तो उसे इस तरह के दूसरे मामलों पर भी ध्यान देना चाहिए। दैनिक `राष्ट्रीय सहारा' ने `दस्तावेज' के स्तंभ में अल्पसंख्यकों की शैक्षिक समस्याएं और उनकी संस्थानों के अधिकार पर विस्तारपूर्वक चर्चा की है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के डीन फैकलटी ऑफ लॉ प्रोफेसर एम. शब्बीर लिखते हैं। 2006 में एएमयू के अल्पसंख्यक दर्जा को खत्म करने वाले फैसले को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चैलेंज किया गया, लेकिन इस मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले की रोशनी में अल्पसंख्यक संस्था मानने से इंकार कर दिया। अदालत के सामने एएमयू (संशोधित) कानून 1981 की पृष्ठभूमि को बयान किया गया कि यह एक अल्पसंख्यक संस्था है और इस अधिकार को बहाल करने के लिए यह कानून बनाया गया था। लेकिन इस सब के बावजूद इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अजीज पाशा के मामले पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को महत्व दिया। उसका कहना था कि हम सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनदेखी नहीं कर सकते हैं। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि एएमयू (संशोधित) कानून 1981 में यह कहीं नहीं कहा गया कि इस कानून को बनाने का किसी को कोई अधिकार नहीं दिया गया। टंडन ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी बनाम डॉ. नरेश अग्रवाल केस में स्पष्ट कर दिया कि संसद को यह अधिकार हासिल नहीं है कि वह एएमयू (संशोधित) एक्ट 1981 कानून बनाए क्योंकि उस समय अजीज पाशा मामले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ चुका है। इसलिए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एएमयू को अल्पसंख्यक संस्था नहीं माना। एएमयू को अल्पसंख्यक संस्था करार देने और अजीज पाशा केस के प्रभाव से मुक्ति दिलाने के लिए याचिका दाखिल करनी पड़ी। यह याचिका सुप्रीम कोर्ट के सामने विचाराधीन है। इसको कम से कम पांच जजों से अधिक की खंडपीठ के सामने पेश होना चाहिए क्योंकि अजीज पाशा केस पर जो फैसला आया था वह पांच जजों की खंडपीठ का था। `गोधरा अदालती फैसला कुछ उभरते सवालात' के शीर्षक से दैनिक `सहाफत' में ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल महासचिव डॉ. मोहम्मद मंजूर आलम ने लिखा है कि यह सवाल भी अहम है कि जब मुकदमे में पोटा लगाना ही षड्यंत्र साबित हो चुका और उसकी बुनियाद पर आगे की कानूनी कार्यवाही पर भरोसा कैसे किया जा सकता है। आश्चर्य की बात तो यह है कि विशेष अदालत ने गोधरा घटना के पूरे मामले में उन 59 कारसेवकों जिनकी मौत का दावा किया जाता है, के नाम और परिजनों का पता नहीं मालूम कर पाई और न ही साबरमती एक्सप्रेस की जलाई गई एस-6 बोगी के आरक्षण चार्ट को हासिल कर पाई लेकिन इनकी हत्या के आरोप में सुनवाई पूरी कर डाली और एक सौ लोगों की जिन्दगी से खिलवाड़ किया। यह फैसला हाई कोर्ट/सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया जाना चाहिए ताकि पूरा मामला जो पहेली बन गया है, सुलझाया जा सके और सही सूरते हाल सामने आ सके। `बिहार 2459 मदरसों की मंजूरी या मुसलमानों की ठगी' के शीर्षक से साप्ताहिक `चौथी दुनिया' में अशरफ अस्थानवी ने लिखा है। 2459 मदरसों के सिलसिले में जारी खुलासे में यह फर्प पैदा कर दिया गया है जिसे कमजोर पाएगी या कहना अभी जल्दबाजी है। अध्यादेश में मदरसों को मंजूरी देने और उनके शिक्षक एवं कर्मचारियों को सरकारी स्कूलों के शिक्षकों के बराबर पगार देने के लिए 108 करोड़ रुपये की मंजूरी की बात कही गई है। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। सबसे पहली बात यह कि सभी 2459 मदरसों को इस फैसले से मंजूरी हासिल नहीं होगी। इनकी जांच जिला शिक्षा अधिनियम के तहत निर्धारित दिशानिर्देश के तहत करेंगे।
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