बीते सप्ताह जहां राजनैतिक परिदृश्य पर अन्ना हजारे और उनकी टीम द्वारा जन लोकपाल का मुद्दा छाया रहा, वहां उर्दू के कई समाचार पत्रों ने इस आंदोलन को सांप्रदायिक ताकतों से जोड़ते हुए इसे देश के लिए खतरनाक बताया। इतना ही नहीं, रामलीला मैदान में अन्ना समर्थन में उमड़ी भीड़ के इलैक्ट्रॉनिक मीडिया का कमाल बताते हुए अन्ना को जनता से मायूसी हुई और उनके समर्थकों को अन्ना की जिद झेलनी पड़ रही है, जैसी खबरें भी उनके संवाददाताओं के नाम से प्रकाशित की गईं। `अन्ना आंदोलन पर मुसलमानों को संदेह' के शीर्षक से लगभग सभी उर्दू अखबारों ने सैयद अहमद बुखारी, पर्सनल लॉ बोर्ड सदस्य जफरयाब जीलानी, वैलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया के महासचिव कासिम रसूल इलियास, दारुल उलूम देवबंद के मोहतामिम अबुल कासिम नोमानी, फतेहपुरी मस्जिद के इमाम मुफ्ती मुकरम अहमद, इमाम आर्गेनाइजेशन अध्यक्ष उमैर इलियासी के बयान को प्रमुखता से प्रकाशित किया। पर्सनल लॉ बोर्ड ने यह कहकर इस मुहिम से पीछा छुड़ाया है कि भ्रष्टाचार बोर्ड के कार्य क्षेत्र में नहीं है। कासिम रसूल इलियास ने कहा कि संसद के अधिकारों को कमजोर करने की कोशिश न तो लोकतंत्र के लिए अच्छी है और न ही देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे के लिए। अन्ना जिस चीज के लिए मुहिम चला रहे हैं, हम इससे सहमत हैं लेकिन संसद को अपनी शर्तें मनवाने पर मजबूर करने के हक में नहीं हैं। लोकपाल बिल और जन लोकपाल बिल पर संसद जल्द फैसला कर किसी निष्कर्ष पर पहुंचे।
`मुस्लिम नेताओं ने सदैव कांग्रेस की डूबती किश्ती बचाई है' के शीर्षक से दैनिक `अखबारे मशरिक' ने ऑल इंडिया उलेमा काउंसिल और तनजीम अबनाए कदीम देवबंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष एजाज अहमद रज्जाकी के हवाले से लिखा है कि कांग्रेस अपने हमाम में नंगी है। `अन्ना की ललकार, बिल लाना पड़ेगा... या जाना पड़ेगा' के शीर्षक से दैनिक `हिन्द समाचार' ने अपने सम्पादकीय में लिखा है। 28 जुलाई को केंद्रीय मंत्रिमंडल की ओर से टीम अन्ना के प्रस्तावित सख्त `जन लोकपाल बिल' को निरस्त कर सरकारी लोकपाल बिल के नरम विधेयक को मंजूरी देने के बाद बुजुर्ग समाजसेवी अन्ना हजारे पहले से घोषणा अनुसार 16 अगस्त से भूख हड़ताल पर बैठ गए हैं। इसी दौरान अन्ना ने लोकपाल के अपने एजेंडे को पालिका को एक ताकतवर लोकपाल के अधीन लाने की बात कही गई लेकिन अन्ना के वर्तमान अनशन को गलत बताया गया। मुस्लिम नेताओं ने मैदान में निकलना शुरू कर दिया है। मौलाना रज्जाकी ने कहा कि दारुल उलूम देवबंद को जमीयत उलेमा हिन्द से अलग कर दें। दोनों संगठनों का सुर में सुर मिल रहा है जो सदस्य दारुल उलूम की कार्यकारिणी में शामिल हैं लगभग वही लोग जमीयत उलेमा के सदस्य भी हैं। इसी के साथ मौलाना रज्जाकी ने उलेमा काउंसिल और तनजीम अबनाए कदीम की ओर से अन्ना के समर्थन की घोषणा की।
दैनिक `प्रताप' में सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने `अन्ना के जन लोकपाल बिल पर भाजपा का दृष्टिकोण क्या है?' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखा है कि अन्ना के अनशन को लगभग नौ दिन गुजर चुके हैं और भाजपा ने अभी तक जन लोकपाल पर अपने पत्ते नहीं खोले? भाजपा के दो सांसदों ने खुलकर जन लोकपाल बिल का समर्थन किया है। इनमें एक वरुण गांधी दूसरे राम जेठमलानी। वरुण का कहना है कि अन्ना का बिल प्राइवेट बिल के तौर पर संसद में पेश करेंगे। राज्यसभा में भाजपा सांसद राम जेठमलानी ने भी अन्ना टीम के बिल का समर्थन किया है। उनका कहना था कि अन्ना के बिल को पूरी तरह नजरंदाज करना अब राजनेताओं के लिए सम्भव नहीं है। जेठमलानी जन लोकपाल बिल के दो अहम बिन्दुओं से पूरी तरह सहमत हैं। इनमें प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाना और न्यायिक व्यवस्था को शामिल करना है। काबिले गौर है कि प्रधानमंत्री को लोकपाल में लाने की मांग तो भाजपा कर रही है लेकिन न्यायाधीशों के लिए वह अलग से संस्था बनाए जाने के पक्ष में है। समय आ गया है कि टीम अन्ना और जनता चाहती है कि भाजपा हर बिन्दु पर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करे। चाहे संसद के बाहर अथवा संसद के अन्दर।
`अन्ना की ललकार' बिल लाना पड़ेगा... या जाना पड़ेगा' के शीर्षक से दैनिक `हिन्द समाचार' ने अपने सम्पादकीय में लिखा है। 28 जुलाई को केंद्रीय मंत्रिमंडल की ओर से टीम अन्ना के प्रस्तावित सख्त `जन लोकपाल बिल' को निरस्त कर सरकारी लोकपाल बिल के नरम विधायक को मंजूरी देने के बाद बुजुर्ग समाजसेवी अन्ना हजारे पहले से घोषणा अनुसार 16 अगस्त से भूख हड़ताल पर बैठ गए हैं। इसी दौरान अन्ना ने लोकपाल के अपने एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए जमीन अधिग्रहण और चुनाव सुधार की बात कर सरकार पर चारों तरफ से दबाव बना दिया है। उन्होंने चुनाव व्यवस्था की खामियों को दूर करने का भी आह्वान किया, क्योंकि इसी के कारण 150 अपराधी संसद में पहुंचे। एक ओर जहां जन लोकपाल सरकार के गले की फांस बना हुआ है वहीं कैग ने 40 हजार करोड़ रुपये के घोटाले की दो और रिपोर्ट तैयार कर ली है जिससे आने वाले दिनों में सरकार की परेशानी बढ़ जाएगी।
दैनिक `इंक्लाब' द्वारा सरकारी बिल में मदरसे और गैर सरकारी संगठन भी आते हैं, का समाचार प्रकाशित किए जाने के बाद पहली बार मुस्लिम संगठनों ने दबी जुबान से सरकारी बिल को खतरा बताया लेकिन इसी स्वर में उन्होंने अन्ना पर भी कटाक्ष कर उन्हें गलत बताया। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (मौलाना सालिम ग्रुप) के महासचिव इलियास मलिक ने सरकारी लोकपाल बिल को अस्वीकार करार देते हुए कहा कि सरकारी बिल के अध्याय छह की धारा `ई' में जो कुछ कहा गया है उसके तहत सभी सरकारी व गैर सरकारी संगठन विशेषकर हमारे मदरसे भी आ जाएंगे। जब हम अपने मदरसों के लिए कल नहीं तैयार हुए तो आज किस तरह तैयार हो जाएंगे कि इनमें हस्तक्षेप का दरवाजा खुले। जहां तक मदरसों में भ्रष्टचार का मामला है तो इसके लिए प्रबंधक कमेटियां होती हैं जो ट्रांसपैरेंसी के लिए प्रयासरत रहती हैं। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव मौलाना सैयद निजामुद्दीन ने सरकारी लोकपाल बिल में गैर सरकारी संगठनों और संस्थानों को इसके तहत लाने की बात पर कहा कि सरकार को इस पर पुनर्विचार करना चाहिए। ऐसा कानून नहीं बनना चाहिए जिससे समाज में बेचैनी पैदा हो।
ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस मुशावरत (सैयद शहाबुद्दीन ग्रुप) ने अपनी बैठक में निर्णय लिया कि भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए किसी बड़ी संस्था के गठन की जरूरत नहीं है, क्योंकि इतनी बड़ी संख्या खुद अपने बोझ तले दब जाएगा और भ्रष्टाचर दूर करने के बजाय भ्रष्टाचार फैलाने का कारण बनेगा। बैठक में मुस्लिम संगठनों के प्रतिनिधियों के अतिरिक्त सीजीआई(एम) के प्रतिनिधि को विशेष रूप से बुलाया गया था। बैठक में राजनेताओं सहित प्रधानमंत्री, ब्यूरोकेसी और न्यायपालिका को एक ताकतवर लोकपाल के अधीन लाने की बात कही गई लेकिन अन्ना के वर्तमान अनशन को गलत बताया गया।
A Blog is specially build for minorities. Where you can find a latest article as well as Issues. there is no need to recognize a muslim but there is a lot of work for humanity.
Friday, August 26, 2011
Friday, August 19, 2011
रमजान में भिखारियों का जमावड़ा
बीते सप्ताह जहां राजनैतिक मुद्दों पर उर्दू अखबारों ने अपना पक्ष रखा वहां पवित्र रमजान महीने के लिहाज से कुछ ऐसे मुद्दों को भी छेड़ा है जो दिलचस्प होने के साथ-साथ विचारणीय भी हैं। `रमजान में भीख मांगने के लिए महत्वपूर्ण सड़कों की नीलामी होती है' के विषय पर हैदराबाद से प्रकाशित उर्दू दैनिक `मुनसिफ' ने विशेष रिपोर्ट प्रकाशित कर बताया है कि किस तरह देश के विभिन्न शहरों से पेशावर भिखारियों की एक बड़ी संख्या हैदराबाद पहुंच चुकी है।
भिखारियों की इस टोली में ईसाई और हिन्दू भिखारी भी मुसलमानों के रूप में भीख मांगते हैं। रमजान के शुरू होते ही हिन्दुस्तानभर के पेशावर भिखारियों ने हैदराबाद का रुख कर लिया है। इनमें वह सफेदपोश भी शामिल हैं जो हाथों में रसीद लिए दीनी मदरसों और मस्जिद निर्माण के लिए चन्दे की अपीलें करते हैं। एक भिखारी ने बताया कि आम दिनों में वह अपने गांव में एक दुकान पर काम करता है लेकिन रमजान के सीजन में भीख मांगने के लिए हैदराबाद आ जाता है, जहां आम दिनों में उसे 800 रुपये से 1100 रुपये रोज मिल जाते हैं। भीख मांगने की जगह उसे ठेके पर मिलती है। ठेकेदार को रकम देकर और खाने-पीने का खर्च निकालकर वह ईद पर 15 से 20 हजार रुपये लेकर वापस जाता है। इसी तरह नाम पल्ली चौराहे के बाहर फुटपाथ पर एक टांग से विक्लांग भिखारी ने बताया कि वह गत सात साल से रमजान में भीख इकट्ठा करने आता है। अंधा भिखारी अकेला नहीं है उसके साथ इस काम में परिवार के 9 सदस्य रमजान में भीख मांग रहे हैं।
`जकात व्यवस्था के बावजूद मुसलमान सबसे ज्यादा गरीब हैं' के शीर्षक से दैनिक `हिन्दुस्तान एक्सप्रेस' में नूर उल्लाह जावेद अपने लेख में लिखते हैं। निसंदेह भारत जैसे देश में जहां मुसलमान अल्पसंख्यक हों वहां सामूहिक जकात व्यवस्था मुश्किल है लेकिन यह देश और राज्य स्तर पर नहीं हो सकता तो मोहल्ला की स्तर पर हम यह कोशिश कर ही सकते हैं। हमारे सामने मलेशिया, दक्षिण अफ्रीका की मिसाल है। मलेशिया में सरकार की निगरानी में जकात की रकम ली जाती है और इसको खर्च किया जाता है लेकिन दक्षिण अफ्रीका में यह व्यवस्था स्वयं मुसलमानों ने कायम कर रखी है। वास्तव में भारत में आज जकात की रकम पहले से कहीं ज्यादा निकलती है। सच्चर कमेटी रिपोर्ट के अनुसार भारतीय बैंकों में मुसलमानों की जो रकम जमा है उसका अनुमान 23657 करोड़ रुपये है। यदि इस रकम की जकात निकाली जाए तो कुल 5914 करोड़ रुपये जकात निकलेगी। यह केवल अनुमान है जबकि मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग ब्याज रहित लेन-देन के चलते अपनी रकम बैंकों में जमा नहीं करता है। यदि इस वर्ग की जकात को भी इसमें मिला लिया जाए तो हिन्दुस्तान में हर वर्ष 10829 करोड़ रुपये की जकात निकलेगी। यदि हम इसकी व्यवस्था करने में सफल हो जाते हैं तो निश्चय ही कुछ सालों में भारतीय मुसलमानों की बहुसंख्यक जकात देने वाली हो जाएगी।
ग्रीनलैंड जहां गर्मी के दिनों में दिन 16 घंटों का होता है वहां अगस्त के महीने में सूर्य अस्त रात 11 बजे होता है। दैनिक `अखबारे मशरिक' ने अरब टीवी `अल-अरबिया' के हवाले से लिखा है कि वसाम आजीकार नामी व्यक्ति गत कई वर्षों से यहां अपना होटल चलाते हैं और अकेले रोजेदार हैं, उनके आसपास कोई दूसरा मुस्लिम रोजेदार नहीं है। 21 घंटे के रोजे में उसके लिए सबसे मुश्किल समय अफतार का होता है यदि अफतार में जल्दी न की जाए तो मगरिब की नमाज कजा हो जाती है और एक रोजेदार के लिए रोजा रखकर मगरिब की नमाज कजा कर देना किसी सूरत स्वीकार्य नहीं है। लगभग 12 बजे रात ईशा की नमाज के समय शुरू होता है और फिर एक घंटे और कुछ मिनट के बाद ही सेहरी का समय शुरू हो जाता है। ग्रीनलैंड के इस इकलौते रोजेदार को लगभग तीन घंटे के अन्दर-अन्दर रोजा खोलने के बाद मगरिब और ईशा की नमाज अदा करना होता है।
ग्रीनलैंड में जिन्दगी सूरज के साथ नहीं चलती बल्कि घड़ी के साथ चलती है। इसलिए खाने-पीने का समय भी रात या दिन के हिसाब से नहीं होते बल्कि आमतौर पर लोग घड़ी देखकर जागने की हालत में हर छह घंटे बाद कुछ न कुछ खाते हैं। सर्दियों के मौसम में सूरज ज्यादा से ज्यादा केवल चार घंटे तक दिखाई देता है।
`अन्ना की आंधी है, यह दूसरे गांधी हैं' के शीर्षक से दैनिक `प्रताप' ने अपने सम्पादकीय में सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने लिखा है कि मंगलवार 16 अगस्त का दिन हमेशा याद रहेगा। यह कोई फिल्म से कम नहीं था। पूरे दिन सस्पेंस, ड्रामा, एमोशन सभी देखने को मिले। सारे देश की नजरें अन्ना पर लगी हुई थीöदेखें आज अन्ना क्या करते हैं। अन्ना अपने कहे पर खरे उतरे। मंगल की सुबह दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी लगभग ढाई सौ जवानों को लेकर मूयर विहार फेज-1 में स्थित सुप्रीम एन्क्लेव में प्रशांत भूषण के फ्लैट पहुंचे, लगभग आधा घंटा बातचीत में कोई नतीजा नहीं निकला तो अन्ना को उसी फ्लैट में जहां वह रुके थे, हिरासत में ले लिया।
अन्ना की गिरफ्तारी की खबर पूरे देश में फैल गई। कुछ माहौल वैसा ही था जो एक जमाने में जेपी आंदोलन के समय बना था। अन्ना आंदोलन अब पूरा रंग दिखा चुकी है। अन्ना मुद्दा, बाबा रामदेव जैसा मुद्दा नहीं बल्कि असल मुद्दा भ्रष्टाचार और महंगाई है। गिरफ्तारी के बाद अन्ना ने कहा कि यह परिवर्तन की लड़ाई है जब तक परिवर्तन नहीं आएगा तब तक जन समर्थन हासिल नहीं होगा।
`अन्ना हजारे का आंदोलन और सोनिया की अनुपस्थिति' के शीर्षक से पहले पेज पर प्रकाशित विशेष सम्पादकीय में दिल्ली संस्करण के सम्पादक हसन शुजा दैनिक `सहाफत' में लिखा है कि अन्ना हजारे के आंदोलन को एक तरफ आरएसएस परिवार, देसी और विदेशी ताकतें हवा दे रही हैं तो दूसरी ओर कांग्रेस पार्टी और सरकार इससे निपटने में नाकाम रही है। इस समय सोनिया गांधी की अनुपस्थिति बुरी तरह महसूस हो रही है जो अपने ईलाज के लिए अमेरिका के एक अस्पताल में दाखिल हैं। अन्ना आंदोलन को जिस तरह आरएसएस और भाजपा का समर्थन हासिल है उससे स्पष्ट है कि इस आंदोलन को पूरी तरह सांप्रदायिक ताकतों ने हाइजैक कर लिया है। भाजपा का खेल यह है कि वह इसका रुख मोड़कर सत्ता पर काबिज होना चाहती है। यदि भाजपा इसमें कामयाब हो जाती है तो यह सेकुलरिज्म के लिए बड़ा नुकसान होगा।
भिखारियों की इस टोली में ईसाई और हिन्दू भिखारी भी मुसलमानों के रूप में भीख मांगते हैं। रमजान के शुरू होते ही हिन्दुस्तानभर के पेशावर भिखारियों ने हैदराबाद का रुख कर लिया है। इनमें वह सफेदपोश भी शामिल हैं जो हाथों में रसीद लिए दीनी मदरसों और मस्जिद निर्माण के लिए चन्दे की अपीलें करते हैं। एक भिखारी ने बताया कि आम दिनों में वह अपने गांव में एक दुकान पर काम करता है लेकिन रमजान के सीजन में भीख मांगने के लिए हैदराबाद आ जाता है, जहां आम दिनों में उसे 800 रुपये से 1100 रुपये रोज मिल जाते हैं। भीख मांगने की जगह उसे ठेके पर मिलती है। ठेकेदार को रकम देकर और खाने-पीने का खर्च निकालकर वह ईद पर 15 से 20 हजार रुपये लेकर वापस जाता है। इसी तरह नाम पल्ली चौराहे के बाहर फुटपाथ पर एक टांग से विक्लांग भिखारी ने बताया कि वह गत सात साल से रमजान में भीख इकट्ठा करने आता है। अंधा भिखारी अकेला नहीं है उसके साथ इस काम में परिवार के 9 सदस्य रमजान में भीख मांग रहे हैं।
`जकात व्यवस्था के बावजूद मुसलमान सबसे ज्यादा गरीब हैं' के शीर्षक से दैनिक `हिन्दुस्तान एक्सप्रेस' में नूर उल्लाह जावेद अपने लेख में लिखते हैं। निसंदेह भारत जैसे देश में जहां मुसलमान अल्पसंख्यक हों वहां सामूहिक जकात व्यवस्था मुश्किल है लेकिन यह देश और राज्य स्तर पर नहीं हो सकता तो मोहल्ला की स्तर पर हम यह कोशिश कर ही सकते हैं। हमारे सामने मलेशिया, दक्षिण अफ्रीका की मिसाल है। मलेशिया में सरकार की निगरानी में जकात की रकम ली जाती है और इसको खर्च किया जाता है लेकिन दक्षिण अफ्रीका में यह व्यवस्था स्वयं मुसलमानों ने कायम कर रखी है। वास्तव में भारत में आज जकात की रकम पहले से कहीं ज्यादा निकलती है। सच्चर कमेटी रिपोर्ट के अनुसार भारतीय बैंकों में मुसलमानों की जो रकम जमा है उसका अनुमान 23657 करोड़ रुपये है। यदि इस रकम की जकात निकाली जाए तो कुल 5914 करोड़ रुपये जकात निकलेगी। यह केवल अनुमान है जबकि मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग ब्याज रहित लेन-देन के चलते अपनी रकम बैंकों में जमा नहीं करता है। यदि इस वर्ग की जकात को भी इसमें मिला लिया जाए तो हिन्दुस्तान में हर वर्ष 10829 करोड़ रुपये की जकात निकलेगी। यदि हम इसकी व्यवस्था करने में सफल हो जाते हैं तो निश्चय ही कुछ सालों में भारतीय मुसलमानों की बहुसंख्यक जकात देने वाली हो जाएगी।
ग्रीनलैंड जहां गर्मी के दिनों में दिन 16 घंटों का होता है वहां अगस्त के महीने में सूर्य अस्त रात 11 बजे होता है। दैनिक `अखबारे मशरिक' ने अरब टीवी `अल-अरबिया' के हवाले से लिखा है कि वसाम आजीकार नामी व्यक्ति गत कई वर्षों से यहां अपना होटल चलाते हैं और अकेले रोजेदार हैं, उनके आसपास कोई दूसरा मुस्लिम रोजेदार नहीं है। 21 घंटे के रोजे में उसके लिए सबसे मुश्किल समय अफतार का होता है यदि अफतार में जल्दी न की जाए तो मगरिब की नमाज कजा हो जाती है और एक रोजेदार के लिए रोजा रखकर मगरिब की नमाज कजा कर देना किसी सूरत स्वीकार्य नहीं है। लगभग 12 बजे रात ईशा की नमाज के समय शुरू होता है और फिर एक घंटे और कुछ मिनट के बाद ही सेहरी का समय शुरू हो जाता है। ग्रीनलैंड के इस इकलौते रोजेदार को लगभग तीन घंटे के अन्दर-अन्दर रोजा खोलने के बाद मगरिब और ईशा की नमाज अदा करना होता है।
ग्रीनलैंड में जिन्दगी सूरज के साथ नहीं चलती बल्कि घड़ी के साथ चलती है। इसलिए खाने-पीने का समय भी रात या दिन के हिसाब से नहीं होते बल्कि आमतौर पर लोग घड़ी देखकर जागने की हालत में हर छह घंटे बाद कुछ न कुछ खाते हैं। सर्दियों के मौसम में सूरज ज्यादा से ज्यादा केवल चार घंटे तक दिखाई देता है।
`अन्ना की आंधी है, यह दूसरे गांधी हैं' के शीर्षक से दैनिक `प्रताप' ने अपने सम्पादकीय में सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने लिखा है कि मंगलवार 16 अगस्त का दिन हमेशा याद रहेगा। यह कोई फिल्म से कम नहीं था। पूरे दिन सस्पेंस, ड्रामा, एमोशन सभी देखने को मिले। सारे देश की नजरें अन्ना पर लगी हुई थीöदेखें आज अन्ना क्या करते हैं। अन्ना अपने कहे पर खरे उतरे। मंगल की सुबह दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी लगभग ढाई सौ जवानों को लेकर मूयर विहार फेज-1 में स्थित सुप्रीम एन्क्लेव में प्रशांत भूषण के फ्लैट पहुंचे, लगभग आधा घंटा बातचीत में कोई नतीजा नहीं निकला तो अन्ना को उसी फ्लैट में जहां वह रुके थे, हिरासत में ले लिया।
अन्ना की गिरफ्तारी की खबर पूरे देश में फैल गई। कुछ माहौल वैसा ही था जो एक जमाने में जेपी आंदोलन के समय बना था। अन्ना आंदोलन अब पूरा रंग दिखा चुकी है। अन्ना मुद्दा, बाबा रामदेव जैसा मुद्दा नहीं बल्कि असल मुद्दा भ्रष्टाचार और महंगाई है। गिरफ्तारी के बाद अन्ना ने कहा कि यह परिवर्तन की लड़ाई है जब तक परिवर्तन नहीं आएगा तब तक जन समर्थन हासिल नहीं होगा।
`अन्ना हजारे का आंदोलन और सोनिया की अनुपस्थिति' के शीर्षक से पहले पेज पर प्रकाशित विशेष सम्पादकीय में दिल्ली संस्करण के सम्पादक हसन शुजा दैनिक `सहाफत' में लिखा है कि अन्ना हजारे के आंदोलन को एक तरफ आरएसएस परिवार, देसी और विदेशी ताकतें हवा दे रही हैं तो दूसरी ओर कांग्रेस पार्टी और सरकार इससे निपटने में नाकाम रही है। इस समय सोनिया गांधी की अनुपस्थिति बुरी तरह महसूस हो रही है जो अपने ईलाज के लिए अमेरिका के एक अस्पताल में दाखिल हैं। अन्ना आंदोलन को जिस तरह आरएसएस और भाजपा का समर्थन हासिल है उससे स्पष्ट है कि इस आंदोलन को पूरी तरह सांप्रदायिक ताकतों ने हाइजैक कर लिया है। भाजपा का खेल यह है कि वह इसका रुख मोड़कर सत्ता पर काबिज होना चाहती है। यदि भाजपा इसमें कामयाब हो जाती है तो यह सेकुलरिज्म के लिए बड़ा नुकसान होगा।
Friday, August 12, 2011
मुस्लिम सांसद अपने समुदाय के लिए आवाज नहीं उठाते
बीते सप्ताह उर्दू अखबारों ने विभिन्न मुद्दों को चर्चा का विषय बनाया है। उर्दू दैनिक `सहाफत' ने मुस्लिम संगठनों को आड़े हाथ लेते हुए उन पर आरोप लगाया है कि यह संगठन मासूम युवाओं के संरक्षण में नाकाम है। मोहम्मद आतिफ ने अपनी रिपोर्ट में मुंबई से समाजवादी विधायक अबु आसिम आजमी द्वारा रमजान के अवसर पर भेजे गए एसएमएस, जिसमें उन्होंने लिखा है कि इस महीने में उन लोगों की भी खबरगीरी कीजिए जिनके बच्चे जेलों में बंद हैं और इंसाफ से वंचित हैं। अपने देश और पूरी दुनिया में शांति व्यवस्था बनी रहे, इसकी भी दुआ कीजिए। इस पर मुस्लिम पॉलिटिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष तसलीम अहमद रहमानी ने कहा कि मुझे यह स्वीकार करने में शर्मिंदगी जरूर है लेकिन संकोच नहीं है कि आतंकवाद के मामले पर मुस्लिम संगठन अपने मासूम बच्चों को संरक्षण देने में पूरी तरह नाकाम हैं। उन्होंने कहा कि हम इन बच्चों को कोई कानूनी सहायता भी नहीं दे पा रहे हैं जिससे उनकी रिहाई का रास्ता आसान हो सके। इसके अलावा बेरोजगार मां-बाप जिनके बच्चे जेलों में कैद हैं उन्हें भुखमरी से निजात दिलाने के लिए भी हमने कोई रणनीति नहीं अपनाई है जबकि उन्हीं के नाम पर हम अपनी सियासत चमका रहे हैं।
संसद के मानसून सत्र में मुसलमानों की बहुत-सी समस्याओं पर आवाज नहीं उठेगी जैसे मुद्दे पर चर्चा करते हुए दैनिक `इंकलाब' ने लिखा है कि राइट टू एजुकेशन, जामिया अल्पसंख्यक चरित्र का मामला, मुसलमानों को आरक्षण और वक्फ जैसे मुद्दों पर मुस्लिम सांसदों को सूचना उपलब्ध कराने के बावजूद हर तरफ खामोशी पर चिंन्ता प्रकट की है। संसद का मानसून सत्र में महंगाई और सीएजी रिपोर्ट के खुलासे के बाद भाजपा ने कांग्रेस के खिलाफ अपना मोर्चा खोल दिया है। इन हालात में मुस्लिम अल्पसंख्यकों के मामले को संसद में उठाना काफी मुश्किल लग रहा है। विशेषकर मुस्लिम सांसदों की जो भूमिका रहती है उससे तो यही संदेह व्यक्त किया जा रहा है कि इस बार भी उपरोक्त मुद्दों पर मुस्लिम सांसद कोई चर्चा नहीं करेंगे। सूत्रों के अनुसार मुसलमानों के एक बड़े संगठन की ओर से यह कोशिश की जा रही है कि इन मुद्दों पर लिखित नोट तैयार किया जाए जो उर्दू, हिन्दी और अंग्रेजी तीनों भाषाओं में हो ताकि मुस्लिम सांसदों को इन मुद्दों को समझने और सवालों का जवाब देने में किसी तरह की परेशानी न हो। जकति फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. जफर महमूद मानते हैं कि मुस्लिम सांसद अपने समुदाय के लिए आवाज नहीं उठाते हैं।
आदर्श सोसाइटी मामले में कैग रिपोर्ट पर अपने सम्पादकीय में दैनिक `हिन्द समाचार' ने लिखा है कि कारगिल जंग के शहीदों की विधवाओं और अन्य फौजियों के रहने के लिए मुंबई के कोलाबा में बनी आदर्श हाउसिंग सोसाइटी का महाघोटाला संसद में `कैग' की रिपोर्ट के बाद फिर से चर्चा में है। पहले यहां 8 मंजिल बनाने की इजाजत दी गई लेकिन बाद में पर्यावरण एवं अन्य मापदंडों की अनदेखी करते हुए इसे 31 मंजिल और 200 से ज्यादा फ्लैट वाली बिल्डिंग बना दी गई। 9 अगस्त को संसद में पेश अपनी 51 पेज की रिपोर्ट में कैग ने आदर्श सोसाइटी का कच्चा चिट्ठा खोलते हुए कहा कि इसमें दो पूर्व मुख्यमंत्रियों के अलावा फौज के दो पूर्व जनरल एनसी विज और जनरल दीपक कपूर को नियम तोड़कर फ्लैट हासिल करने का कसूरवार ठहराया है। `कैग' ने कहा है कि शायद देश में ऐसा दूसरा कोई भी मामला देखने में नहीं आया है जिसमें सभी संबंधित विभाग एक राष्ट्रीय हित के लिए नहीं बल्कि व्यक्तिगत हितों के लिए एकजुट हुए। सभी ने मिलकर आम जनता का भरोसा तोड़ा और कारगिल शहीदों का अपमान किया। कैग की रिपोर्ट ने केंद्र सरकार की परेशानी बन रहे भ्रष्टाचार मुद्दों की सूची में और वृद्धि कर दी है। इसी कारण सरकार और उसके उच्चाधिकारी कैग के खुलासे से काफी परेशानी महसूस कर रहे हैं, क्योंकि इस रिपोर्ट ने साबित कर दिया है कि नेताओं, बाबुओं और फौज के सदस्यों अर्थात् सबने मिलकर नियमों को तोड़ा और साबित कर दिया कि `सब चोर' हैं।
दैनिक `राष्ट्रीय सहारा' ने अपने सम्पादकीय में आदर्श सोसाइटी पर कैग की रिपोर्ट के हवाले से लिखा है कि राष्ट्रमंडल खेलों में हुए भ्रष्टाचार पर कैग की रिपोर्ट पर संसद और इसके बाहर हंगामा जारी है। यूपीए सरकार के लिए चैलेंज है कि वह इन सबका मुकाबला कैसे करें और संसद की कार्यवाही कैसे चले। सरकार की इन परेशानियों में आदर्श सोसाइटी में घपले पर कैग रिपोर्ट ने और भी वृद्धि कर दी है। कैग की रिपोर्ट न केवल केंद्र की यूपीए सरकार बल्कि महाराष्ट्र सरकार के लिए भी समस्या बनी हुई है क्योंकि इसके बाद दोनों सरकारों पर कसूरवार ठहराए गए नेताओं, मंत्रियों और नौकरशाहों पर कार्यवाही के लिए दबाव बढ़ जाएगा। सरकार के रुख से ऐसा लगता है कि वह कैग की रिपोर्ट को ज्यादा महत्व देने के मूड में नहीं है और अपने मंत्रियों के बचाव में उतर सकती है। शीला दीक्षित के मामले में अपनाया गया रवैया इसका सबूत है लेकिन जहां तक नौकरशाहों अथवा उच्च फौजी अधिकारियों का मामला है तो इनमें से कुछ को बलि का बकरा बनाकर इस मामले को ठंडा करने की कोशिश की जा सकती है। `सोनिया की अनुपस्थिति में पार्टी को ठीकठाक चलाना चुनौती है' के शीर्षक से दैनिक `प्रताप' में सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि आमतौर पर स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर 24 अकबर रोड स्थित कांग्रेस मुख्यालय में पार्टी प्रधान तिरंगा लहराती हैं लेकिन इस वर्ष पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी देश में नहीं हैं इसलिए किसी और को उनकी अनुपस्थिति में झंडा लहराना पड़ेगा। सोनिया गांधी के बाद आशा तो यह है कि राहुल गांधी इस बार राष्ट्रीय झंडा लहराएंगे। लेकिन राहुल गांधी फिलहाल अमेरिका में अपनी मां के साथ हैं। शायद वह आज-कल में आ जाएंगे। कांग्रेस पार्टी को फिलहाल दैनिक कार्यों को ठीक-ठीक चलाने के अलावा एक अहम फैसला यूपी में टिकट बंटवारे और यूपी लीडरशिप को लेकर करना होगा। इसके लिए क्रीनिंग कमेटी की बैठक होनी है। मोहन प्रकाश की अगुवाई में होने वाली बैठक तभी होगी जब राहुल गांधी वापस आ जाएंगे। राहुल का यूपी मिशन 2012 उनकी अनुपस्थिति में अधूरा है और इनके लौटने पर ही इसमें रंग भरा जाएगा।
संसद के मानसून सत्र में मुसलमानों की बहुत-सी समस्याओं पर आवाज नहीं उठेगी जैसे मुद्दे पर चर्चा करते हुए दैनिक `इंकलाब' ने लिखा है कि राइट टू एजुकेशन, जामिया अल्पसंख्यक चरित्र का मामला, मुसलमानों को आरक्षण और वक्फ जैसे मुद्दों पर मुस्लिम सांसदों को सूचना उपलब्ध कराने के बावजूद हर तरफ खामोशी पर चिंन्ता प्रकट की है। संसद का मानसून सत्र में महंगाई और सीएजी रिपोर्ट के खुलासे के बाद भाजपा ने कांग्रेस के खिलाफ अपना मोर्चा खोल दिया है। इन हालात में मुस्लिम अल्पसंख्यकों के मामले को संसद में उठाना काफी मुश्किल लग रहा है। विशेषकर मुस्लिम सांसदों की जो भूमिका रहती है उससे तो यही संदेह व्यक्त किया जा रहा है कि इस बार भी उपरोक्त मुद्दों पर मुस्लिम सांसद कोई चर्चा नहीं करेंगे। सूत्रों के अनुसार मुसलमानों के एक बड़े संगठन की ओर से यह कोशिश की जा रही है कि इन मुद्दों पर लिखित नोट तैयार किया जाए जो उर्दू, हिन्दी और अंग्रेजी तीनों भाषाओं में हो ताकि मुस्लिम सांसदों को इन मुद्दों को समझने और सवालों का जवाब देने में किसी तरह की परेशानी न हो। जकति फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. जफर महमूद मानते हैं कि मुस्लिम सांसद अपने समुदाय के लिए आवाज नहीं उठाते हैं।
आदर्श सोसाइटी मामले में कैग रिपोर्ट पर अपने सम्पादकीय में दैनिक `हिन्द समाचार' ने लिखा है कि कारगिल जंग के शहीदों की विधवाओं और अन्य फौजियों के रहने के लिए मुंबई के कोलाबा में बनी आदर्श हाउसिंग सोसाइटी का महाघोटाला संसद में `कैग' की रिपोर्ट के बाद फिर से चर्चा में है। पहले यहां 8 मंजिल बनाने की इजाजत दी गई लेकिन बाद में पर्यावरण एवं अन्य मापदंडों की अनदेखी करते हुए इसे 31 मंजिल और 200 से ज्यादा फ्लैट वाली बिल्डिंग बना दी गई। 9 अगस्त को संसद में पेश अपनी 51 पेज की रिपोर्ट में कैग ने आदर्श सोसाइटी का कच्चा चिट्ठा खोलते हुए कहा कि इसमें दो पूर्व मुख्यमंत्रियों के अलावा फौज के दो पूर्व जनरल एनसी विज और जनरल दीपक कपूर को नियम तोड़कर फ्लैट हासिल करने का कसूरवार ठहराया है। `कैग' ने कहा है कि शायद देश में ऐसा दूसरा कोई भी मामला देखने में नहीं आया है जिसमें सभी संबंधित विभाग एक राष्ट्रीय हित के लिए नहीं बल्कि व्यक्तिगत हितों के लिए एकजुट हुए। सभी ने मिलकर आम जनता का भरोसा तोड़ा और कारगिल शहीदों का अपमान किया। कैग की रिपोर्ट ने केंद्र सरकार की परेशानी बन रहे भ्रष्टाचार मुद्दों की सूची में और वृद्धि कर दी है। इसी कारण सरकार और उसके उच्चाधिकारी कैग के खुलासे से काफी परेशानी महसूस कर रहे हैं, क्योंकि इस रिपोर्ट ने साबित कर दिया है कि नेताओं, बाबुओं और फौज के सदस्यों अर्थात् सबने मिलकर नियमों को तोड़ा और साबित कर दिया कि `सब चोर' हैं।
दैनिक `राष्ट्रीय सहारा' ने अपने सम्पादकीय में आदर्श सोसाइटी पर कैग की रिपोर्ट के हवाले से लिखा है कि राष्ट्रमंडल खेलों में हुए भ्रष्टाचार पर कैग की रिपोर्ट पर संसद और इसके बाहर हंगामा जारी है। यूपीए सरकार के लिए चैलेंज है कि वह इन सबका मुकाबला कैसे करें और संसद की कार्यवाही कैसे चले। सरकार की इन परेशानियों में आदर्श सोसाइटी में घपले पर कैग रिपोर्ट ने और भी वृद्धि कर दी है। कैग की रिपोर्ट न केवल केंद्र की यूपीए सरकार बल्कि महाराष्ट्र सरकार के लिए भी समस्या बनी हुई है क्योंकि इसके बाद दोनों सरकारों पर कसूरवार ठहराए गए नेताओं, मंत्रियों और नौकरशाहों पर कार्यवाही के लिए दबाव बढ़ जाएगा। सरकार के रुख से ऐसा लगता है कि वह कैग की रिपोर्ट को ज्यादा महत्व देने के मूड में नहीं है और अपने मंत्रियों के बचाव में उतर सकती है। शीला दीक्षित के मामले में अपनाया गया रवैया इसका सबूत है लेकिन जहां तक नौकरशाहों अथवा उच्च फौजी अधिकारियों का मामला है तो इनमें से कुछ को बलि का बकरा बनाकर इस मामले को ठंडा करने की कोशिश की जा सकती है। `सोनिया की अनुपस्थिति में पार्टी को ठीकठाक चलाना चुनौती है' के शीर्षक से दैनिक `प्रताप' में सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि आमतौर पर स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर 24 अकबर रोड स्थित कांग्रेस मुख्यालय में पार्टी प्रधान तिरंगा लहराती हैं लेकिन इस वर्ष पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी देश में नहीं हैं इसलिए किसी और को उनकी अनुपस्थिति में झंडा लहराना पड़ेगा। सोनिया गांधी के बाद आशा तो यह है कि राहुल गांधी इस बार राष्ट्रीय झंडा लहराएंगे। लेकिन राहुल गांधी फिलहाल अमेरिका में अपनी मां के साथ हैं। शायद वह आज-कल में आ जाएंगे। कांग्रेस पार्टी को फिलहाल दैनिक कार्यों को ठीक-ठीक चलाने के अलावा एक अहम फैसला यूपी में टिकट बंटवारे और यूपी लीडरशिप को लेकर करना होगा। इसके लिए क्रीनिंग कमेटी की बैठक होनी है। मोहन प्रकाश की अगुवाई में होने वाली बैठक तभी होगी जब राहुल गांधी वापस आ जाएंगे। राहुल का यूपी मिशन 2012 उनकी अनुपस्थिति में अधूरा है और इनके लौटने पर ही इसमें रंग भरा जाएगा।
Friday, August 5, 2011
महंगाई और भ्रष्टाचार में फंसी सरकार
`मुस्लिम कैसे पाएं अपना वाजिब स्थान' के शीर्षक से उर्दू दैनिक `हिन्द समाचार' ने लिखा है। दूसरी पिछड़ी जातियों से जुड़े मुस्लिमों के लिए यूपीए सरकार कुछ आरक्षण कर रही है क्योंकि उत्तर प्रदेश में चुनाव समीप है और कांग्रेस का मकसद यह है कि वह दोबारा इस राज्य में पदासीन हो जाए। भारतीय मुसलमानों के सामने आरक्षण ही अहम मुद्दा नहीं है अन्य कई समस्याएं भी हैं। उनकी स्थिति तो प्रचलित फारसी कहावत `तन हम दाग, दाग सूद, पम्बा कुजा नेहाम' (पूरे बदन पर दाग ही दाग हैं) में कितनी जगह फाया रखूं। अन्य समस्याओं को छोड़कर केवल एक समस्या से ही निपटना असंतुष्टि है, इससे भले ही बुरा मकसद जाहिर न होता हो, अज्ञात कारणों से नाइंसाफी को जारी रखने की बू आती है। ऐसा लगता है कि आरक्षण की यह पेशकश बड़ी होशियारी से तैयारी की गई है। इसके बाद कांग्रेस के कुछ चहेते इसे अदालत में चैलेंज करेंगे और अदालतें इसे एक अथवा दूसरा कारण बताकर निरस्त कर देंगी। आखिर हिन्दू वोट मुस्लिम वोट के मुकाबले अहम है क्योंकि हिन्दू वोट मुस्लिम वोट के मुकाबले कहीं ज्यादा है। इसी बीच आरक्षण की इस घोषणा से कांग्रेस की चुनावी मुहिम चलाने वाले पूरा फायदा उठा लेंगे। इस प्रक्रिया में मुस्लिमों की नई राजनैतिक पार्टियों को चुनाव में नुकसान पहुंचेगा जैसा कि एआईयूडीएफ, पीस पार्टी और वैलफेयर पार्टी से जाहिर है। इसलिए मुस्लिमों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उन्हें वहीं कांग्रेस के बारे में वोट देने के लिए सोचना चाहिए जहां इन पार्टियों में किसी एक अथवा अन्य का कोई उम्मीदवार न हो। `वोटिंग कायदे के तहत बहस का जुआ' के शीर्षक से दैनिक `प्रताप' में सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने अपने सम्पादकीय में लिखा है। जैसा कि आशा थी भारतीय जनता पार्टी ने संसद में यूपीए सरकार पर हल्ला बोल दिया है और भ्रष्टाचार व महंगाई को लेकर केंद्र की कांग्रेस अगुवाई वाली यूपीए सरकार को घेरने में लगी भाजपा ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को चारों तरफ से घेरने की पूरी योजना बना ली है। भाजपा ने इन पर मानसून सत्र का माहौल खराब करने का भी आरोप लगा दिया है।
भ्रष्टाचार और महंगाई पर भाजपा केवल बहस ही नहीं बल्कि वोटिंग भी चाहती है ताकि इन मुद्दों पर यह साफ हो सके कि कौन सरकार के साथ है और कौन सरकार के खिलाफ। यह दांव चलकर भाजपा कांग्रेस के साथ इसके सहयोगियों को भी बेनकाब करना चाहती है। भाजपा का अनुमान है कि इन मुद्दों पर यदि वोटिंग हुई तो यूपीए सरकार फंस सकती है। सरकार ने वोट कायदे के तहत बहस कराना स्वीकार कर लिया है। देखें इस जुए में वह कितनी कामयाब होती है?
हैदराबाद से प्रकाशित उर्दू दैनिक `ऐतमाद' में आमिर उल्लाह खां ने `सुधारों के 20 साल' के शीर्षक से समीक्षा करते हुए लिखा है कि 20 साल पूर्व भारत की प्रति व्यक्ति आय 30 डालर थी अर्थात् हर भारतीय की मासिक आय 400 रुपये से भी कम थी। लेकिन अब यह 1500 डालर अर्थात् 60 हजार रुपये को छूने लगी है। सरकार के पास अब खजाना भरा हुआ है ताकि वह गरीबों पर खर्च कर सके। मनमोहन सिंह ने 20 वर्ष पूर्व सुधारों का जब सफर शुरू किया था। यही कहा जा रहा था कि भारत संकट में आ जाएगा। गरीबी बढ़ेगी, भारतीय कम्पनियां बन्द होंगी, हर चीज इम्पोर्ट करना पड़ेगी और विदेशी कम्पनियों का भारतीय मंडियों पर कब्जा हो जाएगा। लेकिन इनमें से कोई संदेह सच साबित न हो सका। भारत में विदेशी निवेश में जितनी वृद्धि हुई, भारतीयों ने भी विदेशों में उतना ही निवेश किया।
`मस्जिदों पर गैर कानूनी कब्जों के लिए दिल्ली वक्फ बोर्ड जिम्मेदार' के शीर्षक से दैनिक `सहाफत' में मुमताज आलम रिजवी ने अपनी विशेष रिपोर्ट में आरटीआई के हवाले से लिखा है कि जमीयत इस्लामी हिन्द के सहायक सचिव इंतिजार नईम की 16 जून 2011 की आरटीआई के जवाब में वक्फ बोर्ड ने यह तो बताया कि 26 वक्फ जायदादों पर विभिन्न सरकारी संस्थानों के गैर कानूनी कब्जे हैं और 72 वक्फ जायदादों पर पुरातत्व विभाग का गैर कानूनी कब्जा है। दिल्ली वक्फ बोर्ड की लापरवाही की एक मिसाल निजामुद्दीन के पीछे रिंग रोड पर मिलिनियम पार्प से मिला हुआ 14 एकड़ कब्रिस्तान की जमीन है। 19 सितम्बर 1949 में सरकार से एक रजिस्टर्ड संधि के तहत दिल्ली के मुसलमानों के लिए 14 एकड़ जमीन कब्रिस्तान के लिए अलाट की गई थी लेकिन डीडीए ने इस 14 एकड़ में से 10 एकड़ जमीन इस शर्त पर इस्तेमाल कर लिया कि वक्फ बोर्ड को जब इसकी जरूरत होगी वह इसे इस्तेमाल कर सकेगा। आरटीआई द्वारा यह पूछे जाने पर कि वक्फ बोर्ड ने इस 14 एकड़ कब्रिस्तान की जमीन की सुरक्षा के लिए क्या उपाय किए और बोर्ड की बैठक में यह एजेंडा कब रहा? के जवाब में वक्फ अधिकारी नजमुल हसनैन ने लिखा कि इस 14 एकड़ जमीन की हिफाजत के लिए दिल्ली वक्फ बोर्ड की ओर से कोई उपाय नहीं किए गए और न ही कोई कानूनी कार्यवाही की गई।
भ्रष्टाचार और महंगाई पर भाजपा केवल बहस ही नहीं बल्कि वोटिंग भी चाहती है ताकि इन मुद्दों पर यह साफ हो सके कि कौन सरकार के साथ है और कौन सरकार के खिलाफ। यह दांव चलकर भाजपा कांग्रेस के साथ इसके सहयोगियों को भी बेनकाब करना चाहती है। भाजपा का अनुमान है कि इन मुद्दों पर यदि वोटिंग हुई तो यूपीए सरकार फंस सकती है। सरकार ने वोट कायदे के तहत बहस कराना स्वीकार कर लिया है। देखें इस जुए में वह कितनी कामयाब होती है?
हैदराबाद से प्रकाशित उर्दू दैनिक `ऐतमाद' में आमिर उल्लाह खां ने `सुधारों के 20 साल' के शीर्षक से समीक्षा करते हुए लिखा है कि 20 साल पूर्व भारत की प्रति व्यक्ति आय 30 डालर थी अर्थात् हर भारतीय की मासिक आय 400 रुपये से भी कम थी। लेकिन अब यह 1500 डालर अर्थात् 60 हजार रुपये को छूने लगी है। सरकार के पास अब खजाना भरा हुआ है ताकि वह गरीबों पर खर्च कर सके। मनमोहन सिंह ने 20 वर्ष पूर्व सुधारों का जब सफर शुरू किया था। यही कहा जा रहा था कि भारत संकट में आ जाएगा। गरीबी बढ़ेगी, भारतीय कम्पनियां बन्द होंगी, हर चीज इम्पोर्ट करना पड़ेगी और विदेशी कम्पनियों का भारतीय मंडियों पर कब्जा हो जाएगा। लेकिन इनमें से कोई संदेह सच साबित न हो सका। भारत में विदेशी निवेश में जितनी वृद्धि हुई, भारतीयों ने भी विदेशों में उतना ही निवेश किया।
`मस्जिदों पर गैर कानूनी कब्जों के लिए दिल्ली वक्फ बोर्ड जिम्मेदार' के शीर्षक से दैनिक `सहाफत' में मुमताज आलम रिजवी ने अपनी विशेष रिपोर्ट में आरटीआई के हवाले से लिखा है कि जमीयत इस्लामी हिन्द के सहायक सचिव इंतिजार नईम की 16 जून 2011 की आरटीआई के जवाब में वक्फ बोर्ड ने यह तो बताया कि 26 वक्फ जायदादों पर विभिन्न सरकारी संस्थानों के गैर कानूनी कब्जे हैं और 72 वक्फ जायदादों पर पुरातत्व विभाग का गैर कानूनी कब्जा है। दिल्ली वक्फ बोर्ड की लापरवाही की एक मिसाल निजामुद्दीन के पीछे रिंग रोड पर मिलिनियम पार्प से मिला हुआ 14 एकड़ कब्रिस्तान की जमीन है। 19 सितम्बर 1949 में सरकार से एक रजिस्टर्ड संधि के तहत दिल्ली के मुसलमानों के लिए 14 एकड़ जमीन कब्रिस्तान के लिए अलाट की गई थी लेकिन डीडीए ने इस 14 एकड़ में से 10 एकड़ जमीन इस शर्त पर इस्तेमाल कर लिया कि वक्फ बोर्ड को जब इसकी जरूरत होगी वह इसे इस्तेमाल कर सकेगा। आरटीआई द्वारा यह पूछे जाने पर कि वक्फ बोर्ड ने इस 14 एकड़ कब्रिस्तान की जमीन की सुरक्षा के लिए क्या उपाय किए और बोर्ड की बैठक में यह एजेंडा कब रहा? के जवाब में वक्फ अधिकारी नजमुल हसनैन ने लिखा कि इस 14 एकड़ जमीन की हिफाजत के लिए दिल्ली वक्फ बोर्ड की ओर से कोई उपाय नहीं किए गए और न ही कोई कानूनी कार्यवाही की गई।
Saturday, July 30, 2011
दिल्ली पुलिस में मुसलमान प्रमोशन से वंचित'
बीते सप्ताह राजनैतिक, सामाजिक मुद्दों सहित अनेक ज्वलंत मुद्दों पर उर्दू अखबारों ने खुलकर अपना नजरिया पेश किया है। पेश है इस बाबत उर्दू अखबारों की राय। उर्दू का सबसे बड़ा अखबार दैनिक `हिन्द समाचार' ने `गडकरी पहले अपने गिरेबां में झांकें' की शीर्षक से लिखे सम्पादकीय में चर्चा करते हुए लिखा है। कर्नाटक सरकार की तरफ से अधिग्रहण जमीन का अधिग्रहण खत्म कर अपने रिश्तेदारों को अलॉट करने, अपने नजदीकी मंत्री को एक बिल्डर से छह करोड़ रुपये दिलाने और अपने मंत्रिमंडल में शामिल खनन व्यावसायी रेड्डी बंधुओं को लाभ पहुंचाने आदि के आरोप में घिरे मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा अब लोक आयुक्त जस्टिस संतोष हेगड़े की ओर से सौंपी जाने वाली 1827 करोड़ रुपये के गैर-कानूनी खनन घोटाले से संबंधित रिपोर्ट में बुरी तरह फंस गए हैं।
एक टीवी चैनल की ओर से लोक आयुक्त की लीक हुई इस रिपोर्ट में येदियुरप्पा का नाम आने पर कांग्रेस एवं अन्य पार्टियों ने जब इससे त्यागपत्र मांगा तो भाजपा अध्यक्ष ने इसका बचाव करते हुए कह दिया कि हम लोक आयुक्त की रिपोर्ट आने के बाद ही इस पर कार्यवाही करेंगे। लेकिन जब 1.76 लाख करोड़ रुपये के स्पेक्ट्रम घोटाले में पूर्व संचार मंत्री ए. राजा ने 25 जुलाई को सीबीआई की विशेष अदालत में यह कहा कि इस लेनदेन में डॉ. मनमोहन सिंह और पी. चिदम्बरम को पूरी जानकारी थी तो गडकरी ने तुरन्त ही दोनों से त्यागपत्र की मांग कर डाली। जहां तक स्पेक्ट्रम घोटाले में राजा के लिप्त होने और इन दोनों को जानकारी होने का सवाल है। गडकरी की मांग सही है लेकिन गडकरी को उनसे त्यागपत्र मांगने का कोई नैतिक हक नहीं है। गडकरी पहले ही यह कर उन्हें `बरी' कर चुके हैं कि येदियुरप्पा की कार्यवाही गैर-कानूनी नहीं अनैतिक है। श्री गडकरी पहले अपनी पार्टी का दामन साफ करें इसके बाद ही कांग्रेस को सफाई की नसीहत दें।
`दिल्ली पुलिस में मुसलमान प्रमोशन से वंचित, 15 फीसदी से अधिक मुस्लिम आबादी के बावजूद पुलिस में प्रतिनिधित्व 2 फीसदी से भी कम' के शीर्षक दैनिक `हमारा समाज' में सादिक शेरवानी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि करोड़ों की आबादी के बावजूद दिल्ली में एक भी मुस्लिम डीसीपी नहीं है जिसको फुल चार्ज दिया गया हो। दिल्ली के कुल 186 थानों में तैनात एसएचओ में मुसलमानों की संख्या दो है जबकि कुल 181 एडीशनल एसएचओ में एक भी मुस्लिम नहीं है। 186 इंस्पेक्टर एटीओ में केवल 2एटीओ इंस्पेक्टर मुस्लिम हैं। दिल्ली पुलिस में उच्च पदों पर तरक्की देने से मुसलमानों को रोका जाता है। इस तरह का आरोप लगाते हुए कई संगठनों ने दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग से शिकायत की थी। जिस पर कार्यवाही करते हुए अल्पसंख्यक आयोग ने दिल्ली पुलिस से जानकारी मांगी थी। गृह मंत्रालय द्वारा भेजी रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली पुलिस में स्पेशल/ज्वाइंट एडीशनल पुलिस आयुक्त की कुल संख्या 44 है। इनमें केवल एक मुस्लिम है जबकि तीन सिख समुदाय से हैं। इसी तरह एसीपी की संख्या 266 है और इनमें से केवल 7 मुस्लिम हैं, सिख 18 हैं। इंस्पेक्टरों की कुल संख्या 1315 है जिनमें से केवल 14 मुस्लिम हैं जबकि 40 सिखों को तरक्की दी गई है। इसी तरह हेडकांस्टेबल को तरक्की देकर एएसआई बनाया जाता है। एएसआई की कुल संख्या 6100 है जिनमें से 173 मुस्लिम हैं, 238 सिख हैं अर्थात् प्रमोशन के लिहाज से मुसलमान सिख समुदाय से पीछे हैं।
`हिना रब्बानी का भारत दौरा' के शीर्षक से दैनिक `इंक्लाब' ने चर्चा करते हुए लिखा है कि पाकिस्तान की नई और प्रथम महिला विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार का भारत दौरा उसी सिलसिले की कड़ी है जिसके तहत दोनों देशों के अधिकारी और मंत्री एक-दूसरे से मिलते रहते हैं। हिना रब्बानी ने भारत आने के पूर्व और भारत पहुंचकर जिस तरह के बयानात दिए हैं उनमें डिप्लोमैटिक शब्दों और प्रचलित शब्दावलियों के अलावा यदि कुछ है तो यह कि कुछ नहीं है। उनके यह शब्द आकर्षक हैं इसलिए सुनने में भी अच्छे मालूम होते हैं। दोबारा बातचीत, दूरी से बेहतर हैं और इतिहास से सबक लिया जाता है और इसे बोझ नहीं समझा जाता। हमें इन शब्दों में कोई गम्भीर पहल का जज्बा दिखाई नहीं पड़ता। एक बात साफ है कि पाकिस्तान अपनी शर्तों पर दोस्ती करना चाहेगा तो रिश्ते मजबूत होना तो दूर की बात, दोस्ती का वातावरण भी पैदा नहीं हो सकता। हिना रब्बानी का यह पहला दौरा है। इसी दौरे से उनके अगले दौरे की शुरुआत हो रही है। इस दौरे की कामयाबी ही उनके अगले दौरे की कामयाबी की जमानत होगी ऐसे में फैसला उन्हीं को करना है कि वह क्या चाहती हैं।
दैनिक `प्रताप' में सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि लगभग एक सप्ताह बाद संसद का मानसून सत्र शुरू होने वाला है। पहले से ही कई तरफ से घिरी कांग्रेस पार्टी और उनके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और घिरने वाले हैं। विपक्ष ने पहले से ही कई मुद्दों पर सरकार के खिलाफ घेराबंदी तेज कर दी है। ऐसे में ए. राजा का सीबीआई की विशेष अदालत में प्रधानमंत्री और गृहमंत्री पर सीधे आरोप लगाने से पार्टी और सरकार दोनों की खासी खिंचाई होने की संभावना है। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला मामले में पहले ही सुप्रीम कोर्ट के फटकार झेल चुके प्रधानमंत्री का नाम अब इस विवाद में घसीटे जाने से यूपीए सरकार में खलबली मचना स्वाभाविक है।
ए. राजा के अदालती बयान से चिंतित सरकार ने अपने रणनीतिकार मंत्रियों की फौज `डैमेज कंट्रोल' के लिए लगा दी है। कपिल सिब्बल से लेकर पी. चिदम्बरम, पवन बंसल और नारायणस्वामी तक सभी राजा के बयानों को एक अपराधी का बयान साबित कर विपक्ष के हमलों का जवाब तैयार करने में जुट गए हैं।
उर्दू अखबारों को घर-घर पहुंचाने के उद्देश्य से इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स प्रोटेक्शन एसोसिएशन ने अपनी मुहिम के पहले दिन इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष शमीम अहमद की अगुवाई में जामा मस्जिद गेट नम्बर 2 पर उर्दू अखबार बेचे गए। तीन घंटों में तीन हजार अखबार बेचे गए। दैनिक `सहाफत' में मोहम्मद अंजुम ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि `उर्दू की तरक्की, कौम की तरक्की' का बैनर उठाए मुहिम के कार्यकर्ताओं को देखने के लिए एक भीड़ जमा हो गई। इस मुहिम में दयाल सिंह कॉलेज के उर्दू विभाग के अध्यक्ष डॉ. मौला बख्श, दैनिक `अदंलीब' के सम्पादक मोहम्मद मुस्तकीम खाँ, विख्यात शायर डॉ. शोएब रजा फातमी, डॉ. एमआर कासमी, अब्दुल अलीम अंसारी, डॉ. अमीर अमरोही, अखबार नौ के जावेद कमर, `वक्त और समाज के सम्पादक शमीम अहमद, अख्तर हुसैन अंसारी एवं अन्य जानी-मानी हस्तियां शामिल थीं।' इस मुहिम का मकसद उर्दू को दूसरी भाषा का दर्जा दिलाना और लोगों को उर्दू अखबार खरीद कर पढ़ने के लिए प्रेरित करना है। मुहिम का यह पहला दिन है। मुहिम अभी जारी रहेगी।
एक टीवी चैनल की ओर से लोक आयुक्त की लीक हुई इस रिपोर्ट में येदियुरप्पा का नाम आने पर कांग्रेस एवं अन्य पार्टियों ने जब इससे त्यागपत्र मांगा तो भाजपा अध्यक्ष ने इसका बचाव करते हुए कह दिया कि हम लोक आयुक्त की रिपोर्ट आने के बाद ही इस पर कार्यवाही करेंगे। लेकिन जब 1.76 लाख करोड़ रुपये के स्पेक्ट्रम घोटाले में पूर्व संचार मंत्री ए. राजा ने 25 जुलाई को सीबीआई की विशेष अदालत में यह कहा कि इस लेनदेन में डॉ. मनमोहन सिंह और पी. चिदम्बरम को पूरी जानकारी थी तो गडकरी ने तुरन्त ही दोनों से त्यागपत्र की मांग कर डाली। जहां तक स्पेक्ट्रम घोटाले में राजा के लिप्त होने और इन दोनों को जानकारी होने का सवाल है। गडकरी की मांग सही है लेकिन गडकरी को उनसे त्यागपत्र मांगने का कोई नैतिक हक नहीं है। गडकरी पहले ही यह कर उन्हें `बरी' कर चुके हैं कि येदियुरप्पा की कार्यवाही गैर-कानूनी नहीं अनैतिक है। श्री गडकरी पहले अपनी पार्टी का दामन साफ करें इसके बाद ही कांग्रेस को सफाई की नसीहत दें।
`दिल्ली पुलिस में मुसलमान प्रमोशन से वंचित, 15 फीसदी से अधिक मुस्लिम आबादी के बावजूद पुलिस में प्रतिनिधित्व 2 फीसदी से भी कम' के शीर्षक दैनिक `हमारा समाज' में सादिक शेरवानी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि करोड़ों की आबादी के बावजूद दिल्ली में एक भी मुस्लिम डीसीपी नहीं है जिसको फुल चार्ज दिया गया हो। दिल्ली के कुल 186 थानों में तैनात एसएचओ में मुसलमानों की संख्या दो है जबकि कुल 181 एडीशनल एसएचओ में एक भी मुस्लिम नहीं है। 186 इंस्पेक्टर एटीओ में केवल 2एटीओ इंस्पेक्टर मुस्लिम हैं। दिल्ली पुलिस में उच्च पदों पर तरक्की देने से मुसलमानों को रोका जाता है। इस तरह का आरोप लगाते हुए कई संगठनों ने दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग से शिकायत की थी। जिस पर कार्यवाही करते हुए अल्पसंख्यक आयोग ने दिल्ली पुलिस से जानकारी मांगी थी। गृह मंत्रालय द्वारा भेजी रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली पुलिस में स्पेशल/ज्वाइंट एडीशनल पुलिस आयुक्त की कुल संख्या 44 है। इनमें केवल एक मुस्लिम है जबकि तीन सिख समुदाय से हैं। इसी तरह एसीपी की संख्या 266 है और इनमें से केवल 7 मुस्लिम हैं, सिख 18 हैं। इंस्पेक्टरों की कुल संख्या 1315 है जिनमें से केवल 14 मुस्लिम हैं जबकि 40 सिखों को तरक्की दी गई है। इसी तरह हेडकांस्टेबल को तरक्की देकर एएसआई बनाया जाता है। एएसआई की कुल संख्या 6100 है जिनमें से 173 मुस्लिम हैं, 238 सिख हैं अर्थात् प्रमोशन के लिहाज से मुसलमान सिख समुदाय से पीछे हैं।
`हिना रब्बानी का भारत दौरा' के शीर्षक से दैनिक `इंक्लाब' ने चर्चा करते हुए लिखा है कि पाकिस्तान की नई और प्रथम महिला विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार का भारत दौरा उसी सिलसिले की कड़ी है जिसके तहत दोनों देशों के अधिकारी और मंत्री एक-दूसरे से मिलते रहते हैं। हिना रब्बानी ने भारत आने के पूर्व और भारत पहुंचकर जिस तरह के बयानात दिए हैं उनमें डिप्लोमैटिक शब्दों और प्रचलित शब्दावलियों के अलावा यदि कुछ है तो यह कि कुछ नहीं है। उनके यह शब्द आकर्षक हैं इसलिए सुनने में भी अच्छे मालूम होते हैं। दोबारा बातचीत, दूरी से बेहतर हैं और इतिहास से सबक लिया जाता है और इसे बोझ नहीं समझा जाता। हमें इन शब्दों में कोई गम्भीर पहल का जज्बा दिखाई नहीं पड़ता। एक बात साफ है कि पाकिस्तान अपनी शर्तों पर दोस्ती करना चाहेगा तो रिश्ते मजबूत होना तो दूर की बात, दोस्ती का वातावरण भी पैदा नहीं हो सकता। हिना रब्बानी का यह पहला दौरा है। इसी दौरे से उनके अगले दौरे की शुरुआत हो रही है। इस दौरे की कामयाबी ही उनके अगले दौरे की कामयाबी की जमानत होगी ऐसे में फैसला उन्हीं को करना है कि वह क्या चाहती हैं।
दैनिक `प्रताप' में सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि लगभग एक सप्ताह बाद संसद का मानसून सत्र शुरू होने वाला है। पहले से ही कई तरफ से घिरी कांग्रेस पार्टी और उनके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और घिरने वाले हैं। विपक्ष ने पहले से ही कई मुद्दों पर सरकार के खिलाफ घेराबंदी तेज कर दी है। ऐसे में ए. राजा का सीबीआई की विशेष अदालत में प्रधानमंत्री और गृहमंत्री पर सीधे आरोप लगाने से पार्टी और सरकार दोनों की खासी खिंचाई होने की संभावना है। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला मामले में पहले ही सुप्रीम कोर्ट के फटकार झेल चुके प्रधानमंत्री का नाम अब इस विवाद में घसीटे जाने से यूपीए सरकार में खलबली मचना स्वाभाविक है।
ए. राजा के अदालती बयान से चिंतित सरकार ने अपने रणनीतिकार मंत्रियों की फौज `डैमेज कंट्रोल' के लिए लगा दी है। कपिल सिब्बल से लेकर पी. चिदम्बरम, पवन बंसल और नारायणस्वामी तक सभी राजा के बयानों को एक अपराधी का बयान साबित कर विपक्ष के हमलों का जवाब तैयार करने में जुट गए हैं।
उर्दू अखबारों को घर-घर पहुंचाने के उद्देश्य से इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स प्रोटेक्शन एसोसिएशन ने अपनी मुहिम के पहले दिन इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष शमीम अहमद की अगुवाई में जामा मस्जिद गेट नम्बर 2 पर उर्दू अखबार बेचे गए। तीन घंटों में तीन हजार अखबार बेचे गए। दैनिक `सहाफत' में मोहम्मद अंजुम ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि `उर्दू की तरक्की, कौम की तरक्की' का बैनर उठाए मुहिम के कार्यकर्ताओं को देखने के लिए एक भीड़ जमा हो गई। इस मुहिम में दयाल सिंह कॉलेज के उर्दू विभाग के अध्यक्ष डॉ. मौला बख्श, दैनिक `अदंलीब' के सम्पादक मोहम्मद मुस्तकीम खाँ, विख्यात शायर डॉ. शोएब रजा फातमी, डॉ. एमआर कासमी, अब्दुल अलीम अंसारी, डॉ. अमीर अमरोही, अखबार नौ के जावेद कमर, `वक्त और समाज के सम्पादक शमीम अहमद, अख्तर हुसैन अंसारी एवं अन्य जानी-मानी हस्तियां शामिल थीं।' इस मुहिम का मकसद उर्दू को दूसरी भाषा का दर्जा दिलाना और लोगों को उर्दू अखबार खरीद कर पढ़ने के लिए प्रेरित करना है। मुहिम का यह पहला दिन है। मुहिम अभी जारी रहेगी।
Saturday, July 23, 2011
`वोट के बदले नोट' अमर सिंह पर शिकंजा कसा
बीते सप्ताह विभिन्न मुद्दे उर्दू मीडिया में छाये रहे। पेश है इन में से कुछ अखबारों की राय। `नोट के बदले वोट' मामले पर अमर सिंह से पूछताछ करने की इजाजत मिलने पर दैनिक `हमारा समाज' ने चर्चा करते हुए लिखा है कि यह मामला अमर सिंह के एक करीबी साथी संजू सक्सेना की दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच द्वारा गिरफ्तारी के बाद सामने आया है। अमर सिंह पर यह आरोप है कि उन्होंने सांसदों को घूस देने के लिए नोट उपलब्ध कराए थे। संजू सक्सेना के इस आरोप के बाद दिल्ली पुलिस समाजवादी पार्टी के पूर्व नेता अमर सिंह के खिलाफ शिकंजा कसने की पूरी तैयारी कर ली है। दरअसल यह मामला भारत-अमेरिका परमाणु संधि से संबंधित है, जिसके लिए वाम मोर्चों के विरोध के बाद यूपीए सरकार को वोट हासिल करने के लिए लोकसभा सदस्यों को खरीदने की बात सामने आई थी, 22 जुलाई 2008 को वोट हासिल करते समय भाजपा के कुछ सदस्यों ने नोटों की गड्डियां संसद में उछाल कर यह सुबूत देने की कोशिश की थी कि उन्हें वोट देने के लिए खरीदा गया, जिसका संबंध अमर सिंह से जोड़ा जा रहा है। तीन साल का समय गुजरने के बाद सुप्रीम कोर्ट की जब फटकार लगी है तब इस मामले में कुछ प्रगति हुई है। अब जबकि अदालत और संसद के बीच टकराव की बात आ रही है और दोनों के क्षेत्राधिकार पर बहस हो रही है, एक बार फिर यह मामला संगीन हो सकता है कि संसद के लिए कोई दिशा-निर्देश हैं या नहीं?
दारुल उलूम देवबंद के मोहतामिम मौलाना गुलाम मोहम्मद वस्तानवी के मामले को लेकर दैनिक `इंक्लाब' ने रहस्योद्घाटन करते हुए लिखा है कि जांच कमेटी के एक सदस्य कानपुर के मुफ्ती मंजूर अहमद मजहिरी ने किसी जांच के बिना ही अपनी रिपोर्ट तैयार की है। रिपोर्ट के अनुसार मौलाना गुलाम मोहम्मद वस्तानवी पर लगाए जाने वाले आरोपों की जांच के लिए गठित तीन सदस्य कमेटी के एक सदस्य मुफ्ती इस्माइल मालेगांव ने आगामी 23, 24 जुलाई को कार्यकारिणी (मजलिस शूरा) की बैठक से पूर्व रहस्योद्घाटन करते हुए कहा कि कमेटी में शामिल कानपुर के मुफ्ती मंजूर अहमद ने जांच पूरी किए बिना मौलाना गुलाम वस्तानवी के खिलाफ रिपोर्ट तैयार कर ली थी और मुझसे और मौलाना मोहम्मद इब्राहिम मद्रासी से अपनी तैयार की रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने की बात की थी, लेकिन हम दोनों ने यह कहकर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया कि कार्यकारिणी ने हमें जो जिम्मेदारी दी है उसे ईमानदारी से पूरा करेंगे। मुफ्ती इस्माइल के अनुसार गत महीने होने वाली कार्यकारिणी की बैठक में भाग लेने के लिए पहुंचे तो हम लोगों ने जांच में शामिल मुद्दों पर तफ्तीश करनी चाहिए तो मुफ्ती मंजूर अहमद ने हमारे साथ शामिल होने से साफ इंकार कर दिया। ज्ञात रहे दारुल उलूम देवबंद का मोहतामिम बनाए जाने के बाद मौलाना वस्तानवी ने मोदी के समर्थन में बयान दिया था, जिस पर काफी हंगामा खड़ा हो जाने के कारण मजलिस शूरा ने तफ्तीश के लिए तीन सदस्यीय कमेटी गठित की थी।
तेलंगाना ः कांग्रेस के `आगे कुआं पीछे खाई' के शीर्षक से दैनिक `हिन्द समाचार' ने लिखा है। 1947 में देश विभाजन के समय हमारे यहां 500 से अधिक छोटे-बड़े राज्य थे जिन्हें सरदार पटेल ने भारत में विलय कराया था। 17 दिसम्बर 1948 को हैदराबाद का भारत में विलय हुआ। तब आंध्रा प्रदेश के 21 तेलुगूभाषी जिलों में से 9 जिले हैदराबाद और 12 जिले मद्रास रेजीडेंसी के अधीन थे। 1952 में यूं ही श्री रामोलो ने आंध्रा प्रदेश के लिए मरणव्रत रखा और शहीद हो गए। पंडित नेहरू ने 19 दिसम्बर को अलग आंध्रा के गठन की घोषणा की। 1956 में राज्यों की भाषायी आधार पर इन तेलुगूभाषी जिलों को मिलाकर आंध्रा प्रदेश का गठन किया गया था जिसकी राजधानी हैदराबाद बनाई गई लेकिन तेलंगाना के लोगों की शिकायतों की अनदेखी की जाती रही। तेलंगाना के लिए आंदोलन चला रही टीआरएस व सहयोगी पार्टियों का कहना था कि वह ऐसे तेलंगाना से कम कुछ भी मंजूर नहीं करेंगे जिसकी राजधानी हैदराबाद हो। उस समय तो मामला थम गया लेकिन अब फिर गरम हो गया है। कांग्रेस एवं केंद्र सरकार इन मुद्दों पर बुरी तरह फंस चुकी है। इससे राज्य की अगुवाई कर रही रेड्डी सरकार के लिए खतरा पैदा हो गया है। एक तरफ कांग्रेस इसे कुछ महीनों के लिए टालने का प्रयास कर रही है और दूसरी तरफ तेलंगाना राज्य के लिए सभी पार्टियों ने सियासी मुहिम तेज कर दी है। कांग्रेस के नेता गण दो हिस्सों में बंट गए हैं। कर्नाटक एवं तमिलनाडु तो पहले ही कांग्रेस के हाथ से निकल चुके हैं जबकि गत चुनाव में केरल में भी इसे मामूली फर्प से सरकार बनाने में कामयाबी मिली है। ऐसे में यदि आंध्रा प्रदेश भी कांग्रेस के हाथ से निकल गया तो दक्षिण में इसका जनाधार खत्म हो जाएगा। `दार्जिलिंग पर त्रिकोणीय संधि' पर चर्चा करते हुए दैनिक `मुनसिफ' ने लिखा है। इस समय पूरा देश अलग तेलंगाना राज्य की मांग करते देख रहा है। स्वतंत्रता के बाद देश में राज्यों की व्यवस्था को सुचारू करने में जो समस्याएं पेश आईं, उससे देश परिचित है। उसके चलते कुछ अन्य राज्यों के अलग गठन की मांग होने लगी है जिसमें झारखंड, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ की मांगें पूरी हुईं। विदर्भ, बुंदेलखंड, तेलंगाना और गोरखालैंड को अलग करने की मांग अभी पूरी नहीं हुई है। जनता के बीच अलग राज्य की मांग भाषायी और भौगोलिक हालात के अलावा उसी समय उठती है जब राज्य सरकारें और प्रशासन राज्य के हर कोने तक पहुंचने में नाकाम हो जाते हैं। तब जनता में बेचैनी की लहर उठती है। पटना और रांची, भोपाल और जयपुर, लखनऊ और देहरादून के विवादों को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। जहां कहीं अलग राज्य के गठन की मांग उठी वहां राजनैतिक पार्टियों के निजी एजेंडे मांगों पर हावी नजर आए। पश्चिमी बंगाल में इन दिनों ऐसा ही दृश्य दिखाई दे रहा है। पश्चिमी बंगाल के पूर्वी भागों को मिलाकर जिसें दार्जिलिंग, कलम्पांग एवं कर सियांग पहाड़ी क्षेत्र हैं, गोरखालैंड के नाम से अलग राज्य बनाने की मांग 1980 से चली आ रही है। 18 जुलाई 2011 को गोरखा जनमुक्ति मोर्चा, पश्चिमी बंगाल और केंद्र सरकार के बीच एक त्रिकोणीय संधि हुई है जिसके तहत केंद्र सरकार ने गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन के गठन को स्वीकृति दे दी है। दार्जिलिंग में लम्बे समय से जारी नाराजगी को तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी ने फिलहाल बड़ी चालाकी से सम्भाल लिया है लेकिन इससे अलग गोरखालैंड की मांग ठंडी पड़ जाएगी, ऐसा फिलहाल नजर नहीं आ रहा है।
दारुल उलूम देवबंद के मोहतामिम मौलाना गुलाम मोहम्मद वस्तानवी के मामले को लेकर दैनिक `इंक्लाब' ने रहस्योद्घाटन करते हुए लिखा है कि जांच कमेटी के एक सदस्य कानपुर के मुफ्ती मंजूर अहमद मजहिरी ने किसी जांच के बिना ही अपनी रिपोर्ट तैयार की है। रिपोर्ट के अनुसार मौलाना गुलाम मोहम्मद वस्तानवी पर लगाए जाने वाले आरोपों की जांच के लिए गठित तीन सदस्य कमेटी के एक सदस्य मुफ्ती इस्माइल मालेगांव ने आगामी 23, 24 जुलाई को कार्यकारिणी (मजलिस शूरा) की बैठक से पूर्व रहस्योद्घाटन करते हुए कहा कि कमेटी में शामिल कानपुर के मुफ्ती मंजूर अहमद ने जांच पूरी किए बिना मौलाना गुलाम वस्तानवी के खिलाफ रिपोर्ट तैयार कर ली थी और मुझसे और मौलाना मोहम्मद इब्राहिम मद्रासी से अपनी तैयार की रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने की बात की थी, लेकिन हम दोनों ने यह कहकर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया कि कार्यकारिणी ने हमें जो जिम्मेदारी दी है उसे ईमानदारी से पूरा करेंगे। मुफ्ती इस्माइल के अनुसार गत महीने होने वाली कार्यकारिणी की बैठक में भाग लेने के लिए पहुंचे तो हम लोगों ने जांच में शामिल मुद्दों पर तफ्तीश करनी चाहिए तो मुफ्ती मंजूर अहमद ने हमारे साथ शामिल होने से साफ इंकार कर दिया। ज्ञात रहे दारुल उलूम देवबंद का मोहतामिम बनाए जाने के बाद मौलाना वस्तानवी ने मोदी के समर्थन में बयान दिया था, जिस पर काफी हंगामा खड़ा हो जाने के कारण मजलिस शूरा ने तफ्तीश के लिए तीन सदस्यीय कमेटी गठित की थी।
तेलंगाना ः कांग्रेस के `आगे कुआं पीछे खाई' के शीर्षक से दैनिक `हिन्द समाचार' ने लिखा है। 1947 में देश विभाजन के समय हमारे यहां 500 से अधिक छोटे-बड़े राज्य थे जिन्हें सरदार पटेल ने भारत में विलय कराया था। 17 दिसम्बर 1948 को हैदराबाद का भारत में विलय हुआ। तब आंध्रा प्रदेश के 21 तेलुगूभाषी जिलों में से 9 जिले हैदराबाद और 12 जिले मद्रास रेजीडेंसी के अधीन थे। 1952 में यूं ही श्री रामोलो ने आंध्रा प्रदेश के लिए मरणव्रत रखा और शहीद हो गए। पंडित नेहरू ने 19 दिसम्बर को अलग आंध्रा के गठन की घोषणा की। 1956 में राज्यों की भाषायी आधार पर इन तेलुगूभाषी जिलों को मिलाकर आंध्रा प्रदेश का गठन किया गया था जिसकी राजधानी हैदराबाद बनाई गई लेकिन तेलंगाना के लोगों की शिकायतों की अनदेखी की जाती रही। तेलंगाना के लिए आंदोलन चला रही टीआरएस व सहयोगी पार्टियों का कहना था कि वह ऐसे तेलंगाना से कम कुछ भी मंजूर नहीं करेंगे जिसकी राजधानी हैदराबाद हो। उस समय तो मामला थम गया लेकिन अब फिर गरम हो गया है। कांग्रेस एवं केंद्र सरकार इन मुद्दों पर बुरी तरह फंस चुकी है। इससे राज्य की अगुवाई कर रही रेड्डी सरकार के लिए खतरा पैदा हो गया है। एक तरफ कांग्रेस इसे कुछ महीनों के लिए टालने का प्रयास कर रही है और दूसरी तरफ तेलंगाना राज्य के लिए सभी पार्टियों ने सियासी मुहिम तेज कर दी है। कांग्रेस के नेता गण दो हिस्सों में बंट गए हैं। कर्नाटक एवं तमिलनाडु तो पहले ही कांग्रेस के हाथ से निकल चुके हैं जबकि गत चुनाव में केरल में भी इसे मामूली फर्प से सरकार बनाने में कामयाबी मिली है। ऐसे में यदि आंध्रा प्रदेश भी कांग्रेस के हाथ से निकल गया तो दक्षिण में इसका जनाधार खत्म हो जाएगा। `दार्जिलिंग पर त्रिकोणीय संधि' पर चर्चा करते हुए दैनिक `मुनसिफ' ने लिखा है। इस समय पूरा देश अलग तेलंगाना राज्य की मांग करते देख रहा है। स्वतंत्रता के बाद देश में राज्यों की व्यवस्था को सुचारू करने में जो समस्याएं पेश आईं, उससे देश परिचित है। उसके चलते कुछ अन्य राज्यों के अलग गठन की मांग होने लगी है जिसमें झारखंड, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ की मांगें पूरी हुईं। विदर्भ, बुंदेलखंड, तेलंगाना और गोरखालैंड को अलग करने की मांग अभी पूरी नहीं हुई है। जनता के बीच अलग राज्य की मांग भाषायी और भौगोलिक हालात के अलावा उसी समय उठती है जब राज्य सरकारें और प्रशासन राज्य के हर कोने तक पहुंचने में नाकाम हो जाते हैं। तब जनता में बेचैनी की लहर उठती है। पटना और रांची, भोपाल और जयपुर, लखनऊ और देहरादून के विवादों को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। जहां कहीं अलग राज्य के गठन की मांग उठी वहां राजनैतिक पार्टियों के निजी एजेंडे मांगों पर हावी नजर आए। पश्चिमी बंगाल में इन दिनों ऐसा ही दृश्य दिखाई दे रहा है। पश्चिमी बंगाल के पूर्वी भागों को मिलाकर जिसें दार्जिलिंग, कलम्पांग एवं कर सियांग पहाड़ी क्षेत्र हैं, गोरखालैंड के नाम से अलग राज्य बनाने की मांग 1980 से चली आ रही है। 18 जुलाई 2011 को गोरखा जनमुक्ति मोर्चा, पश्चिमी बंगाल और केंद्र सरकार के बीच एक त्रिकोणीय संधि हुई है जिसके तहत केंद्र सरकार ने गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन के गठन को स्वीकृति दे दी है। दार्जिलिंग में लम्बे समय से जारी नाराजगी को तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी ने फिलहाल बड़ी चालाकी से सम्भाल लिया है लेकिन इससे अलग गोरखालैंड की मांग ठंडी पड़ जाएगी, ऐसा फिलहाल नजर नहीं आ रहा है।
Friday, July 15, 2011
मुसलमानों का कांग्रेस से मोहभंग
बीते सप्ताह कई मुद्दों को उर्दू अखबारों ने चर्चा का विषय बनाया है। `देश में मस्जिद असुरक्षित, अजान और नमाज पर रोक' के शीर्षक से दैनिक `सहाफत' में मोहम्मद आतिफ ने एक सर्वे रिपोर्ट के हवाले से यह रहस्योद्घाटन किया है। जमीअत उलेमा हिन्द द्वारा सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मेरठ और गाजियाबाद का सर्वे कर यह जानकारी एकत्र की है। रिपोर्ट के अनुसार जहां बहुत-सी मस्जिदें गैर-आबाद हैं वहां ऐसी मस्जिदें भी हैं जिन पर कुछ लोगों का कब्जा है और वह उसको स्टोर के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं। मेरठ शहर जहां मुसलमानों की जनसंख्या काफी है वहां भी मस्जिद में अजान और नमाज अदा करने की इजाजत नहीं दी जाती है। मिलिट्री एरिया की मस्जिद हाथी खाना इसका उदाहरण है। इस मस्जिद में तीन साल पूर्व नमाज होती थी लेकिन अब हाल यह है कि इसमें किसी को अन्दर तो क्या कैम्पस में भी जाने की इजाजत नहीं है। बहुत सी मस्जिदों के कागजात गायब हैं। यह सूरतेहाल सहारनपुर और मुजफ्फरनगर की कई मस्जिदों की है। सूत्रों के अनुसार जमीअत के वर्किंग ग्रुप में विचार-विमर्श कर आगे की रणनीति तय की जाएगी। सर्वे के मुताबिक प्रशासन के भेदभाव के चलते मस्जिदों की हालत खराब होती जा रही है। सारे सुबूत मुसलमानों के हक में हैं और सारे कागजात मौजूद हैं फिर भी सरकार इसके निर्माण में रुकावट डाल रही है। इस सर्वे के हवाले से जमीअत उलेमा हिन्द सचिव मौलाना अब्दुल हमीद नोमानी से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि मौलाना महमूद मदनी की कोशिश और हिदायत पर सर्वे कराया गया है और वह इस सिलसिले में गंभीरता से रणनीति बनाने पर विचार कर रही है इसके लिए जमीअत उलेमा हिन्द बड़े स्तर पर आंदोलन भी चला सकती है।
`हज घपला से सामाजिक कार्यकर्ता बेचैन' के शीर्षक से मोहम्मद अंजुम ने लिखा है कि हज घपले के रहस्योद्घाटन से लोगों में बेचैनी फैल गई है। ज्यादा कीमत वाली कम्पनी को टेंडर करने वाले मामलों को किसी ने मंत्रालय और अधिकारियों की मिलीभगत बताया और इस भ्रष्टाचार की सीबीआई जांच कराने की मांग करते हुए इसे 2जी स्पेक्ट्रम से भी बड़ा घोटाला बताया। मुस्लिम पॉलिटिकल कौंसिल के अध्यक्ष डा. तसलीम अहमद रहमानी ने हज सब्सिडी को खत्म करने की मांग करते हुए कहा कि हज कमेटी को खत्म करके एक ग्लोबल कारपोरेशन बनाया जाए जो सभी तरह के अधिकार रखता हो इसके बाद टेंडर भी ग्लोबल स्तर पर हो और जिस कम्पनी का रेट कम हो उसे टेंडर दिया जाए। इससे न केवल हाजियों को आसानी होगी बल्कि सरकार पर भी बोझ कम पड़ेगा। रहमानी के अनुसार टेंडर दिए जाने में नागरिक अड़चन मंत्रालय से लेकर संबंधित अधिकारियों को घूस कमीशन के तौर पर दी जाती थी, पहले यह कमीशन 30 डालर प्रति हाजी था जो अब बढ़कर 70 डालर प्रति हाजी हो गया है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि यदि एक लाख 40 हजार हाजी जाते हैं तो यह कमीशन कितना हो जाएगा।
प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह की टीम में हुई फेरबदल में एक भी मुस्लिम को शामिल नहीं किए जाने पर दैनिक `हमारा समाज' में आमिर सलीम खाँ ने कुछ मुस्लिम नेताओं के वक्तव्यों को प्रकाशित किया है। कांग्रेस पार्टी ने एक बार फिर मुसलमानों के मुंह पर जोरदार तमाचा मारा है, सलमान खुर्शीद को तरक्की जरूर दी गई लेकिन मंत्रिमंडल में लिए 8 नए चेहरों में एक भी मुस्लिम नहीं है जबकि मुसलमानों को यूपीए प्रथम और यूपीए द्वितीय से काफी उम्मीदें थीं। फिलहाल मनमोहन सिंह की टीम में वही पांच पुराने मुस्लिम चेहरे हैं। मुसलमानों का प्रतिनिधित्व अब गुलाम नबी आजाद, सलमान खुर्शीद, ई. अहमद और फारुक अब्दुल्ला तक सीमित होगा। यदि मुसलमानों का प्रतिशत सरकार के मुताबिक लगभग 15 फीसदी मान लिया जाए तब भी 67 मंत्रिमंडल मंत्रियों में मुसलमानों की संख्या 8 होनी चाहिए। यूपीए द्वितीय के गठन के समय मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने मंत्रिमंडल में 11 मुसलमानों के प्रतिनिधित्व की सिफारिश की थी लेकिन उन्हें मायूसी हाथ लगी। कांग्रेस द्वारा मुसलमानों को ठेंगा दिखाने पर मुस्लिम संगठनों के प्रतिनिधियों ने कटाक्ष करते हुए कहा कि अब हमें सरकार से उम्मीदें छोड़ देनी चाहिए।
दैनिक `अखबारे मशरिक' ने अपने दूसरे सम्पादकीय में `अल्लाह के नाम पर' चर्चा करते हुए लिखा है कि हाल ही में पड़ोसी देश बंगलादेश में संविधान में संशोधन कर `अल्लाह' की जगह `खालिक' (बनाने वाला) शब्द इस्तेमाल किया गया है। इस पर बंगलादेश में कई स्थानों पर हिंसा भड़क उठी है जिसमें कम से कम एक सौ व्यक्ति जख्मी हुए।
यह मुहिम बंगलादेश की जमीअत इस्लामी चला रही है जिसे विपक्षी पार्टी बंगलादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बेगम खालिदा जिया) का समर्थन हासिल है। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि संविधान में `खालिक' के बजाय पूर्व की भांति `अल्लाह' शब्द रखा जाए। बंगलादेश की 95 फीसदी जनसंख्या मुसलमानों की है। इन हालात में संविधान से शब्द `अल्लाह' निकाल देना सही नहीं है। बंगलादेश में काफी समय से दो बेगमें, बेगम खालिदा जिया और शेख हसीना वाजिद का शासन रहा है। बेहतर था कि बंगलादेश नेशनलिस्ट पार्टी इसको अपना आगामी चुनावी मुद्दा बनाती और कामयाब होने की सूरत में संशोधन करती। बंगलादेश पहले ही गरीबी की मार झेल रहा है यह और ज्यादा हिंसा सहन नहीं कर सकता। इसलिए सारा ध्यान सकारात्मक कार्यों पर केंद्रित होना चाहिए।
`मकतबा जामिया के साथ `जंग' का मजाक' के शीर्षक से मुमताज आलम रिजवी ने लिखा है कि उर्दू किताबें छापने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय मकतबा जामिया दिल्ली के साथ जिस तरह का मजाक किया जा रहा है वह पूरी उर्दू बिरादरी के लिए निन्दनीय घटना है। मकतबा जामिया का दुर्भाग्य यह है कि जामिया मिलिया इस्लामिया की सरपरस्ती होने के बावजूद यह संस्था खस्ता हाल है।
बड़े-बड़े प्रोफेसर और उर्दू प्रेमियों की निगरानी के बावजूद इसकी व्यवस्था खराब से खराब हो चुकी है। कौमी काउंसिल बराए फरोग उर्दू जुबान (एनसीपीयूएल) के साथ हुई संधि से पूर्व मकतबा जामिया के बारे में यह बात आम थी कि यह अपनी जिन्दगी की अंतिम सांसें गिन रहा है। आखिर क्या वजह है कि जामिया मिलिया इस्लामिया इस संस्था की मालिक (स्वामी) होने के बावजूद इसको टेकओवर नहीं कर रही है? जामिया के वर्तमान वाइस चांसलर नजीब जंग से पहले जब प्रोफेसर मुशीरुल हसन जामिया के वीसी और मकतबा जामिया के चेयरमैन थे, उन्होंने भी इस संस्था को बर्बाद करने का काम किया।
22 मई 2011 को जामिया के वीसी नजीब जंग और एनसीपीयूएल के डायरेक्टर हमीद उल्ला भट्ट के बीच जो संधि हुई उसके मुताबिक मकतबा जामिया की किताबों को छापने और इन दोनों संस्थानों के सहयोग से बेचने की बातें तय हुईं। किताबों को बेचने से जो मुनाफा मिलेगा उसका आधा-आधा दोनों संस्था लेंगी। सूत्रों के अनुसार एनसीपीयूएल ने मकतबा जामिया को टेकओवर करने का इरादा किया था जिस पर वीसी नजीब जंग का कहना था कि यह क्या बात हुई कि कल वह कहेगा कि हम जामिया मिलिया इस्लामिया को टेकओवर करना चाहते हैं तो क्या हम जामिया दे देंगे।
`हज घपला से सामाजिक कार्यकर्ता बेचैन' के शीर्षक से मोहम्मद अंजुम ने लिखा है कि हज घपले के रहस्योद्घाटन से लोगों में बेचैनी फैल गई है। ज्यादा कीमत वाली कम्पनी को टेंडर करने वाले मामलों को किसी ने मंत्रालय और अधिकारियों की मिलीभगत बताया और इस भ्रष्टाचार की सीबीआई जांच कराने की मांग करते हुए इसे 2जी स्पेक्ट्रम से भी बड़ा घोटाला बताया। मुस्लिम पॉलिटिकल कौंसिल के अध्यक्ष डा. तसलीम अहमद रहमानी ने हज सब्सिडी को खत्म करने की मांग करते हुए कहा कि हज कमेटी को खत्म करके एक ग्लोबल कारपोरेशन बनाया जाए जो सभी तरह के अधिकार रखता हो इसके बाद टेंडर भी ग्लोबल स्तर पर हो और जिस कम्पनी का रेट कम हो उसे टेंडर दिया जाए। इससे न केवल हाजियों को आसानी होगी बल्कि सरकार पर भी बोझ कम पड़ेगा। रहमानी के अनुसार टेंडर दिए जाने में नागरिक अड़चन मंत्रालय से लेकर संबंधित अधिकारियों को घूस कमीशन के तौर पर दी जाती थी, पहले यह कमीशन 30 डालर प्रति हाजी था जो अब बढ़कर 70 डालर प्रति हाजी हो गया है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि यदि एक लाख 40 हजार हाजी जाते हैं तो यह कमीशन कितना हो जाएगा।
प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह की टीम में हुई फेरबदल में एक भी मुस्लिम को शामिल नहीं किए जाने पर दैनिक `हमारा समाज' में आमिर सलीम खाँ ने कुछ मुस्लिम नेताओं के वक्तव्यों को प्रकाशित किया है। कांग्रेस पार्टी ने एक बार फिर मुसलमानों के मुंह पर जोरदार तमाचा मारा है, सलमान खुर्शीद को तरक्की जरूर दी गई लेकिन मंत्रिमंडल में लिए 8 नए चेहरों में एक भी मुस्लिम नहीं है जबकि मुसलमानों को यूपीए प्रथम और यूपीए द्वितीय से काफी उम्मीदें थीं। फिलहाल मनमोहन सिंह की टीम में वही पांच पुराने मुस्लिम चेहरे हैं। मुसलमानों का प्रतिनिधित्व अब गुलाम नबी आजाद, सलमान खुर्शीद, ई. अहमद और फारुक अब्दुल्ला तक सीमित होगा। यदि मुसलमानों का प्रतिशत सरकार के मुताबिक लगभग 15 फीसदी मान लिया जाए तब भी 67 मंत्रिमंडल मंत्रियों में मुसलमानों की संख्या 8 होनी चाहिए। यूपीए द्वितीय के गठन के समय मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने मंत्रिमंडल में 11 मुसलमानों के प्रतिनिधित्व की सिफारिश की थी लेकिन उन्हें मायूसी हाथ लगी। कांग्रेस द्वारा मुसलमानों को ठेंगा दिखाने पर मुस्लिम संगठनों के प्रतिनिधियों ने कटाक्ष करते हुए कहा कि अब हमें सरकार से उम्मीदें छोड़ देनी चाहिए।
दैनिक `अखबारे मशरिक' ने अपने दूसरे सम्पादकीय में `अल्लाह के नाम पर' चर्चा करते हुए लिखा है कि हाल ही में पड़ोसी देश बंगलादेश में संविधान में संशोधन कर `अल्लाह' की जगह `खालिक' (बनाने वाला) शब्द इस्तेमाल किया गया है। इस पर बंगलादेश में कई स्थानों पर हिंसा भड़क उठी है जिसमें कम से कम एक सौ व्यक्ति जख्मी हुए।
यह मुहिम बंगलादेश की जमीअत इस्लामी चला रही है जिसे विपक्षी पार्टी बंगलादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बेगम खालिदा जिया) का समर्थन हासिल है। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि संविधान में `खालिक' के बजाय पूर्व की भांति `अल्लाह' शब्द रखा जाए। बंगलादेश की 95 फीसदी जनसंख्या मुसलमानों की है। इन हालात में संविधान से शब्द `अल्लाह' निकाल देना सही नहीं है। बंगलादेश में काफी समय से दो बेगमें, बेगम खालिदा जिया और शेख हसीना वाजिद का शासन रहा है। बेहतर था कि बंगलादेश नेशनलिस्ट पार्टी इसको अपना आगामी चुनावी मुद्दा बनाती और कामयाब होने की सूरत में संशोधन करती। बंगलादेश पहले ही गरीबी की मार झेल रहा है यह और ज्यादा हिंसा सहन नहीं कर सकता। इसलिए सारा ध्यान सकारात्मक कार्यों पर केंद्रित होना चाहिए।
`मकतबा जामिया के साथ `जंग' का मजाक' के शीर्षक से मुमताज आलम रिजवी ने लिखा है कि उर्दू किताबें छापने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय मकतबा जामिया दिल्ली के साथ जिस तरह का मजाक किया जा रहा है वह पूरी उर्दू बिरादरी के लिए निन्दनीय घटना है। मकतबा जामिया का दुर्भाग्य यह है कि जामिया मिलिया इस्लामिया की सरपरस्ती होने के बावजूद यह संस्था खस्ता हाल है।
बड़े-बड़े प्रोफेसर और उर्दू प्रेमियों की निगरानी के बावजूद इसकी व्यवस्था खराब से खराब हो चुकी है। कौमी काउंसिल बराए फरोग उर्दू जुबान (एनसीपीयूएल) के साथ हुई संधि से पूर्व मकतबा जामिया के बारे में यह बात आम थी कि यह अपनी जिन्दगी की अंतिम सांसें गिन रहा है। आखिर क्या वजह है कि जामिया मिलिया इस्लामिया इस संस्था की मालिक (स्वामी) होने के बावजूद इसको टेकओवर नहीं कर रही है? जामिया के वर्तमान वाइस चांसलर नजीब जंग से पहले जब प्रोफेसर मुशीरुल हसन जामिया के वीसी और मकतबा जामिया के चेयरमैन थे, उन्होंने भी इस संस्था को बर्बाद करने का काम किया।
22 मई 2011 को जामिया के वीसी नजीब जंग और एनसीपीयूएल के डायरेक्टर हमीद उल्ला भट्ट के बीच जो संधि हुई उसके मुताबिक मकतबा जामिया की किताबों को छापने और इन दोनों संस्थानों के सहयोग से बेचने की बातें तय हुईं। किताबों को बेचने से जो मुनाफा मिलेगा उसका आधा-आधा दोनों संस्था लेंगी। सूत्रों के अनुसार एनसीपीयूएल ने मकतबा जामिया को टेकओवर करने का इरादा किया था जिस पर वीसी नजीब जंग का कहना था कि यह क्या बात हुई कि कल वह कहेगा कि हम जामिया मिलिया इस्लामिया को टेकओवर करना चाहते हैं तो क्या हम जामिया दे देंगे।
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