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Sunday, September 16, 2012

असम हिंसा में राज्य सरकार को मुशावरत की क्लीन चिट


हामिद अंसारी के दूसरी बार उपराष्ट्रपति बनने का स्वागत करते हुए दैनिक `जदीद मेल' ने लिखा है कि वह स्वतंत्र भारत के 14वें उपराष्ट्रपति हैं और एक मुसलमान के नाते वह दूसरे मुस्लिम हैं। इनसे पूर्व स्वर्गीय जाकिर हुसैन उपराष्ट्रपति रहे थे जो बाद में राष्ट्रपति बने। जाकिर हुसैन, फखरुद्दीन अली अहमद और एपीजे अब्दुल कलाम तीन ऐसे मुस्लिम हैं जो राष्ट्रपति रहे हैं। अब तक दो मुस्लिम चीफ जस्टिस हिदायत उल्ला बेग और जस्टिस एएम अहमदी रह चुके हैं। इदरीस हसन लतीफ देश की वायुसेना के चीफ रहे हैं। फौज का चीफ अभी तक कोई मुसलमान नहीं हुआ लेकिन अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के वर्तमान कुलपति जनरल जमीरउद्दीन शाह फौज के उप चीफ रह चुके हैं। भारतीय लोकतंत्र में हिन्दुस्तानी मुसलमानों के लिए उच्च पदों के दरवाजे खुले हुए हैं और यह राष्ट्र के सेकुलर चरित्र का सुबूत है लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी कौम की समस्याएं सत्ता के शीर्ष पदों पर असीन होने से हल हो सकते हैं। आज मुसलमान राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक हर मैदान में पिछड़ेपन की चरम सीमा पर पहुंच चुका है।
इसी स्वतंत्र और सेकुलर भारत में बाबरी मस्जिद का गिराया जाना, गुजरात में मुसलमानों का नरसंहार होना और अभी दस दिन पूर्व असम में  लगभग चार लाख मुसलमानों का नस्ली हिंसा में  बेघर होना इस बात का तर्प है कि मुसलमानों के खिलाफ देश में घृणा का एक सैलाब है जो ढाढे मार रहा है। इसलिए देश हित में यही है कि हामिद अंसारी उपराष्ट्रपति के पद पर रहते देश के मुसलमानों की समस्याओं पर गंभीरतापूर्वक ध्यान दें और सच्चर कमेटी रिपोर्ट के सुझावों पर अमल कर इनकी समस्याओं को जल्द से जल्द हल करने की कोशिश की जाए।
`फिजा' में दूषित `चांद' के शीर्षक से दैनिक `हिन्दुस्तान एक्सप्रेस' ने अपने सम्पादकीय में 24 घंटे में हरियाणा से दोनों खबरों पर चर्चा करते हुए लिखा है कि एयर होस्टेस और फिजा दोनों की मौत में एक बात संयुक्त यह है कि इसका आरोप ऐसे वर्ग पर जाता है जिस पर कानून बनाने की अतिरिक्त जिम्मेदारी है। दोनों की कहानी में बहुत ज्यादा फर्प नहीं है। अनुराधा उर्प फिजा हरियाणा की पूर्व सहायक एडवोकेट जनरल थीं और राज्य के उपमुख्यमंत्री की मोहब्बत में फंस गई थी। शादी के लिए इस्लाम धर्म स्वीकार करने का ड्रामा रचा क्योंकि धर्म परिवर्तन के बिना शादी संभव नहीं थी। अनुराधा ने फिजा और चंद्र मोहन ने चांद मोहम्मद का चोला पहन शादी का स्वांग रचा, लेकिन यह रिश्ता 40 दिन से ज्यादा न चला और तलाक हो गई। इन दोनों में दूरी क्यों हुई, इस पर किसी चर्चा की जरूरत नहीं है और न ही यह बताने की जरूरत है कि अनुराधा की जिंदगी में उसके इतने ज्यादा नकारात्मक प्रभाव पड़े कि उसने आत्महत्या कर अपनी जिंदगी को खत्म कर लिया। यह संयोग ही है कि अनुराधा की जान भी एक नेता के चक्कर में गई जबकि गीतिका की जान भी एक नेता के कारण गई। इन घटनाओं में उन राजनेताओं का लिप्त होना निश्चय ही चिंता का विषय है जो विधानसभा के सदस्य हैं और जिन पर कानून बनाने की अतिरिक्त जिम्मेदारी भी है। जब इस तरह के लोग कानून बनाएंगे तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि समाज किस रास्ते पर चलेगा और महिलाओं की आबरू किस हद तक सुरक्षित रहेगी?
असम दंगों पर चर्चा करते हुए मोहम्मद रियाज अहमद ने लिखा है कि असम में योजनाबद्ध तरीके से मुसलमानों का मारा गया, उनके मकान जलाए गए। 20 जुलाई से लगातार दस दिन तक बोडो टेरीटोरियल आटोनामी डिस्ट्रिक्ट्स (ँऊAअ) में मुसलमानों का खून बहाया गया। इसके बावजूद कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने आपराधिक खामोशी अख्तियार की। कोकराझार एवं अन्य जिलों में मुसलमानों की जो तबाही हुई है उसमें गोगोई की भूमिका संदिग्ध हो गई है। क्योंकि पुलिस ने मौजूद कुछ मानवतावादी और शिक्षिक पदाधिकारियों के हवाले से सूत्रों न रहस्योद्घाटन किया है कि इन पुलिस अधिकारियों को हिंसा भड़काने वालों के खिलाफ किसी भी कार्यवाही न करने की हिदायत दी गई थी इनसे स्पष्ट तौर पर कह दिया गया था कि बोडो आतंकवादी जो कर रहे हैं उनके इस काम (मुसलमानों का नरसंहार) में रुकावट न डाली जाए। यह हिदायत किसने दी? क्यों दी और इसका मकसद क्या है? इस बारे में उच्च स्तरीय जांच जरूरी है। वैसे भी कोकराझार में मुसलमानों का कत्ल कोई नई बात नहीं है। वर्तमान नस्ली हिंसा से `नेली' में 18 फरवरी 1983 को मुसलमानों के बर्बरतापूर्वक किए कत्ल की याद ताजा हो गई। 18 फरवरी को चुनाव के दिन लगभग सुबह 9 बजे एक भीड़ ने नेली और आसपास के देहातों पर हमला कर दिया और 6 घंटों तक मुसलमानों का कत्ल होता रहा। इसमें 2191 मुसलमानों के शहीद होने की पुष्टि की गई लेकिन गैर सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 5 से 10 हजार मुसलमानों को मौत के घाट उतारा गया। इस घटना पर 378 मुकदमे दर्ज किए गए लेकिन राजीव गांधी के साथ आंसु संधि के दौरान इन मुकदमों को खत्म कर दिया गया।
`असम हिंसा पर गोगोई सरकार को क्लीन चिट' दिए जाने पर मोहम्मद अहमद ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि आल इंडिया मुस्लिम मजलिस मुशावरत ने आज कहा है कि यह कहना कि असम हिंसा गोगोई सरकार की सरपरस्ती में हुई है बिल्कुल गलत होगा। मुशावरत के अध्यक्ष डॉ. जफरुल इस्लाम खां ने असम से वापसी के बाद आज मुशावरत के मुख्यालय में पत्रकारों से बातचीत में कहा कि हम राज्य सरकार के खिलाफ कोई मुकदमा कर ही नहीं सकते, क्योंकि वह इस हिंसा के लिए जिम्मेदारी नहीं है। उन्होनें बोडो लीडरशिप (बीटीसी) को भी क्लीन चिट देने की कोशिश करते हुए कहा कि इनकी लीडरशिप से बात करने के बाद ऐसा लगता है कि वह भी इस हिंसा पर शर्मिंदा है और चाहते हैं कि जल्द से जल्द लोग अपने घरों को लौट आएं क्योंकि यदि मुसलमान वापस नहीं आएंगे तो उनके क्षेत्रों में विकास रुक जाएगा।
उन्होंने इस हिंसा को गुजरात से जोड़ने की बात को भी सिरे से खारिज करते हुए कहा कि गुजरात दंगे मोदी की सरपरस्ती में हुआ था, लेकिन इसमें सरकार (गोगोई) शामिल नहीं हैं। उल्लेखनीय है कि जमीअत उलेमा हिंद (अरशद मदनी) के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने असम से वापसी के बाद असम हिंसा को गुजरात हिंसा की तर्ज पर बताया था। जिसका मुशावरत ने खंडन कर दिया।
`अन्ना ने टीम भंग तो कर दी पर अब क्या होगा?' के शीर्षक से दैनिक `प्रताप' के सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि सोमवार को अन्ना हजारे ने अपनी टीम भंग करने की घोषणा कर दी। उन्होंने कहा कि जन लोकपाल के लिए टीम अन्ना बनाई गई थी और अब चूंकि सरकार से इस विषय पर कोई बातचीत नहीं होनी है इसलिए टीम अन्ना के नाम से शुरू हुए काम खत्म होता है और समिति भी समाप्त होती है। उन्होंने कहा कि अब चुनावी तैयारी शुरू होगी। टीम अन्ना कुछ मुद्दों को लेकर चल रही है, ऐसे में जातिवाद के जिन्न से कैसे निपटेगी?
अन्ना खुद कह चुके हैं कि वह तो नगर पालिका का चुनाव भी नहीं जीत सकते, ऐसे में लोकसभा की कितनी सीट जीत पाएंगे? प्रत्याशियों का चयन भी बड़ा काम होता है। राजनीतिक संगठन बनाने या चुनाव लड़ने के लिए पैसा, साधन चाहिए, यह कहां से आएगा? इसलिए भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन को राजनीतिक विकल्प के रूप में आगे बढ़ाना आसान नहीं होगा? वैसे यह चुनौती अकेले इस आंदोलन की नहीं बल्कि देश के लोकतांत्रिक भविष्य की भी है।

Sunday, June 17, 2012

`सब कोटा संविधान के खिलाफ नहीं'


देश की गिरती अर्थव्यवस्था पर चर्चा करते हुए उर्दू दैनिक `प्रताप' में सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि जो बात हम अक्सर कहा करते हैं उसकी पुष्टि अब अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एवं पुअर्स (एस एंड पी) ने कर दी है। हम अकसर कहा करते हैं कि हमारे प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की गलत नीतियों, अनिर्णय की आदत ने देश को कंगाली के कगार पर पहुंचा दिया है। भारत की गिरती आर्थिक साख के लिए सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह जिम्मेदार हैं। यह आरोप विपक्षी दलों का नहीं बल्कि एस एंड पी का है। एजेंसी ने भारत की केडिट रेटिंग को और कम करने की चेतावनी देते हुए सीधे शब्दों में कांग्रेस को ही इसके लिए जिम्मेदार ठहराया है। बकौल एजेंसी पार्टी जहां अंदरुनी मतभेदों से भरी है वहीं संप्रग सरकार का ढांचा ही दोषपूर्ण है। एस एंड पी ने संप्रग सरकार के सियासी ढांचे पर भी गंभीर सवाल खड़े करते हुए कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के पास सर्वोच्च अधिकार है। लेकिन वह कैबिनेट में नहीं हैं जबकि बिना चुने हुए नियुक्त प्रधानमंत्री के पास राजनैतिक फैसला लेने के लिए आधार नहीं है। प्रधानमंत्री को अपने मंत्रिमंडल पर ही कंट्रोल नहीं है। वह अपने मंत्रियों से भी अपनी बात नहीं मनवा सकते, कड़े फैसले लेना तो दूर रहा। सवाल राजनीतिक मंशा पर उठाया गया है और कहा गया है कि सुधार रोकने के लिए विपक्ष या सहयोगी दल नहीं खुद कांग्रेस और सरकार जिम्मेदार है। पार्टी के अन्दर ही इसे रोका जा रहा है।
`आरएसएस और भाजपा का असल मकसद' के शीर्षक से दैनिक `सहाफत' ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि भाजपा की ओर से स्पष्ट तौर पर यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि यह इस देश को हर हाल में हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहती है और यहां सदियों पुरानी वही व्यवस्था स्थापित करना चाहती है जिसके तहत यहां वर्ण व्यवस्था लागू थी। अर्थात् जाति-पाति पर आधारित एक ऐसी व्यवस्था यहां थी जिसने इंसानों को कई भागों में विभाजित कर दिया था। इसे यह भी स्वीकार करना चाहिए वह जैसी व्यवस्था भारत में कायम करना चाहती है उसमें बहुसंख्यक समुदाय के लोगों को ही वर्चस्व हासिल होगा और अल्पसंख्यकों को यहां दूसरे और मुसलमानों को तीसरे दर्जे का नागरिक बनकर रहना होगा अन्यथा उनके साथ वही सुलूक होगा जो गुजरात में 2002 में हुआ था और जो फलस्तीनियों के साथ हो रहा है। इस सिलसिले में आरएसएस बल्कि पूरा संघ परिवार भाजपा के साथ है लेकिन वह खुलकर यह स्वीकार नहीं कर रही है जबकि उसकी इच्छा यही है। भाजपा यदि खुलकर अपने गंतव्य की घोषणा कर दे तो राष्ट्रीय राजनीति की तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है और नए राजनैतिक गठजोड़ का रास्ता खुल सकता है। भाजपा और आरएसएस ने अब यह महसूस कर लिया है कि उसके उद्देश्यों को व्यवहारिक रूप से क्रियान्वित करने का काम नरेन्द्र मोदी ही कर सकते हैं। इसीलिए मोदी के सामने आरएसएस और भाजपा एक तरह से नत मस्तक हो गए हैं।
आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट द्वारा 4.5 फीसद मुस्लिम ओबीसी आरक्षण को निरस्त किए जाने पर दैनिक `राष्ट्रीय सहारा' ने `धोखा दिया गया या धोखा खाया गया?' के शीर्षक से लिखे अपने सम्पादकीय में लिखा है कि यदि यह सच कि देश तैयार है या नहीं, चावल का एक ही दाना चखना काफी होता है तो सुप्रीम कोर्ट की तरफ से आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले को स्टे देने से इंकार से अंदाजा लगाया जा सकता है कि बाकी मुकदमे का अंजाम क्या होगा। आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट इसके पूर्व दो बार आंध्र प्रदेश के आदेश को निरस्त कर चुका था जिसमें मुसलमानों को आरक्षण देने की घोषणा की गई थी। आंध्र हाई कोर्ट ने तीसरे आदेश की मंजूरी दी थी जब आंध्र सरकार ने उन मुस्लिम वर्गों को चिन्हित किया जिन्हें ओबीसी करार दिया गया था। समझने वालों को समझ लेना चाहिए था कि धर्म की बुनियाद पर आरक्षण किसी भी हाल में नहीं दिया जा सकता। सलमान खुर्शीद इस बिन्दु को क्यों भूल गए? क्या इसका कारण देश के चार राज्य में होने वाले विधानसभा चुनाव थे। शायद यह भ्रम जानबूझ कर रखा गया कि यह आरक्षण सभी मुसलमानों के लिए है या मुस्लिम ओबीसी के लिए। बहुत से वह तथाकथित मुस्लिम नेता जो आज बड़ी नाराजगी का इजहार कर रहे हैं कल तक खुद भी कह रहे थे कि यह आरक्षण सभी मुसलमानों के लिए है। सबसे ज्यादा भ्रम इन तत्वों ने ही फैलाया। कहा जा रहा है कि मुसलमानों को आरक्षण देने के लिए संविधान में संशोधन होना चाहिए। लेकिन यह बात स्पष्ट नहीं है कि इस तरह का कोई संशोधन संभव भी है अथवा नहीं। क्योंकि सेकुलरिज्म संविधान की रूह है और सेकुलरिज्म में धार्मिक आधार पर किसी भेदभाव की व्यवस्था नहीं रखी गई है। सच तो यह है कि केंद्रीय सरकार और कुछ मुस्लिम नेताओं ने मिलकर मुसलमानों को धोखा दिया है।
`मुस्लिम आरक्षण पर संजीदगी दिखाए सरकार' के शीर्षक से दैनिक `हमारा समाज' ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि सरकार अभी तक यह बताने में असमर्थ रही है कि देश में ओबीसी का फीसदी क्या है। क्योंकि मंडल आयोग की रिपोर्ट तो 1935 की जनगणना के आंकड़ों पर आधारित है और इन आंकड़ों को 75 वर्ष का समय गुजर चुका है इसलिए यह आंकड़े अब पुराने हो गए हैं। अब जबकि 13 जून को इस मामले की सुनवाई है तो सरकार को चाहिए कि वह अल्पसंख्यकों विशेषकर मुसलमानों के बारे में ठोस सुबूत पेश करे यदि अदालत उसे नहीं मानती है तो सरकार का फर्ज है कि वह संसद में कानून बनाए इसके बाद मुस्लिम आरक्षण की बात करे या दूसरा तरीका वही है कि मुसलमानों को भी धारा 341 में शामिल किया जाए क्योंकि धारा 341 में मुसलमानों को शामिल न करना उनके अधिकारों का हनन है। एक पिछड़ा हिन्दू, धोबी, नाई, जुलाहा, धुनिया और खटीक को आरक्षण की सुविधा है लेकिन मुस्लिम धोबी, नाई, जुलाहा, धुनिया या कसाई को यह सुविधा नहीं है। इसलिए कांग्रेस को गंभीरता से कदम उठाना चाहिए ताकि देश की दूसरी सबसे बड़ी बहुसंख्यक समूह इससे वंचित न रह रह जाए।
मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार खालिद शेख ने दैनिक `ंइंकलाब' के अपने विशेष लेख में लिखा है कि सब कोटा संविधान के खिलाफ नहीं है। संविधान की धारा 15(4) और 16(4) में है कि यदि जनता का कोई वर्ग सामाजिक और शैक्षिक स्तर पर पिछड़ा हुआ तो उसे दूसरों के बराबर लाने में सरकार शिक्षा व रोजगार में आरक्षण दे। आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के ऐसे ही एक फैसले पर 25 मार्च 2010 को सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी बहुत महत्वपूर्ण है जिसमें कहा गया है कि मुसलमानों के कुछ वर्ग सामाजिक व शैक्षिक रूप से पिछड़े हैं, इसलिए इस बुनियाद पर कि वह मुसलमान हैं उन्हें आरक्षण से वंचित नहीं रखा जा सकता। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता वीरप्पा मोइली का यह बयान भी कम अहम नहीं है कि संविधान बनाते समय डॉ. बीआर अम्बेडकर ने मसौदे की धारा 294 में अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण की व्यवस्था रखी जिसे देश के विभाजन के बाद फाइनल करते समय निकाल दिया गया।

H � � � � �� ��ती है कि मामला न्यायालय में पहुंचते ही बच निकलने के सारे रास्ते बंद हो जायेंगे। अब सरकारी तौर पर टीम अन्ना को विदेशी हस्तक कह दिया गया है क्या टीम अन्ना इसको अवमानना का मुद्दा बनाकर सरकार को अदालत में घसीटेगी? हरीश खरे ने "ाrक ही कहा है कि मनमोहन सिंह भ्रष्ट नहीं हैं लेकिन भ्रष्टाचार को संरक्षण देने के गुनाहगार हैं यह बात उनके अधीन रहते हुए कोल ब्लाक आवंटन का विवरण सामने आने से स्पष्ट हो गया है। पहले हम नारा लगाते थे सच्चे का बोलबाला झू"s का मुंह काला। अब सत्ता का नारा है भ्रष्टाचारियों का बोलबाला, सच्चे का मुंह काला। ऐसे में नैतिकता के आधार पर पद त्याग की उम्मीद रेगिस्तान में पानी ढूंढने  समान है। सुब्रह्मण्यम स्वामी की तरह अदालत में ही जाना एकमात्र उपाय है।