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Monday, November 26, 2012

बाल ठाकरे और मुसलमान


अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के बर्मा दौरे पर चर्चा करते हुए दैनिक `जदीद मेल'ने अपने सम्पादकीय में लिखा है। उनके पहले शासनकाल में उनके प्रशासन की विदेश नीति का केंद्र मध्य पूर्व और अफगानिस्तान बने हुए थे लेकिन मालूम होता है कि अब उनके लिए एशिया बहुत अहम रहेगा। अमेरिकी राष्ट्रपति का दौरा केवल छह घंटे तक जारी रहा लेकिन फिर भी यह बहुत अहम है। गत वर्ष तक बर्मा विश्व बिरादरी में आलोचना का निशाना बना रहा और वह फौजी शासन एवं मानव अधिकार उल्लंघन के कारण नापसंद और अलोकतांत्रिक देश माना जाता था। ओबामा प्रशासन का कहना है कि इस दौरे का मकसद उन लोकतांत्रिक सुधारों का समर्थन करना है जो राष्ट्रपति थेन सेन ने बर्मा में शुरू की है लेकिन एक और मकसद यह भी है जिसका जिक्र नहीं किया जाता, वह है बर्मा में चीन के बढ़ते असर को कम करना। बर्मा और चीन के संबंधों का इतिहास बहुत अच्छा नहीं रहा है और दोनों के बीच हथियारों के बेचने और चीनी निवेश पर आधारित रहा है। दौरे की आलोचना करने वालों का यह भी कहना है कि शायद यह दौरा समय से पहले किया गया है। क्योंकि सुधार की प्रक्रिया पिछले साल से ही शुरू हुई थी और इस पर अमेरिका अपने लिए कोई विशेष मांग नहीं मनवा सका। बर्मा सरकार ने कुछ दिन पूर्व 452 कैदियों को माफी देने की घोषणा की थी लेकिन इनमें वह लोग शामिल नहीं हैं जिनको सियासी बुनियाद पर कैद किया गया है। `बर्मा की सरकार ने कुछ कैदियों को रिहा किया है जिनमें कोई सियासी कैदी शामिल नहीं। यह तो दौरे के लिए कोई अच्छी शुरुआत नहीं।' बर्मा में सत्ता और सियासी सुधार के बारे में अब भी बहुत कुछ स्पष्ट नहीं है। फौज की भूमिका कितनी कम हो सकी है, बर्मा के वर्तमान राष्ट्रपति सुधार के प्रति कितना गंभीर हैं, इन सवालों का जवाब किसी के पास नहीं है।
बर्मा में मुसलमानों के नरसंहार के हवाले से दैनिक `जदीद मेल' ने `ओबामा का म्यांमार का दौरा' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखा है कि बराक ओबामा ने म्यांमार के दौरे के दौरान कहा कि रोहगनियां मुसलमानों को राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल किया जाना चाहिए। निसंदेह उनके इस बयान से मुसलमानों को हार्दिक सुकून मिला होगा लेकिन गत चार वर्ष का अनुभव कहता है कि ओबामा मुसलमानों के हक में हमदर्द साबित नहीं हुए और इनकी कथनी करनी से मुसलमानों को मायूसी हाथ लगी है। गत चार साल के शासनकाल में ओबामा ने सबसे बड़े आतंकी देश इजरायल को फलस्तीनी मुसलमानों की हत्या करने की खुली छूट दे रखी है जब-जब इजरायल को घेरने की कोशिश की गई। अमेरिका वीटो कर गया और फलस्तीन मामला वहीं का वहीं उलझा रहा। गत एक सप्ताह से फिर इजरायली हमलों में तेजी आ गई है। ओबामा से जब फलस्तीनी मुसलमानों के बारे में कोई आशा नहीं की जा सकती तो फिर इनके इस बयान पर किस तरह विश्वास किया जा सकता है कि म्यांमार  में रोहगनियां मुसलमानों को राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल किया जाए। अपने चार वर्षीय शासनकाल में अपनी कथनी और करनी से अब तक यह साबित नहीं किया गया है कि वह मुसलमानों के हमदर्द हैं।
`इजरायल बनाम हमास लड़ाई खतरनाक मोड़ पर' के शीर्षक से दैनिक `प्रताप' के सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि मध्य पूर्व एशिया में गाजा पट्टी और इजरायल में पिछले कई दिनों से लड़ाई खतरनाक स्थिति में पहुंचती जा रही है। गत दिनों फलस्तीनी चरमपंथियों ने यरुशलम पर राकेट से हमला किया। फलस्तीनी संगठन हमास ने कहा कि इस राकेट का निशाना इजरायली संसद थी। पिछले कई दशकों में यह पहली बार है कि यरुशलम को निशाना बनाया गया और गाजा पट्टी से इस तरह का यह पहला हमला था। पिछले कई दिनों से हमास तथा इजरायल की तरफ से एक-दूसरे को निशाना बनाया जा रहा है और दोनों ही यह स्वीकार भी कर रहे हैं कि अंतर बस इतना है कि इजरायल डिफेंस फोर्स (आईडीएफ) इसे आतंकी ठिकानों पर किया गया हमला बता रहा है और हमास सहित अरब दुनिया या उससे जुड़े तमाम चरमपंथी संगठन इसे गाजा के निर्दोष लोगों के खिलाफ हमला मान रहे हैं। दोनों देशों द्वारा अपनाई जा रही गतिविधियों को देखते हुए यह कहना शायद गलत होगा कि इस स्थिति के लिए कोई एक दोषी है।
मुसलमानों के प्रति बाल ठाकरे का रवैया को लेकर दैनिक `जदीद खबर' में `बाल ठाकरे और मुसलमान' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखा है कि बाल ठाकरे की पूरी जिंदगी मुसलमानों की देशभक्ति पर सवालिया निशान लगाते गुजरी। वह अक्सर ऐसे बयान दागा करते थे जो भारतीय दंड संहिता के तहत काबिले गिरफ्त होते थे। उन पर कई बार मुकदमे भी कायम हुए लेकिन कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ सका क्योंकि उन्होंने कानून का क्रियान्वयन करने वाली संस्थानों पर यह भय कर रखा था कि यदि पुलिस ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई की तो पूरा महाराष्ट्र जल उठेगा। पुलिस और प्रशासन इसी भय से इनके खिलाफ कोई सख्त कदम नहीं उठा सके और इसी बुजदिली (कायरता) के नतीजे में बाल ठाकरे लॉ एंड आर्डर की मशीनरी पर हावी हो गए। बाल ठाकरे शिवसेना मुख्य पत्र `सामना' में भी अपने सम्पादकीय में अक्सर मुसलमानों के खिलाफ अंतिम स्तर की भड़काऊ लेखनी लिखा करते थे, यह उनकी सियासी मजबूरी थी क्योंकि उन्होंने अपनी सांप्रदायिकता की राजनीति से जिन लाखों शिव सैनिकों की फौज तैयार की थी उसकी मानसिक खुराक और हरारत बाला साहब के उत्तेजित बयान और भड़काऊ लेखनी से ही मिलती थी। दिलचस्प बात यह है कि मुसलमानों से दुश्मनी के बावजूद उन पर विश्वास भी करते थे। जिस समय उन्होंने अंतिम सांस ली तो उनके पास जो डाक्टर मौजूद था उसका नाम डॉ. जलील पारकर था। डॉ. जलील बाल ठाकरे का पांच साल से इलाज कर रहे थे और इनके परिवार को डॉ. जलील पर बड़ा भरोसा था। डॉ. जलील ठाकरे के साथ  दशहरे की पारंपरिक रैली में मंच पर मौजूद रहते थे ताकि आपातकाल स्थिति में उन्हें चिकित्सा सहायता पहुंचा सकें।
`कसाब को फांसी' के शीर्षक से दैनिक `राष्ट्रीय सहारा' ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि फांसी दिए जाने के लिए ऐसा समय चुना गया जिसके सियासी पहलू को देखने के लिए किसी मैगनीफाइट ग्लास की जरूरत नहीं है। कसाब को फांसी 21 नवम्बर को दी गई, संसद का अधिवेशन 22 नवम्बर से शुरू हो रहा है। इसका मतलब यह है कि संसद के अधिवेशन का पहला दिन बहुत दिलचस्प होगा। इस दिन सरकार के खिलाफ या तो कुछ कहा ही नहीं जा सकता और यदि कहा जा सकता है तो अच्छा ही कहा जा सकता है। कम से कम इस मुद्दे पर विपक्ष सरकार पर हमला नहीं कर सकता। विपक्ष के पास केवल एक मुद्दा अफजल गुरु की फांसी की मांग का रह गया, वह भी कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने छीन लिया है। इससे पहले कि कोई और अफजल गुरु का मामला उठाए, उन्होंने खुद ही उसकी फांसी की मांग कर दी।
इसमें कोई संदेह नहीं कि अजमल कसाब की फांसी से कांग्रेस आमतौर से और महाराष्ट्र कांग्रेस विशेष रूप से फायदा उठाने की कोशिश करेगी। महाराष्ट्र में बाल ठाकरे की मौत के बाद जो सियासी गैप पैदा हो गया, उसे भरने के लिए जनहित में कुछ लोकप्रिय कदम उठाए जाएं। अजमल कसाब को फांसी दिया जाना ऐसा ही कदम है क्योंकि इसकी फांसी की मांग केवल सियासी पार्टियां ही नहीं, वह लोग भी कर रहे थे जिनके अपने 26/11 हमले में मारे गए थे।

Saturday, March 24, 2012

`बेचारा हिन्दुस्तानी मुसलमान...'

गत सप्ताह केंद्र सरकार द्वारा संसद से पारित बजट में मुसलमानों के लिए प्रावधान सहित योजना आयोग की वार्षिक रिपोर्ट जैसे अनेक मुद्दे उर्दू अखबारों में चर्चा का विषय रहे। पेश है इनमें से कुछ उर्दू अखबारों की राय।
`दिल्ली के स्कूलों में मुस्लिम बच्चों के दाखिले का मसला, मुख्यमंत्री शीला दीक्षित इस पर तुरन्त ध्यान दें' के शीर्षक से दैनिक `अखबारे मशरिक' ने अपने सम्पादकीय में चर्चा करते हुए लिखा है कि दिल्ली के प्राइवेट स्कूलों में नर्सरी कक्षाओं में जो दाखिले हुए हैं उनमें मुसलमानों के साथ अन्याय किया गया है। लोक जनशक्ति पार्टी के महासचिव अब्दुल खालिक ने आंकड़ों द्वारा यह रहस्योद्घाटन किया कि दिल्ली पब्लिक स्कूल (मथुरा) को छोड़कर शहर के सभी स्कूलों में मुस्लिम बच्चों के साथ अन्याय किया गया है। कुछ स्कूलों में तो मुस्लिम बच्चों को दाखिला दिया ही नहीं गया जबकि कुछ अन्य में सिर्प नाम के लिए कुछ बच्चों को दाखिला दिया गया। यह सवाल लोक जनशक्ति पार्टी सुप्रीमो रामविलास पासवान ने राज्यसभा में उठाया तो मुस्लिम दुश्मनी में भाजपा सांसद बलबीर पुंज भड़क उठे और मुसलमानों से अपने बच्चों को मदरसों में पढ़ाने को कहा। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने अल्पसंख्यकों के हवाले से इस रहस्योद्घाटन को संगीन बताते हुए इस मामले की जांच कर उचित कार्यवाही करने की घोषणा की है जबकि मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने रामविलास पासवान के आरोपों को गलत करार दिया है।
सच्चाई यह है कि मुस्लिम बच्चों के दाखिलों में रुकावट खड़ी नहीं की जाती बल्कि दलितों और झुग्गी-झोपड़ियों वाले गरीब बच्चों के साथ भी ऐसा होता है। पश्चिमी दिल्ली के एक मोहल्ले पांडव नगर में 50 से अधिक ऐसे बच्चे हैं जिनका दाखिला सरकारी स्कूलों में नहीं हो सका। आरोप है कि झुग्गी-झोपड़ी में रहने के कारण उनका दाखिला नहीं हुआ। सरकार इस पर तुरन्त ध्यान दे।
`बेचारा हिन्दुस्तानी मुसलमान...' के शीर्षक से दैनिक `जदीद मेल' ने अपनी समीक्षा में चर्चा करते हुए लिखा है कि सच्चर कमेटी ने इस बात को उजागर किया था कि हिन्दुस्तानी मुसलमान शैक्षिक तौर पर दलितों से भी पिछड़े हैं। अब योजना आयोग ने मुसमलानों के संबंध में एक और चौंकाने वाला रहस्योदघाटन किया है और वह यह है कि शहरों में रहने वाले मुसलमानों की गिनती अब देश के सबसे गरीब वर्ग में होती है। योजना आयोग के अनुसार 2005-10 के बीच पांच करोड़ भारतीय गरीबी रेखा से बाहर हो गए हैं लेकिन मुसलमान और गरीब हुआ है। शहरी क्षेत्रों में रहने वाले 34 फीसदी मुसलमान अत्याधिक गरीबी के दायरे में आते हैं। इस बाबत सबसे ज्यादा खराब सूरतेहाल गुजरात, बिहार और उत्तर प्रदेश में है। ग्रामीण क्षेत्रों के मुसलमानों की हालत भी अत्यंत चिन्ताजनक है। आयोग के आंकड़ों के अनुसार असम के ग्रामीण क्षेत्रों के मुसलमानों में 53 फीसदी गरीबी रेखा से नीचे हैं और उत्तर प्रदेश में यह अनुपात 56 फीसदी है। गुजरात में मुसलमान यदि दूसरे वर्गों से अधिक गरीब हैं तो इसमें कोई बहुत आश्चर्य की बात नहीं है। लेकिन आश्चर्य इस बात पर है कि उत्तर प्रदेश और बिहार जहां सेकुलर सरकारों का राज है।
यह स्थिति असम की है जहां ज्यादातर कांग्रेस का राज रहा है। योजना आयोग के यह आंकड़े इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि मुसलमानों की गरीबी दूर करने की कोशिश नहीं की गई तो सेकुलरिज्म एक खोखला नारा होकर रह जाएगा और यह हिन्दुस्तानी मुसलमानों का दुर्भाग्य होगा।
`अल्पसंख्यक मंत्रालय की सुस्ती, 587 करोड़ रुपये इस्तेमाल नहीं हुए' के शीर्षक से दैनिक `इंकलाब' ने स्टैंडिंग कमेटी आन सोशल जस्टिस एंड इम्पावरमेंट की रिपोर्ट के हवाले से लखा है कि 2010-11 में अल्पसंख्यकों के विकास के लिए दिए गए अनुदान में से 587 करोड़ रुपये इस्तेमाल करने के बजाय इसे सरकार को वापस लौटा दिया। रिपोर्ट के अनुसार गत वर्ष लौटाई गई रकम इसके मुकाबले कहीं कम थी। अल्संख्यक मंत्रालय ने 2008-09 में 33.63 करोड़ रुपये और 2009-10 में 31.5 करोड़ रुपये का गैर इस्तेमाल अनुदान लौटा दिया था। कमेटी रिपोर्ट के अनुसार यह रकम इसलिए इस्तेमाल नहीं हो सकी कि 4 नई योजनाएं शुरू ही नहीं की जा सकीं। मंत्रालय ने मल्टी सेक्टोरियल डेवलपमेंट प्रोग्राम के लिए दिए गए 426.26 करोड़ रुपये इस्तेमाल नहीं किए। इसने पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति के लिए 24 करोड़, वक्फ बोर्ड के कम्प्यूटरीकरण के लिए दिए गए 9.3 करोड़ रुपये, प्री मैट्रिक छात्रवृत्ति के लिए 33 करोड़ रुपये और मेरिट कम मींस छात्रवृत्ति के लिए दिए 26 करोड़ रुपये भी इस्तेमाल नहीं किए। कमेटी ने यह भी कहा कि सच्चर कमेटी के सभी सुझावों का गंभीरतापूर्वक क्रियान्वयन नहीं किया जा रहा है। कमेटी ने मंत्रालय को हिदायत दी कि सच्चर सुझावों को सीमित समय में क्रियान्वित करने हेतु योजना बनाए।
`यह तो सांप्रदायिकता के संबंध में बातें हैं और बातों का क्या? काम कब शुरू होगा?' के शीर्षक से दैनिक `सहाफत' में प्रकाशित समीक्षात्मक लेख में मौलाना अब्दुल हमीद नोमानी ने लिखा है कि सांप्रदायिक तत्रों की गतिविधियों और देश की व्यवस्था को अपने विचारों के अनुसार चलाने की बात कोई नई नहीं है और यह भी कोई राज नहीं कि इनकी पकड़ विभिन्न विभागों पर कितनी मजबूत है। अन्य पार्टियों को छोड़िए, खुद कांग्रेस में भी संघ और इसके विचारों से प्रभावित सांप्रदायिक तत्वों की एक मजबूत टोली हमेशा से रही है। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू बराबर इस तरफ ध्यान दिलाते हुए उन्हें बेनकाब करने और उनसे सरकारी विभागों को पाक करने की जरूरत बताते रहते थे।
गत कुछ दिनों से राहुल गांधी, जयप्रकाश अग्राल और दिग्विजय सिंह जैसे कांग्रेसियों को सरकारी विभागों में सांप्रदायिक तत्वों की घुसपैठ का बहुत अहसास हो रहा है और वह इसका इजहार कर रहे हैं। लेकिन यह काफी नहीं है। बीमारी के कारणों को दूर करने के साथ सरकारी विभागों को पाक करने के लिए व्यवहारिक उपाय भी जरूरी हैं।
`सरकार और अल्पसंख्यक' के शीर्षक से दैनिक `हमारा समाज' ने अपने संपादकीय में चर्चा करते हुए लिखा है कि 2012-13 के बजट में वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने अपनी आंखों पर एक चश्मा लगाते हुए अल्पसंख्यकों के हाथों में झुनझुना थमा दिया है जिससे यह महसूस होता है कि हमारी सरकार के पास अल्पसंख्यकों के लिए कुछ है ही नहीं अथवा हम अल्पसंख्यकों को देश के नागरिक ही नहीं मानते। अल्पसंख्यकों के साथ बजट में यह अन्याय कोई इस वर्ष का मामला ही नहीं है बल्कि गत कई बार से अल्पसंख्यकों के साथ यही मजाक किया जाता रहा है और यदि अल्पसंख्यकों के लिए राशि का प्रावधान किया जाता है, इसके संबंध में कोई योजना तैयार नहीं की जाती कि वह किस तरह खर्च की जाएगी अथवा अल्पसंख्यकों पर इस राशि को कैसे लगाएं। इसलिए आने वाले वर्ष में वह राशि वापस हो जाती है और कहा जाता है कि अल्पसंख्यकों को इसकी जरूरत नहीं। वैसे गत बजट के मुकाबले 385 करोड़ रुपये की वृद्धि की गई है। लेकिन इस वृद्धि से देश के अल्पसंख्यकों को किसी सूरत में कोई फायदा नहीं होता।

Friday, August 5, 2011

महंगाई और भ्रष्टाचार में फंसी सरकार

`मुस्लिम कैसे पाएं अपना वाजिब स्थान' के शीर्षक से उर्दू दैनिक `हिन्द समाचार' ने लिखा है। दूसरी पिछड़ी जातियों से जुड़े मुस्लिमों के लिए यूपीए सरकार कुछ आरक्षण कर रही है क्योंकि उत्तर प्रदेश में चुनाव समीप है और कांग्रेस का मकसद यह है कि वह दोबारा इस राज्य में पदासीन हो जाए। भारतीय मुसलमानों के सामने आरक्षण ही अहम मुद्दा नहीं है अन्य कई समस्याएं भी हैं। उनकी स्थिति तो प्रचलित फारसी कहावत `तन हम दाग, दाग सूद, पम्बा कुजा नेहाम' (पूरे बदन पर दाग ही दाग हैं) में कितनी जगह फाया रखूं। अन्य समस्याओं को छोड़कर केवल एक समस्या से ही निपटना असंतुष्टि है, इससे भले ही बुरा मकसद जाहिर न होता हो, अज्ञात कारणों से नाइंसाफी को जारी रखने की बू आती है। ऐसा लगता है कि आरक्षण की यह पेशकश बड़ी होशियारी से तैयारी की गई है। इसके बाद कांग्रेस के कुछ चहेते इसे अदालत में चैलेंज करेंगे और अदालतें इसे एक अथवा दूसरा कारण बताकर निरस्त कर देंगी। आखिर हिन्दू वोट मुस्लिम वोट के मुकाबले अहम है क्योंकि हिन्दू वोट मुस्लिम वोट के मुकाबले कहीं ज्यादा है। इसी बीच आरक्षण की इस घोषणा से कांग्रेस की चुनावी मुहिम चलाने वाले पूरा फायदा उठा लेंगे। इस प्रक्रिया में मुस्लिमों की नई राजनैतिक पार्टियों को चुनाव में नुकसान पहुंचेगा जैसा कि एआईयूडीएफ, पीस पार्टी और वैलफेयर पार्टी से जाहिर है। इसलिए मुस्लिमों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उन्हें वहीं कांग्रेस के बारे में वोट देने के लिए सोचना चाहिए जहां इन पार्टियों में किसी एक अथवा अन्य का कोई उम्मीदवार न हो। `वोटिंग कायदे के तहत बहस का जुआ' के शीर्षक से दैनिक `प्रताप' में सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने अपने सम्पादकीय में लिखा है। जैसा कि आशा थी भारतीय जनता पार्टी ने संसद में यूपीए सरकार पर हल्ला बोल दिया है और भ्रष्टाचार व महंगाई को लेकर केंद्र की कांग्रेस अगुवाई वाली यूपीए सरकार को घेरने में लगी भाजपा ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को चारों तरफ से घेरने की पूरी योजना बना ली है। भाजपा ने इन पर मानसून सत्र का माहौल खराब करने का भी आरोप लगा दिया है।
भ्रष्टाचार और महंगाई पर भाजपा केवल बहस ही नहीं बल्कि वोटिंग भी चाहती है ताकि इन मुद्दों पर यह साफ हो सके कि कौन सरकार के साथ है और कौन सरकार के खिलाफ। यह दांव चलकर भाजपा कांग्रेस के साथ इसके सहयोगियों को भी बेनकाब करना चाहती है। भाजपा का अनुमान है कि इन मुद्दों पर यदि वोटिंग हुई तो यूपीए सरकार फंस सकती है। सरकार ने वोट कायदे के तहत बहस कराना स्वीकार कर लिया है। देखें इस जुए में वह कितनी कामयाब होती है?
हैदराबाद से प्रकाशित उर्दू दैनिक `ऐतमाद' में आमिर उल्लाह खां ने `सुधारों के 20 साल' के शीर्षक से समीक्षा करते हुए लिखा है कि 20 साल पूर्व भारत की प्रति व्यक्ति आय 30 डालर थी अर्थात् हर भारतीय की मासिक आय 400 रुपये से भी कम थी। लेकिन अब यह 1500 डालर अर्थात् 60 हजार रुपये को छूने लगी है। सरकार के पास अब खजाना भरा हुआ है ताकि वह गरीबों पर खर्च कर सके। मनमोहन सिंह ने 20 वर्ष पूर्व सुधारों का जब सफर शुरू किया था। यही कहा जा रहा था कि भारत संकट में आ जाएगा। गरीबी बढ़ेगी, भारतीय कम्पनियां बन्द होंगी, हर चीज इम्पोर्ट करना पड़ेगी और विदेशी कम्पनियों का भारतीय मंडियों पर कब्जा हो जाएगा। लेकिन इनमें से कोई संदेह सच साबित न हो सका। भारत में विदेशी निवेश में जितनी वृद्धि हुई, भारतीयों ने भी विदेशों में उतना ही निवेश किया।
`मस्जिदों पर गैर कानूनी कब्जों के लिए दिल्ली वक्फ बोर्ड जिम्मेदार' के शीर्षक से दैनिक `सहाफत' में मुमताज आलम रिजवी ने अपनी विशेष रिपोर्ट में आरटीआई के हवाले से लिखा है कि जमीयत इस्लामी हिन्द के सहायक सचिव इंतिजार नईम की 16 जून 2011 की आरटीआई के जवाब में वक्फ बोर्ड ने यह तो बताया कि 26 वक्फ जायदादों पर विभिन्न सरकारी संस्थानों के गैर कानूनी कब्जे हैं और 72 वक्फ जायदादों पर पुरातत्व विभाग का गैर कानूनी कब्जा है। दिल्ली वक्फ बोर्ड की लापरवाही की एक मिसाल निजामुद्दीन के पीछे रिंग रोड पर मिलिनियम पार्प से मिला हुआ 14 एकड़ कब्रिस्तान की जमीन है। 19 सितम्बर 1949 में सरकार से एक रजिस्टर्ड संधि के तहत दिल्ली के मुसलमानों के लिए 14 एकड़ जमीन कब्रिस्तान के लिए अलाट की गई थी लेकिन डीडीए ने इस 14 एकड़ में से 10 एकड़ जमीन इस शर्त पर इस्तेमाल कर लिया कि वक्फ बोर्ड को जब इसकी जरूरत होगी वह इसे इस्तेमाल कर सकेगा। आरटीआई द्वारा यह पूछे जाने पर कि वक्फ बोर्ड ने इस 14 एकड़ कब्रिस्तान की जमीन की सुरक्षा के लिए क्या उपाय किए और बोर्ड की बैठक में यह एजेंडा कब रहा? के जवाब में वक्फ अधिकारी नजमुल हसनैन ने लिखा कि इस 14 एकड़ जमीन की हिफाजत के लिए दिल्ली वक्फ बोर्ड की ओर से कोई उपाय नहीं किए गए और न ही कोई कानूनी कार्यवाही की गई।

Wednesday, March 23, 2011

मौलाना अरशद मदनी पर 101 करोड़ रुपये का दावा

बीते दिनों राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं पर उर्दू मीडिया ने परम्परानुसार बेबाकी से अपना पक्ष रखा। पेश है इस बाबत कुछ उर्दू अखबारों की राय।

दुश्मन जायदाद के विधेयक (संशोधित) को लेकर जहां उर्दू अखबारों ने सक्रिय भूमिका निभाई वहां मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने वाले मुस्लिम सांसदों की इसमें दिलचस्पी नहीं रही। इस पर चर्चा करते हुए दैनिक `हमारा समाज' में आमिर सलीम खाँ ने अपनी रिपोर्ट में यह रहस्योद्घाटन किया है कि ऐनामी प्रापर्टी विधेयक 2010 पर राज्यसभा की स्टैंडिंग कमेटी की बैठक से गायब रहे कमेटी के मुस्लिम सदस्य। जबकि सूत्रों के अनुसार कल की यह बैठक आखिरी थी जिसके बाद कमेटी विधेयक पर अपनी रिपोर्ट पेश करने में सक्षम हो जाती है। इसी बीच 14 मार्च को राष्ट्रीय एकता परिषद के सदस्य नवेद हामिद की पहल पर 17 सांसदों के हस्ताक्षर से एक पत्र कमेटी चेयरमैन वेंकैया नायडू को दिया गया है जिस पर एक माह का समय दे दिया गया है। राज्यसभा की 31 सदस्यीय स्टैंडिंग कमेटी में चार सदस्य मुस्लिम हैं जिनमें तारिक अनवर, मौलाना असरारुल हक कासमी, मोहम्मद हमीद उल्ला सईद और जावेद अख्तर शामिल हैं। 1968 में बने एनेमी प्रापर्टी कानून के तहत पाकिस्तान जाने वालों के हिन्दुस्तान में रह गए वारिसों के बावजूद उनकी जमीनें कसटोडियन के कब्जे में दे दी गई थीं। राजा महमूदाबाद के वारिस मोहम्मद आमिर खाँ ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और एक लम्बी लड़ाई के बाद 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने इनके हक में फैसला कर दिया लेकिन इसके खिलाफ गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने अध्यादेश को लेकर फैसले को निरस्त कर दिया। इस अध्यादेश से वारिसों को जायदादें नहीं मिल रही थीं इस पर राज्यसभा के डिप्टी चेयरमैन के. रहमान खाँ और केंद्रीय मंत्री अल्पसंख्यक मंत्रालय सलमान खुर्शीद की अगुवाई में 40 मुस्लिम सांसदों ने जुलाई 2010 में प्रधानमंत्री से मुलाकात कर विधेयक में उचित संशोधन की मांग की थी। जिस पर सरकार ने स्टैंडिंग कमेटी बनाकर मामला उसके सुपुर्द कर दिया।

`मौलाना अरशद मदनी पर 101 करोड़ का दावा, मौलाना बदरुद्दीन अजमल पर भाजपा से 55 करोड़ घूस लेने का आरोप, गोहाटी जिला अदालत में अवमानना का मुकदमा दायर' के शीर्षक से `हमारा समाज' ने लिखा है। गत महीनों जमीयत उलेमा हिन्द (मौलाना अरशद मदनी) के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी और मौलाना बदरुद्दीन अजमल में होने वाली लड़ाई खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोकेटिक फ्रंट के अध्यक्ष मौलाना अजमल पर गत महीने फरवरी में मौलाना मदनी द्वारा कथित तौर पर गत लोकसभा चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी से 55 करोड़ रुपये घूस लेने का आरोप लगाया था। मौलाना अजमल ने इस पर अवमानना का केस करते हुए असम मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारेगी। इस पार्टी में आरिफ बेग, सिकंदर बख्त, मुख्तार अब्बास नकवी और आरिफ मोहम्मद खाँ जैसे तथाकथित मुस्लिम चेहरों को सामने रखकर असम के मुस्लिम चेहरों की हकीकत को भी अच्छी तरह समझा जा सकता है। गोहाटी की जिला अदालत में 101 करोड़ रुपये का मुकदमा मौलाना अरशद मदनी पर किया है। एयूडीएफ प्रवक्ता के अनुसार अवमानना की याचिका में मौलाना अजमल की ओर से कहा गया है चूंकि वह लाखों लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं और इनके सामाजिक काम का दायरा दूर-दूर तक फैला हुआ है। इसलिए इस आरोप से उन्हें काफी मानसिक और आर्थिक चोट पहुंची है और इनकी छवि खराब हुई है। ऐसी सूरत में यदि उन्होंने घूस लिया है तो आदलत में सुबूत पेश किए जाएं। यदि ऐसा नहीं है तो फिर मौलाना अरशद मदनी के खिलाफ अदालत नोटिस जारी करे। मौलाना अजमल ने याचिका में कहा है कि यदि दावा गलत है तो फिर मेरे करोड़ों रुपये की भरपायी की जाए जिसके लिए उन्होंने 101 करोड़ रुपये तय किए हैं। इसमें अदालत को कम-ज्यादा करने का अधिकार दिया गया है। ज्ञात रहे असम में तोपखाना मदरसा के अधिवेशन में मौलाना अजमल पर मौलाना अरशद मदनी ने आरोप लगाया कि उन्होंने गत लोकसभा चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी से 55 करोड़ रुपये घूस ली थी।

बाबरी मस्जिद मिलकियत मुकदमें में अदालत की अवमानना के आरोप में इलाहाबाद हाई कोर्ट की विशेष तीन सदस्यीय खंडपीठ द्वारा पीटीआई, दैनिक जागरण और इतिहासकारों एवं पुरातत्व विशेषज्ञों पर जुर्माना किए जाने पर चर्चा करते हुए दैनिक `अखबारे मशरिक' ने लिखा है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट की विशेष खंडपीठ के जस्टिस एसयू खाँ, जस्टिस सुधीर अग्रवाल और जस्टिस वीके दीक्षित ने हिन्दी `दैनिक जागरण' बाबरी मस्जिद मुकदमें की गलत रिपोर्टिंग पर दोनों पर एक हजार रुपये का जुर्माना किया है। खंडपीठ ने बाबरी मस्जिद मुकदमें में मुसलमानों की तरफ से पेश किए इतिहासकार और पुरातत्व विशेषज्ञ धतेश्वर मंडल और प्रोफेसर शिंटी रत्नाकर को भी अदालत की अवमानना का दोषी ठहराते हुए दोनों पर एक-एक हजार का जुर्माना किया है। इन दोनों इतिहासकारों तक अधारित सच्चाई को स्वीकार किए जाने पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की विशेष खंडपीठ की आलोचना करते हुए अपना विरोध प्रकट किया था।

`असम के मुसलमानों के लिए नया जाल बिछाया जा रहा है' के शीर्षक से `सहरोजा दावत' ने लिखा है। भाजपा ने इस बार मुस्लिम बहुल क्षेत्र असम में मुसलमानों को अपने जाल में फंसाने की रणनीति बनाई है। सूत्रों के अनुसार भाजपा इस चुनाव में दो मुस्लिम उम्मीदारों को मैदान में उतारेगी। इस पार्टी में आरिफ बेग, सिकंदर बख्त, मुख्तार अब्बास नकवी और आरिफ मोहम्मद खाँ जैसे तथाकथित मुस्लिम चेहरों को सामने रखकर असम के मुस्लिम चेहरों की हकीकत को भी अच्छी तरह समझा जा सकता है।

स्वतंत्रता आंदोलन से पूर्व ही इसकी विचारधारा को दुनिया जानती है। हिन्दू महासभा, आरएसएस, जनसंघ और भाजपा की तरह मुखौटे सामने आते हैं। लेकिन मिशन एवं गंतव्य में कोई फर्प नहीं रहा।

भाजपा बिहार विधाननसभा के चुनावी नतीजों की रोशनी में असम चुनाव को देख रही है। जाहिर है वहां लालू यादव और कांग्रेस ने जिस तरह उन्हें मायूस किया और नीतीश कुमार ने सांप्रदायिकता को रोकते हुए चाहे मुसलमानों को कुछ नहीं दिया। कुल मिलाकर जो विकास कार्य किया उससे मुसलमान भी लाभांवित हो रहे हैं। कोई ऐसा काम नहीं किया गया जिससे मुसलमान भेदभाव का अहसास करते। यदि स्वयं भाजपा इस रंग में आ जाएगी तो अपनी विचारधारा से दूरी की बिना पर स्वयं अपने वोट बैंक से वंचित हो जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा हज सब्सिडी को बहाल रखने के निर्णय के बाद मुस्लिम नेतृत्व ने इसके खिलाफ लामबंद होना शुरू कर दिया है और वह इसे खत्म करने की मांग कर रहे हैं क्योंकि हज सब्सिडी के बहाने सरकार एयर इंडिया को फायदा पहुंचा रही है। मुस्लिम नेतृत्व की सोच के विपरीत केंद्रीय हज कमेटी के उपाध्यक्ष ने हज सब्सिडी जारी रखने की वकालत कर इनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। दैनिक `हिन्दुस्तान एक्सप्रेस' में फरजान कुरैशी ने हज कमेटी उपाध्यक्ष हसन अहमद के हवाले से लिखा है कि सब्सिडी हमारा अधिकार है और यह जारी रहना चाहिए। उनका कहना था कि देश का मुसलमान इनकम टैक्स और सेल्स टैक्स देता है और जो लोग सरकार को टैक्स देते हैं उसके बदले सरकार उन्हें कुछ न कुछ छूट जरूर देती है। मुसलमान देश के नागरिक हैं जब दूसरे लोग सरकार से सब्सिडी हासिल कर सकते हैं तो फिर मुसलमान इस छूट से क्यों वंचित रहें।

`नकवी के बयान पर कांग्रेस में आंतरिक बहस की शुरुआत, कांग्रेस के मुस्लिम नेता झांक रहे हैं अपना गिरेबां, सेकुलरिज्म की रक्षा के लिए पार्टी नेता सक्रिय' के तहत दैनिक `सहाफत' ने लिखा है। भाजपा प्रवक्ता और सांसद मुख्तार अब्बास नकवी द्वारा जारी बजट के आरोप को लेकर कांग्रेस पार्टी में आंतरिक बहस शुरू हो गई है। मुख्तार अब्बास नकवी ने अल्पसंख्यक मंत्रालय पर बहस के दौरान कांग्रेस और सरकार पर कई तरह के सवाल उठाए थे। उनका आरोप था कि कांग्रेस पार्टी सेकुलरिज्म की बात करती है लेकिन देश में आज के दिन किसी राज्य का गवर्नर मुस्लिम नहीं है। पूरे देश के किसी भी राज्य में मुख्यमंत्री तो दूर की बात है। एक भी विपक्षी नेता मुस्लिम नहीं है। बिहार छोड़कर किसी भी राज्य में कांग्रेस अध्यक्ष मुस्लिम नहीं है। इस सन्दर्भ में कांग्रेस अल्पसंख्यक मोर्चा के महासचिव अनीस दुर्रानी का कहना है कि उनके बयान से कांग्रेस की सेहत पर कोई असर पड़ने वाला नहीं है।