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Tuesday, January 8, 2013

प्रधानमंत्री के आश्वासन के बाद क्या मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी रुकेगी?


बाबरी मस्जिद गिराए जाने के 20 वर्ष बाद लगभग सभी उर्दू अखबारों ने इस पर विशेष रिपोर्ट प्रकाशित की और सम्पादकीय लिखे। दैनिक `सहाफत' में अतहर सिद्दीकी ने अपने विशेष लेख `परदे सियासत पर अगर शहाबुद्दीन न होते तो बाबरी मस्जिद शहीद नहीं होती' में स्थिति की समीक्षा की है। साथ ही उनके द्वारा नरेन्द्र मोदी को माफी दिए जाने पर लिखा है कि किसी व्यक्ति को यह अधिकार नहीं है कि वह दंगा पीड़ितों की ओर से उस अत्याचारी व्यक्ति को माफ करे। शहाबुद्दीन साहब। खुदा के लिए ऐसा फलस्फा आप मुस्लिम कौम को न पढ़ाएं जिसमें दूसरी बार बाबरी मस्जिद को शहीद करने का संदेह मौजूद हो। इसी अखबार ने बाबरी मस्जिद मुकदमे के संदर्भ में तीन किस्तों में सूरतेहाल को स्पष्ट कर बताया है कि मुकदमों में देर भी है और अंधेर भी। सीबीआई ने 9 फरवरी 2011 को सुप्रीम कोर्ट में अपील कर मांग की है कि हाई कोर्ट के इस आदेश को निरस्त करते हुए आडवाणी सहित 21 आरोपियों के खिलाफ बाबरी मस्जिद गिराने का षड्यंत्र और अन्य धाराओं में मुकदमा चलाया जाए। अभी इस अपील पर सुनवाई होनी है। मुकदमा चलने के बाद सबूत न होने के कारण बहुत से अपराधी छूट जाएंगे, वह अलग बात है लेकिन अभी यही तय नहीं हो रहा है कि किस आरोपी के खिलाफ किस-किस सेक्शन में कहां मुकदमा चलाया जाएगा। अब हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से कौन पूछेगा कि अदालतों में यह देर अंधेर नहीं तो फिर क्या है?
दैनिक `इंकलाब' में सईद अहमद खां ने बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद मुंबई दंगों के पीड़ितों पर चर्चा करते हुए लिखा है कि 20 साल बाद भी इंसाफ का रास्ता देख रहे हैं। मुंबई दंगा पीड़ितों के जख्म आज भी हरे हो जाते हैं जब 6 दिसम्बर आता है। पीड़ितों को सबसे ज्यादा शिकायत पुलिस और सरकार से है। उनके अनुसार एक तरफ जहां पुलिस ने दंगों के दौरान दंगाइयों की भूमिका निभाई, वहीं सरकार ने भी इनके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की है। जिसकी वजह से पीड़ितों को आज तक न्याय नहीं मिला और उन पर भय छाया हुआ है। `बाबरी मस्जिद घटना' पर इसी अखबार ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि बहुत से लोग गंभीरता के साथ ही यह सुझाव देते हुए मिलते हैं कि मुसलमान बाबरी मस्जिद घटना को भूल जाएं और शिक्षा एवं रोजगार द्वारा उस सामूहिक परिवर्तन को पकड़ें जो उन्हें इस देश में ज्यादा प्रभावी बना सकता है। जहां तक इस पहले सुझाव का मामला है कि मुसलमान बाबरी मस्जिद को भूल जाएं, तो यह संभव नहीं है क्योंकि बाबरी मस्जिद देश में लोकतंत्र और भाईचारे का एक अहम प्रतीक थी। इस घटना ने मुसलमानों को ही नहीं देशवासियों को भी झिझोड़ कर रख दिया था। यह सेकुलरिज्म पर विश्वास रखने वाले, देश के हर नागरिक का मसला है। इस बुनियाद पर यह भी कहना गलत न होगा कि यदि मुसलमान उसे भूल जाएं तब भी यह घटना भूली नहीं जा सकती। दूसरा सुझाव सौ फीसदी सही है कि मुसलमान शैक्षिक एवं आर्थिक पिछड़ेपन से निजात हासिल कर जिंदगी की दौड़ में न केवल आएं बल्कि खुद को भी मनवाएं।
दारुल उलूम देवबंद में भारतीय दर्शन के शिक्षक एवं जमीअत उलेमा हिन्द के प्रवक्ता मौलाना अब्दुल हमीद नोमानी ने आरएसएस के चेन्नई में हुए तीन दिवसीय सम्मेलन पर चर्चा करते हुए लिखा है कि आरएसएस के सिलसिले में यह बताने की जरूरत नहीं है कि उसकी सभी बुनियादें नकारात्मक और प्रयास का निशाना देश के एक विशेष वर्ग का उत्थान और उसे सत्तासीन बनाना है, जिसे वह हिन्दू राष्ट्र का नाम देता है। तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में आयोजित हुई इस बैठक के पहले सेशन में असम की हिंसा के शीर्षक से बंगलादेशी घुसपैठियों की चनौती को देशव्यापी स्तर पर बताने की कोशिश की गई है। इससे जाहिर है कि राष्ट्रीय स्तर पर मुस्लिम अल्पसंख्यकों के खिलाफ बहुसंख्यक में घृणा और संदेह पैदा करने का और रास्ता खुलेगा। पुलिस प्रशासन की भी इसमें पूरी मदद मिलेगी, जैसा कि आज तक देखा गया है। घृणा, हिंसा और संदेह के माहौल में जहां संघ को बहुसंख्यक समाज के संरक्षण के तौर पर पेश करने का मौका मिल जाता है वहीं आतंक के शिकार इसे अपनी पनाहगाह समझते हुए इसके करीब आ जाते हैं और यही आरएसएस की कामयाबी है। आरएसएस के अंग्रेजी मुखपत्र`आर्गनाइजर' के सम्पादकीय, डॉ. प्रवीन तोगड़िया का स्तम्भ और राष्ट्रीय कार्यकारिणी के चेन्नई अधिवेशन की पूर्ण रिपोर्ट से संघ के इरादों का पता चलता है। इस सिलसिले में हमें नहीं मालूम कि हमारा नेतृत्व किस हद तक संघ के मामले को गंभीरता से लेते हुए आने वाले दिनों में रणनीति बनाकर ऐसा काम करेंगे जिससे मुल्क व मिल्लत दोनों को फायदा हो।
मुस्लिम युवाओं की गिरफ्तारी को लेकर समाजवादी पार्टी नेता प्रोफेसर राम गोपाल यादव की अगुवाई में संसद में मुद्दा उठाने और इसके चलते संसद की कार्यवाही तीन बार रोकनी पड़ी, जबकि इसके एक दिन पूर्व 3 दिसम्बर को लोक जन शक्ति पार्टी के अध्यक्ष राम विलास पासवान की अगुवाई में 16 सांसदों के एक प्रतिनिधि मंडल ने प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह से मुलाकात कर उन्हें एक ज्ञापन दिया। इन सांसदों ने जांच एजेंसियों सीबीआई, पुलिस और अन्य एजेंसियों द्वारा मुस्लिम युवाओं की लगातार हो रही गिरफ्तारियों पर चिन्ता व्यक्त की। इस पर प्रधानमंत्री ने उन्हें भरोसा दिलाया कि आतंकी मामलों में पारदर्शिता और ईमानदारी से काम लिया जाएगा। दैनिक `हमारा समाज' ने `विश्वास दिलाने से कुछ नहीं होगा' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में  लिखा है कि सवाल यह पैदा होता है कि इन मुस्लिम युवाओं को कब तक इंसाफ मिलेगा और प्रधानमंत्री ने जो विश्वास दिलाया है, उस पर किस समय अमल किया जाएगा। हकीकत यह है कि ऐसी यकीनी दहानी अल्पसंख्यक विशेषकर मुसलमानों के बारे में कराई जाती रही हैं लेकिन उसके बाद हमारे देश के नेता यह भूल जाते हैं कि हम ने कब किस से क्या वादा किया था। समाजवादी पार्टी की मांग पर प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ने आकर कोई बयान नहीं दिया जबकि संसद की कार्यवाही को तीन बार स्थगित करना पड़ा। राज्यसभा में मुस्लिम युवाओं की रिहाई के सिलसिले में नारे लगाए गए लेकिन हमें अब भी सरकार की नीयत साफ नजर आती और हमें नहीं लगता कि इस तरह की यकीन दहानी के बाद बेगुनाह मुसलमानों की गिरफ्तारियों पर रोक लग जाएगी।
अरविन्द केजरीवाल द्वारा `आम आदमी पार्टी' के नाम से सियासी पार्टी के गठन पर सहरोजा `दावत' के सम्पादक परवाज रहमानी ने विख्यात स्तम्भ `खबरो नजर' में चर्चा करते हुए लिखा कि आम आदमी पार्टी के संस्थापक के अब तक बयानात और विचारों से यह धारणा गलत न होगी कि वह अपने प्रयासों में ईमानदार हैं। भ्रष्टाचार से परेशान हैं और उसे हर कीमत पर खत्म करना चाहते हैं। थोड़ा जज्बाती आदमी  हैं लेकिन आदमी काम के हैं। इसलिए उन्हें याद दिलाना उचित मालूम होता है कि वह बातचीत याद करें जो गत वर्ष जमाअत इस्लामी हिन्दू मुख्यालय में अमीर जमाअत मौलाना जलालुद्दीन उमरी ने उनसे की थी, जब वह अपनी टीम के साथ जमाअत मुख्यालय विचार-विमर्श के लिए आए थे। अमीर जमाअत ने उनकी टीम से कहा था कि भ्रष्टाचार सहित सभी बुराइयों पर काबू अल्लाह के सामने जवाबदेही की धारणा के बिना संभव नहीं है। अरविन्द ने स्वीकार किया कि फिलहाल यह पहलू हमारे सामने नहीं है। अब उन्हें इस पर जरूर विचार करना चाहिए। काम देखने में मुश्किल है लेकिन अगर समझ में आ जाए तो भ्रष्टाचार पर रोक का सबसे आसान रास्ता भी यही है।
थ�e � � � ��{ Р� � हो सकती है और क्या जो दल पायः सभी दल-वर्ग विशेष का मत पाने की आंकांक्षा में उससे दूरी बनाये हुए हैं-वे सरकार बनाते समय संयुक्त मोर्चा बनाने की दिशा में जाकर कांग्रेस के समर्थन से सरकार चलायेंगे। पिछले डेढ़ दशक में जो राजनीतिक नियत उतरकर सामने आई है उससे किसी पतिबद्धता की सांवना का आंकलन करना दिवास्वप्न देखने के समान ही होगा। लेकिन एक बात को-उत्तर पदेश के संदर्भ में- समझ लेना आवश्यक है वह यह कि मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्रित्व के समय 1989 में जनता दल का विभाजन होने के बाद उनकी सरकार के समर्थन में जब कांग्रेस खड़ी हुई तो वे अल्पमत में थे। उनकी सरकार कांग्रेस के सहारे कुछ महीने चली नारायण दत्त तिवारी विपक्ष के नेता थे। मुलायम सिंह यादव ने जिस तरह से सरकार चलायी वह वैसी ही थी जैसे आज अखिलेश की सरकार चल रही है। फलतः 1991 के चुनाव में विधानसभा में चौथे नंबर का सिर्फ 31 सीटें मिल पायी थी और कांग्रेस तब से उत्तर पदेश में राजनीति की मुख्यधारा से बाहर है। नारायण दत्त के नेतृत्व में मुलायम सिंह की सरकार को समर्थन न मुलायम सिंह के लिए शुभ रहा और ना ही कांग्रेस के लिए। नारायण दत्त तिवारी का ``आर्शीवाद'' वैसा ही जैसे विधान परिषद में स्थान पाने के लिए जे.ए. अहमद का कम्युनिस्ट पार्टी छोड़ मुलायम सिंह की शरण में जाना। लेकिन उन्हें कुछ भी नहीं मिला। तिवारी जी सुर्खियों में बने रहने के लिए चाहे जो उपकम करें। अब उनको जे.ए. अहमद की स्थिति पाप्त हो गई है। आज की राजनीति अवसरवादिता और सत्ता सुख भोगने का साधन मात्र होकर रह गई है इसलिए किसी भी चुनाव के बाद कोई पार्टी किस करवट बढ़ेगी इसकी गारंटी नहीं दी जा सकती।

Wednesday, March 23, 2011

मौलाना अरशद मदनी पर 101 करोड़ रुपये का दावा

बीते दिनों राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं पर उर्दू मीडिया ने परम्परानुसार बेबाकी से अपना पक्ष रखा। पेश है इस बाबत कुछ उर्दू अखबारों की राय।

दुश्मन जायदाद के विधेयक (संशोधित) को लेकर जहां उर्दू अखबारों ने सक्रिय भूमिका निभाई वहां मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने वाले मुस्लिम सांसदों की इसमें दिलचस्पी नहीं रही। इस पर चर्चा करते हुए दैनिक `हमारा समाज' में आमिर सलीम खाँ ने अपनी रिपोर्ट में यह रहस्योद्घाटन किया है कि ऐनामी प्रापर्टी विधेयक 2010 पर राज्यसभा की स्टैंडिंग कमेटी की बैठक से गायब रहे कमेटी के मुस्लिम सदस्य। जबकि सूत्रों के अनुसार कल की यह बैठक आखिरी थी जिसके बाद कमेटी विधेयक पर अपनी रिपोर्ट पेश करने में सक्षम हो जाती है। इसी बीच 14 मार्च को राष्ट्रीय एकता परिषद के सदस्य नवेद हामिद की पहल पर 17 सांसदों के हस्ताक्षर से एक पत्र कमेटी चेयरमैन वेंकैया नायडू को दिया गया है जिस पर एक माह का समय दे दिया गया है। राज्यसभा की 31 सदस्यीय स्टैंडिंग कमेटी में चार सदस्य मुस्लिम हैं जिनमें तारिक अनवर, मौलाना असरारुल हक कासमी, मोहम्मद हमीद उल्ला सईद और जावेद अख्तर शामिल हैं। 1968 में बने एनेमी प्रापर्टी कानून के तहत पाकिस्तान जाने वालों के हिन्दुस्तान में रह गए वारिसों के बावजूद उनकी जमीनें कसटोडियन के कब्जे में दे दी गई थीं। राजा महमूदाबाद के वारिस मोहम्मद आमिर खाँ ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और एक लम्बी लड़ाई के बाद 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने इनके हक में फैसला कर दिया लेकिन इसके खिलाफ गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने अध्यादेश को लेकर फैसले को निरस्त कर दिया। इस अध्यादेश से वारिसों को जायदादें नहीं मिल रही थीं इस पर राज्यसभा के डिप्टी चेयरमैन के. रहमान खाँ और केंद्रीय मंत्री अल्पसंख्यक मंत्रालय सलमान खुर्शीद की अगुवाई में 40 मुस्लिम सांसदों ने जुलाई 2010 में प्रधानमंत्री से मुलाकात कर विधेयक में उचित संशोधन की मांग की थी। जिस पर सरकार ने स्टैंडिंग कमेटी बनाकर मामला उसके सुपुर्द कर दिया।

`मौलाना अरशद मदनी पर 101 करोड़ का दावा, मौलाना बदरुद्दीन अजमल पर भाजपा से 55 करोड़ घूस लेने का आरोप, गोहाटी जिला अदालत में अवमानना का मुकदमा दायर' के शीर्षक से `हमारा समाज' ने लिखा है। गत महीनों जमीयत उलेमा हिन्द (मौलाना अरशद मदनी) के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी और मौलाना बदरुद्दीन अजमल में होने वाली लड़ाई खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोकेटिक फ्रंट के अध्यक्ष मौलाना अजमल पर गत महीने फरवरी में मौलाना मदनी द्वारा कथित तौर पर गत लोकसभा चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी से 55 करोड़ रुपये घूस लेने का आरोप लगाया था। मौलाना अजमल ने इस पर अवमानना का केस करते हुए असम मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारेगी। इस पार्टी में आरिफ बेग, सिकंदर बख्त, मुख्तार अब्बास नकवी और आरिफ मोहम्मद खाँ जैसे तथाकथित मुस्लिम चेहरों को सामने रखकर असम के मुस्लिम चेहरों की हकीकत को भी अच्छी तरह समझा जा सकता है। गोहाटी की जिला अदालत में 101 करोड़ रुपये का मुकदमा मौलाना अरशद मदनी पर किया है। एयूडीएफ प्रवक्ता के अनुसार अवमानना की याचिका में मौलाना अजमल की ओर से कहा गया है चूंकि वह लाखों लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं और इनके सामाजिक काम का दायरा दूर-दूर तक फैला हुआ है। इसलिए इस आरोप से उन्हें काफी मानसिक और आर्थिक चोट पहुंची है और इनकी छवि खराब हुई है। ऐसी सूरत में यदि उन्होंने घूस लिया है तो आदलत में सुबूत पेश किए जाएं। यदि ऐसा नहीं है तो फिर मौलाना अरशद मदनी के खिलाफ अदालत नोटिस जारी करे। मौलाना अजमल ने याचिका में कहा है कि यदि दावा गलत है तो फिर मेरे करोड़ों रुपये की भरपायी की जाए जिसके लिए उन्होंने 101 करोड़ रुपये तय किए हैं। इसमें अदालत को कम-ज्यादा करने का अधिकार दिया गया है। ज्ञात रहे असम में तोपखाना मदरसा के अधिवेशन में मौलाना अजमल पर मौलाना अरशद मदनी ने आरोप लगाया कि उन्होंने गत लोकसभा चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी से 55 करोड़ रुपये घूस ली थी।

बाबरी मस्जिद मिलकियत मुकदमें में अदालत की अवमानना के आरोप में इलाहाबाद हाई कोर्ट की विशेष तीन सदस्यीय खंडपीठ द्वारा पीटीआई, दैनिक जागरण और इतिहासकारों एवं पुरातत्व विशेषज्ञों पर जुर्माना किए जाने पर चर्चा करते हुए दैनिक `अखबारे मशरिक' ने लिखा है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट की विशेष खंडपीठ के जस्टिस एसयू खाँ, जस्टिस सुधीर अग्रवाल और जस्टिस वीके दीक्षित ने हिन्दी `दैनिक जागरण' बाबरी मस्जिद मुकदमें की गलत रिपोर्टिंग पर दोनों पर एक हजार रुपये का जुर्माना किया है। खंडपीठ ने बाबरी मस्जिद मुकदमें में मुसलमानों की तरफ से पेश किए इतिहासकार और पुरातत्व विशेषज्ञ धतेश्वर मंडल और प्रोफेसर शिंटी रत्नाकर को भी अदालत की अवमानना का दोषी ठहराते हुए दोनों पर एक-एक हजार का जुर्माना किया है। इन दोनों इतिहासकारों तक अधारित सच्चाई को स्वीकार किए जाने पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की विशेष खंडपीठ की आलोचना करते हुए अपना विरोध प्रकट किया था।

`असम के मुसलमानों के लिए नया जाल बिछाया जा रहा है' के शीर्षक से `सहरोजा दावत' ने लिखा है। भाजपा ने इस बार मुस्लिम बहुल क्षेत्र असम में मुसलमानों को अपने जाल में फंसाने की रणनीति बनाई है। सूत्रों के अनुसार भाजपा इस चुनाव में दो मुस्लिम उम्मीदारों को मैदान में उतारेगी। इस पार्टी में आरिफ बेग, सिकंदर बख्त, मुख्तार अब्बास नकवी और आरिफ मोहम्मद खाँ जैसे तथाकथित मुस्लिम चेहरों को सामने रखकर असम के मुस्लिम चेहरों की हकीकत को भी अच्छी तरह समझा जा सकता है।

स्वतंत्रता आंदोलन से पूर्व ही इसकी विचारधारा को दुनिया जानती है। हिन्दू महासभा, आरएसएस, जनसंघ और भाजपा की तरह मुखौटे सामने आते हैं। लेकिन मिशन एवं गंतव्य में कोई फर्प नहीं रहा।

भाजपा बिहार विधाननसभा के चुनावी नतीजों की रोशनी में असम चुनाव को देख रही है। जाहिर है वहां लालू यादव और कांग्रेस ने जिस तरह उन्हें मायूस किया और नीतीश कुमार ने सांप्रदायिकता को रोकते हुए चाहे मुसलमानों को कुछ नहीं दिया। कुल मिलाकर जो विकास कार्य किया उससे मुसलमान भी लाभांवित हो रहे हैं। कोई ऐसा काम नहीं किया गया जिससे मुसलमान भेदभाव का अहसास करते। यदि स्वयं भाजपा इस रंग में आ जाएगी तो अपनी विचारधारा से दूरी की बिना पर स्वयं अपने वोट बैंक से वंचित हो जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा हज सब्सिडी को बहाल रखने के निर्णय के बाद मुस्लिम नेतृत्व ने इसके खिलाफ लामबंद होना शुरू कर दिया है और वह इसे खत्म करने की मांग कर रहे हैं क्योंकि हज सब्सिडी के बहाने सरकार एयर इंडिया को फायदा पहुंचा रही है। मुस्लिम नेतृत्व की सोच के विपरीत केंद्रीय हज कमेटी के उपाध्यक्ष ने हज सब्सिडी जारी रखने की वकालत कर इनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। दैनिक `हिन्दुस्तान एक्सप्रेस' में फरजान कुरैशी ने हज कमेटी उपाध्यक्ष हसन अहमद के हवाले से लिखा है कि सब्सिडी हमारा अधिकार है और यह जारी रहना चाहिए। उनका कहना था कि देश का मुसलमान इनकम टैक्स और सेल्स टैक्स देता है और जो लोग सरकार को टैक्स देते हैं उसके बदले सरकार उन्हें कुछ न कुछ छूट जरूर देती है। मुसलमान देश के नागरिक हैं जब दूसरे लोग सरकार से सब्सिडी हासिल कर सकते हैं तो फिर मुसलमान इस छूट से क्यों वंचित रहें।

`नकवी के बयान पर कांग्रेस में आंतरिक बहस की शुरुआत, कांग्रेस के मुस्लिम नेता झांक रहे हैं अपना गिरेबां, सेकुलरिज्म की रक्षा के लिए पार्टी नेता सक्रिय' के तहत दैनिक `सहाफत' ने लिखा है। भाजपा प्रवक्ता और सांसद मुख्तार अब्बास नकवी द्वारा जारी बजट के आरोप को लेकर कांग्रेस पार्टी में आंतरिक बहस शुरू हो गई है। मुख्तार अब्बास नकवी ने अल्पसंख्यक मंत्रालय पर बहस के दौरान कांग्रेस और सरकार पर कई तरह के सवाल उठाए थे। उनका आरोप था कि कांग्रेस पार्टी सेकुलरिज्म की बात करती है लेकिन देश में आज के दिन किसी राज्य का गवर्नर मुस्लिम नहीं है। पूरे देश के किसी भी राज्य में मुख्यमंत्री तो दूर की बात है। एक भी विपक्षी नेता मुस्लिम नहीं है। बिहार छोड़कर किसी भी राज्य में कांग्रेस अध्यक्ष मुस्लिम नहीं है। इस सन्दर्भ में कांग्रेस अल्पसंख्यक मोर्चा के महासचिव अनीस दुर्रानी का कहना है कि उनके बयान से कांग्रेस की सेहत पर कोई असर पड़ने वाला नहीं है।

Thursday, February 10, 2011

दारूल उलूम- साख पर आंच

किसी चिंतक ने सच ही कहा है कि इतिहास अपने आपको दोहराता है। ठीक यही मामला देवबद स्थित अंतरराष्ट्रीय शिक्षण संस्था दारुल उलूम का है। लगभग तीस साल के बाद यह दूसरा मौका है जब दारुल उलूम के मोहतमिम (कुलपति) पद को लेकर विवाद अपनी चरम सीमा पर पहुंच चुका है। अतीत में हुए इस विवाद के चलते ही दारुल उलूम का विभाजन हुआ था। दारुल उलूम की मजलिस शूरा (कार्यकारिणी) के फैसले की बुनियाद पर ही उसके मोहतमिम कारी मोहम्मद तैयब ने दारुल उलूम (वक्फ) बनाकर अपनी राह अलग पकड़ी और जमीअत उलेमा हिंद के अध्यक्ष मौलाना असद मदनी की दारुल उलूम पर पकड़ मजबूत हो गई। कहा जाता है कि ऐसा कांग्रेस की नीति के चलते हुआ क्योंकि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी मुसलमानों की एकजुटता को खत्म कर उन्हें कमजोर करना चाहती थीं। वर्तमान विवाद को इस प्ररिप्रेक्ष्य से अलग कर नहीं देखा जा सकता। फर्क केवल इतना है कि तब मजलिस शूरा ने मदनी परिवार के हक में अपना मत दिया था और अब तीस साल बाद उसने मदनी परिवार को दारुल उलूम से बेदखल कर दिया है।
दारुल उलूम के मोहतमिम मौलाना मरगूर्बुरहमान के निधन के बाद 10 जनवरी को मजलिस शूरा ने अपनी बैठक में बहुसंख्यक मतों के आधार पर मौलाना गुलाम मोहम्मद वस्तानवी को दारुल उलूम के मोहतमिम की जिम्मेदारी सौंपी थी। 21 सदस्यीय शूरा में 4 सदस्यों का निधन हो चुका है, जिनका चुनाव किया जाना बाकी है। जबकि तीन सदस्य किन्हीं कारणों से बैठक में शरीक नहीं हुए। इस तरह 14 सदस्यों में से 8 ने मौलाना वस्तानवी को मोहतमिम बनाने के पक्ष में वोट दिया। चार सदस्यों ने इनके प्रतिद्वंद्वी जमीअत उलेमा हिंद के दूसरे घडे़ के अध्यक्ष एवं दारुल उलूम के शिक्षक और मौलाना वस्तानवी के रिश्तेदार मौलाना अरशद मदनी के पक्ष में और दो सदस्यों ने दारुल उलूम के नायब मोहतमिम मौलाना अब्दुल खालिक मदरासी के पक्ष में अपना मत दिया। साफ और निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया से हताश मौलाना अरशद मदनी के एक रिश्तेदार एवं शूरा सदस्य मौलाना अब्दुल अलीम फारूकी ने यह शिगूफा छोड़ दिया कि मौलाना वस्तानवी कासमी नहीं है। इस पद पर किसी कासमी को ही आसीन करना चाहिए। बतातें चलें कि दारुल उलूम से शिक्षा प्राप्त करने वालों को कासमी कहा जाता है। ऐसा वह मौलाना मोहम्मद कासिम नानोतवी द्वारा दारुल उलूम का गठन किए जाने की याद में अपने नाम के आगे लगाकर करते हैं। कोई कासमी मोहतमिम हो, दारुल उलूम का संविधान इस बाबत मौन है। मोहतमिम के चयन का पूरा अधिकार मजलिस शूरा को दिया गया है।
मजलिस शूरा के इस फैसले की अभी स्याही सूखी भी नहीं थी कि मौलाना वस्तानवी के अतीत के कुछ कामों को लेकर विवाद खड़ा हो गया। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ को दिए साक्षात्कार में मौलाना वस्तानवी ने कहा कि गुजरात में मुसलमानों के साथ भेद-भाव नहीं किया जा रहा है। राज्य में मुसलमानों की आर्थिक स्थित अच्छी है। उन्होंने यह भी कहा कि 8 वर्ष पूर्व हुए दंगों को अब याद करने का औचित्य नहीं है। मौलाना वस्तानवी को गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थन में बयान देने की जरूरत क्यों महसूस हुई? इसे लेकर मुसलमानों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि क्या चर्चा में बने रहने के लिए दारुल उलूम का इस्तेमाल किया जा रहा है। पूर्व में मौलाना मरगूर्बुरहमान के समय इसकी शुरुआत हो चुकी थी लेकिन तब वह एक सीमित दायरे में थी। अब जिस तरह खुल कर राजनीतिक बयानबाजी हो रही है, उससे आम मुसलमानों की नाराजगी बिल्कुल स्वाभाविक है। राजनैतिक पार्टियां जिस तरह दिल्ली स्थित जामा मस्जिद को अपने हित के लिए इस्तेमाल करती हैं बिल्कुल उसी तरह दारुल उलूम का इस्तेमाल किया जा रहा है। जानकारों को इस बात पर आश्चर्य है कि मोलाना वस्तानवी गुजरात जाने के बाद दारुल उलूम की बाबत कहने के बजाए मोदी के राज्य में मुसलमान खुशहाल हैं और वह उन्नति कर आगे बढ़ रहे हैं, जैसे बयान दे रहे हैं। इससे उनकी दिलचस्पी का अनुमान लगाया जा सकता है।
बात यहीं खत्म नहीं हुई बल्कि एक उर्दू दैनिक ‘सहाफत’ ने पहले पेज पर उस फोटो को छापकर उन्हें कठघरे में खड़ा कर दिया, जिसमें महाराष्ट्र के एक मंत्री को मौलाना वस्तानवी के हाथों एक मूर्ति पेश करते दिखाया गया था। यह फोटो कोई साल भर पहले के एक कार्यक्रम का है। इस फोटो ने मौलाना वस्तानवी के खिलाफ माहौल बनाने में अहम भूमिका निभाई। दारुल उलूम के कुछ शिक्षकों ने भी इस बयान को दारुल उलूम की साख को नुकसान पहुंचाने वाला बताया। साथ ही दारुल उलूम की मजलिस शूरा से अपने फैसले पर पुनर्विचार का अनुरोध किया। तनजीम मुहिब्बान दारुल उलूम, देवबंद ने तो शूरा के फैसले पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया। तनजीम के महासचिव मौलाना अरशद रजा कासमी बिजनौरी ने शूरा से सवाल किया है कि क्या दारुल उलूम इतना बांझ हो गया है कि इससे पढ़कर निकलने वाले उलेमा में से कोई नहीं मिल सका कि उसे दूसरी संस्था के पढ़े हुए को लेना पड़ा।
पूरे मामले में नाटकीय मोड़ तब आया जब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनैतिक सलाहकार अहमद पटेल जिनका संबंध भी गुजरात से है और वे मौलाना वस्तानवी के करीबी रिश्तेदार हैं, का बयान उक्त उर्दू दैनिक में प्रकाशित हुआ। जिसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि दारुल उलूम का मोहतमिम किसी योग्य व्यक्ति को बनाया जाए। मौलाना वस्तानवी इस पद के लायक नहीं हैं। उन्होंने अपने इस बयान में मौलाना वस्तानवी के पुत्र मुफ्ती हुजैफा के दावे को भी निरस्त कर दिया, जिसमें उसने कहा था कि अहमद पटेल उसके नाना हैं और गुजरात एवं महाराष्ट्र की कांग्रेस इकाई में वह जो चाहते हैं, वही होता है। पटेल ने यह भी कहा कि जो व्यक्ति मोदी का दोस्त हो सकता है वह मेरा कैसे हो सकता है।
इसी बीच मौलाना वस्तानवी ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि टाइम्स ऑफ इंडिया का जो बयान उनसे संबंधित बताया जा रहा है, उसे तोड़ मोड़कर पेश किया गया है। मैं ऐसी कोई बात जो दारुल उलूम देवबंद और अपने बुजुर्गों की परंपरा एवं मान-सम्मान के खिलाफ है, को सोच भी नहीं सकता। मूर्ति के संबंध में उन्होंने कहा कि यह उनके दुश्मनों का षड्यंत्र है। वस्तानवी ने कहा कि गत वर्ष नवंबर में ईद मिलन समारोह के अवसर पर जिसमें हिंदू और मुस्लिम दोनों शरीक थे, उन्हें महाराष्ट्र के एक मंत्री को मोमेंटो पेश करना था। उस पर तस्वीर बनी हुई थी, वह मूर्ति नहीं थी। उन्होंने जोर देकर कहा कि तस्वीर और मूर्ति में बड़ा फर्क है। जो लोग इस तस्वीर को मूर्ति कह रहे हैं, वह गलत कह रहे हैं।
मौलाना वस्तानवी दीनी शिक्षा के साथ ही आधुनिक शिक्षा में दक्षता रखते हैं। वे गुजरात के निवासी हैं। वे गुजरात एवं महाराष्ट्र में कई कॉलेज एवं मदरसे चला रहे हैं जिनमें हजारों लड़के शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। मजलिस शूरा ने उनका चयन एक ऐसे समय में किया है जब मदरसों की विचारधारा को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस चल रही है। दूसरी ओर उनके करीबी रिश्तेदार मौलाना अरशद मदनी जो मदनी परिवार के मुखिया हैं, की कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह से मुलाकात को कांग्रेस एजेंडा को लागू करने के संदर्भ में देखा जा रहा हैं। जानकर मानते हैं कि अहमद पटेल पहले वस्तानवी के समर्थक थे। उन्होंने इसलिए पाला बदला कि वस्तानवी के दारुल उलूम में आने से मुसलमानों को कांग्रेस के करीब लाने में परेशानी होगी। इसके विपरीत मौलाना अरशद मदनी के आने से उत्तर भारत में मुसलमानों को कांग्रेस से जोड़ने में कामयाबी मिलेगी। चर्चा यह भी है कि 10 जनपथ से इसका ब्लू प्रिंट तैयार हो गया है? लेकिन ऐसा कैसे होगा? क्या मजलिस शूरा जिसने मौलाना अरशद मदनी के खिलाफ फैसला दिया था, पर राजनैतिक दबाव डाला जाएगा या फिर उसमें जो जगहें खाली हैं, उन पर ऐसे लोगों को लाने की कोशिश होगी जो इस मिशन को पूरा करने में अपना सहयोग देंगे। ऐसे ही सवालों पर सबकी निगाहें लगी हुई हैं।