Sunday, November 13, 2011

सच गवारा क्यों नहीं होता!

मालेगांव बम धमाकों के आरोप में गिरफ्तार व मुस्लिम युवकों की 6 साल बाद रिहाई पर चर्चा करते हुए दैनिक `अखबारे मशरिक' ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि 2006 में हुए इस धमाके में 37 व्यक्ति मारे गए और सैकड़ों जख्मी हुए। मरने और जख्मी होने वाले सभी मुसलमान थे। प्रशासन ने यह सोचकर कि धमाका करने वाले केवल मुसलमान होते हैं, 9 मुसलमानों को गिरफ्तार कर लिया। इनके घर वाले बराबर यह कहते रहे कि यह लोग बेगुनाह हैं और इनका धमाकों से कुछ लेना-देना नहीं है। लेकिन सरकार ने इनकी फरियाद नहीं सुनी। शुरू में महाराष्ट्र एटीएस ने इस मामले को देखा और उसी के दखल पर इन सबकी गिरफ्तारी हुई थी, बाद में यह केस सीबीआई के हवाले कर दिया जिसके काम करने का तरीका भी एटीएस जैसा ही था। इसी वर्ष असीमानन्द ने इकबाले जुर्म किया कि 2006 में मालेगांव बम धमाके में कट्टरपंथी हिन्दू संगठन का हाथ था। जिसने मालेगांव के अतिरिक्त अजमेर और हैदराबाद की मक्का मस्जिद में भी बम धमाके किए थे। असीमानन्द के कुबूल जुर्म के बाद उर्दू अखबारों और मुस्लिम नेतृत्व ने इन मुस्लिम युवाओं को रिहा कराने का आंदोलन चलाया। इस बाबत महाराष्ट्र मुख्यमंत्री और केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम से मिलकर उन्हें हालात से अवगत कराया गया। शुक्र है कि घटनाओं की रोशनी में सरकार का माइंड सेट बदला है और अब विशाल परिपेक्ष में जांच करने लगी है। सरकार से हमारी मांग है कि वह बम धमाकों में गिरफ्तार मुसलमानों के केसों पर पुनर्विचार करें एवं बम धमाकों में लिप्त हिन्दू संगठनों को सामने लाए और इनके खिलाफ उचित कार्यवाही करे ताकि दुनिया के सामने सही सूरत-ए-हाल आ सके।
`सच गवारा क्यों नहीं होता!' के शीर्षक से दैनिक `जदीद मेल' में अपने सम्पादकीय में उत्तर प्रदेश पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी डीआईजी देवेन्द्र दत्त मिश्रा द्वारा लगाए गए आरोप पर चर्चा करते हुए लिखा है कि वह ईमानदार पुलिस अधिकारी हैं। पुलिस सेवा में आने के बाद से कई जिलों में एसपी रहकर उल्लेखनीय काम किया। इनकी बेहतर सेवा हेतु 1992 में उन्हें आईपीएस का दर्जा मिला। 2006 में उन्हें सैलेक्शन ग्रेड मिला और 2008 में उनको पदोन्नति देकर डीआईजी बना दिया गया। बेहद सादा जिन्दगी गुजारने वाले मिश्रा अचानक पागल कैसे हो गए, यह बात समझ से परे है। वह उसूलों के पक्के थे और ईमानदारी से अपना काम करते थे। शायद यही उनका पागलपन हो कि भ्रष्टाचार के समुद्र में रहकर उन्होंने गोता लगाना गवारा नहीं किया और जब सरकार और उसके अन्दर चल रहे घालमेल को मुंह से बाहर निकालना शुरू कर दिया तो उन्हें मानसिक रूप से पागल करार दे दिया गया। वह तो वही बातें कह रहे थे जो उत्तर प्रदेश सरकार के बारे में मशहूर हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो वर्तमान उत्तर प्रदेश सरकार के बारह मंत्री लोकायुक्त की जांच के घेरे में न होते। वह उसी भ्रष्टाचार को उजागर कर रहे थे जिसके सामने आने पर स्वयं मुख्यमंत्री को मजबूर होकर अपने मंत्रियों को मंत्रिमंडल से हटाना पड़ा है। इसलिए सरकार पर जो आरोप लगाए हैं उसके लिए किसी जांच की जरूरत नहीं है। इस कड़वी सच्चाई को हल्क में उतारने का जब साहस नहीं हुआ तो डीडी मिश्रा को पागल करार दे दिया गया।
सच्चर कमेटी के पांच साल पूरे होने पर दरभंगा (बिहार) के मिल्लत कॉलेज के प्रिंसिपल, डॉ. मुशताक अहमद ने इसकी समीक्षा करते हुए लिखा है कि अब जबकि देश के कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और 2014 में आम चुनाव होंगे तो समय-समय पर मुसलमानों को सुनहरा सपना दिखाया जा रहा है विशेषकर सच्चर कमेटी रिपोर्ट के हवाले से। सच्चर कमेटी के सदस्य सचिव अबु सालेह शरीफ ने भी बीते दिनों इस बात को स्वीकार किया है कि कमेटी जिस मकसद से बनाई गई थी और जिस मेहनत से कमेटी सदस्यों ने इस रिपोर्ट को तैयार किया था इस पर पानी फिर गया है। सच्चर कमेटी रिपोर्ट देश के मुसलमानों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक पिछड़ेपन को दूर करने से अधिक राजनैतिक प्रोपेगंडा ही साबित हुई है। केंद्र सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि इस रिपोर्ट से मुसलमानों को कुछ मिला हो या नहीं लेकिन यह सच्चाई तो सामने आ ही गई कि इस देश में स्वतंत्रता के 64 वर्षों के बाद भी वह दलितों से पिछड़े हैं। नवम्बर 2006 में जब कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सरकार के हवाले की थी तो मुसलमानों को यह आशा हो चली थी कि देर से ही शायद अब उनकी हालत सुधरने वाली है लेकिन जिस तरह से इसे राजनीतिक हथकंडा बनाया गया न केवल चिन्ताजनक है बल्कि उनके साथ एक बड़ा धोखा है।
उर्दू साप्ताहिक `चौथी दुनिया' ने भारत के अटार्नी `जनरल ई. वाहनवती का असली चेहरा' से प्रकाशित लेख में रुबी अरविन ने लिखा है कि वाहनवती ने न केवल 2जी स्पेक्ट्रम में सरकार की किरकिरी कराई है बल्कि वह पहले भी अपने फैसलों पर सरकार को परेशानी में डाल चुके हैं। ताजा मामला समाजवादी पार्टी सुप्रीमों मुलायम सिंह यादव की आमदनी से ज्यादा सम्पत्ति का सीबीआई में दर्ज मामला है। सुप्रीम कोर्ट के वकील विश्वनाथ चतुर्वेदी ने दिल्ली के तिलक मार्ग थाने में अटार्नी जनरल के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है जिसमें कहा गया है कि गुलाम वाहनवती ने सीबीआई पर इस बात के लिए दबाव डाला था कि वह मुलायम सिंह के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में चल रहे आमदनी से ज्यादा सम्पत्ति रखने वाले मामले को रफा-दफा करे। इसके अतिरिक्त वाहनवती ने भोपाल गैस कांड पर भी सरकार की किरकिरी कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। फौजी जनरल की आयु विवाद पर इनकी भूमिका ने इस पद की गरिमा को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया। इन पर यह भी आरोप है कि उन्होंने अपने सुपुत्र ऐसाजी वाहनवती को फायदा पहुंचाने के लिए सरकारी निर्देशों की अवहेलना की। मामला वेदांता नामी कम्पनी से जुड़ा है। गृहमंत्री पी. चिदम्बरम इस कम्पनी के बोर्ड ऑफ डायरेर्क्ट्स में थे। गुलाम वाहनवती के सुपुत्र ऐसाजी वाहनवती इसके विधि विशेषज्ञ हैं। अगस्त 2010 में वेदांता ने घोषणा की कि वह केरन इंडिया लिमिटेड की 60 फीसदी हिस्सेदारी खरीदना चाहते हैं। यह फाइल उस समय के सालिसीटर जनरल वाहनवती के पास सीधे पहुंच गई। मामला गैस और पेट्रोलियम का था जिसका तरीका यह है कि किसी भी राज्य में स्थित पेट्रोल भंडार पर पहले ओएनजीसी का अधिकार होता है लेकिन यहां गुलाम वाहनवती के बेटे की वजह से वेदांता की फाइल सीधी केंद्र तक पहुंच गई। हालांकि इस मसले पर बाद में काफी विवाद भी हुआ और वाहनवती एवं कानून मंत्रालय को इस बात पर सफाई भी देनी पड़ी।

Friday, October 28, 2011

`पेड न्यूज पर चुनाव आयोग की ऐतिहासिक पहल'

केंद्र सरकार द्वारा 1400 आईपीएस भर्ती के लिए डीएसपी और सेना के मेजर/कैप्टन रैंक के अधिकारी ही भाग ले सकेंगे, की प्रधानमंत्री कार्यालय के सुझाव पर मुस्लिम संगठनों ने आजित करते हुए इसे मुसलमानों के हक पर संवैधानिक डाका डालने के बराबर बतया है। दैनिक `सहाफत' ने जकात फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. सैयद जफर महमूद, जमाअत इस्लामी हिन्द अध्यक्ष मौलाना सैयद जलालुद्दीन उमरी, दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस राजेन्द्र सच्चर और ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस के कार्यवाहक अध्यक्ष एवं पाक्षिक अंग्रेजी `मिल्ली गजट' के सम्पादक डॉ. जफरुल इस्लाम खां के संयुक्त बयान को प्रकाशित कर इनके विचारों को प्रमुखता से उजागर किया है। बयान के अनुसार इस तरह की भर्ती के नतीजे में आईपीएस में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व अगले तीन-चार दशकों के लिए और भी कम हो जाएगा क्योंकि सशस्त्र बल में मुसलमानों का अनुपात आईपीएस से भी कम है और डीएसपी के पद पर मुसलमान गिनती के हैं। इंडियन पुलिस सर्विस और अन्य सिविल सर्विस में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व केवल 2.3 फीसदी है जबकि 2001 की जनगणना के अनुसार इनका अनुपात 13.4 फीसदी है। नए आईपीएस अधिकारियों की भर्ती के लिए ओपन परीक्षा न लेने का फैसला मुसलमानों के हित के खिलाफ होगी। इस फैसले से सरकारी रोजगार के समान अवसर के संवैधानिक हक की अवहेलना होती है जिसकी जमानत धारा 16 में दी गई है। जस्टिस सच्चर के अनुसार यह संविधान की धारा 15 के भी खिलाफ है जिसमें धर्म के आधार पर सरकार की ओर से भेदभाव वर्जित है।
`आडवाणी की आखिरी यात्रा' के शीर्षक से साप्ताहिक `नई दुनिया' ने पटना से अपने विशेष संवाददाता के हवाले से लिखा है कि आडवाणी जी गुजरात के बजाय बिहार को नमूना बता रहे हैं, मोदी के बजाय नीतीश कुमार को आइडियल मुख्यमंत्री कह रहे हैं, जो मोदी को अपने राज्य में घुसने नहीं देते और साफ-साफ कह देते हैं कि बिहार में इसका अपना मोदी मौजूद है। किसी अन्य मोदी की जरूरत नहीं है। आडवाणी की यात्रा गुजरात से शुरू हुआ करती थी लेकिन यह उनकी पहली यात्रा है जो पूरब से पश्चिम को हो रही है। यह देश के सोशलिस्ट नेता के जन्म स्थल से नई दिल्ली की ओर शुरू की गई है और इसको हरी झंडी जय प्रकाश नारायण के चेले नीतीश कुमार ने दिखाई है। सोमनाथ से अयोध्या की रथयात्राओं के लिए बदनाम आडवाणी की यात्रा हर बार देश में सांप्रदायिक वातावरण को खराब करती रही है लेकिन पहली बार वह भ्रष्टाचार जैसे गैर सांप्रदायिक मुद्दे पर यात्रा कर रहे हैं। विशेषज्ञों का यह विचार गलत नहीं है कि यह आडवाणी की आखिरी यात्रा है, उनके सामने करो या मरो की चुनौती है।
`पेड न्यूज पर चुनाव आयोग की ऐतिहासिक पहल' के शीर्षक से दैनिक `प्रताप' के सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश के दसौली विधानसभा क्षेत्र के विधायक उरमिलेश यादव पर तीन वर्ष तक चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगा दी है। आयोग ने अपने फैसले में कहा कि पेड न्यूज मामले पर आरोप साबित होने के चलते यादव पर 20 अक्तूबर 2011 से 19 अक्तूबर 2014 तक चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगा दी है। ऐसी स्थिति में उर्मिलेश यादव 2012 में होने वाले विधानसभा चुनाव में भाग नहीं ले सकेंगी। इसी सीट से योगेन्द्र कुमार ने भी इनके खिलाफ चुनाव लड़ा था। उन्होंने एक जुलाई 2010 को चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज कराई कि चुनाव से ठीक पहले 17 अप्रैल 2007 को उर्मिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश के दो बड़े हिन्दी दैनिक में अपने हक में समाचार प्रकाशित कराए हैं। इसी के साथ उन्होंने यह शिकायत प्रेस परिषद में भी दर्ज कराई थी। चुनाव आयोग ने इस मामले की जांच की और दोनों पक्षों की दलीलें भी सुनीं और तफ्तीश के बाद आयोग ने पाया कि उर्मिलेश ने चुनाव से ठीक पहले समाचार प्रकाशित कराने के लिए 21250 रुपये खर्च किए लेकिन इस खर्च को चुनावी खर्च में नहीं दिखाया गया था। उम्मीदवार को अपना प्रचार करने का पूरा हक है लेकिन उसे खर्च दिखाना पड़ेगा। ऐसी खबरें प्रकाशित करने वाले अखबारों और इलैक्ट्रॉनिक मीडिया को भी आखिर में यह लिखना और दिखाना होगा कि यह विज्ञापन है और वह भी पेड विज्ञापन। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण, झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा पर भी पेड न्यूज के आरोप हैं। इन दोनों नेताओं को भी चुनाव आयोग द्वारा नोटिस दिया जा चुका है। दैनिक `जदीद खबर' ने `मोदी के खिलाफ सुबूत' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में चर्चा करते हुए लिखा है कि गुजरात की जमीन पर मुसलमानों के नरसंहार में मोदी किस हद तक शरीक थे, इसका अभी तक कोई दस्तावेजी सुबूत सामने नहीं आ सका है। इस बाबत जकिया जाफरी की अपील पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित विशेष तफ्तीशी टीम ने भी नरेन्द्र मोदी के खिलफ ठोस सुबूत उपलब्ध करने से इंकार कर दिया था और ऐसा महसूस होने लगा था कि इतिहास के इस बड़े नरसंहार के सबसे बड़े अपराधी पर कोई आंच नहीं आएगी और वह अपनी गर्दन में बेगुनाही का हार डलकर इसी तरह इंसाफ और कानून का मजाक उड़ाता रहेगा। लेकिन अब अदालत के एक निरपेक्ष सलाहकार ने अपनी जांच में यह रहस्योद्घाटन किया है कि नरेन्द्र मोदी के खिलाफ मुकदमा चलाने के सुबूत मौजूद हैं। इन सुबूतों की बुनियाद पर मोदी के खिलाफ संगीन मुकदमा तो कायम नहीं हो पाएगा लेकिन सांप्रदायिक घृणा, भड़काऊ और जनता को हंगामे पर उसकाने जैसी धारा के तहत मुकदमा कायम हो सकता है। यदि ट्रायल कोर्ट ने विशेष वकील रामचन्द्रन के विचार को स्वीकार कर लिया तो मोदी के खिलाफ मुकदमे की कार्यवाही जल्द शुरू होगी।
`मोदी के खिलाफ शिकंजा' के शीर्षक से दैनिक `हिन्दुस्तान एक्सप्रेस' ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी एक बार फिर मुश्किल में दिखाई दे रहे हैं क्योंकि इनके खिलाफ धारा 153 और 163 के तहत मुकदमा चलाने की पैरवी कर दी गई है, इसके बावजूद यह नहीं कहा जा सकता कि गुजरात दंगों के मामले में मोदी के खिलाफ शिकंजा कसा ही जाएगा लेकिन अदालत के सलाहकार ने यह महसूस कर स्पष्ट कर दिया है कि मोदी का गुनाह माफी लायक नहीं है। इसके बावजूद एक बार फिर यह बात साफ हो गई है कि मोदी के लिए यह रिपोर्ट भारी पड़ सकती है। कल तक मोदी इस बात पर गर्व करते रहे हैं कि सुबूत न होने के आधार पर उन्हें क्लीन चिट मिल सकती है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की गठित कमेटी की रिपोर्ट की रोशनी में यह बात उभरकर सामने आ गई है कि मोदी को राहत दिया जाना अब संभव नहीं है। देखना यह है कि 10 वर्षों से इंसाफ की राह देख रहे पीड़ितों को कब इंसाफ मिलता है। `मुसलमानों के लिए आरक्षण दुश्वार, कांग्रेस का मायूस कुन जवाब' के शीर्षक से दैनिक `अखबारे मशरिक' ने कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अलवी के हवाले से लिखा है कि मुसलमानों के लिए आरक्षण का मामला बहुत गंभीर है जब इस मसले पर कोई फैसला लिया जाएगा तो मीडिया को सूचित कर दिया जाएगा। कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में मुसलमानों को आरक्षण देने का वादा किया था और कहा था कि केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के मॉडल पर विचार किया जाएगा। राशिद अलवी ने कहा कि घोषणा पत्र में बहुत सारे वायदे किए गए हैं। मुस्लिम आरक्षण भी इन वायदों में से एक है।

Wednesday, October 26, 2011

मुस्लिम महापंचायत की अनॉप-शनॉप

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय संस्थापक सर सैयद अहमद के जन्म दिवस पर 17 अक्तूबर 2011 को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में आयोजित समारोह में केंद्रीय कानून एवं इंसाफ मंत्री सलमान खुर्शीद को शरीक नहीं होने दिया गया, पर चर्चा करते हुए दैनिक `अखबारे मशरिक' ने अखबार की पहली खबर बनाई है। अलीगढ़ के संवाददाता ए. समन सवॉ के हवाले से अखबार ने लिखा है कि सर सैयद का 194वां जन्म दिवस पारम्परिक जोश खरोश से मनाया जाना था। इस कार्यक्रम में मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति ने सलमान खुर्शीद को विशेष मेहमान क sतौर पर बुलाया था लेकिन उनका सपना एक डरावने ख्वाब की तरह बिखर गया। छात्र और शिक्षक संघ ने इसका विरोध करते हुए पहले ही घोषणा कर दी थी कि वह किसी भी कीमत पर सलमान खुर्शीद को इस समारोह में शरीक नहीं होने देंगे। सर सैयद कार्यक्रम शाम चार बजे शुरू होना था लेकिन वीसी लाज पर छात्र और शिक्षकों की भीड़ काले झंडे लिए हुए सलमान खुर्शीद मुर्दाबाद और वाइस चांसलर मुर्दाबाद के नारे लगा रही थी। जिला और प्रशासन ने स्थिति को देखते हुए केंद्रीय मंत्री को एक होटल में ठहरा दिया और इनको यूनिवर्सिटी में दाखिल होने की इजाजत नहीं दी। जिसके नतीजे में साम साढ़े छह बजे अर्थात् दो घंटे बाद वाइस चांसलर और रजिस्ट्रार किसी गोपनीय रास्ते से समारोह स्थल पर आए जहां रजिस्ट्रार ने बताया कि पुलिस ने सलमान खुर्शीद को यहां आने से रोक दिया है।
आल इंडिया उलेमा मशाएख के बैनर तले मौलाना मोहम्मद अशरफ द्वारा मुसलमानों के एक सप्रदाय को निशाना बनाए जाने पर दैनिक `हमारा समाज' में आमिर सलीम खां ने अपनी विशेष रिपोर्ट में लिखा है कि एमएलबी की सीट और कुछ विधानसभा टिकटों के लिए मौलाना मिल्लत में फूट डाल रहे हैं इसके लिए उन्होंने उत्तर प्रदेश की एक अहम राजनैतिक पार्टी के बड़े नेता से गोपनीय संधि भी की है। कुर्सी और कुछ टिकटों के बदले पूरे मुस्लिम समुदाय को बांटने की नीति अपना सकते हैं। गत दिनों दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस और फिर बाद में बरेली की महापंचायत को इसी पार्टी ने स्पांसर किया था। मौलाना अशरफ ने प्रेस कांफ्रेंस और महापंचायत में मिल्लत इस्लामिया के संबंध में जो विचार जाहिर किए हैं उससे सुन्नी उलेमा भी हैरान हैं। इस बात से हैरान नहीं होना चाहिए कि वह राजनैतिक कद बढ़ाने के लिए वहाबी विचारधारा के खिलाफ काम कर रहे हैं। सूत्रों के अनुसार प्रेस कांफ्रेंस के लिए दिल्ली का चयन भी इन नेता जी की गोपनीय बैठक और निर्देश का नतीजा था क्योंकि दिल्ली से जो बात चलेगी वह दूर तक चलेगी। दूसरी ओर मुरादाबाद में भी हुई महापंचायत में भी वही बातें सामने आई हैं जिससे मुसलमानों में काफी गुस्सा पाया जा रहा है।
मुरादाबाद की महापंचायत में वक्ताओं द्वारा अनॉप-शनॉप बातें करने पर मुसलमानों द्वारा तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की जारी है। दैनिक `सहाफत' ने अपनी पहली खबर में जमीअत उलेमा हिन्द (अरशद ग्रुप) के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी, दिल्ली उर्दू अकादमी के वाइस चेयरमैन प्रोफेसर अखतारुल वासे, जमाअत इस्लामी हिन्द सचिव मौलाना रफीक कासमी, जमीअत अहले हदीस के महासचिव मौलाना असगर इमाम मेहंदी खलफी और मुस्लिम मजलिस अमल के महासचिव राहत मदमूद चौधरी सहित अनेक बुद्धिजीवियों के विचारों को प्रमुखता से प्रकाशित कर उनकी निन्दा की है और उन्हें कुरआन एवं हदीस की शिक्षा से अनभिज्ञ बताया है। मुरादाबाद की मुस्लिम महापंचायत में जिस तरह मुसलमानों को सुन्नी वहाबी में विभाजित कर वहाबी सप्रदाय पर आरोप लगाया गया है, वह बिल्कुल बेबुनियाद हैं। राहत महमूद चौधरी के अनुसार इस तरह का आरोप तो आरएसएस, भाजपा, शिवसेना, बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद भी आज तक नहीं लगा सकी है। उन्होंने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया कि इस महापंचायत में सऊदी अरब में कब्रिस्तान और मस्जिद की अवमानना का तो जिक्र किया गया लेकिन देश में वीरान पड़ी मस्जिदों और बाबरी मस्जिद तक का कोई जिक्र नहीं किया गया।
मौलाना अरशद मदनी ने महापंचयात के आरोप को नकारते हुए स्पष्ट किया कि इस्लाम दुनिया में मुसलमानों को जोड़ने के लिए आया है, तोड़ने के लिए नहीं। इसलिए दारुल उलूम देवबंद से कभी कोई आवाज मिल्लत के किसी सप्रदाय को तोड़ने के लिए नहीं उठाई जाती है। जोड़ने की यह कोशिश 150 साल से जारी है और हम इसमें पूरी तरह कामयाब हैं।
`सूचना अधिकार पर तलवार' के शीर्षक से दैनिक `जदीद मेल' ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि सूचना का अधिकार एक बार फिर चर्चा में है और इसके कुछ बिन्दुओं पर फिर से विचार-विमर्श की बात की जा रही है। इस बार यह चिन्ता स्वयं प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा की ओर से की जा रही है। उनका कहना है कि इस कानून का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि इसके द्वारा ईमानदारी और सही ढंग से काम करने वाले लोग परेशान हों। प्रधानमंत्री की चिन्ता इसलिए है कि गत दिनों आरटीआई कार्यकर्ता द्वारा इस कानून के तहत प्रधानमंत्री कार्यालय से वह पत्र हासिल कर लिया गया था जो 2जी मामले में वित्त मंत्रालय ने उन्हें लिखा था जिसके बाद केंद्र सरकार संकट में पड़ गई थी। इसके अतिरिक्त जितने बड़े घोटाले सामने आए हैं उसमें सूचना अधिकार कानून का बड़ा योगदान है इसलिए सरकार अब इस कानून को कमजोर करना चाहती है। नौकरशाही व्यवस्था पर लगाम कसने वाला यह कानून अब सरकार के निशाने पर है।
दैनिक `प्रताप' में सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने `अन्ना और उनकी टीम पर चौतरफा हमला' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखा है कि अन्ना हजारे और उनकी टीम गत कुछ दिनों से चारों ओर से समस्याओं से घिरती जा रही है। एक-एक करके कई समस्याएं खड़ी हो गई हैं। उत्तर प्रदेश में अन्ना का संदेश लेकर दौरा कर रहे उनके सिपाहसालार अरविन्द केजरीवाल पर हमला हुआ। टीम अन्ना के दो वरिष्ठ सदस्य पीवी राजगोपाल और राजेन्द्र सिंह ने मुहिम के राजनैतिक रंग लेने पर कोर कमेटी से त्यागपत्र दे दिया है। कांग्रेस से सुलह कराने के प्रयासों पर उस समय पानी फिर गया जब समय देकर राहुल गांधी अन्ना के प्रतिनिधियों से नहीं मिले। रामदेव ने प्रशांत भूषण के खिलाफ मामला दर्ज करने की बात कही। अन्त में टीम अन्ना को एक झटका उस समय लगा जब सुप्रीम कोर्ट ने अन्ना के हिन्द स्वराज ट्रस्ट को मिलने वाले सरकारी पैसे का गलत इस्तेमाल की छानबीन के लिए सीबीआई की अर्जी को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया। अन्ना खुद तो बेदाग हैं लेकिन उनके साथी निश्चित रूप से अन्ना आंदोलन को नुकसान पहुंचा रहे हैं।

Friday, October 14, 2011

अन्ना हजारे का असली चेहरा

बीते सप्ताह विभिन्न राजनैतिक और सामाजिक घटनाओं सहित अनेक ज्वलंत मुद्दों पर उर्दू अखबारों ने अपना पक्ष रखा। अन्ना हजारे की मुहिम का विशेष रूप से नोटिस लिया। लगभग सभी उर्दू अखबारों ने इस पर सम्पादकीय लिखे और लेख प्रकाशित किए। हैदराबाद से प्रकाशित दैनिक `मुनसिफ' ने `अन्ना हजारे की कांग्रेस विरोधी अपील' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में चर्चा करते हुए लिखा है कि अन्ना हजारे की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम पर जनता की सकारात्मक प्रतिक्रिया कोई ढकी छिपी बात नहीं है। जन लोकपाल बिल के मंजूर किए न किए जाने पर कांग्रेस को वोट न देने की अपील का कांग्रेस गंभीरता से नोटिस ले। यदि इस अपील के नतीजे में भाजपा अगुवाई वाली एनडीए सत्ता में वापस होती है तो यह देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण ही कहलाएगा। दूसरी बात यह कि भाजपा कोई दूध की धूली पार्टी नहीं है। जब तक सत्ता हाथ नहीं आई यह अपनी साफ छवि का दावा करती रही लेकिन विभिन्न राज्यों और विशेषकर कर्नाटक में सत्ता संभालने के बाद भाजपा मुख्यमंत्री और मंत्रियों के अवैध खनन में विभिन्न घोटालों में लिप्त होना इस बात का सुबूत है कि भाजपा भी भ्रष्टाचार में लिप्त है। हजारे यदि कांग्रेस को वोट न देने की अपील के साथ-साथ भाजपा को भी वोट न देने की अपील करते तो सांप्रदायिक ताकतों के प्रति इनके झुकाव का संदेह दूर हो जाता। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। अन्ना को यह बात समझ लेना चाहिए कि इसी सत्ता भोग का फायदा उठाकर नरेन्द्र मोदी ने गुजरात में मुसलमानों का नरसंहार किया। हजारे जब अपने आपको गांधी उसूलों पर चलने वाला बताते हैं तो उनके लिए जरूरी है कि वह इस देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समूह को नजरंदाज न करें।
`...तो यह है अन्ना जी का असली चेहरा' के शीर्षक से सना उल्ला सादिक तैमी ने दैनिक `हमारा समाज' में प्रकाशित अपने लेख में लिखा है कि अन्ना हजारे के इस आंदोलन को लेकर कुछ वर्गों के अन्दर शुरू से एक प्रकार का असंतोष देखा गया, यदि साफ तौर पर कहा जाए तो मुसलमानों और दलितों ने लगभग इस पूरे आंदोलन से खुद को अलग रखा। व्यक्तिगत तौर पर हम न तो कांग्रेस को दूध की धुली हुई पार्टी समझते हैं और न ही हम इसके पक्षधर हैं कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध साथ न दें। यह तो लोकतंत्र का अपहरण करने जैसा है। अन्ना का कहना यह है कि भाजपा भी भ्रष्टाचार में वैसी ही लिप्त है जैसे अन्य राजनैतिक पार्टियां। ऐसा लगता है कि अन्ना जाने-अनजाने में किसी और के इशारों पर चल रहे हैं, वोट किसको देना है और किसको नहीं, यह फैसला हर भारतीय खुद कर सकता है। उनकी इस बात से अन्ना जी के चाहने वाले भी उनसे नाराज हो रहे हैं।
दैनिक `जदीद मेल' ने `गलत दिशा में आंदोलन' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखा है कि अन्ना हजारे हो या उनकी टीम के दूसरे सदस्य, उनकी बातों पर उसी समय विश्वास करेंगे जब वह राजनैतिक पार्टियों से समान दूरी बनाकर अपने आंदोलन को आगे बढ़ाएंगे। यह सही है कि किसी भी जन आंदोलन में शामिल होने के लिए कोई भी आगे आ सकता है लेकिन आंदोलन का नेतृत्व करने वालों का दामन पाक-साफ होना जरूरी है। यदि हरियाणा में कांग्रेस को कामयाबी हासिल हो जाती है तो फिर अन्ना हजारे की पोजीशन कमजोर पड़ जाएगी और वह इस आंदोलन को जन आंदोलन होने का भी दावा नहीं कर सकते और यदि कांग्रेस वहां से हार जाती है तो अन्ना हजारे पर भाजपा के संरक्षण का आरोप लगेगा। इसलिए दोनों स्थिति में अन्ना की ही हार होगी। चुनावी जंग में कूद कर अन्ना ने बड़ी गलती की है। लोकपाल बिल संसद के आगामी अधिवेशन में पेश होगा इसके अतिरिक्त कई अन्य बिल भी पेश होंगे जो भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल कानून के सहायक बनेंगे तो फिर आगामी अधिवेशन तक अन्ना को इंतजार करने में कोई हर्ज नहीं था। अब लोग इस बात को देख रहे हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ और चुनावी सुधारों को लागू करने में कौन ईमानदार है और कौन ड्रामेबाजी कर रहा है।
`अन्ना हजारे का आंदोलन, बिल्ली थैले से बाहर आ गई' के शीर्षक से दैनिक `इंकलाब' में `हिन्दुस्तान नाम' के अपने स्तम्भ में नाके किदवई ने लिखा है कि अन्ना हजारे की कांग्रेस दुश्मनी स्पष्ट है कि उन्होंने कांग्रेस हटाओ का तो नारा दिया लेकिन उत्तर प्रदेश जिसकी गिनती आज देश के भ्रष्टाचार राज्यों में की जाने लगी है और शायद मुख्यमंत्री मायावती सबसे बड़ी भ्रष्टाचारी राजनेता भी हैं। यूपी की मंत्रिपरिषद लगभग भ्रष्टाचार मंत्रियों पर आधारित है, मायावती अरबपति हैं तो उनकी मंत्रिपरिषद का हर व्यक्ति करोड़ों में खेल रहा है। उत्तर प्रदेश के लोक आयुक्त एनके मेहरोत्रा अब तक तीन मंत्रियों को भ्रष्टाचार, बेइमानी के संगीन मामलों में कसूरवार ठहरा चुके हैं। इन मंत्रियों को मायावती ने अपने मंत्रिपरिषद से निकाल बाहर भी कर दिया लेकिन खुद मायावती ने अभी तक अपनी जवाबदेही नहीं की है। अन्ना हजारे ने मायावती, बीएसपी के उम्मीदवारों को हराने की कोई अपील नहीं की और न ही अन्ना हजारे को मुलायम सिंह यादव और उनकी समाजवादी पार्टी नजर आ रही है जो अतीत से लेकर आज तक भ्रष्टाचार में डूबी हुई है। यही सूरते हाल भाजपा का है लेकिन इन पार्टियों को अन्ना हजारे ने छोड़ दिया है। इनको हराने की कोई अपील जारी नहीं की। इससे साफ जाहिर है कि अन्ना आंदोलन का मकसद कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर लाल कृष्ण आडवाणी अथवा नरेन्द्र मोदी जैसे नेता को प्रधानमंत्री का ताज पहनाना चाहते हैं।
दैनिक `सहाफत' ने अपने सम्पादकीय में अन्ना हजारे की मुहिम पर चर्चा करते हुए लिखा है कि अन्ना हजारे ने धमकी दी है कि आने वाले दिनों में कुछ राज्यों में जो चुनाव होने वाले हैं, उनमें वह उन सभी पार्टियों और उम्मीदवारों के खिलाफ चुनावी मुहिम में भाग लेंगे जो जन लोकपाल बिल के विरोधी हैं। आने वाले साल में जहां चुनाव होने हैं उनमें पांच राज्यों के अतिरिक्त मुंबई नगर निगम का चुनाव भी शामिल है। मुंबई नगर निगम का बजट कई राज्यों के बजट से ज्यादा बड़ा है। इसलिए हमें नहीं मालूम कि अन्ना हजारे की सूची में मुंबई निगम का चुनाव शामिल है या नहीं, यदि नहीं शामिल है तो बड़ी आश्चर्य की बात होगी क्योंकि इसका मतलब यह होगा कि अन्ना हजारे यह समझते हैं कि सारा भ्रष्टाचार विधानसभा और संसद तक सीमित है। नगर निगम भ्रष्टाचार से बिल्कुल पाक साफ होती है और यदि मुंबई नगर निगम भी इनकी सूची में शामिल हैं तो हमें यह भी नहीं मालूम कि शिवसेना और उसके उम्मीदवारों के प्रति इनका रवैया क्या होगा? मुंबई नगर निगम पर भाजपा-शिव सेना का कब्जा है। मुंबई की सड़कों के गड्ढे गवाह हैं कि मुंबई नगर निगम ने गत पांच सालों में कितना `शानदार' काम किया। शिव सेना एक बार नहीं कई बार अन्ना हजारे और उनके आंदोलन का मजाक बना चुकी है। देखना यह है कि शिव सेना और उसके उम्मीदवारों के खिलाफ चुनावी मुहिम चलाएंगे? यदि ऐसा नहीं होता है तो इसका मतलब यह है कि चिराग तले अंधेरा है।

Friday, September 23, 2011

बटला हाउस की तीसरी वर्षगांठ

बीते सप्ताह बटला हाउस एनकाउंटर की तीसरी बरसी और नरेन्द्र मोदी के उपवास ने प्रिंट और इलैक्ट्रानिक मीडिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। दोनों ही मुद्दे राष्ट्रीय स्तर के हैं और इन पर राजनीति होती है। यही कारण है कि इनसे संबंधित जब कोई बात सामने आती है तो वह राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन जाती है। पेश है इस बाबत कुछ उर्दू अखबारों की राय।

उर्दू दैनिक `प्रताप' में सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने अपने सम्पादकीय में `बटला हाउस की तीसरी वर्षगांठ' के शीर्षक से चर्चा करते हुए लिखा है कि इस अवसर पर धरना प्रदर्शन के लिए आजमगढ़ से एक विशेष ट्रेन द्वारा राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल सदस्य आए थे। इन्होंने घटना की सीबीआई जांच की मांग की। दिलचस्प बात यह रही कि उलेमा ने हजारों समर्थकों के बीच कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह पर खास निशाना लगाया। उलेमा काउंसिल चेयरमैन मौलाना जाकिर रशीद मदनी ने कहा कि दिग्विजय ने मुझसे खुद कहा था कि उन्होंने इस मुठभेड़ के फर्जी होने की बात कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से कही थी, लेकिन उनकी किसी ने नहीं सुनी। मुझे लगता है कि दिग्विजय नौटंकी करते हैं, उन्हें मुसलमानों से कोई हमदर्दी नहीं है। इंस्पेक्टर मोहन चन्द शर्मा की शहादत को जिस तरह संदेह के कठघरे में खड़ा किया गया, उससे निश्चित तौर पर दिल्ली पुलिस के जवानों का ही नहीं बल्कि पूरे देश के सुरक्षा बलों का हौंसला टूटा होगा। इसका नकारात्मक प्रभाव यह जरूर हुआ कि पुलिस एवं अन्य सुरक्षा बलों के जवान अच्छी तरह से समझ चुके हैं कि आतंक के खिलाफ चुप बैठना और सांप निकलने के बाद लकीर पीटना इसका पहला दायित्व है आतंकियों को पकड़ना नहीं। नतीजे के तौर पर अब राजधानी दिल्ली में कोई भी बम धमाका हो इसमें पुलिस के हाथ खाली थे और खाली हैं।

मोर्चा के इंचार्ज जेके जैन की उपस्थिति आश्चर्यजनक रही। इस रैली में जेके जैन ने मुसलमानों को लुभाने के लिए बड़ी लच्छेदार तकरीर की, जिसे तकरीर के शौकीन मुसलमानों ने खूब चटखारे लेकर सुना। जैन ने एनकाउंटर की अदालती जांच कराने की मुसलमानों की मांग का खुलकर समर्थन किया। जैन ने इस स्थिति के लिए मुसलमानों के कांग्रेस प्रेम को कसूरवार करार दिया, क्योंकि उन्होंने आज तक भाजपा को एक बार भी मौका नहीं दिया। भाजपा का मुस्लिम प्रेम केवल बटला हाउस एनकाउंटर की जांच तक ही सीमित नहीं है बल्कि अभी भरतपुर में हुई पुलिस मुठभेड़ में मुसलमानों के नुकसान का जायजा लेने और मामले की तहकीकात के लिए भाजपा ने दो सांसदों का एक प्रतिनिधिमंडल भेजा है। इस प्रतिनिधिमंडल में भाजपा के मुस्लिम शाहनवाज हुसैन भी मौजूद थे। उन्होंने वापसी पर बयान दिया कि वहां पुलिस ने मुस्लिम युवकों को कत्ल किया और एक मस्जिद में तोड़फोड़ की।

यह बयान देते समय शाहनवाज यह भूल गए कि जिस भीड़ के साथ पुलिस ने भरतपुर में मुसलमानों पर अत्याचार किया, वह संघ परिवार के गुंडों की भीड़ थी। उन्होंने ही कब्रिस्तान की जमीन पर कब्जा किया था जिसके खिलाफ मुस्लिम विरोध कर रहे थे। बाद में संघ परिवार के गुंडों ने पुलिस के साथ मिलकर मुसलमानों की जान व माल से ऐसा ही खिलवाड़ किया जैसा कि गुजरात में किया गया था।

गुजरात मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा तीन दिन के उपवास पर दैनिक `हमारा समाज' में `उपवास बनाम बकवास' के शीर्षक से लिखा है कि मोदी का यह उपवास मुसलमानों के नरसंहार को नहीं धो सकता, इसलिए कि यह पूरी तरह बकवास है और `नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली' की जीती जागती तस्वीर है। इस तरह की बकवास से यदि मोदी यह समझते हैं कि हम मुसलमानों का दिल जीत लेंगे अथवा 2014 में प्रधानमंत्री की कुर्सी हासिल करने के लिए जमीन तैयार कर सकेंगे तो यह उनकी भूल है, वैसे कुछ खरीदारों को खरीदने में शायद उन्हें कुछ कामयाबी मिल जाए, तब भी यह उनके गुनाहों को नहीं धो सकती। उन्हें अब उपवास करने के बजाय वनवास में जाकर मजलूमों की पुकारों को आसमान से टकराने का इंतजार करना चाहिए। इसलिए इस उपवास से किसी तरह की आशा न कर मोदी को प्राकृतिक मार का इंतजार करना चाहिए और बस।

दैनिक `इंकलाब' ने `उपवास और इंसाफ' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखा है कि इस संदर्भ में हमें विश्वास है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के `उपवास' पर बहुत से लोग दिल ही दिल में मुस्कुरा रहे होंगे कि दूसरों को बेवकूफ समझने वाला यह व्यक्ति खुद कितना बेवकूफ है। सद्भावना की बात उस व्यक्ति की जुबान से अच्छी लगती है जो सद्भावना पर विश्वास रखता हो।

यदि वह पूर्व में ऐसा नहीं था तब भी उसे सद्भावना की बात करना जब देगा शर्त यह है कि वह अपने तौर-तरीके बदल चुका हो और अपनी हरकतों पर उसे आत्मग्लानि महसूस हो। मोदी `उपवास' पर बैठे हुए हैं और सद्भावना की बातें कर रहे हैं। यह मुंह और मसूर की दाल।

मोदी ने जनता को बांटकर अतीत में राजनैतिक और चुनावी फायदे तो हासिल कर लिए लेकिन धीरे-धीरे ही सही, अब वह समय आ रहा है जो उन्हें कठघरे में खड़ा करके उनसे गुजरात नरसंहार का न केवल जवाब मांगेगा बल्कि बेगुनाहों के कत्ल का हिसाब मांगेगा। अपनी गर्दन को इस तरह फंसता देखकर मोदी बौखला गए हैं।

`तीन साल बाद भी...' के शीर्षक से दैनिक `हिन्दुस्तान एक्सप्रेस' ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि बटला हाउस एनकाउंटर के तीन साल पूरे हो गए। तीन साल पूर्व जो सवालात उठाए गए थे वह आज भी उत्तर की प्रतीक्षा कर रहे हैं क्योंकि इन सवालों का कोई उपयुक्त जवाब अभी तक नहीं दिया जा सका है। इस बीच विभिन्न अवसरों पर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की ओर से यह मांग की जाती रही कि इस घटना की अदालती जांच होनी चाहिए लेकिन इस जांच का यह कहकर विरोध किया जाता रहा कि इससे पुलिस का मनोबल गिरेगा। विशेष बात यह भी थी कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग इसी बटला हाउस एनकाउंटर के मामले में अपनी साख खो चुका है। यह वही संस्था है जिसने पुलिस की कहानी को सही करार देते हुए घर बैठे अपनी रिपोर्ट तैयार कर ली थी और अपनी टीम को घटनास्थल पर वास्तविकता जानने के लिए नहीं भेजी। सवाल यह है कि मानवाधिकार आयोग ने किसके इशारे पर अपनी जिम्मेदारी से फरार की कोशिश की थी।

Sunday, September 18, 2011

मोदी की अग्निपरीक्षा'

बीते सप्ताह राष्ट्रीय एकता परिषद में सांप्रदायिक हिंसा रोधक संबंधी विधेयक पर राजनैतिक पार्टियों सहित यूपीए सहयोगी तृणमूल कांग्रेस का विरोध, 2002 के गुजरात नरसंहार में सुप्रीम कोर्ट द्वारा मामले को निचली अदालत में सुनवाई के लिए भेजना, आडवाणी की रथ यात्रा एवं अन्ना हजारे का राष्ट्रव्यापी आंदोलन जैसे कई मुद्दों पर उर्दू समाचार पत्रों ने चर्चा की है। पेश है इस बाबत कुछ उर्दू अखबारों की राय।

दैनिक `अखबारे मशरिक' ने `सांप्रदायिक हिंसा विधेयक फिर खटाई में, सांप्रदायिक और सेकुलर दोनों पार्टियों ने इसका विरोध किया' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखा है कि तीन साल बाद हुई राष्ट्रीय एकता परिषद की इस बैठक में कुछ हाई प्रोफाइल मुख्यमंत्रियों जैसे नरेन्द्र मोदी, मायावती, नीतीश कुमार, ममता बनर्जी और जयललिता शरीक नहीं हुईं। इस बैठक में विधेयक की धज्जियां बिखेर कर रख दी गईं। नेशनल एडवाइजरी काउंसिल (एनआईसी) ने विधेयक का जो ड्राफ्ट तैयार किया था उसमें भाजपा, जनता दल (यूनाइटेड), अकाली दल, सीपीआई(एम) बीजू जनता दल, राष्ट्रीय जनता दल, यहां तक कि यूपीए समर्थक तृणमूल कांग्रेस ने इसमें सौ-सौ कीड़े निकाले स्वयं कांग्रेस के अन्दर विधेयक को लेकर कोई उत्साह नहीं था और ऐसा लगा जैसे इस महत्वपूर्ण मुद्दे को हल करने के मामले में सरकार को एक किनारे कर दिया गया है। एनआईसी इस विधेयक की रूपरेखा को फिर से तैयार करेगी।

जाहिर है इस विधेयक द्वारा अल्पसंख्यकों के आंसू पोंछने की जो कोशिश की जा रही थी उस पर पानी फिर जाएगा और उनके सिर पर पूर्व की तरह ही तलवार लटकती रहेगी। इसलिए हमें सबसे पहले सांप्रदायिक मानसिकता पर चोट करनी होगी जिसने एक अहम कानून से देश को वंचित करा दिया।

`प्रस्तावित धार्मिक हिंसा विधेयक का विरोध' के शीर्षक से दैनिक `राष्ट्रीय सहारा' ने अपने सम्पादकीय में भाजपा द्वारा अल्पसंख्यकों और बहुसंख्यकों को बांटने के आरोप पर चर्चा करते हुए लिखा है कि यूपीए सरकार को अल्पसंख्यकों के अधिकारों एवं इंसाफ दिलाने वाले किसी प्रस्ताव पर भाजपा से सकारात्मक आशा नहीं की जा सकती। भाजपा के इस विचार कि प्रस्तावित विधेयक अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक को विभाजित करता है, को निरस्त कर देना चाहिए। क्योंकि यह साबित हो चुका है कि दंगों में धार्मिक आधार पर अल्पसंख्यकों पर अत्याचार किया जाता है इसलिए ऐसे कानून बनाए जाएं जो अल्पसंख्यकों को सुरक्षा का एहसास दिला सकें। भाजपा अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक में फर्प के खिलाफ तो है लेकिन दंगों के दौरान इस आधार पर हो रहे नंगे नाच पर वह हमेशा मौन रहती है। इस बात को समझना होगा कि जो जख्म समाज के नीचे स्तर तक पहुंच गया है उसकी अनदेखी से स्थिति नहीं बदलेगी बल्कि इस नासूर का ऑपरेशन करके समाज को सांप्रदायिकता से मुक्ति दिलाना जरूरी है। इसलिए जरूरी है कि सरकार इस विधेयक को संसद में पेश कर इसे अंजाम तक पहुंचाए।

दैनिक `इंकलाब' ने `गुलबर्ग सोसाइटी और सुप्रीम कोर्ट' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखा है कि इस बाबत सुप्रीम कोर्ट का फैसला आते ही जो लोग खुशियां मना रहे हैं, वह हमारी समझ से परे है। सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा कि अब अहमदाबाद का मजिस्ट्रेट जो भी फैसला सुनाएगी उसके आगे जकिया जाफरी समेत इंसाफ चाहने वाले सभी नतमस्तक हो जाएंगे। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी नहीं कहा कि अब वह कोई अपील नहीं सुनेगा। इस केस को निचली अदालत के पास भेजने का जो कारण हमारी समझ में आता है वह यह कि इसका संबंध हमारे देश की न्यायिक व्यवस्था से है। यदि निचली अदालतों के फैसलों से जनता की बेचैनी बढ़ती रही और हर बड़ा और संगीन केस सुप्रीम कोर्ट पहुंचता रहे और उसी से आशा होने लगी तो निचली अदालतों की जरूरत क्या रह जाएगी और यदि निचली अदालतें ऐसे ही फैसले सुनाने लगे जिससे इंसाफ चाहने वालों को मायूसी हो तो फिर इस तरह के सभी केस सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचेंगे जिससे सुप्रीम कोर्ट के पास देशभर से मुकदमों की भीड़ लग जाएगी, वैसे भी सुप्रीम कोर्ट में आवेदन करने वालों की कमी नहीं है। इस अदालत ने यह तो कहा है कि अब उसे गुलबर्ग सोसाइटी केस पर नजर रखने (श्दहग्tदग्हु) की जरूरत नहीं है लेकिन यह नहीं कहा है कि अब वह इस केस की सुनवाई नहीं करेगा।

`नरेन्द्र मोदी की अग्निपरीक्षा' के शीर्षक से दैनिक `प्रताप' में सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र के राजनैतिक विरोधियों को पूरी आशा थी कि सुप्रीम कोर्ट सोमवार के दिन मोदी को 2002 के गोधरा कांड के बाद हुए दंगों पर मुकदमे में लपेट लेगी और उन्हें कठघरे में खड़ा कर देगी। लेकिन मोदी को नीचा दिखाने की कोशिश कर रहे इनके विरोधियों को सुप्रीम कोर्ट से मायूसी हाथ लगी। बड़ी अदालत ने दंगा रोकने में इनकी भूमिका में लापरवाही पर कोई फैसला सुनाने से इंकार कर दिया। जस्टिस डीके जैन की अगुवाई वाली तीन जजों की खंडपीठ ने मोदी और अन्य सरकारी अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने के लिए भी कोई विशेष हिदायत जारी करने से इंकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर खुशी जाहिर करते हुए जेटली ने कहा कि भाजपा शुरू से ही कहती रही है कि मोदी पर लगाए गए आरोप झूठे हैं और इनकी दंगों में कोई भूमिका नहीं थी। इससे साबित हुआ कि केवल प्रोपेगंडा और झूठे आरोप कभी सच नहीं हो सकते। मोदी का नाम एक भी चार्जशीट में नहीं है और न ही विशेष जांच टीम ने उन्हें कसूरवार पाया है। सुषमा ने कहा कि मोदी ने अग्निपरीक्षा पास कर ली है, सत्यमेव जयते।

जमीअत उलेमा हिन्द के एक धड़े जिसके अध्यक्ष मौलाना अरशद हैं, के बारे में विकीलीक्स का यह बयान कि मौलाना अमेरिका के लिए सकारात्मक व्यक्तित्व है, को अमेरिका द्वारा उन्हें बदनाम करने का षड्यंत्र है, के विषय पर आमिर सलीम खाँ ने `हमारा समाज' में लिखा है कि उपरोक्त कथन 2008 में भारत में अमेरिकी दूत मलफोर्ड का है जिसका रहस्योद्घाटन विकीलीक्स ने अपने केबल में किया है जिसमें कहा गया है कि यदि जमीअत पर मौलाना अरशद मदनी का वर्चस्व रहता है तो यह बात अमेरिका के हित में बेहतर होगी, क्योंकि दूसरे ग्रुप के मौलाना महमूद मदनी ने आतंकवाद विरोधी मुहिमों के दौरान अमेरिका की कड़ी आलोचना की है जबकि इनके मुकाबले मौलाना अरशद मदनी सुलझे हुए हैं और उनकी तरफ से कभी अमेरिका का विरोध नहीं हुआ है। भारत स्थित अमेरिकी उच्चायोग ने पूरी स्थिति को उजागर करते हुए कहा है कि दारुल उलूम देवबंद में 25 फरवरी 2008 में आतंकवाद विरोधी कांफ्रेंस में जहां एक तरफ मौलाना अरशद मदनी ने आतंकवाद को चर्चा का विषय बनाया था वहीं मौलाना महमूद मदनी और इनके समर्थकों ने आतंकवाद विरोध के साथ-साथ अमेरिका के खिलाफ खूब हंगामा किया।

Saturday, September 10, 2011

`धमाकों पर धमाके'

बीते सप्ताह अमर सिंह की जेल यात्रा सहित अनेक मुद्दों पर उर्दू अखबारों ने चर्चा की है लेकिन दिल्ली हाई कोर्ट के गेट नं. 5 पर हुए बम धमाके ने देशवासियों को सकते में डाल दिया है। सभी की इच्छा है कि ऐसी आतंकी घटना को अंजाम देने वालों को सरेआम फांसी दी जाए ताकि कोई दूसरा ऐसा काम करने की हिम्मत न कर सके। पेश है इस बाबत कुछ उर्दू अखबारों की राय। दैनिक `इंकलाब' ने `धमाकों पर धमाके' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में चर्चा करते हुए लिखा है कि जब भी कोई ऐसी घटना होती है, घूम-फिरकर वही चन्द सवालात नए सिरे से उभरते हैं जिनका संतोषजनक जवाब पिछली वारदातों के बाद भी नहीं मिला था। मिसाल के तौर पर हमारा खुफिया विभाग क्या करता है? यदि खुफिया विभाग ने अपनी जिम्मेदारी पूरी की तो संबंधित विभाग क्या करते रहे? हमारी सुरक्षा व्यवस्था इतनी फुसफुसी क्यों है कि उसकी आंखों में किसी भी समय धूल झोंकी जा सकती है। राजधानी में मोटे तौर पर अब तक बम धमाकों की डेढ़ दर्जन से अधिक वारदातें हो चुकी हैं। अब तक किसी धमाका केस में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई है। यही कारण है जिससे आतंकवादियों के हौंसले बुलंद होते हैं। हर धमाके के बाद `हमारा संकल्प कि हम कसूरवारों को नहीं बख्शेंगे' जैसे बयानात अपनी छाप खोते जा रहे हैं क्योंकि अब तक हमारे सामने केवल बयानात ही हैं कोई ठोस तफ्तीश नहीं है।
`इंसाफ का मंदिर लहुलूहान' के शीर्षक से `हमारा समाज' ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि देश व कौम और समाज के दुश्मनों द्वारा इंसाफ के मंदिर को लहुलूहान करने, 12 मासूमों को मौत के घाट उतारने और 83 लोगों को मौत व जिन्दगी के फंदे पर लटकाने के बाद सरकार की आंखें खुली हैं और सभी राज्यों में हाई अलर्ट जारी कर दिया गया है लेकिन इस तरह की आतंकी घटनाओं और बम धमाकों से सरकार पर सवाल उठते हैं कि आखिर अब तक सरकार इतनी बेबस क्यों है? जब चार महीने पूर्व आतंकवादियों ने रिहर्सल के तौर पर हाई कोर्ट को निशाना बनाया था तो इसके बाद सरकार और सुरक्षा विभाग की आंखें क्यों नहीं खुल सकीं?
दिल्ली जैसे कई शहरों में आतंकवादी हमले हो चुके हैं, विशेषकर दिल्ली को तो हमेशा ही आतंकवादी अपना निशाना बनाते रहे हैं। ऐसे में आतंकवादियों से निपटने के लिए सरकार के पास किसी की रणनीति का न होना दुःखदायी है।
दैनिक `जदीद मेल' में `फिर वही बर्बरता' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखा है कि गुजरी 25 मई को भी मौत के सौदागरों ने हाई कोर्ट के बाहर आतंक फैलाने की कोशिश की थी लेकिन तब कोई जानी व माली नुकसान नहीं हुआ था लेकिन आज के धमाके से साबित हुआ है कि आतंकियों ने हाई कोर्ट को अपना निशाना बनाया था जिसमें वह किसी हद तक सफल हो गए। यह धमाके क्यों और किसने कराए, अभी सरकार और एजेंसियां कुछ भी कहने से बच रही हैं। एक ईमेल पुलिस को जरूर मिला है जिसमें किसी हरकातुल जिहाद इस्लामी नामी संगठन ने धमाके की जिम्मेदारी ली है। इसका कारण भी बताया है कि संसद पर हुए आतंकवादी हमले में अपराधी करार पाए अफजल गुरु की सजाए मौत यदि माफ नहीं की जाती है तब तक अदालतों के बाहर इसी तरह के धमाके होते रहेंगे। इसलिए इस दिशा में तफ्तीश की काफी गुंजाइश है। वर्तमान में सजाए मौत का मामला देश के राजनैतिक एवं सामाजिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है क्योंकि देश के तीन अहम मामलों के अपराधियों की सजाए मौत का दिन करीब आ चुका है। यह तीनों मामले आतंकवाद से जुड़े हुए हैं लेकिन इन तीनों को अलग-अलग नजरिये से देखा जा रहा है। बहरहाल जुल्म करने वालों को सजा देना इंसाफ की मांग है।
दैनिक `हिन्दुस्तान एक्सप्रेस' ने `ठाकुर की गिरफ्तारी के बाद' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखा है कि यह अपनी जगह कड़वी हकीकत है कि नोट के बदले वोट मामला ठंडे बस्ते में पड़ा हुआ था और उस समय तक दिल्ली पुलिस खरगोश की नींद सोती रही जब तक अदालत ने उसे झिंझोड़ कर जगाया नहीं। इस मामले में पुलिस स्वयं सक्रिय नहीं हो सकी तो इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि आम मामलों में पुलिस का रवैया किस हद तक जिम्मेदारी वाला हो सकता है। अदालत की फटकार के बाद पहले सक्सेना गिरफ्तार हुए फिर हिन्दुस्तानी पकड़े गए। पहले अमर सिंह से पूछताछ हुई और फिर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। देखने की बात यह होगी कि सफेदपोश जमाअतों से संबंध रखने वाले अन्य किन-किन काले चेहरों को गिरफ्त में लिया जाता है। अभी भाजपा नेता अमर सिंह की गिरफ्तारी पर झूम रहे हैं। लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि वह भविष्य में भी इसी तरह झूमते रहेंगे। क्योंकि ऐसे इशारे मिले हैं कि भाजपा के भी कुछ नेताओं को खुफिया एजेंसियां गिरफ्त में ले सकती हैं। मनमोहन सरकार को अविश्वास प्रस्ताव से बचाने की कोशिश के तहत सांसदों की खरीदने की कोशिश वास्तव में की गई थी या फिर यह सरकार को बदनाम करने की कोशिश। तफ्तीश द्वारा सारे बिन्दु निकलकर सामने न आ जाएं इसके बाद ही पता चलेगा कि सच्चाई क्या है?
`बेचारे अमर सिंह गए थे जमानत के लिए मिली जेल' के शीर्षक से दैनिक `प्रताप' में सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि अमर सिंह को बलि का बकरा बना दिया गया है। पैसे किसने अमर सिंह को दिए, किसलिए दिए, पूरे मामले में फायदा किसको हुआ। जब तक इन सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं मिल जाता हमारी नजर में यह मामला अधूरा है।
उनका कसूर क्या था? बस यही कि उन्होंने पूरे षड्यंत्र का राज फाश कर दिया। इस गिरफ्तारी का जबरदस्त फाल आउट हो सकता है। यदि अमर सिंह ने सारा राज खोल दिया तो कांग्रेस के कई चोटी के नेता फंस सकते हैं और यही चीज कांग्रेस को सताएगी।
यही कारण है कि कांग्रेस ने अपना डैमेज कंट्रोल शुरू कर दिया है इससे पहले कि अमर सिंह मुंह खोलें, कांग्रेस रणनीतिकारों ने अपना मोर्चा सम्भाल लिया है। संसदीय मामलों के मंत्री पवन कुमार बंसल का कहना है कि उस समय कांग्रेस को वोट खरीदने की जरूरत नहीं थी। वाम मोर्चा द्वारा समर्थन वापस लिए जाने के बावजूद यूपीए के पास उचित बहुमत था। बंसल का तर्प इसलिए भी जरूरी दिखाई पड़ता है क्योंकि अदालत में सबसे पहला सवाल यही उठेगा कि आखिर पूरे मामले में फायदा किसे मिला?