Saturday, February 12, 2011

`मुस्लिम देशों में जनता की नाराजगी है या इस्लामी बेदारी'

बीते सप्ताह राष्ट्रीय स्तर पर भ्रष्टाचार का मुद्दा चर्चा में छाया रहा जबकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले घटनाक्रम के चलते मिस्र में इंकलाब की दस्तक ने सभी मुद्दों को पीछे छोड़ दिया। राष्ट्रीय समाचार पत्रों की तरह उर्दू के अखबारों ने इस पर अपने सम्पादकीय लिखे और आलेख प्रकाशित किए। पेश है इस बाबत कुछ उर्दू अखबारों की राय।
हैदराबाद से प्रकाशित दैनिक `सियासत' ने `मिस्र में टकराव' के शीर्षक से लिखा है। राष्ट्रपति मिस्र हुस्नी मुबारक को हटाने की कोशिश, अरब देशों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया के किस ढांचे में ले जाएगी इसका अनुमान काहिरा के तहरीर स्क्वायर पर एकत्र लाखों की भीड़ को न हो। लेकिन अरब देशों को यह विश्वास हो गया है कि मध्य पूर्व में जन आंदोलन के पीछे कोई न कोई ताकत जरूर है। 2009 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने काहिरा दौरे में लोकतंत्र के लिए मजबूत केस पेश करते हुए जनता में जो प्रेरणा पैदा की, यह उसी श्रृंखला की कड़ी समझी जा रही है। हुस्नी मुबारक ने मिस्र के हालात के लिए अखवानुल मुसलेमीन को जिम्मेदार ठहराया है तो सत्ता के हस्तांतरण के लिए यह कट्टरपंथी संगठन जनता में किस हद तक विकल्प साबित हो सकेगा, यह कहना मुश्किल है। काहिरा के तहरीर स्क्वायर पर एकत्र होकर विरोध करने वालों में मिस्र के आम नागरिक और मध्य वर्गीय से संबंध रखने वाले भी शामिल हैं। शांतिपूर्ण ढंग से विरोध करने वाली जनता यह अच्छी तरह जानती है कि इनके देश के लिए कट्टरपंथी वर्ग एक मात्र हल नहीं है क्योंकि अखवानुल मुसलेमीन को गलत दिनों होने वाले चुनाव में 30 फीसदी वोट ही मिले थे।
कानपुर, फतेहपुर और लखनऊ से एक साथ प्रकाशित दैनिक `अनवारे कौम' ने `भय का शिकार' शीर्षक से लिखा है। मिस्र के इंकलाब की विशेष बात यह है कि वहां की इस्लाम समर्थक पार्टी `अखवानुल मुसलेमीन' बहुत तेजी से आगे बढ़ रही है। यह वह पार्टी है जिसके हजारों कार्यकर्ताओं, उलेमा और बुद्धिजीवियों को मिस्र की गैर इस्लामी सरकारों ने फांसी पर चढ़ाया और कत्ल किया। राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक के प्रतिद्वंद्वी मोहम्मद अल-बरदाई से इस पार्टी ने कहा है कि वह उनका साथ देगी इस तरह इस बात की संभावना पैदा हो गई है कि मिस्र में इस्लाम समर्थकों की सरकार कायम हो जाए। इस बदलती हुई स्थिति से इस्राइल, अमेरिका तो परेशान हैं ही फ्रांस और ब्रिटेन जैसे इस्लाम विरोधी देश भी बहुत परेशान हैं। उत्तरी अफ्रीका के देश मिस्र में इंकलाब विशेष तौर पर यूरोप के देशों को भी प्रभावित कर सकता है, क्योंकि कई दिनों से चलने वाले प्रदर्शनों ने मिस्र की अर्थव्यवस्था को गड़बड़ा दिया है। दैनिक उपभोग की वस्तुओं के दाम आसमां से बातें कर रहे हैं। इस बात का संदेह पैदा हो गया कि नहर स्वेज बन्द कर दी जाएगी यदि यह बन्द कर दी गई तो सारी दुनिया में तेल की कीमतें आसमां छूने लगेंगी क्योंकि हर दिन पचास जहाज तेल लेकर इस नहर से गुजरते हैं विशेष रूप से यूरोप में जिनता भी तेल सप्लाई होता है वह इसी तरफ से आता है। मिस्र तेल पैदा करने वाला देश नहीं है लेकिन नहर स्वेज एक ऐसी नहर है जो छह हजार किलोमीटर की दूरी को कम करती है और तेल से लदे हुए जहाजों को इसी नहर से गुजरना पड़ता है तभी वह यूरोप में दाखिल हो सकते हैं। इससे साफ स्पष्ट है कि हुस्नी मुबारक के खिलाफ बगावत से यूरोप अत्याधिक प्रभावित होगा, वाणिज्य दृष्टि से भी और वैचारिक दृष्टि से भी मिस्र का यह इंकलाब बहुत अहम है।
कोलकाता और दिल्ली से एक साथ प्रकाशित दैनिक `अखबारे मशरिक' ने `इंकलाब मिस्र को सही दिशा देने और उसकी दशा निर्धारित करने की जरूरत' के तहत लिखा है। मिस्र के राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक का समय खत्म हो गया है और समय की मांग है कि उन्हें सत्ता से अलग हो जाना चाहिए लेकिन वह शरारती बच्चों की तरह जिद पर अड़े हुए हैं। बदहवासी में उन्होंने पुलिस के सिपाहियों को वर्दी उतारकर तहरीर स्क्वायर में प्रदर्शनकारियों पर हमला करने के लिए भेज दिया। मुबारक को समझना चाहिए था कि देश में पुलिस कोई बड़ी ताकत नहीं है, असल ताकत फौज की है जो एक संगठित इकाई है। लेकिन वह उनका साथ देने के बजाय प्रदर्शनकारियों की समर्थक बन गई है। जगह-जगह पुलिस और जनता में तो झड़पें देखने में आईं लेकिन फौज और प्रदर्शनकारियों में कोई टकराव नहीं है। फौज ने स्पष्ट कर दिया है कि वह जनता पर गोलियां नहीं चलाएगी।
वास्तविक लोकतंत्र केवल चुनाव करा देने का नाम नहीं है। मजा तो जब है जब इसका फायदा आम आदमी तक पहुंचे और उसे अतीत और वर्तमान स्पष्ट फर्प महसूस हो। इस उद्देश्य के लिए पूरा लोकतांत्रिक ढांचा नए सिरे से खड़ा करना होगा। हुस्नी मुबारक से छुटकारा पाने के बाद विपक्षी नेताओं को सिर जोड़कर बैठना होगा और जनता की भावनाओं को ध्यान रखते हुए न केवल संविधान को नए सिरे से बनाना होगा बल्कि देश में लोकतांत्रिक समस्याओं का जाल बिछाना होगा।
दैनिक `राष्ट्रीय सहारा' में शकील शम्सी ने अपने स्तंभ `क्या मिस्र में लोकतंत्र ला सकेगी अखवानुल मुसलेमीन'? में लिखा है। मिस्र के नेताओं ने विभिन्न तरह की झूठी घटनाएं अखवान आंदोलन के नाम जोड़कर मिस्र की जनता को गुमराह करने की बहुत कोशिशें कीं लेकिन अखवानुल मुसलेमीन की लोकप्रियता में कमी आने के बजाय दिन प्रतिदिन बढ़ती गई और नतीजा यह हुआ कि मिस्र की जनता सड़कों पर आ गई और आज पहली बार दुनिया में यह बात कही जा रही है कि अखवान को बातचीत में शरीक किया जाना चाहिए। विचित्र संयोग है कि 12 नवम्बर 1949 को हसनुल बन्ना को शहीद किया गया और इसके तीस साल बाद 11 फरवरी को ईरान में इस्लामी क्रांति आई और वहां लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम हुई और फिर एक बार हसनुल बन्ना के शहीदी दिवस के आसपास ही एक और मुस्लिम देश में लोकतंत्र का चिराग जलने वाला है लेकिन पश्चिम के षड्यंत्र के चलते मिस्र में लोकतंत्र का फूल खिलने में विलम्ब हो रहा है। अखवानुल मुसलेमीन के नेतृत्व ने बहुत सूझबूझ का परिचय देते हुए अभी तक स्वयं को जन आंदोलन के पीछे रखा है अन्यथा पश्चिमी मीडिया अब तक इस आंदोलन को अलकायदा और तालिबान से जोड़ चुके होते।
`सहरोजा दावत' ने मुस्लिम देशों में यह नाराजगी है या इस्लामी बेदारी? के शीर्षक से लिखा है। अरब, मध्य एशिया और उत्तरी अफ्रीका के मुस्लिम देशों में जन चेतना की जो लहर देखने को मिल रही है और जिस तरह एक के बाद एक मुस्लिम देशों में सरकार विरोधी प्रदर्शन हो रहे हैं। उसे अधिकतर जीडीपी, गरीबी एवं बेरोजगारी और आर्थिक सुधारों के शीशे से देख रहे हैं। कुछ लोग मानव अधिकार और अभिव्यक्त की आजादी और परिवारवाद के संदर्भ में देख रहे हैं। पश्चिमी मीडिया भी लगभग इसी तरह की सोच रखता है और वह शुरू से इन पहलुओं को पेश कर रहा है। लेकिन विश्व में एक ऐसा वर्ग भी है जो इस जन चेतना को इस्लामी बेदारी बता रहा है। उसका कहना है कि जनता की समस्याएं और सरकार से शिकायत सही है। इससे किसी को इंकार नहीं लेकिन यदि यही सच्चाई होती तो विश्व स्तर की आर्थिक संकट के समय जब अमेरिका सहित सभी यूरोपीय एवं पश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्था पटरी से उतर गई थी। एक के बाद एक दुनिया की बड़ी से बड़ी आर्थिक संस्था दीवालिया हो गई, मध्य पूर्व के किसी भी देश अमेरिका और यूरोप जैसे हालात क्यों नहीं पैदा हुए, जो प्रदर्शन अब हो रहे हैं वह प्रदर्शन आर्थिक संकट के समय क्यों नहीं हुए। अचानक इतने बड़े स्तर पर एक साथ कई देशों में जन चेतना की यह लहर कैसे चल पड़ी?

Thursday, February 10, 2011

दारूल उलूम- साख पर आंच

किसी चिंतक ने सच ही कहा है कि इतिहास अपने आपको दोहराता है। ठीक यही मामला देवबद स्थित अंतरराष्ट्रीय शिक्षण संस्था दारुल उलूम का है। लगभग तीस साल के बाद यह दूसरा मौका है जब दारुल उलूम के मोहतमिम (कुलपति) पद को लेकर विवाद अपनी चरम सीमा पर पहुंच चुका है। अतीत में हुए इस विवाद के चलते ही दारुल उलूम का विभाजन हुआ था। दारुल उलूम की मजलिस शूरा (कार्यकारिणी) के फैसले की बुनियाद पर ही उसके मोहतमिम कारी मोहम्मद तैयब ने दारुल उलूम (वक्फ) बनाकर अपनी राह अलग पकड़ी और जमीअत उलेमा हिंद के अध्यक्ष मौलाना असद मदनी की दारुल उलूम पर पकड़ मजबूत हो गई। कहा जाता है कि ऐसा कांग्रेस की नीति के चलते हुआ क्योंकि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी मुसलमानों की एकजुटता को खत्म कर उन्हें कमजोर करना चाहती थीं। वर्तमान विवाद को इस प्ररिप्रेक्ष्य से अलग कर नहीं देखा जा सकता। फर्क केवल इतना है कि तब मजलिस शूरा ने मदनी परिवार के हक में अपना मत दिया था और अब तीस साल बाद उसने मदनी परिवार को दारुल उलूम से बेदखल कर दिया है।
दारुल उलूम के मोहतमिम मौलाना मरगूर्बुरहमान के निधन के बाद 10 जनवरी को मजलिस शूरा ने अपनी बैठक में बहुसंख्यक मतों के आधार पर मौलाना गुलाम मोहम्मद वस्तानवी को दारुल उलूम के मोहतमिम की जिम्मेदारी सौंपी थी। 21 सदस्यीय शूरा में 4 सदस्यों का निधन हो चुका है, जिनका चुनाव किया जाना बाकी है। जबकि तीन सदस्य किन्हीं कारणों से बैठक में शरीक नहीं हुए। इस तरह 14 सदस्यों में से 8 ने मौलाना वस्तानवी को मोहतमिम बनाने के पक्ष में वोट दिया। चार सदस्यों ने इनके प्रतिद्वंद्वी जमीअत उलेमा हिंद के दूसरे घडे़ के अध्यक्ष एवं दारुल उलूम के शिक्षक और मौलाना वस्तानवी के रिश्तेदार मौलाना अरशद मदनी के पक्ष में और दो सदस्यों ने दारुल उलूम के नायब मोहतमिम मौलाना अब्दुल खालिक मदरासी के पक्ष में अपना मत दिया। साफ और निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया से हताश मौलाना अरशद मदनी के एक रिश्तेदार एवं शूरा सदस्य मौलाना अब्दुल अलीम फारूकी ने यह शिगूफा छोड़ दिया कि मौलाना वस्तानवी कासमी नहीं है। इस पद पर किसी कासमी को ही आसीन करना चाहिए। बतातें चलें कि दारुल उलूम से शिक्षा प्राप्त करने वालों को कासमी कहा जाता है। ऐसा वह मौलाना मोहम्मद कासिम नानोतवी द्वारा दारुल उलूम का गठन किए जाने की याद में अपने नाम के आगे लगाकर करते हैं। कोई कासमी मोहतमिम हो, दारुल उलूम का संविधान इस बाबत मौन है। मोहतमिम के चयन का पूरा अधिकार मजलिस शूरा को दिया गया है।
मजलिस शूरा के इस फैसले की अभी स्याही सूखी भी नहीं थी कि मौलाना वस्तानवी के अतीत के कुछ कामों को लेकर विवाद खड़ा हो गया। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ को दिए साक्षात्कार में मौलाना वस्तानवी ने कहा कि गुजरात में मुसलमानों के साथ भेद-भाव नहीं किया जा रहा है। राज्य में मुसलमानों की आर्थिक स्थित अच्छी है। उन्होंने यह भी कहा कि 8 वर्ष पूर्व हुए दंगों को अब याद करने का औचित्य नहीं है। मौलाना वस्तानवी को गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थन में बयान देने की जरूरत क्यों महसूस हुई? इसे लेकर मुसलमानों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि क्या चर्चा में बने रहने के लिए दारुल उलूम का इस्तेमाल किया जा रहा है। पूर्व में मौलाना मरगूर्बुरहमान के समय इसकी शुरुआत हो चुकी थी लेकिन तब वह एक सीमित दायरे में थी। अब जिस तरह खुल कर राजनीतिक बयानबाजी हो रही है, उससे आम मुसलमानों की नाराजगी बिल्कुल स्वाभाविक है। राजनैतिक पार्टियां जिस तरह दिल्ली स्थित जामा मस्जिद को अपने हित के लिए इस्तेमाल करती हैं बिल्कुल उसी तरह दारुल उलूम का इस्तेमाल किया जा रहा है। जानकारों को इस बात पर आश्चर्य है कि मोलाना वस्तानवी गुजरात जाने के बाद दारुल उलूम की बाबत कहने के बजाए मोदी के राज्य में मुसलमान खुशहाल हैं और वह उन्नति कर आगे बढ़ रहे हैं, जैसे बयान दे रहे हैं। इससे उनकी दिलचस्पी का अनुमान लगाया जा सकता है।
बात यहीं खत्म नहीं हुई बल्कि एक उर्दू दैनिक ‘सहाफत’ ने पहले पेज पर उस फोटो को छापकर उन्हें कठघरे में खड़ा कर दिया, जिसमें महाराष्ट्र के एक मंत्री को मौलाना वस्तानवी के हाथों एक मूर्ति पेश करते दिखाया गया था। यह फोटो कोई साल भर पहले के एक कार्यक्रम का है। इस फोटो ने मौलाना वस्तानवी के खिलाफ माहौल बनाने में अहम भूमिका निभाई। दारुल उलूम के कुछ शिक्षकों ने भी इस बयान को दारुल उलूम की साख को नुकसान पहुंचाने वाला बताया। साथ ही दारुल उलूम की मजलिस शूरा से अपने फैसले पर पुनर्विचार का अनुरोध किया। तनजीम मुहिब्बान दारुल उलूम, देवबंद ने तो शूरा के फैसले पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया। तनजीम के महासचिव मौलाना अरशद रजा कासमी बिजनौरी ने शूरा से सवाल किया है कि क्या दारुल उलूम इतना बांझ हो गया है कि इससे पढ़कर निकलने वाले उलेमा में से कोई नहीं मिल सका कि उसे दूसरी संस्था के पढ़े हुए को लेना पड़ा।
पूरे मामले में नाटकीय मोड़ तब आया जब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनैतिक सलाहकार अहमद पटेल जिनका संबंध भी गुजरात से है और वे मौलाना वस्तानवी के करीबी रिश्तेदार हैं, का बयान उक्त उर्दू दैनिक में प्रकाशित हुआ। जिसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि दारुल उलूम का मोहतमिम किसी योग्य व्यक्ति को बनाया जाए। मौलाना वस्तानवी इस पद के लायक नहीं हैं। उन्होंने अपने इस बयान में मौलाना वस्तानवी के पुत्र मुफ्ती हुजैफा के दावे को भी निरस्त कर दिया, जिसमें उसने कहा था कि अहमद पटेल उसके नाना हैं और गुजरात एवं महाराष्ट्र की कांग्रेस इकाई में वह जो चाहते हैं, वही होता है। पटेल ने यह भी कहा कि जो व्यक्ति मोदी का दोस्त हो सकता है वह मेरा कैसे हो सकता है।
इसी बीच मौलाना वस्तानवी ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि टाइम्स ऑफ इंडिया का जो बयान उनसे संबंधित बताया जा रहा है, उसे तोड़ मोड़कर पेश किया गया है। मैं ऐसी कोई बात जो दारुल उलूम देवबंद और अपने बुजुर्गों की परंपरा एवं मान-सम्मान के खिलाफ है, को सोच भी नहीं सकता। मूर्ति के संबंध में उन्होंने कहा कि यह उनके दुश्मनों का षड्यंत्र है। वस्तानवी ने कहा कि गत वर्ष नवंबर में ईद मिलन समारोह के अवसर पर जिसमें हिंदू और मुस्लिम दोनों शरीक थे, उन्हें महाराष्ट्र के एक मंत्री को मोमेंटो पेश करना था। उस पर तस्वीर बनी हुई थी, वह मूर्ति नहीं थी। उन्होंने जोर देकर कहा कि तस्वीर और मूर्ति में बड़ा फर्क है। जो लोग इस तस्वीर को मूर्ति कह रहे हैं, वह गलत कह रहे हैं।
मौलाना वस्तानवी दीनी शिक्षा के साथ ही आधुनिक शिक्षा में दक्षता रखते हैं। वे गुजरात के निवासी हैं। वे गुजरात एवं महाराष्ट्र में कई कॉलेज एवं मदरसे चला रहे हैं जिनमें हजारों लड़के शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। मजलिस शूरा ने उनका चयन एक ऐसे समय में किया है जब मदरसों की विचारधारा को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस चल रही है। दूसरी ओर उनके करीबी रिश्तेदार मौलाना अरशद मदनी जो मदनी परिवार के मुखिया हैं, की कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह से मुलाकात को कांग्रेस एजेंडा को लागू करने के संदर्भ में देखा जा रहा हैं। जानकर मानते हैं कि अहमद पटेल पहले वस्तानवी के समर्थक थे। उन्होंने इसलिए पाला बदला कि वस्तानवी के दारुल उलूम में आने से मुसलमानों को कांग्रेस के करीब लाने में परेशानी होगी। इसके विपरीत मौलाना अरशद मदनी के आने से उत्तर भारत में मुसलमानों को कांग्रेस से जोड़ने में कामयाबी मिलेगी। चर्चा यह भी है कि 10 जनपथ से इसका ब्लू प्रिंट तैयार हो गया है? लेकिन ऐसा कैसे होगा? क्या मजलिस शूरा जिसने मौलाना अरशद मदनी के खिलाफ फैसला दिया था, पर राजनैतिक दबाव डाला जाएगा या फिर उसमें जो जगहें खाली हैं, उन पर ऐसे लोगों को लाने की कोशिश होगी जो इस मिशन को पूरा करने में अपना सहयोग देंगे। ऐसे ही सवालों पर सबकी निगाहें लगी हुई हैं।

बाबरी मामले को लेकर बोर्ड ने नई कमेटी बनाई

पिछले दिनो बर्मा जिसका नया नाम म्यांमार है, में लोकतंत्र की आवाज बनी सान सान सू की रिहाई समेत कांग्रेस द्वारा आरएसएस पर सांप्रदायिकता का आरोप लगाने और बाबरी मस्जिद के मुकदमें को सुप्रीम कोर्ट ले जाने का मुद्दा उर्दू समाचार पत्रों में छाया रहा।
जमीअत उलेमा हिंद (मौलाना अरशद मदनी ग्रुप) द्वारा बाबरी मस्जिद पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किए जाने को बाबरी मस्जिद काज को नुकसान हो सकता है एवं आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड को नजरंदाज कर अपील दाखिल की गई, अपील में 34 से ज्यादा गलतियों की संभावना के तहत दैनिक हमारा समाज ने लिखा है कि जमीअत उलेमा द्वारा जल्दबाजी में दाखिल की गई यह याचिका न तो मुसलमानों के हक में है और न ही बाबरी मस्जिद के हित में। मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के वकील जफरयाब जिलानी के हवाले से लिखा है कि अरशद मदनी ने बोर्ड को नजरंदाज किया है। इस जल्दबाजी के पीछे क्या सोच है यह तो आने वाला समय ही बताएगा लेकिन इतना तय है कि बाबरी मस्जिद काज को नुकसान पहुंचने का खतरा जरूर पैदा हो गया है। उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि इस याचिका में बहुत सी गलतियों को चिन्हित किया गया था। अखबार के मुताबिक फैजाबाद के वरिष्ठ अधिवक्ता अफताब अहमद सिद्दीकी को यह याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर करने से पूर्व भेजी गई थी ताकि उसकी कमियों को देखा जा सके। इसमें 34 गलतियों को चिन्हित किया गया था। यह रिपोर्ट अहम जिम्मेदारों को दी गई थी लेकिन इसे बिल्कुल नजरअंदाज कर दिया गया।
बाबरी मस्जिद मामले में आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड द्वारा नई बाबरी मस्जिद कमेटी के गठन पर दैनिक सहाफत ने लिखा है कि पिछली कमेटी की गतिविधियों से असंतुष्ट एवं इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के बाद बोर्ड ने यह नई कमेटी बनाई है। 10 सदस्यों वाली इस कमेटी में पूर्व कमेटी के संयोजक को मात्र सदस्य के तौर पर शामिल किया गया है। जबकि एक नई परम्परा की शुरुआत के चलते इस कमेटी का चेयरमैन बोर्ड सचिव अर्ब्दुरहीम कुरैशी को बनाया गया है और संयोजक बोर्ड की लीगल कमेटी के सदस्य एवं मुंबई हाई कोर्ट के वकील युसुफ हातिम मुछाला को बनाया गया है। बोर्ड ने यह फैसला लखनऊ में अपने पदाधिकारियों की तीन दिवसीय बैठक जो एक से तीन नम्बर 2010 को हुई में लिया है। पूर्व की बाबरी मस्जिद कमेटी के संयोजक डा. कासिम रसूल इलियास ने हाई कोर्ट के फैसले के बाद जिस तरह बयानबाजी शुरू की थी उस पर आल इंडिया मिल्ली काउंसिल के महासचिव
डॉ. मोहम्मद मंजूर आलम ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त कर संयोजक बाबरी कमेटी से कहा था कि वह मौन रहें क्योंकि उनके बयान से कनफियूजन पैदा हो रहा है।
सारा की शादी, टीआरपी के खेल में इस्लाम का मजाक के शीर्षक से साप्ताहिक नई दुनिया ने लिखा है कि निकाह के नाम पर जो बेहुदगी फैलाई गई और सारा को हर किसी से गले मिलते दिखाया गया, वह केवल इस्लामी सिद्धांतों के ही नहीं, भारतीय संस्कृति और नैतकिता के मुंह पर भी जोरदार तमाचा है। बिग बास से पहले किसी भी चैनल ने कम से कम इस तरह का गंदा मजाक नहीं किया था और निकाह व अन्य इस्लामी परम्पराओं को टीआरपी की भेंट नहीं चढ़ाया। कैमरे के सामने शादी करने के लिए दोनों ने 50 लाख रुपए लिए हैं। सुहाग रात की फिल्म बंदी के लिए भी दोनों ने मोटी रकम वसूल की है। टीआरपी के इस खेल के बाद यह बहस छिड़ी हुई है कि क्या एक शादी के बाद दूसरी शादी करना इस्लाम के अनुसार सही है या नहीं।
आरएसएस की तिलमिलाहट के शीर्षक से आलमी सहारा ने लिखा है कि आतंकवादी घटनाओं में आरएसएस के लिप्त होने की बात सामने आने और कांग्रेस की आलोचना के बाद इसके नेताओं की बेचैनी स्वभाविक है। अपनी तिलमिलाहट का इजहार वह जगह जगह रैली और प्रदर्शनों द्वारा कर रहा है। इंदौर में पांच किलोमीटर लंबी रैली इसी का हिस्सा है। इंदौर रैली में आरएसएस ने इस बात की भी व्यवस्था की कि स्वयंसेवकों का स्वागत मुसलमान भी करें और सिख भी, इसके लिए कुछ बुर्के पहनी महिलाएं और दाढ़ी टोपी वाले बोहरा मुसलमान भी स्वागत समारोह में नजर आ रहे थे। दरअसल आरएसएस इन दिनों भारत के विभिन्न समूहों का नैतिक समर्थन हासिल चाहता है क्योंकि वह अपने ऊपर लगे आतंकवाद के आरोप को धोने के लिए ऐसा करना जरूरी समझता है। गत दिनों जंतर मंतर पर एक प्रदर्शन की व्यवस्था कुछ मुसलमानों की ओर से किया गया था जिसका मकसद इंद्रेश कुमार का अजमेर बम धमाकों में नाम आने के खिलाफ विरोध करना था। आरएसएस ने मुसलमानों को करीब करने और मुस्लिम चेहरों को सामने लाने के लिए राष्ट्रीय मुस्लिम संगठन कायम कर रखा है जिनका इस्तेमाल ऐसे मौकों पर किया जाता है। आरएसएस जिस बेचैनी के दौर से गुजर रहा है इसका एहसास करते हुए संघ नेताओं को समझना चाहिए कि भारत में आतंकवाद के नाम पर मुस्लिम युवाओं पर अत्याचार का जो सिलसिला एक लंबे समय से जारी है क्या इसके खिलाफ उसने कभी विरोध प्रदर्शन किया।
बर्मा में स्वतंत्रता सेनानी सान सू की रिहाई के शीर्षक से दैनिक अखबार मशरिक ने लिखा है कि फौजी सरकार के विरुद्ध बगावत का बिगुल बजाने वाली सान सू को आखिरकार रिहा कर दिया गया उन्हें गत सात वर्षों से अपने घर में कैद कर रखा था। उनकी रिहाई पर पूरे देश में उत्साह का माहौल देखा जा रहा है। अखबार के अनुसार बर्मा की जमीन सोना उगलती थी। जमीन उपजाऊ है और अत्याधिक प्राकृतिक संसाधन हैं। किसी समय में बर्मा विश्व का सबसे बड़ा चावल निर्यात करने वाला देश होता था लेकिन अब नहीं। वर्तमान बर्मा दुनिया के गरीब देशों की श्रेणी में आ गया है। भ्रष्टाचार के चलते इसकी मिसाल सोमालिया से दी जाती है। उसकी यह स्थित वास्तव में फौजी शासन का नतीजा है जो उस पर 1962 से काबिज है।
फौजी शासन ने लोकतंत्र के सभी रास्ते बंद कर दिए गए थे यहां तक कि पिछले दिनों हुए चुनाव में सान सू को भी वोट नहीं डालने दिया गया। फौजी शासन ने दावा किया है कि इस चुनाव में बहुत सी राजनैतिक पार्टियों ने भाग लिया है लेकिन यह चोर दरवाजे से फौजी टोले की सरकार है। फौजी शासकों ने केवल अपनी वर्दियां उतार दी हैं और शहरी लिबास पहन लिया है। इस आम चुनाव में फौज की सरपरस्ती में यूनियन सालिडेटरी एवं डेवलपमेंट पार्टी ने इसलिए कामयाबी हासिल की है क्योंकि सान सू की नेशनल लीग फार डेमोकेसी को इस हाल में कि उसकी प्रिय नेता कैद में थी, चुनाव का बायकाट करने पर मजबूर होना पड़ा। 1990 के आम चुनाव में सान सू की पार्टी को 80 फीसदी वोट मिले थे जिसे फौजी शासकों ने निरस्त कर दिया था। लोकतंत्र की लहर में फौजी टोला जिस लिबास में हो ज्यादा देर तक नहीं रह सकता और बर्मा में लोकतंत्र एवं सान सू की जीत होकर रहेगी।

Wednesday, February 9, 2011

मोदी को क्लीन चिट से इंसाफ की आशा धूमिल

गुजरात एसआईटी द्वारा गुजरात मुख्यमंत्री को क्लीन चिट दिए जाने, Šजी स्पेक्ट्रम घोटाले पर संसद में गतिरोध, फ्रांस राष्ट्रपति की भारत यात्रा, सुप्रीम कोर्ट द्वारा इलाहाबाद हाई कोर्ट के बारे में व्यक्त की गई टिप्पणी, भारत-पाक संबंध, नीति का निर्धारण जैसे अन्य मुद्दों सहित विकिलीक्स के गोपनीय दस्तावेजों को उजागर करने एवं बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार की जीत पर समीक्षा का सिलसिला जारी है। `हमारा समाज' ने गुजरात मुख्यमंत्री को क्लीन चिट दिए जाने पर चर्चा करते हुए लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में काम कर रही एसआईटी ने गुजरात मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को 2002 की गोधरा घटना के बाद हुए दंगों में जिस तरह क्लीन चिट दी है उससे इंसाफपसंद लोगों को बड़ा धक्का लगा है। नरेन्द्र मोदी के आदेश पर दंगों के दौरान हजारों मुसलमानों का कत्ल हुआ, इससे पूरी दुनिया परिचित है। इसके बावजूद एसआईटी ने उन्हें क्लीन चिट देकर उन लाखों शांतिप्रिय लोगों के मुंह पर ताला लगा दिया जो गोधरा घटना के बाद हुए मुसलमानों के नरसंहार का दोषी नरेन्द्र मोदी को करार देते हैं। यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने जिसे `मौत का सौदागर' कहा, ऐसे व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट की अगुवाई में काम कर रही एसआईटी ने क्लीन चिट दी है। जिस पर कई तरह के सवालात खड़े हो रहे हैं। गुजरात के पूर्व डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस आरबी श्री कुमार के आरोप से इसकी शुरुआत हो चुकी है कि गुजरात दंगों की तफ्तीश कर रही विशेष टीम (एसआईटी) वास्तव में गुजरात पुलिस की बी टीम के तौर पर काम कर रही है। अखबार लिखता है कि मोदी को क्लीन चिट मिलने के बाद अब यह आशा भी धूमिल हो गई कि गुजरात दंगों के निर्दोषों को इंसाफ मिल सकेगा।
Šजी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच जेपीसी से कराने की मांग पर जिस तरह संसद में गतिरोध है उसको लेकर पक्ष, विपक्ष एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। दैनिक मुनसिफ लिखता है कि इस दौरान जनता की समस्याओं और संसद के दैनिक खर्चा की हो रही तबाही का किसी को भी ख्याल तक नहीं है और इस भारी रकम का भरपायी भी जनता से की जाएगी। यह तो किसी शिक्षित देश के जनप्रतिनिधियों का व्यवहार नहीं हो सकता। देश की परम्परा ही निराली है जो नेता जितना बड़ा घोटाला करता वह उतना ही सीना ठोंक कर चलता है। सभी तरह के कानूनी प्रतिबंध और सजा केवल चोर-उच्चकों के लिए रह गई हैं जो कि संविधान की मर्यादा के खिलाफ ही नहीं बल्कि संविधान का उल्लंघन है। `अखबारें मशरिक' ने फ्रांस राष्ट्रपति के भारत आगमन पर लिखा है कि फ्रांस के राष्ट्रपति सर्कोजी ने वादा किया है कि फ्रांस भारत के संयुक्त राष्ट्र की स्थायी सदस्य की उम्मीदवारी का हर तरह से समर्थन करेगा। जहां तक संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का सवाल है तो परिषद के पांच में से चार सदस्य अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और रूस ने पहले ही भारत की सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का समर्थन कर रखा है केवल चीन को इस मामले में संकोच है जो भारत को अपना प्रतिद्वंद्वी समझता है। बहरहाल जब संयुक्त राष्ट्र के ढांचे में सुधार का एजेंडा आगे बढ़ाया जाएगा और यह चारों देश भारत के समर्थन में उठ खड़े होंगे तो चीन का विरोध निप्रभावी हो जाएगा। ओबामा की तरह सर्कोजी ने भी भारत का समर्थन कर इस काज को आगे बढ़ाया है। भविष्य में हमें अच्छी उम्मीद रखनी चाहिए।
विकिलीक्स द्वारा गोपनीय दस्तावेजों को उजागर करने की समीक्षा करते हुए `सह रोजा दावत' ने लिखा है कि इन रहस्योद्घाटन को एक सप्ताह हो गया लेकिन अभी तक किसी भी मुस्लिम देश अथवा शासक की ओर से दूसरे देश अथवा शासक के खालफ ऐसी कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है जिससे कहा जा सके कि विकिलीक्स का तार निशाने पर लग गया और इसने संबंध खराब करने का अपना काम कर दिया। जैसा कि सभी ने देखा कि अमेरिका ने पहले इराक पर ईरान को आपस में लड़ाकर उन्हें कमजोर किया, फिर इराक द्वारा कुवैत पर हमला कर खुद ही इस पर धावा बोल दिया और देखते ही देखते सभी खाड़ी देशों को अपनी चपेट में कर लिया। यही खेल उसने अफगानिस्तान और पाकिस्तान में खेला और अब ईरान एवं शान और पर्दों के पीछे इंडोनेशिया एवं मलेशिया को भी अपने निशाने पर रख लिया। इसलिए विकिलीक्स के रहस्योद्घाटन की यह कहकर अनदेखी नहीं की जा सकती कि इसमें सभी अहम देशों विशेषकर अमेरिका को निशाना बनाया गया है बल्कि यह मुस्लिम देशों और शासकों के खिलाफ योजनाबद्ध षड्यंत्र है और इस रहस्योद्घाटन में अन्य देशों को इसलिए शामिल किया गया है ताकि मुस्लिम देश भ्रम में रहें। इसलिए सचेत रहने की जरूरत अमेरिका एवं पश्चिमी देशों को नहीं है बल्कि मुस्लिम देशों को है जिनके खिलाफ नए खेल के लिए भरपूर सामान उपलब्ध करा दिया गया है। बनारस के बम धमाकों पर `हिन्दुस्तान एक्सप्रेस' ने लिखा है कि हमें यह मानने में कोई संकोच नहीं है कि इन धमाकों के पीछे वही तत्व हैं जो पहले भी देश में इस प्रकार के बम धमाके करा के सांप्रदायिक हिंसा की आग भड़काने का खेल खेलते आए हैं। यह एक अटल सच्चाई है कि हर बम धमाके के बाद इंडियन मुजाहिद्दीन अथवा लश्कर-ए-तोयबा और सिमी का नाम लिया गया लेकिन बाद में इनमें से कुछ के पीछे अभिनव भारत और आरएसएस अथवा इसी की शाखाओं के कार्यकर्ताओं का हाथ निकला, हैदराबाद से अजमेर और मालेगांव से सूरत तक इनके खिलाफ बेशुमार सुबूत हैं जिनका खंडन नहीं किया जा सकता। यह सोच कर एक ओर से आंखें फेर लेना कि किसी मंदिर अथवा घाट पर बम धमाके होते हैं तो यह मुजाहिद्दीन की कार्यवाही होगी या किसी मस्जिद एवं गुरुद्वारा में आतंकवाद के लिए एक विशेष समुदाय के लोग ही जिम्मेदार हो सकते हैं, किसी तरह सही नहीं है। 2006 में बनारस के संकट मोचन मंदिर और कैंट रेलवे स्टेशन पर होने वाले बम धमाकों का सुराग आज तक नहीं मिल सका। यह सोच बेबुनियाद नहीं है कि एक बार फिर इंडियन मुजाहिद्दीन की आड़ में विशेष समुदाय के लोगों की शामत आएगी, पुलिस और खुफिया एजेंसियों का कहर इन बेगुनाहों पर टूटेगा और ऊपरी तौर पर देखने से बम धमाकों को अंजाम देने वालों का मकसद भी यही है। सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ द्वारा इलाहाबाद हाई कोर्ट पर की गई टिप्पणी पर `सहरोजा दावत' ने लिखा है कि इससे लॉ कमीशन की रिपोर्ट प्रमाणित हो गई जिसमें कहा गया है कि बेलाग इंसाफ को लोग तरसते जा रहे हैं और वह उनसे दूर होता जा रहा है। कमीशन ने अपनी 230वीं रिपोर्ट में अदालतों की गतिविधियों की समीक्षा कर वर्तमान स्थिति को उजागर करने के लिए एक विशेष शब्दावली का इस्तेमाल किया है। इसमें एक विशेष शब्दावली अंकल जज की है। कमीशन का भी यही कहना है कि यह अंकल जज दो ही काम जानते हैं या तो अपने करीबी रिश्तेदारों को फायदा पहुंचाना चाहते हैं या अपने विरोधियों को सबक सिखाना जानते हैं। निश्चय ही दोनों स्थिति में पद का गलत इस्तेमाल हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर नोटिस लिया है तो कोई गलत नहीं किया है।

Tuesday, February 8, 2011

मुसलमान विकास और सत्ता में साझेदारी के एजेंडे पर

यूनाइटेड लेबरेशन फ्रंट (उल्फा) के चेयरमैन राजखोवा को जमानत पर रिहा कर उत्तर पूर्व भाग में चल रहे आतंकवाद को खत्म करने की ओर एक अहम प्रयास किया है और इससे क्षेत्र में उम्मीद की आशा दिखाई पड़ती है।
अंग्रेजों ने यहां चाय बागान में चीनी मजदूरों को हटाकर मध्य भारत के मैदानी क्षेत्र से मजदूर लाना शुरू किया जिससे यहां की जनसंख्या का संतुलन बिगड़ गया और स्थानीय लोगों में बेचैनी पैदा होने लगी। उन्नीसवीं सदी के आखिर में भुखमरी और सूखे के कारण बहुत से लोगों की जानें गईं और यहां के क्षेत्र में स्थानीय आबादी कम हो गई जिसको मुहाजिर मजदूरों द्वारा पूरा किया गया। शुरू में अंग्रेजों ने असम को बंगला प्रेसीडेंसी का हिस्सा बनाकर रखा। बाद में यह भारत सरकार का एक राज्य हो गया। अंग्रेजों के जाने के बाद यहां कई साल तक शांति रही लेकिन स्थानीय आबादी और असमी नागरिकों के बीच घृणा जोर पकड़ती गई और असमी नागरिकों को यह लगता रहा कि देश के अन्य भागों विशेषकर बांगल से आए हुए लोगों ने इनको आर्थिक कंगाली पर पहुंचा दिया है। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बीच पूर्वी पाकिस्तान में चल रहे बंगलादेश आंदोलन के कराण लाखों बंगाली अपना देश छोड़कर यहां पनाह लेने पर विवश हुए उनको बहाना बनाकर यहां के स्थानीय नागरिकों ने यह कहना शुरू कर दिया कि बंगलादेश बन जाने के बावजूद लाखों मुहाजिर असम से वापस नहीं गए हैं जिसके कारण यहां की जनसंख्या का संतुलन बिगड़ गया है। असम के स्थानीय नागरिकों ने असम में बसने वाले सभी बंगालियों को विदेशी कहकर बाहर निकालने की मांग शुरू कर दी और कुछ ही वर्षों बाद यह घृणित आंदोलन सांप्रदायिक रुख अख्तियार कर गया क्योंकि ज्यादातर बंगाली बोलने वाले नागरिक मुसलमान थे। 1979 में पहले ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन और बाद में असम गण परिषद नामी संगठनों ने काफी हिंसात्मक आंदोलन चलाए। राज खोवा ने अपनी रिहाई के बाद कहा कि जब तक इनके सभी साथी रिहा नहीं हो जाते तब तक बातचीत शुरू नहीं हो सकती। भारत सरकार के नरम रुख को देखते हुए ऐसा लगने लगा है कि जल्द ही अन्या नेता भी रिहा हो जाएंगे और असम समस्या का कोई राजनीतिक हल निकलेगा। उल्फा की ओर से बातचीत की मेज पर आने के बाद देशवासी कश्मीरी चरमपंथियों से भी यही आशा करते हैं कि वह बन्दूक छोड़कर बातचीत की मेज पर आने के सिलसिले में पहल करेंगे ताकि साउथ एशिया के इस अहम क्षेत्र में पूर्ण रूप से शांति व्यवस्था स्थापित हो सके। दैनिक `अखबारे मशरिक' ने `श्रीकृष्णा कमेटी की रिपोर्ट की रोशनी में आंध्र प्रदेश में राजनैतिक संकट' में लिखा है कि पृथक तेलंगाना राज्य की स्थापना के सवाल पर इस समय आंध्र प्रदेश में जबरदस्त राजनैतिक भूचाल मचा हुआ है और सरकार अन्दर से डरी हुई है कि यह मामला हाथ से बेहाथ न हो जाए। 1953 में जब जस्टिस फजल अली की अगुवाई में राज्यों के पुनर्गठन का आयोग बनाया गया तो उस समय भी तेलंगाना का मसला खड़ा हुआ था। उस समय राज्य के एक वर्ग ने संयुक्त आंध्र प्रदेश के हक में राय दी थी जिस पर प्रजा राज्यम, सीपीआईएम और मज्लिस इत्तेहादुल मुसलमान आज भी कायम हैं। इसी के साथ पृथक तेलंगाना राज्य की मांग भी उठी थी।
इतना तो तय है कि श्रीकृष्णा रिपोर्ट पर विभिन्न पार्टियों की ओर से भिन्न और एक दूसरे के विपरीत प्रतिक्रिया सामने आएंगी। ऐसे में कोई स्पष्ट फैसला करना केंद्र के लिए एक टेढ़ी खीर साबित होगा। यदि सरकार पृथक तेलंगाना की मांग मान लेती है तो कांग्रेस निश्चित रूप से दो भागों में विभाजित हो जाएगी और विद्रोही कांग्रेसी में जगन रेड्डी की स्थिति मजबूत हो जाएगी। पृथक तेलंगाना राज्य के हक में फैसला देश के विभिन्न भागों में छोटे राज्यों की मांग को समर्थन मिलेगा। कांग्रेस एक तूफानी संकट से गुजर रही है। देखना है कि वह इस संकट से कैसे उबरती है। `इंसाफ की डगर' मैं दैनिक `हमारा समाज' ने लिखा है कि 18 वर्ष बाद मुंबई दंगों के 10 मुस्लिम युवक बरी हो चुके हैं लेकिन यह अपने पीछे कई ऐसे सवाल छोड़ गई है जिनका हर दिमाग में आना स्वाभाविक है। सबसे आश्चर्यजनक पहलू यह है कि 18 वर्ष बाद ऐसे मुकदमे का फैसला आया है जो प्रथमदृष्टि में पुलिस पक्षपात को जाहिर कर रहा था। इसलिए कि गवाह कोई और नहीं बल्कि कुरला पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर शिंदे और इनके सहायक थे। दोनों के बयानात में विरोधाभास पाया जा रहा था और सुबूत के तौर पर ऐसी चीजें पेश की गईं जो बाजार में आसानी से उपलब्ध हैं। मतलब यह है कि पुलिस की फर्जी कहानी पहले दिन से उजागर थी फिर भी इतने लम्बे समय के बाद फैसला क्यों आया, आश्चर्यजनक है। 18 वर्ष में एक बच्चा जवान, जवान बूढ़ा और बूढ़ा मौत की दहलीज पर पहुंच जाता है। बहरहाल 18 वर्ष बाद ही सही मुस्लिम युवाओं की बेगुनाही साबित हो गई, पुलिस की भेदभाव वाली भूमिका और मुस्लिम दुश्मनी उजागर हो गई। इस मुकदमे में यह तीन पहलू विचारणीय हैं। हैदराबाद से प्रकाशित दैनिक `मुनसिफ' ने `पुलिस प्रशासन में सुधार' में लिखा है। कनाडा में उच्च पद पर भारतीय मूल के टोरंटो पुलिस बोर्ड चेयरमैन आलोक मुखर्जी ने अपने एक साक्षात्कार में कहा है कि भारतीय पुलिस प्रशासन में तेजी के साथ सुधार स्वयं भारत के हित में है। उन्होंने भारतीय पुलिस शासन को उपनिवेशवाद (अंग्रेजों) शासकों का बरसा करार देते हुए कहा कि उपनिवेशवाद शासन जनता को अपना दुश्मन समझते थे। इसलिए पुलिस फोर्स को उनके खिलाफ इस्तेमाल किया जाता था। उन्होंने कहा कि भारतीय पुलिस राजनेताओं के अधीन है और इस तरह की पुलिस कार्यवाहियों पर रोक लगा देनी चाहिए। उन्होंने भारतीय पुलिस अधिकारियों को अच्छा व्यवहार न करने और कांस्टेबल की कम पगार को पुलिस विभाग में घूस का कारण बताया। भारतीय पुलिस व्यवस्था में सुधार निश्चय ही देश एवं कौम के हित में होगा। यदि पुलिस फोर्स को राजनैतिक शासकों के प्रभाव से आजाद कर दिया जाता है तो देश में 60 साल से अधिक समय से जारी भ्रष्टाचारी पर रोक संभव है। क्योंकि भ्रष्टाचार में लिप्त राजनेता/शासकों को अपने खिलाफ पुलिस कार्यवाही का डर पैदा हो जाएगा, यही वह मोड़ है जहां से भ्रष्टाचार के खात्मे के शुरुआत होगी। दैनिक `हिन्दुस्तान एक्सप्रेस' ने `मुस्लिम वोट की जंग' के शीर्षक से लिखा है कि बिहार के बाद अब उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोट की जंग छिड़ गई है। विधानसभा चुनाव के दिन जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं यह जंग तेज होती जा रही है। सवाल यह नहीं कि यह जंग किस-किस रूप में सामने आ रही है और चुनाव का समय करीब आने पर क्या गुल खिलाएगी? सवाल यह भी है कि इस जंग में खुद मुसलमान कहां खड़े हैं और क्या वह सिर्प मैदान जंग या इस्तेमाल ही होते रहेंगे? मुस्लिम नेताओं व कार्यकर्ताओं की भूमिका केवल शतरंज के मोहरों और बादशाह के सिपाहियों की ही रहेगी या फिर वह सियासी पार्टियों की इस जंग से कोई फायदा भी उठाएंगे? इनकी अपनी आवाज भी जगह हासिल कर सकेगी और इनका नेतृत्व भी अपनी भूमिका निभा सकेगी? राज्य में हर वर्ग और हर जाति की सियासत और उसका रुख स्पष्ट है। यादव मुलायम के साथ हैं।
ब्राह्मण राजपूत, भाजपा और कांग्रेस में विभाजित हैं। बनिये, कायस्थ, भूमिहार और अन्य जातियां भाजपा के साथ हैं, जाट अजीत सिंह के साथ हैं। हिन्दुओं की अन्य जातियों की भी अपनी पार्टी है। ले-दे कर केवल मुसलमान मुफ्त माल हैं। इसलिए उन पर हर तरफ से जाल डाला जा रहा है लेकिन मुसलमान है कि हल्के फुल्के दाने या फिर भावुक नारों में आ जाते हैं। जब तक वह अपने आपको नहीं बदलते, वह खुद ठोस समस्याओं और विकास एवं सत्ता में साझेदारी के एजेंडे पर नहीं आते, मुस्लिम वोट की जंग सकारात्मक रुख अख्तियार नहीं कर सकती।

Monday, February 7, 2011

करकरे की हत्या, सच्चाई सामने आनी चाहिए

कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह द्वारा हेमंत करकरे से मौत से पूर्व बात करने सहित अमेरिकी दबाव में संधि एवं चीनी प्रधानमंत्री की भारत यात्रा, आशाएं और जैसे अनेक मुद्दों को उर्दू अखबारों ने चर्चा का विषय बनाया है।

दैनिक `हिन्दुस्तान एक्सप्रेस' ने `दिग्विजय सिंह की कथनी और खंडन' के तहत लिखा है कि जिस तरह यह चर्चा का विषय बना हुआ है वह बहुत अफसोसजनक है। उन्होंने चंद दिन पूर्व नई दिल्ली के इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में एक सम्मेलन में भाषण देते हुए यह रहस्योद्घाटन किया था कि हेमंत करकरे ने अपने कत्ल से सिर्प दो घंटे पूर्व फोन पर उनसे बात की थी और बताया था कि वह बेहद परेशान हैं और गंभीर परिणाम भुगतने की धमकियां दी जा रही हैं। उन्होंने कहा था कि षड्यंत्र करना और झूठे प्रचार करना आरएसएस के लोगों की पुरानी आदत है। यह किताब के लोकार्पण पर आयोजित गोष्ठी थी और जिस किताब का उन्होंने विमोचन किया उसका नाम है। `आरएसएस की साजिश 26/11?' उनका यह बयान अगले दिन केवल उर्दू समाचार पत्रों में स्थान पा सका था लेकिन उसके चार दिन बाद जब एक अंग्रेजी दैनिक ने इनके इस बयान को पहली खबर बना दी तो हंगामा हो गया और अब कांग्रेस यह कह कर अपना दामन बचा रही है कि यह उनका व्यक्तिगत बयान है इससे जार्टी का कुछ लेना-देना नहीं है। वहीं स्वयं दिग्विजय सिंह सफाई दे रहे हैं कि मैंने यह कब कहा कि करकरे के कत्ल में उन ताकतों का हाथ है जो मालेगांव बम धमाके की तहकीकात से परेशान थे। मैंने तो केवल यह कहा है कि करकरे से इस दिन मेरी बात हुई थी और वह बहुत परेशान थे। वह अब इससे भी इंकार कर रहे हैं कि करकरे ने उनको फोन किया था। कह रहे हैं कि मैंने करकरे को फोन किया था। सवाल यह है कि जब अपनी बातचीत के बारे में इतने दिनों तक मौन रहे, कभी जरूरत नहीं समझी कि इसका रहस्योद्घाटन करें तो फिर इतने सनसनी अंदाज में आज इसका जिक्र करने की जरूरत क्यों पेश आ गई? वह अब कह रहे हैं कि न ही इस वारदात समझा जाए? क्या है जो 6 दिसम्बर के दिन इस कार्यक्रम में भारी संख्या में मौजूद थे।

`हेमंत करकरे की मौत' पर दैनिक `सियासत' ने अपने संपादकीय में लिखा है कि मुंबई हमलों के समय करकरे की मौत से ही कई सवाल उठने लगे थे। यह सवाल किया जा रहा था कि इतने गंभीर आतंकवादी हमलों के स्थान पर करकरे और उनके साथी किसी सूचना के बिना अचानक क्यों पहुंच गए? उनकी जैकेट भी लापता हो गई थी। यह वह सवालात थे जो उस समय उठे थे लेकिन तब उनको जुबान नहीं मिल सकी। अब कांग्रेस के एक जिम्मेदार महासचिव दिग्विजय सिंह ने स्वयं यह संदेह व्यक्त किया है कि हिन्दू आतंकवादी संगठन करकरे की मौत के जिम्मेदार हो सकते हैं क्योंकि इन संगठनों से खतरे की बात स्वयं करकरे ने बताई थी। दिग्विजय सिंह के रहस्योद्घाटन इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इस समय दुनिया भर में तहलका मचाने वाले वीकीलेक्स के रहस्योद्घाटन से यह सच्चाई सामने आई है कि कांग्रेस पार्टी ने मुंबई में हुए आतंकवाद हमलों के बाद धार्मिक राजनीति की है। जबकि दिग्विजय सिंह की तरह वीकीलेक्स दस्तावेजों में किए गए रहस्योद्घाटन को भी बेबुनियाद करार देते हुए उन्हें नजर अंदाज किया जा रहा है। इसलिए जरूरत इस बात की है कि इस पूरे घटना की सच्चाई को सारी हिन्दुस्तानी कौम के सामने लाया जाए। सच्चाई को सामने लाने के लिए केंद्र और महाराष्ट्र दोनों ही सरकारों को इन आरोपों की छानबीन का आदेश देना चाहिए।

दैनिक `उर्दू टाइम्स' ने `हेमंत करकरे पर राजनीति अफसोसनाक' में लिखा है कि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि करकरे ऐसे ईमानदार अधिकारी साबित हुए हैं जिन्होंने बम धमाके के आरोपियों को बेनकाब किया और पहली बार हिन्दू आतंकवादियों को मालेगांव बम धमाके में लिप्त होने के आरोप में गिरफ्तार किया था जिसके कारण भगवा संगठन हेमंत करकरे की मुखालिफ हो गई। यदि हेमंत करकरे के दिमाग में हिन्दू-मुस्लिम की भावना होती तो यह संभव नहीं था। वह एक सेकुलर और मजबूत इरादों के मालिक थे। उन्होंने कभी हिन्दू बनकर काम नहीं किया बल्कि एक सच्चे और ईमानदार अधिकारी के तौर पर काम किया और इसी में है वह सही नहीं है। नेताओं को इस तरह की बयानबाजी से करना चाहिए ताकि आम आदमी के शरीर पर लगे जख्म ठीक हो सकें।

`अमेरिका के दबाव में संधि' के तहत दैनिक `सहाफत' ने लिखा है कि मीडिया विशेषकर अंग्रेजी मीडिया को जब यह पता चलता है कि कोई काम अमेरिकी दबाव में आकर किया गया है तो उसकी तेजी खत्म हो जाती है, तेवर नरम पड़ जाते हैं और हाथ-पांव ठंडे पड़ जाते हैं। यही कारण है कि तुर्पमानिस्तान से गैस पाइप लाइन पर कोई चर्चा तो दूर उसे कोई महत्व भी देने की जरूरत नहीं समझी गई। यदि यही संधि ईरान से हुई होती तो चारों तरफ चेतावनी और खतरे वाले भोंपू बजने लगते। अब एक और खबर आई है जो इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसका प्रभाव छोटे-छोटे उद्योगों पर भी पड़ सकता है। भारत में बहुत से ऐसे छोटे-छोटे उद्योग हैं जिनमें कोयले का इस्तेमाल किया जाता है और कोयले के इस्तेमाल की वजह से बड़ी संख्या में कार्बन डाई आक्साइड निकलती है। इसी आधार पर भारत इस संधि पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर रहा था। पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश इसी आश्वासन के साथ कानकुन गए थे लेकिन वहां पहुंचकर उन्होंने भाषण के बीच अपना लहजा बदल दिया जिससे अंदाजा हुआ कि उन्होंने अमेरिकी दबाव कुबूल कर लिया है। राष्ट्रपति बराक ओबामा शुरू से कह रहे थे कि भारत को इस संधि पर हस्ताक्षर करना ही होगा। जयराम रमेश के बदले लहजे पर यहां के राजनैतिक हलकों और मीडिया में काफी हंगामा हुआ, लेकिन अब वही समाचार पत्र जो कल तक ऐसी किसी संधि के खिलाफ थे, अब अपने संपादकीय धारा हमें यह समझा रहे हैं कि स्वास्थ्य और पर्यावरण आर्थिक उन्नति से ज्यादा अहम है।

इसलिए यदि यह संधि हो जाती है तो हमें इस संधि का विरोध नहीं करना चाहिए। इसमें कोई दो राय नहीं कि पर्यावरण की बेहतरी हम सबके हित में है लेकिन इसके लिए जरूरी है कि कोयले की मदद से चलने वाले उद्योगों को विकल्प दिया जाए, अन्यथा यह उद्योग दम तोड़ देंगे। शायद यही कारण है कि स्टाक एक्सचेंज के विशेषज्ञ सुझाव देने लगे हैं कि छोटे उद्योगों के शयेर न खरीदे जाएं।

`राष्ट्रीय सहारा' ने चीनी प्रधानमंत्री की भारत यात्रा ः आशा एवं संभावनाएं में लिखा है कि भारत-चीन संबंधों के लिए कभी गर्म और कभी नरम की शब्दावली का इस्तेमाल किया जाए तो गलत न होगा। चीनी प्रधानमंत्री 400 व्यापारियों का एक बड़ा प्रतिनिधि मंडल अपने साथ लेकर आ रहे हैं और वह भारत-चीन कंपनियों के बीच बिजली से लेकर दवाओं के विभिन्न क्षेत्रों में 20 अरब डालर के 45 से अधिक व्यापारिक समझौते के इच्छुक हैं। दोनों देशों के नेतृत्व को जनता के संपर्प को बढ़ावा देना चाहिए और सीमा विवाद के स्वीकार हल तलाश करने में गंभीरतापूरक कोशिश करनी चाहिए।

`जेपीसी और आरएसएस का आतंकवाद सिक्के के दो रुख'

बीते सप्ताह जहां 2जी स्पेक्ट्रम और महंगाई का मुद्दा छाया रहा वहां अजमेर बम धमाके के आरोपी स्वामी असीमानंद का इकबालिया बयान सभी मुद्दों पर हावी पड़ गया और इकबालिया बयान के विभिन्न पहलुओं की समीक्षा का सिलसिला शुरू हो गया है। पेश है इस बाबत उर्दू अखबारों की राय।

हैदराबाद से प्रकाशित दैनिक `एतमाद' ने `जेपीसी और आरएसएस का आतंकवाद एक सिक्के के दो रुख' के शीर्षक से लिखा है। आरएसएस का आतंकवाद जैसे-जैसे बेनकाब होने लगा है और आतंकवाद में लिप्त इसके नेता गण इकबाले जुर्म करने लगे हैं। 2जी स्पेक्ट्रम की ज्वाइंट पार्लियामेंटरी कमेटी (जेपीसी) द्वारा कराने की जांच के लिए भाजपा की मांग जोर पकड़ती जा रही है। महसूस यह होता है कि आरएसएस का आतंकवाद और जेपीसी के लिए भाजपा की मांग में कोई आपसी संबंध है। आरएसएस नेताओं को जो आतंकवाद में लिप्त हैं। भाजपा कानून के शिकंजे से छुटकारा दिलाना चाहती हैं ताकि `हिन्दू राष्ट्रभक्त' आरएसएस का शरीर जो खून से भरा है है उसे दूध से नहलाया जा सके। गोहाटी में भाजपा कार्यकारिणी में पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने जिस भाषा का प्रयोग किया है वह यह जाहिर करता है कि आरएसएस को आतंकवाद के आरोप से मुक्ति दिलाने के लिए भाजपा सरकार से सौदेबाजी करना चाहती है। असम में गडकरी ने मक्का मस्जिद और समझौता एक्सप्रेस धमाकों के बारे में असीमानंद के रहस्योद्घाटन को सोनिया और राहुल गांधी के संरक्षण में एक षड्यंत्र करार दिया और कहा कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले से ध्यान हटाने के लिए हिन्दू आतंकवाद का हव्वा खड़ा किया जा रहा है और जो भी हो रहा है, वह सोनिया और राहुल गांधी का षड्यंत्र है।

`हिन्दू आतंकवाद का नेटवर्प' के तहत दैनिक `सियासत' ने लिखा है। भारत में हिन्दू आतंकवाद के विषय पर संघ परिवार ने खुद को पाक साफ और राष्ट्रीय होने का दावा किया था। संघ परिवार के सभी छोटे-बड़े कार्यकर्ता भारत को अपनी जागीर समझते हुए अन्य नागरिकों विशेषकर अल्पसंख्यकों को निशाना बनाते हुए अपना दबदबा कायम करने की कोशिश की। सरकार की आंख में धूल झोंक कर आतंकवादी हमलों का आरोप अल्पसंख्यकों के सिर थोपने में सफल हुआ। इस घटना से कई मुस्लिम बच्चे जेल में हैं और उनका भविष्य अंधकारमय बन चुका है। मक्का मस्जिद बम धमाके में खुफिया एजेंसियों की कार्यवाहियों ने संघ परिवार के काले चेहरे को बेनकाब कर दिया है। मक्का मस्जिद के आरोपी असीमानंद के इकबाले जुर्म के साथ यह सच्चाई भी उजागर हुई है कि आतंकवाद गतिविधियों के पीछे संघ परिवार का बड़ा नेटवर्प काम कर रहा है। देश में आतंकवाद फैलाने और भय के साथ-साथ मुसलमानों को संदिग्ध बनाने के लिए एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत नेटवर्प सक्रिय है। मस्जिस्ट्रेट के सामने भारतीय दंड संहिता की धारा 164 के तहत कलमबंद बयान में असीमानंद ने संघ परिवार के हिन्दुत्व आतंकवादी नेटवर्प को बेनकाब किया है तो सरकार का यह दायिव है कि इस मामले में पूरी जांच कर संघ परिवार पर पाबंदी लगाए।

सह रोजा `दावत' ने `आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त होने के नाम पर गिरफ्तारियों की हककीत' में लिखा है। देश की खुफिया एजेंसियों की तफ्तीश से यह राज् ा खुलने लगा है कि गत कुछ वर्ष से देश के अंदर जो आतंकी गतिविधियां हुई हैं उन सबके पीछे सलमानों का हाथ नहीं था। न केवल उन्हें रिहा कर दिया जाना चाहिए बल्कि इनकी इज्जत पर जो दाग लगा है उसको धोने की भी व्यवस्था की जानी चाहिए एवं उन्हें उचित मुआवजा भी दिया जाना चाहिए ताकि वहअपना भविष्य संवार सकें। `खबरो नजर' के अपने स्तंभ में परवाज रहमानी ने `दो बिन्दु विचारणीय हैं' के शीर्षक से लिखा है। असीमानंद के इस बयान की मूल प्रति मीडिया को पुलिस ने उपलबध कराई है, अर्थात् मीडिया से स्वामी की बात सीधे तौर पर नहीं हुई है अन्यथा शायद और भी बहुत विस्तृत विवरण सामने आता। लेकिन जो कुछ बताया गया है वह भी अत्यंत महत्वपूर्ण और कई पहलुओं से विचारणीय है। दो बिन्दु विशेष तौर पर विचारणीय हैं। (1) कलीम का प्रशंसीय कार्य जो निश्चिय ही उसके मुस्लिम पारिवारिक पृष्ठभूमि का नतीजा था। इस कार्य ने स्वामी के सामने दावते हक (सत्यता) का काम किया। (2) एक कट्टर स्वामी का हृदय जिससे यह हकीकत उजागर थी कि हर व्यक्ति के हृदय में कहीं न कहीं मानवता, शराफत और अल्लाह से डर छिपा होता है जो किसी भी घटना के नतीजे में उभकर सामने आ सकती है। अभी पूरे विश्वास से कुछ नहीं कहा जा सकता कि स्वामी असीमानंद का यह इकबालिया बयान आने वाले दिनों में क्या रूप लेगा, क्या रंग लाएगा। हृदय स्वामी को अपने बया न पर कायम रहने देगा या आंतरिक दबाव अपना काम कर जाएगा। इसके बावजूद (1) यह घटना अपनी तरह की पहली घटना नहीं है। (2) `मुस्लिम आतंकवाद' के शोर में यह बयान बहरहाल अच्छा काम करेगा चाहे इसे दबाने या नजरंदाज करने की कितनी ही कोशिशें की जाएं। स्वामी के वकील ने बयान का खंडन करने की कोशिश की है लेकिन खंडन से सच्चाई का पहलू निकल रहा है।

दिल्ली, कोलकाता और रांची से एक साथ प्रकाशित होने वाले दैनिक `अखबारे मशरिफ' में डॉ. परवेज अहमद `असीमानंद का इकबालिया जुर्म ः वास्तविकता का द्योतक' में लिखते हैं। पाप का घड़ा भर कर फूट पड़ता है अब पता नहीं आतंकवाद के मामलों में गिरफ्तार असीमानंद के इकबालिया बयान से हिन्दू आतंकवादी और उसके संरक्षणकर्ताओं के पापों का घड़ा भर चुका है या सेकुलरिज्म के नाम पर सांप्रदायिकता के पापों को दूध पिलाने वालों का घड़ा फूट रहा है लेकिन यह तो तय है कि भगवा आतंकवादी और आरएसएस के संबंध में स्वामी असीमानंद के इकबालिया बयान से खुल रहा है कि हमलों के लिए इन्द्रsश कुमार प्रचारकों का चयन और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराता था। सेकुलरिज्म के हंगामे के दौरान अक्सर सुनता रहा हूं कि सरकार सांप्रदायिकता को बर्दाश्त नहीं करेगी लेकिन सच्चाई इसके विपरीत है।