बीते दिनों बटला हाउस मुठभेड़ सहित इत्तेहाद पंट और ऑल इंडिया उलेमा मशाएख बोर्ड जैसे अनेक मुद्दे चर्चा का विषय रहे। बटला हाउस मुठभेड़ के बाद मारे गए लड़कों के परिजनों की सहायता राशि की घोषणा पर चर्चा करते हुए बटला हाउस के शहीदों की सहायता राशि को क्या जमीन निगल गई? के शीर्षक से दैनिक `हिन्दुस्तान एक्सपेस' में रागिब आलिम ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि मुठभेड़ में तुरंत बाद उस समय के समाजवादी पार्टी नेता अमर सिंह ने मजलुमों की सहायता के नाम पर जामिया ओल्ड ब्याज एसोसिएशन को 10 लाख रुपए दिए थे एवं जामिया में शिक्षा पाप्त कर रहे छात्रों ने अपने जेब खर्च से बचाकर लगभग 95 हजार रुपया सहायता के नाम पर जमा किया था। इसके अतिरिक्त जामिया टीचर्स एसोसिएशन ने अपनी एक दिन की पगार सहायता के नाम पर दी थी लेकिन दिलचस्प बात यह है कि आज तक यह राशि न साजिद और आतिक के परिजनों को दी गई और न ही जियाउर रहमान और साकिब निसार के मां-बाप को कानूनी सहायता के लिए उपलब्ध कराई गई। इतना ही नहीं बटला हाउस मुठभेड़ के बाद जामिया में पढ़ रहे आतिक और साजिद के बारे में जामिया मिलिया इसलामियां ने इस मामले में कानूनी सहायता का आश्वासन दिया था लेकिन आज तक किसी पीड़ित को कानूनी इमदाद तो दूर की बात है जामिया पशासन ने पीड़ितों से हमदर्दी का इजहार करना भी जरूरी नहीं समझा। इस बाबत आरटीआई कार्यकर्ता अफरोज आलम साहिल द्वारा फण्ड के बारे में पूछे गए सवाल पर जामिया ने किसी भी तरह की जानकारी देने से इंकार किया।
घटना या षड्यंत्र के शीर्षक से दैनिक `जदीद खबर' ने अपने सम्पादकीय में सुपीम कोर्ट द्वारा बाबरी मस्जिद को मात्र घटना माने जाने पर चर्चा करते हुए लिखा है कि हम सुपीम कोर्ट से पूरे आदर के साथ कहना चाहेंगे कि बाबरी मस्जिद की शहादत को षड्यंत्र करार देना बुनियादी सच्चाई से मुंह छुपाने के बराबर है। यह बात साफ है कि बाबरी मस्जिद विध्वंस एक षड्यंत्र था और इसके पीछे संघ परिवार की एक सुनियोजित और लम्बा राजनैतिक षड्यंत्र शामिल था। हम यह बात भावना में बहकर नहीं कह रहे हैं बल्कि सरकार ने जस्टिस लिब्राहन की अगुवाई में जो जांच आयोग गठित हुआ था उसने अपनी लम्बी जांच रिपोर्ट में इस षड्यंत्र की सभी कड़ियों को जोड़कर अपराधियों को बेनकाब कर दिया है। इन मुजरिमों को सजा दिलाने के लिए सीबीआई ने रायबरेली की विशेष अदालत में जो आरोप पत्र दाखिल किया था उसके आरोपी अपनी जान बचाने के लिए कानूनी रास्तों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इस सिलसिले में सीबीआई ने जो ताजा कार्यवाही की है, उसे लालकृष्ण आडवाणी ने अदालती पकिया को हनन करार दिया है। आडवाणी न केवल बाबरी मस्जिद की शहादत के समय घटना स्थल पर मौजूद थे बल्कि वह अन्य नेताओं के साथ कारसेवकों का मनोबल भी बढ़ा रहे थे। इसकी तसदीक आडवाणी की सुरक्षा पर तैनात एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी मिसेज गुप्ता ने अपने शपथ-पत्र में भी की है।
देवबंदिया की दुश्मनी में हिन्दू परस्त हो गए कछोछवी के शीर्षक से दैनिक `सहाफत' में पकाशित अनीस अहमद खां ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि बरेलवी सुन्नी मुसलमानों के आल इंडिया उलेमा मशाएख बोर्ड ने अपने समर्थकों को आदेश दिया है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में जहां भी देवबंदी उम्मीदवार खड़े हों उन्हें पराजित किया जाए। यही नहीं बोर्ड के राष्ट्रीय सचिव बाबर अशरफ ने यहां तक कह दिया है कि वह अब देवबंदियों के साथ खुली जंग शुरू कर रहे हैं। इसका पहला स्तर चुनाव से शुरू कर रहे हैं।
साथ ही यह जंग उन सियासी पार्टियों के साथ भी है जो देवबंदियों को अपना उम्मीदवार बनाती हैं। अशरफ यहीं नहीं रुकते उनका कहना है कि हम देवबंदी उम्मीदवारों का न केवल विरोध करेंगे बल्कि उनको जड़ से भी उखाड़ फेकेंगे। रायबरेली से कांग्रेस को जीतने नहीं देंगे और यदि राहुल गांधी यह समझते हैं कि वह केवल देवबंदियों को खुश करके चुनाव जीत लेंगे तो यह उनकी भूल है। क्योंकि रायबरेली में देवबंदी नहीं बरेलवी रहते हैं। ज्ञात रहे आल इंडिया उलेमा मशाएख बोर्ड ने अक्टूबर 2011 में एक कांपेंस कर वहां भी आतंकवाद का कार्ड दिखाया था, वहीं मुरादाबाद की एक कांपेंस में उसके अध्यक्ष सैयद मोहम्मद अशरफ कछोछवी ने देवबंदियों को इस्लाम से खारिज करने तक की मांग कर डाली थी।
यूपी में होगा सोशल इंजीनियरिंग का असली इम्तेहान के शीर्षक से दैनिक `पताप' के सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि उत्तर पदेश चुनाव में हर सियासी पार्टी को तथाकथित सोशल इंजीनियरिंग का इमतेहान होने वाला है।
बसपा सुपीमो मायावती द्वारा विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों की सूची जारी करते गिनाना शुरू कर दिया कि एससी 88, ओबीसी 113, ब्राह्मण 74, ठाकुर 33 और 85 मुसलमान हैं। जाति-पाति का विवरण देना कोई नई बात नहीं है लेकिन बहन जी की पेस कांपेंस के कुछ घण्टों बाद ही भाजपा की पेस कांपेंस में पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मुख्तार अहमद अब्बास नकवी ने भी विवरण पेश किया कि अब तक जारी भाजपा की सूची में कितने पिछड़ों, एससी और ब्राह्मणों को टिकट दिया गया है। कांग्रेस जो ब्राह्मणों की पार्टी मानी जाती हैं उसने भी 325 उम्मीदवारों में से 39 ब्राह्मणों, 51 ठाकुरों, एससी 82 और मुसलमानों को 52 टिकट दिए हैं। समाजवादी पार्टी ने भी टिकट वितरण में अपनी सोशल इंजीनियरिंग का पूरा ख्याल रखा है। कुल मिलाकर दिलचस्प सूरतेहाल बनी हुई है देखें, यूपी में सोशल इंजीनियरिंग कितनी सफल साबित होती है अथवा किस पार्टी का जाति आंकलन फिट बैठता है।
लखनऊ से पकाशित दैनिक `अवधनामा' में हिसाम सिद्दीकी ने पैसों के लालच में डटा सलमान का इत्तेहाद पंट के शीर्षक से लिखा है कि आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड सदस्य और दारुल उलूम नदवातुल उलेमा लखनऊ और मौलाना अली मियां परिवार के एक सदस्य सलमान हसनी नदवी ने जिन एक दर्जन कागजी पार्टियों को जोड़कर एक बेमेल शादी की भी उसमें केवल तेरह दिनों में ही तलाक हो गया। तलाक भी काले धन के बंटवारे के कारण हुआ। सलमान नदवी ने ऐलान किया कि पीस पार्टी आल इंडिया ने मनमाने तरीके से अपने उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया। पीस पार्टी में मोटी रकमें लेकर टिकट दिए गए इसालिए पीस पार्टी को इत्तेहाद पंट से निकाल दिया गया।
पीस पार्टी का कहना है किसलमान नदवी ने केवल अफवाहों की बुनियादों पर मान लिया था और वह कह रहे थे कि उम्मीदवारों से ली गई रकम में उन्हें भी उचित हिस्सा दिया जाए। पार्टी ने जब पैसा लिया ही नहीं था, तो उन्हें थैली कहां से पहुंचाई जाती। पीस पार्टी के एक सदस्य ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि सलमान नदवी के रुख से मौलवियों की बेइमानी और लालची होने का यकीन हो गया।
A Blog is specially build for minorities. Where you can find a latest article as well as Issues. there is no need to recognize a muslim but there is a lot of work for humanity.
Thursday, February 2, 2012
Tuesday, January 3, 2012
मुस्लिम ओबीसी आरक्षण पर उठे सवाल
उत्तर पदेश में कांग्रेस की अग्निपरीक्षा के शीर्षक से दैनिक `पताप' ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि विधानसभा चुनाव की तारीख तय होने से लगभग 40 घंटे पहले कांग्रेस द्वारा ओबीसी के 27 फीसदी कोटे में से अल्पसंख्यकों, मुसलमान, ईसाई, बौद्ध और पारसी को 4.5 फीसदी अलग से आरक्षण देना यूपी की 403 विधानसभा में कांग्रेस को अपने वजूद के मजबूत होने की उम्मीद है। पहले इसकी सीटें 22 थीं अब इसमें 60 सीटें बढ़ सकती हैं। कांग्रेस का चौधरी अजीत सिंह की पार्टी आरएलडी से समझौता इसके वोट बैंक में वृद्धि करेगा। कांग्रेस का अगला कदम उत्तर पदेश में पधानमंत्री की कुर्सी के दावेदार मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी से चुनावी तालमेल की कोशिश होगी ताकि इसके साथ मिलकर कांग्रेस चुनाव में यादव एवं अन्य जातियों के वोट बैंक पर पकड़ बना सके। राज्य में कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी की सकियता से पार्टी को आशा हो चली है कि 17 फीसदी मुस्लिम वोट की अहम भूमिका होगी। वह जिस पार्टी की ओर जाएगा वही पार्टी सत्ता में आने वाली पार्टी किंग मेकर की भूमिका निभाएगी। चुनाव पूर्व सर्वे के मुताबिक किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिलने वाली है। उत्तर पदेश में गठजोड़ की सरकार बनेगी। देखना है कि चुनाव में ऊंट किस करवट बैठता है लेकिन इतना तय है कि यूपी चुनाव कांग्रेस और यूपीए सरकार के लिए सियासी चैलेंज भरा होगा।
कोलकाता से पकाशित दैनिक `आजाद हिंद' ने उत्तर पदेश विधानसभा चुनाव के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखा है कि मायावती को अपने राज्य में मुसलमानों से कभी कोई दिलचस्पी नहीं रही और न ही अल्पसंख्यकों के लिए इनकी पार्टी ने कुछ किया है लेकिन इस बार जब उन्हें मुसलमानों के तेवर साफ दिखाई दे रहे हैं तो ऐसे मौकों पर उन्होंने मुस्लिम कार्ड खेलने की भी कोशिश की है और पिछले सप्ताह ही घोषणा की कि उनकी सरकार राज्य में अल्पसंख्यकों के उत्थान के लिए काम करेगी। अब जबकि चुनाव सिर पर आ गया है तो मायावती को मुसलमानों की याद आई और कुछ बिकाऊ मुस्लिम चेहरों को लेकर एक बड़ा सम्मेलन भी किया लेकिन राज्य के मुसलमान मायावती से दूर हो गए हैं। गत 5 वर्षों के दौरान मायावती को कभी भी मुसलमानों की याद नहीं आई लेकिन इस समय मुसलमानों से हमदर्दी का दम भर रही हैं। सच्चर कमेटी ने तो पश्चिम बंगाल में मुसलमानों की सबसे खराब हालत बताई थी लेकिन यदि उत्तर पदेश का जायजा लिया जाए तो पता चलेगा कि वहां के मुसलमान पश्चिमी बंगाल से भी खराब हालत में अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं जहां उनकी न अपनी कोई पहचान है और न कोई भविष्य। मुसलमानों की उन्नति के लिए आरक्षण जरूरी के शीर्षक से आबिद अनवर अपने लेख में लिखते हैं कि मुसलमान हिन्दुस्तान में नए दलित हैं। दुनिया में ऐसा पहला देश होगा जहां दलित से बदतर मुसलमानों की जिंदगी बना दी गई है। सर्वे में पता चला है कि देश के लगभग एक तिहाई मुसलमान 550 रुपए मासिक से कम आमदनी पर जिंदगी गुजारने पर विवश हैं। नेशनल काउंसिल फॉर अप्लाइड एकोनामिक रिसर्च (एनसीएईआर) के अनुसार 2004-05 में हर 10 में से तीन मुसलमान गरीबी रेखा से नीचे जिंदगी गुजार रहे हैं। गरीब मुसलमान जो शहरों में रहते हैं उनकी हालत गांव में रहने वाले मुसलमानों से कुछ बेहतर है। गांव में रहने वालों की आमदनी मात्र 338 रुपए मासिक थी। इसके अतिरिक्त शहरी इलाकों में लगभग 38 फीसदी और देहाती क्षेत्र में 27 फीसदी मुसलमान गरीबी रेखा से नीचे की जिंदगी गुजार रहे हैं। मुसलमानों को सुविधा देने की बात सभी सियासी पार्टियां करती हैं लेकिन जब उन्हें सुविधा देने की बात आती है तो इन पार्टियों को सांप सूंघ जाता है। कुछ पार्टियां आरक्षण की बात करती हैं लेकिन जब सत्ता में आ जाती हैं तो वह भूल जाती हैं कि जैसा कि नीतीश कुमार सरकार ने किया। उन्होंने चुनाव से पूर्व मुसलमानों के लिए आरक्षण की बात कही थी लेकिन दोबारा सत्ता में आते ही आरक्षण की बात तो दूर उल्टे बिहार में मुसलमानों का खून बहाया जा रहा है। फारबसगंज पुलिस फायरिंग और बड़ाहा कत्ल इसका ताजा उदाहरण है।
मुस्लिम ओबीसी के लिए विशेष किया गया कोटा- खोटा के शीर्षक से दैनिक `हमारा समाज' में पकाशित लेख में मौलाना अब्दुल मोईद कासमी ने लिखा है कि सच्चाई यह है कि 4.5 फीसदी आरक्षण मुसलमानों अथवा ओबीसी मुसलमानों के लिए बल्कि सभी ओबीसी अल्पसंख्यकों (मुस्लिम, सिख, बौद्ध, ईसाई और पारसी) के लिए है। इस तरह यह घोषणा साढ़े चार फीसदी की है लेकिन मुस्लिम ओबीसी के हिस्से में मुश्किल से ढाई फीसदी आएगा। कांग्रेस मंत्रिमंडल ने कोटा तो तय किया है लेकिन इसमें दो बड़े छल किए हैं। एक यह कि मुस्लिम ओबीसी का कोटा तय करने के बजाए अल्पसंख्यकों अर्थात मुसलमानों समेत सिख, बौद्ध, इसाई और पारसी का कोटा तय किया है। इससे स्थित में यह तब्दीली हुई कि पहले मुस्लिम ओबीसी सभी ओबीसी का हिस्सा थे। अब सभी अल्पसंख्यक ओबीसी का हिस्सा हैं अर्थात केवल शालि होने को विशेष किया गया है, स्पष्ट रूप से मुस्लिम ओबीसी का कोटा विशेष नहीं किया गया है। इस तरह यह बताया जा रहा है कि कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में मुसलमानों के लिए आरक्षण का जो वादा किया था उसको पूरा कर दिया गया। इस आधे-अधूरे फैसले द्वारा मुसलमानों की ओर आरक्षण का जो दबाव बना था उसे भी निष्पभावी करने की कोशिश की गई है और कुछ दिया भी नहीं गया है। दूसरी ओर भाजपा सहित साम्पदायिक ताकतों को मुसलमानों के खिलाफ देशवासियों विशेषकर हिन्दू ओबीसी जातियों को बहकाने का मौका हाथ आ गया।
विधानसभा चुनाव का बिगुल के शीर्षक से दैनिक `जदीद खबर' ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि वैसे तो उत्तर पदेश में सभी सियासी पार्टियों की नजर 20 फीसदी मुस्लिम वोटों पर है जो विधानसभा की 100 से अधिक सीटों पर निर्णायक भूमिका रखते हैं। लेकिन बाबरी मस्जिद के अपराधी कल्याण सिंह से हाथ मिलाने के कारण मुलायम सिंह की वह इमेज बाकी नहीं रह गई जो कभी हुआ करती थी। राज्य की सत्ता बन बहुजन समाज पार्टी को मुसलमानों की याद चुनाव के बहुत करीब आकर आई।
पहले उन्होंने पधानमंत्री को पत्र लिखकर मुस्लिम आरक्षण देने की मांग की और इसके बाद लखनऊ में मुसलमानों को लुभाने के सम्मेलन किया। पिछली बार मायावती ने दलितों और ब्राह्मण वोटों के बल पर सत्ता हासिल करने का जो तजुर्बा किया था उसे राजनैतिक हलकों में सराहा गया था लेकिन अब स्थिती पूरी तरह भिन्न है। कांग्रेस की केन्द्र सरकार ने चुनाव से पूर्व अन्य पिछड़ी जातियों को साढ़े चार फीसदी आरक्षण की घोषणा कर दी है। इस बाबत सरकारी अधिसूचना जारी हो चुकी है और मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने शैक्षिक संस्थानों में अन्य पिछड़ी जातियों को साढ़े चार फीसदी आरक्षण देने हेतु दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं। इसी के साथ पार्टी ने अपनी स्थिति मजबूत बनाने के लिए राष्ट्रीय लोकदल से चुनावी समझौता किया और चौधरी अजीत सिंह को मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया है। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी पार्टी को यूपी में सत्ता सीन करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं। देखना यह है कि इन कोशिशों के नतीजे में कांग्रेस को किस हद तक सियासी फायदा हासिल होगा।
कोलकाता से पकाशित दैनिक `आजाद हिंद' ने उत्तर पदेश विधानसभा चुनाव के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखा है कि मायावती को अपने राज्य में मुसलमानों से कभी कोई दिलचस्पी नहीं रही और न ही अल्पसंख्यकों के लिए इनकी पार्टी ने कुछ किया है लेकिन इस बार जब उन्हें मुसलमानों के तेवर साफ दिखाई दे रहे हैं तो ऐसे मौकों पर उन्होंने मुस्लिम कार्ड खेलने की भी कोशिश की है और पिछले सप्ताह ही घोषणा की कि उनकी सरकार राज्य में अल्पसंख्यकों के उत्थान के लिए काम करेगी। अब जबकि चुनाव सिर पर आ गया है तो मायावती को मुसलमानों की याद आई और कुछ बिकाऊ मुस्लिम चेहरों को लेकर एक बड़ा सम्मेलन भी किया लेकिन राज्य के मुसलमान मायावती से दूर हो गए हैं। गत 5 वर्षों के दौरान मायावती को कभी भी मुसलमानों की याद नहीं आई लेकिन इस समय मुसलमानों से हमदर्दी का दम भर रही हैं। सच्चर कमेटी ने तो पश्चिम बंगाल में मुसलमानों की सबसे खराब हालत बताई थी लेकिन यदि उत्तर पदेश का जायजा लिया जाए तो पता चलेगा कि वहां के मुसलमान पश्चिमी बंगाल से भी खराब हालत में अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं जहां उनकी न अपनी कोई पहचान है और न कोई भविष्य। मुसलमानों की उन्नति के लिए आरक्षण जरूरी के शीर्षक से आबिद अनवर अपने लेख में लिखते हैं कि मुसलमान हिन्दुस्तान में नए दलित हैं। दुनिया में ऐसा पहला देश होगा जहां दलित से बदतर मुसलमानों की जिंदगी बना दी गई है। सर्वे में पता चला है कि देश के लगभग एक तिहाई मुसलमान 550 रुपए मासिक से कम आमदनी पर जिंदगी गुजारने पर विवश हैं। नेशनल काउंसिल फॉर अप्लाइड एकोनामिक रिसर्च (एनसीएईआर) के अनुसार 2004-05 में हर 10 में से तीन मुसलमान गरीबी रेखा से नीचे जिंदगी गुजार रहे हैं। गरीब मुसलमान जो शहरों में रहते हैं उनकी हालत गांव में रहने वाले मुसलमानों से कुछ बेहतर है। गांव में रहने वालों की आमदनी मात्र 338 रुपए मासिक थी। इसके अतिरिक्त शहरी इलाकों में लगभग 38 फीसदी और देहाती क्षेत्र में 27 फीसदी मुसलमान गरीबी रेखा से नीचे की जिंदगी गुजार रहे हैं। मुसलमानों को सुविधा देने की बात सभी सियासी पार्टियां करती हैं लेकिन जब उन्हें सुविधा देने की बात आती है तो इन पार्टियों को सांप सूंघ जाता है। कुछ पार्टियां आरक्षण की बात करती हैं लेकिन जब सत्ता में आ जाती हैं तो वह भूल जाती हैं कि जैसा कि नीतीश कुमार सरकार ने किया। उन्होंने चुनाव से पूर्व मुसलमानों के लिए आरक्षण की बात कही थी लेकिन दोबारा सत्ता में आते ही आरक्षण की बात तो दूर उल्टे बिहार में मुसलमानों का खून बहाया जा रहा है। फारबसगंज पुलिस फायरिंग और बड़ाहा कत्ल इसका ताजा उदाहरण है।
मुस्लिम ओबीसी के लिए विशेष किया गया कोटा- खोटा के शीर्षक से दैनिक `हमारा समाज' में पकाशित लेख में मौलाना अब्दुल मोईद कासमी ने लिखा है कि सच्चाई यह है कि 4.5 फीसदी आरक्षण मुसलमानों अथवा ओबीसी मुसलमानों के लिए बल्कि सभी ओबीसी अल्पसंख्यकों (मुस्लिम, सिख, बौद्ध, ईसाई और पारसी) के लिए है। इस तरह यह घोषणा साढ़े चार फीसदी की है लेकिन मुस्लिम ओबीसी के हिस्से में मुश्किल से ढाई फीसदी आएगा। कांग्रेस मंत्रिमंडल ने कोटा तो तय किया है लेकिन इसमें दो बड़े छल किए हैं। एक यह कि मुस्लिम ओबीसी का कोटा तय करने के बजाए अल्पसंख्यकों अर्थात मुसलमानों समेत सिख, बौद्ध, इसाई और पारसी का कोटा तय किया है। इससे स्थित में यह तब्दीली हुई कि पहले मुस्लिम ओबीसी सभी ओबीसी का हिस्सा थे। अब सभी अल्पसंख्यक ओबीसी का हिस्सा हैं अर्थात केवल शालि होने को विशेष किया गया है, स्पष्ट रूप से मुस्लिम ओबीसी का कोटा विशेष नहीं किया गया है। इस तरह यह बताया जा रहा है कि कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में मुसलमानों के लिए आरक्षण का जो वादा किया था उसको पूरा कर दिया गया। इस आधे-अधूरे फैसले द्वारा मुसलमानों की ओर आरक्षण का जो दबाव बना था उसे भी निष्पभावी करने की कोशिश की गई है और कुछ दिया भी नहीं गया है। दूसरी ओर भाजपा सहित साम्पदायिक ताकतों को मुसलमानों के खिलाफ देशवासियों विशेषकर हिन्दू ओबीसी जातियों को बहकाने का मौका हाथ आ गया।
विधानसभा चुनाव का बिगुल के शीर्षक से दैनिक `जदीद खबर' ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि वैसे तो उत्तर पदेश में सभी सियासी पार्टियों की नजर 20 फीसदी मुस्लिम वोटों पर है जो विधानसभा की 100 से अधिक सीटों पर निर्णायक भूमिका रखते हैं। लेकिन बाबरी मस्जिद के अपराधी कल्याण सिंह से हाथ मिलाने के कारण मुलायम सिंह की वह इमेज बाकी नहीं रह गई जो कभी हुआ करती थी। राज्य की सत्ता बन बहुजन समाज पार्टी को मुसलमानों की याद चुनाव के बहुत करीब आकर आई।
पहले उन्होंने पधानमंत्री को पत्र लिखकर मुस्लिम आरक्षण देने की मांग की और इसके बाद लखनऊ में मुसलमानों को लुभाने के सम्मेलन किया। पिछली बार मायावती ने दलितों और ब्राह्मण वोटों के बल पर सत्ता हासिल करने का जो तजुर्बा किया था उसे राजनैतिक हलकों में सराहा गया था लेकिन अब स्थिती पूरी तरह भिन्न है। कांग्रेस की केन्द्र सरकार ने चुनाव से पूर्व अन्य पिछड़ी जातियों को साढ़े चार फीसदी आरक्षण की घोषणा कर दी है। इस बाबत सरकारी अधिसूचना जारी हो चुकी है और मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने शैक्षिक संस्थानों में अन्य पिछड़ी जातियों को साढ़े चार फीसदी आरक्षण देने हेतु दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं। इसी के साथ पार्टी ने अपनी स्थिति मजबूत बनाने के लिए राष्ट्रीय लोकदल से चुनावी समझौता किया और चौधरी अजीत सिंह को मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया है। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी पार्टी को यूपी में सत्ता सीन करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं। देखना यह है कि इन कोशिशों के नतीजे में कांग्रेस को किस हद तक सियासी फायदा हासिल होगा।
Tuesday, December 6, 2011
सब सियासत के संकेत हैं, चना जोर गरम
केंद्र सरकार द्वारा खुदरा बाजार में विदेशी निवेश की इजाजत देने के फैसले पर जहां सियासी पार्टियों की ओर से विरोध का सिलसिला जारी है वहीं संसद में भी इसको लेकर गतिरोध है। इस मुद्दे पर उर्दू अखबारों ने अपने विचार रखे हैं। पेश हैं उनमें से कुछ की राय। `खुदरा में एफडीआई का फैसला सरकार को टाल देना चाहिए' के शीर्षक से दैनिक `प्रताप' में सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि देश के मंझोले और छोटे शहरों में ठेला, रेहड़ी लगाने, फल-सब्जी बेचने वाले छोटे दुकानदार और किसान यदि अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं तो उन्हें कुसूरवार नहीं ठहराया जा सकता। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के खुदरा कारोबार से साढ़े तीन करोड़ लोगों को रोजगार मिलता है। यदि एक परिवार में पांच व्यक्तियों को भी बुनियाद माना जाए तो 18 करोड़ लोग इस खुदरा कारोबार से जुड़े हैं। इनके लिए वैकल्पिक व्यवस्था करना सरकार के समीप एक बड़ा सवाल है। इन सवालों के बावजूद मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार अपने फैसले पर अटल है। सूत्रों के अनुसार कांग्रेस के अन्दर और बाहर विरोध के बावजूद प्रधानमंत्री के निवास पर कांग्रेस कोर ग्रुप की बैठक में फैसला लिया गया कि सरकार एफडीआई के फैसले को वापस नहीं लेगी। सियासी विरोध के चलते खुदरा बाजार में विदेशी दुकानें खुलना आसान नजर नहीं आ रहा है। पश्चिमी बंगाल, यूपी के बाद तमिलनाडु द्वारा विदेशी दुकानों को इजाजत न देने के ऐलान से विरोधी राज्यों की संख्या 28 हो गई है। सरकार को चाहिए कि वह एफडीआई के मामले को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न न बनाए और फैसले को टाल दे। अभी इस मसले पर बहस बहुत जरूरी है।
कोलकाता से प्रकाशित दैनिक `आजाद हिन्द' ने `खुदरा बाजार में विदेशी निवेश, सब सियासत के हैं संकेत चना जोर गरम' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में चर्चा करते हुए लिखा है कि यूपीए की सबसे बड़ी सहयोगी तृणमूल कांग्रेस ने फैसला वापस लेने की मांग की है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने साफ कह दिया है कि इसके राज्य में विदेशी खुदरा कम्पनियों को सुपर मार्केट खोलने की इजाजत नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि इस मुद्दे पर सभी पार्टियां अपने-अपने राजनैतिक हित को सामने रखकर विरोध अथवा समर्थन कर रही हैं। उदाहरण के तौर पर भाजपा इस फैसले के विरोध में सबसे आगे है लेकिन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और कर्नाटक सरकार ने कहा है कि वह अपने राज्यों में वॉलमार्ट और टिसको जैसी कम्पनियों के सुपर मार्केट का स्वागत करेंगे। दूसरी ओर पंजाब में भाजपा की सहयोगी शिरोमणि अकाली दल ने एफडीआई पर सरकार के फैसले का समर्थन किया है। जयललिता की एडीएम के भी केंद्र के फैसले के खिलाफ है। बहुत-सी पार्टियों को यह नहीं पता कि वह इसका विरोध क्यों कर रही हैं। मायावती का कहना है कि सरकार ने यह फैसला इसलिए किया है कि राहुल गांधी के विदेशी दोस्तों को फायदा पहुंचेगा। सीपीएम का कहना है कि इस फैसले से लाखों दुकानदार और इससे जुड़े करोड़ों व्यक्ति बेरोजगार हो जाएंगे।
`एफडीआई का विरोध' के शीर्षक से दैनिक `जदीद खबर' ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि सरकार ने इस मसले पर विपक्ष को विश्वास में लेने की जो कोशिश की थी वह पूरी तरह नाकाम हो गई है। इस मामले में विपक्ष के अतिरिक्त सरकार की समर्थक पार्टियां भी विपक्ष की भाषा बोल रही हैं। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि पूरे देश में फैले शॉपिंग मॉल के कल्चर ने भारतीय मार्केट की शक्ल की बदल दी है। इन शॉपिंग मॉल में महंगे विदेशी ब्रांड मुंह मांगी कीमतों पर बेचा जाता है और शॉपिंग मॉल की चकाचौंध से प्रभावित होकर वह लोग भी इनके चंगुल में आ जाते हैं जिनकी जेब इसे वहन नहीं कर सकती। विदेशी निवेश से नौकरियों के दरवाजे निश्चय ही खुले हैं लेकिन बेरोजगारी की दर बढ़ी है। अब देखना यह है कि खुदरा बाजार में विदेशी निवेश के बाद हालात क्या करवट लेंगे। फिलहाल इसका विरोध चल रहा है। देश के 26 राज्यों में से केवल 5 राज्य ऐसे हैं जिन्होंने एफडीआई को लागू करने से सहमति व्यक्त की है जबकि 10 राज्यों का स्पष्ट रूप से कहना है कि वह इसके हक में नहीं हैं। अन्य राज्यों का भी यही मत है। इन हालात में खुदरा बाजार में विदेशी निवेश का फैसला सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है।
`अपने पैरों पर कुल्हाड़ी' के शीर्षक से दैनिक `इंकलाब' ने लिखा है कि खुदरा बाजार में विदेशी निवेश की इजाजत देने का फैसला और इस पर प्रतिक्रिया के तौर पर संसद का कामकाज ठप होने का मामला ऐसी आग है जो न तो खुद लगी है और न ही विपक्ष ने लगाई है इसके लिए सरकार के अलावा कोई जिम्मेदार नहीं है। आश्चर्य है कि सरकार ने यह फैसला अचानक ही कर लिया और इसके लिए समर्थकों को विश्वास में लेने की जरूरत भी महसूस नहीं की गई। हम नहीं जानते कि खुदरा बाजार में विदेशी निवेश के जितने फायदे गिनाए जा रहे हैं वह हासिल हो सकेंगे या नहीं, क्योंकि इस पर वही लोग प्रतिक्रिया दे सकते हैं जो अर्थव्यवस्था की गुत्थियों पर नजर रखते हैं और उन्हें सुलझाने के लिए बेहतर सुझाव भी दे सकते हैं लेकिन हम यह जरूर जानते हैं कि किसी बड़ी और अहम पहल से पूर्व सियासी वातावरण बनाना और सभी राजनीतिक पार्टियों को विश्वास में लेने की कोशिश करना ही लोकतंत्र की अंतरआत्मा है। लोकतंत्र के फैसले कभी एकतरफा नहीं हो सकते। इसके बावजूद सरकार ने लोकतांत्रिक मर्यादाओं का उल्लंघन कर यह फैसला किया और अब इसके गुणों को बताकर विपक्ष के दांत खट्टे करना चाहती है। जाहिर है यह संभव नहीं है।
दैनिक `राष्ट्रीय सहारा' ने `एफडीआई पर कांग्रेस की परेशानी' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखा है कि प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का यह कहना कि एफडीआई पर फैसला जल्दबाजी में नहीं किया गया है बल्कि बहुत सोच-विचार कर किया गया है। इसके बावजूद यदि कुछ राज्य इस फैसले को कुबूल नहीं करना चाहती तो यह उनके अधिकार में है कि वह एफडीआई की इजाजत दें या न दें। इसका विरोध केवल विपक्ष अथवा कांग्रेस को सहयोग दे रही पार्टियां ही नहीं कर रही हैं बल्कि कांग्रेस का एक बड़ा वर्ग भी इसके हक में नहीं है। जाहिर है कि यदि पार्टी के अन्दर से एफडीआई के खिलाफ आवाज उठेगी तो उससे निपटना सरकार और कांग्रेस दोनों के लिए बड़ा चैलेंज होगा। पार्टी के कई वर्गों की ओर से एफडीआई के संबंध में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में प्रभाव को लेकर जो सन्देह व्यक्त किया जा रहा है उसके दबाव में यदि सरकार अपना फैसला बदल देती है तो भी इसे सियासी फायदा कम और विरोधियों को ज्यादा मिलने की आशा है।
कोलकाता से प्रकाशित दैनिक `आजाद हिन्द' ने `खुदरा बाजार में विदेशी निवेश, सब सियासत के हैं संकेत चना जोर गरम' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में चर्चा करते हुए लिखा है कि यूपीए की सबसे बड़ी सहयोगी तृणमूल कांग्रेस ने फैसला वापस लेने की मांग की है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने साफ कह दिया है कि इसके राज्य में विदेशी खुदरा कम्पनियों को सुपर मार्केट खोलने की इजाजत नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि इस मुद्दे पर सभी पार्टियां अपने-अपने राजनैतिक हित को सामने रखकर विरोध अथवा समर्थन कर रही हैं। उदाहरण के तौर पर भाजपा इस फैसले के विरोध में सबसे आगे है लेकिन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और कर्नाटक सरकार ने कहा है कि वह अपने राज्यों में वॉलमार्ट और टिसको जैसी कम्पनियों के सुपर मार्केट का स्वागत करेंगे। दूसरी ओर पंजाब में भाजपा की सहयोगी शिरोमणि अकाली दल ने एफडीआई पर सरकार के फैसले का समर्थन किया है। जयललिता की एडीएम के भी केंद्र के फैसले के खिलाफ है। बहुत-सी पार्टियों को यह नहीं पता कि वह इसका विरोध क्यों कर रही हैं। मायावती का कहना है कि सरकार ने यह फैसला इसलिए किया है कि राहुल गांधी के विदेशी दोस्तों को फायदा पहुंचेगा। सीपीएम का कहना है कि इस फैसले से लाखों दुकानदार और इससे जुड़े करोड़ों व्यक्ति बेरोजगार हो जाएंगे।
`एफडीआई का विरोध' के शीर्षक से दैनिक `जदीद खबर' ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि सरकार ने इस मसले पर विपक्ष को विश्वास में लेने की जो कोशिश की थी वह पूरी तरह नाकाम हो गई है। इस मामले में विपक्ष के अतिरिक्त सरकार की समर्थक पार्टियां भी विपक्ष की भाषा बोल रही हैं। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि पूरे देश में फैले शॉपिंग मॉल के कल्चर ने भारतीय मार्केट की शक्ल की बदल दी है। इन शॉपिंग मॉल में महंगे विदेशी ब्रांड मुंह मांगी कीमतों पर बेचा जाता है और शॉपिंग मॉल की चकाचौंध से प्रभावित होकर वह लोग भी इनके चंगुल में आ जाते हैं जिनकी जेब इसे वहन नहीं कर सकती। विदेशी निवेश से नौकरियों के दरवाजे निश्चय ही खुले हैं लेकिन बेरोजगारी की दर बढ़ी है। अब देखना यह है कि खुदरा बाजार में विदेशी निवेश के बाद हालात क्या करवट लेंगे। फिलहाल इसका विरोध चल रहा है। देश के 26 राज्यों में से केवल 5 राज्य ऐसे हैं जिन्होंने एफडीआई को लागू करने से सहमति व्यक्त की है जबकि 10 राज्यों का स्पष्ट रूप से कहना है कि वह इसके हक में नहीं हैं। अन्य राज्यों का भी यही मत है। इन हालात में खुदरा बाजार में विदेशी निवेश का फैसला सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है।
`अपने पैरों पर कुल्हाड़ी' के शीर्षक से दैनिक `इंकलाब' ने लिखा है कि खुदरा बाजार में विदेशी निवेश की इजाजत देने का फैसला और इस पर प्रतिक्रिया के तौर पर संसद का कामकाज ठप होने का मामला ऐसी आग है जो न तो खुद लगी है और न ही विपक्ष ने लगाई है इसके लिए सरकार के अलावा कोई जिम्मेदार नहीं है। आश्चर्य है कि सरकार ने यह फैसला अचानक ही कर लिया और इसके लिए समर्थकों को विश्वास में लेने की जरूरत भी महसूस नहीं की गई। हम नहीं जानते कि खुदरा बाजार में विदेशी निवेश के जितने फायदे गिनाए जा रहे हैं वह हासिल हो सकेंगे या नहीं, क्योंकि इस पर वही लोग प्रतिक्रिया दे सकते हैं जो अर्थव्यवस्था की गुत्थियों पर नजर रखते हैं और उन्हें सुलझाने के लिए बेहतर सुझाव भी दे सकते हैं लेकिन हम यह जरूर जानते हैं कि किसी बड़ी और अहम पहल से पूर्व सियासी वातावरण बनाना और सभी राजनीतिक पार्टियों को विश्वास में लेने की कोशिश करना ही लोकतंत्र की अंतरआत्मा है। लोकतंत्र के फैसले कभी एकतरफा नहीं हो सकते। इसके बावजूद सरकार ने लोकतांत्रिक मर्यादाओं का उल्लंघन कर यह फैसला किया और अब इसके गुणों को बताकर विपक्ष के दांत खट्टे करना चाहती है। जाहिर है यह संभव नहीं है।
दैनिक `राष्ट्रीय सहारा' ने `एफडीआई पर कांग्रेस की परेशानी' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखा है कि प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का यह कहना कि एफडीआई पर फैसला जल्दबाजी में नहीं किया गया है बल्कि बहुत सोच-विचार कर किया गया है। इसके बावजूद यदि कुछ राज्य इस फैसले को कुबूल नहीं करना चाहती तो यह उनके अधिकार में है कि वह एफडीआई की इजाजत दें या न दें। इसका विरोध केवल विपक्ष अथवा कांग्रेस को सहयोग दे रही पार्टियां ही नहीं कर रही हैं बल्कि कांग्रेस का एक बड़ा वर्ग भी इसके हक में नहीं है। जाहिर है कि यदि पार्टी के अन्दर से एफडीआई के खिलाफ आवाज उठेगी तो उससे निपटना सरकार और कांग्रेस दोनों के लिए बड़ा चैलेंज होगा। पार्टी के कई वर्गों की ओर से एफडीआई के संबंध में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में प्रभाव को लेकर जो सन्देह व्यक्त किया जा रहा है उसके दबाव में यदि सरकार अपना फैसला बदल देती है तो भी इसे सियासी फायदा कम और विरोधियों को ज्यादा मिलने की आशा है।
Sunday, November 13, 2011
सच गवारा क्यों नहीं होता!
मालेगांव बम धमाकों के आरोप में गिरफ्तार व मुस्लिम युवकों की 6 साल बाद रिहाई पर चर्चा करते हुए दैनिक `अखबारे मशरिक' ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि 2006 में हुए इस धमाके में 37 व्यक्ति मारे गए और सैकड़ों जख्मी हुए। मरने और जख्मी होने वाले सभी मुसलमान थे। प्रशासन ने यह सोचकर कि धमाका करने वाले केवल मुसलमान होते हैं, 9 मुसलमानों को गिरफ्तार कर लिया। इनके घर वाले बराबर यह कहते रहे कि यह लोग बेगुनाह हैं और इनका धमाकों से कुछ लेना-देना नहीं है। लेकिन सरकार ने इनकी फरियाद नहीं सुनी। शुरू में महाराष्ट्र एटीएस ने इस मामले को देखा और उसी के दखल पर इन सबकी गिरफ्तारी हुई थी, बाद में यह केस सीबीआई के हवाले कर दिया जिसके काम करने का तरीका भी एटीएस जैसा ही था। इसी वर्ष असीमानन्द ने इकबाले जुर्म किया कि 2006 में मालेगांव बम धमाके में कट्टरपंथी हिन्दू संगठन का हाथ था। जिसने मालेगांव के अतिरिक्त अजमेर और हैदराबाद की मक्का मस्जिद में भी बम धमाके किए थे। असीमानन्द के कुबूल जुर्म के बाद उर्दू अखबारों और मुस्लिम नेतृत्व ने इन मुस्लिम युवाओं को रिहा कराने का आंदोलन चलाया। इस बाबत महाराष्ट्र मुख्यमंत्री और केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम से मिलकर उन्हें हालात से अवगत कराया गया। शुक्र है कि घटनाओं की रोशनी में सरकार का माइंड सेट बदला है और अब विशाल परिपेक्ष में जांच करने लगी है। सरकार से हमारी मांग है कि वह बम धमाकों में गिरफ्तार मुसलमानों के केसों पर पुनर्विचार करें एवं बम धमाकों में लिप्त हिन्दू संगठनों को सामने लाए और इनके खिलाफ उचित कार्यवाही करे ताकि दुनिया के सामने सही सूरत-ए-हाल आ सके।
`सच गवारा क्यों नहीं होता!' के शीर्षक से दैनिक `जदीद मेल' में अपने सम्पादकीय में उत्तर प्रदेश पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी डीआईजी देवेन्द्र दत्त मिश्रा द्वारा लगाए गए आरोप पर चर्चा करते हुए लिखा है कि वह ईमानदार पुलिस अधिकारी हैं। पुलिस सेवा में आने के बाद से कई जिलों में एसपी रहकर उल्लेखनीय काम किया। इनकी बेहतर सेवा हेतु 1992 में उन्हें आईपीएस का दर्जा मिला। 2006 में उन्हें सैलेक्शन ग्रेड मिला और 2008 में उनको पदोन्नति देकर डीआईजी बना दिया गया। बेहद सादा जिन्दगी गुजारने वाले मिश्रा अचानक पागल कैसे हो गए, यह बात समझ से परे है। वह उसूलों के पक्के थे और ईमानदारी से अपना काम करते थे। शायद यही उनका पागलपन हो कि भ्रष्टाचार के समुद्र में रहकर उन्होंने गोता लगाना गवारा नहीं किया और जब सरकार और उसके अन्दर चल रहे घालमेल को मुंह से बाहर निकालना शुरू कर दिया तो उन्हें मानसिक रूप से पागल करार दे दिया गया। वह तो वही बातें कह रहे थे जो उत्तर प्रदेश सरकार के बारे में मशहूर हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो वर्तमान उत्तर प्रदेश सरकार के बारह मंत्री लोकायुक्त की जांच के घेरे में न होते। वह उसी भ्रष्टाचार को उजागर कर रहे थे जिसके सामने आने पर स्वयं मुख्यमंत्री को मजबूर होकर अपने मंत्रियों को मंत्रिमंडल से हटाना पड़ा है। इसलिए सरकार पर जो आरोप लगाए हैं उसके लिए किसी जांच की जरूरत नहीं है। इस कड़वी सच्चाई को हल्क में उतारने का जब साहस नहीं हुआ तो डीडी मिश्रा को पागल करार दे दिया गया।
सच्चर कमेटी के पांच साल पूरे होने पर दरभंगा (बिहार) के मिल्लत कॉलेज के प्रिंसिपल, डॉ. मुशताक अहमद ने इसकी समीक्षा करते हुए लिखा है कि अब जबकि देश के कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और 2014 में आम चुनाव होंगे तो समय-समय पर मुसलमानों को सुनहरा सपना दिखाया जा रहा है विशेषकर सच्चर कमेटी रिपोर्ट के हवाले से। सच्चर कमेटी के सदस्य सचिव अबु सालेह शरीफ ने भी बीते दिनों इस बात को स्वीकार किया है कि कमेटी जिस मकसद से बनाई गई थी और जिस मेहनत से कमेटी सदस्यों ने इस रिपोर्ट को तैयार किया था इस पर पानी फिर गया है। सच्चर कमेटी रिपोर्ट देश के मुसलमानों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक पिछड़ेपन को दूर करने से अधिक राजनैतिक प्रोपेगंडा ही साबित हुई है। केंद्र सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि इस रिपोर्ट से मुसलमानों को कुछ मिला हो या नहीं लेकिन यह सच्चाई तो सामने आ ही गई कि इस देश में स्वतंत्रता के 64 वर्षों के बाद भी वह दलितों से पिछड़े हैं। नवम्बर 2006 में जब कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सरकार के हवाले की थी तो मुसलमानों को यह आशा हो चली थी कि देर से ही शायद अब उनकी हालत सुधरने वाली है लेकिन जिस तरह से इसे राजनीतिक हथकंडा बनाया गया न केवल चिन्ताजनक है बल्कि उनके साथ एक बड़ा धोखा है।
उर्दू साप्ताहिक `चौथी दुनिया' ने भारत के अटार्नी `जनरल ई. वाहनवती का असली चेहरा' से प्रकाशित लेख में रुबी अरविन ने लिखा है कि वाहनवती ने न केवल 2जी स्पेक्ट्रम में सरकार की किरकिरी कराई है बल्कि वह पहले भी अपने फैसलों पर सरकार को परेशानी में डाल चुके हैं। ताजा मामला समाजवादी पार्टी सुप्रीमों मुलायम सिंह यादव की आमदनी से ज्यादा सम्पत्ति का सीबीआई में दर्ज मामला है। सुप्रीम कोर्ट के वकील विश्वनाथ चतुर्वेदी ने दिल्ली के तिलक मार्ग थाने में अटार्नी जनरल के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है जिसमें कहा गया है कि गुलाम वाहनवती ने सीबीआई पर इस बात के लिए दबाव डाला था कि वह मुलायम सिंह के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में चल रहे आमदनी से ज्यादा सम्पत्ति रखने वाले मामले को रफा-दफा करे। इसके अतिरिक्त वाहनवती ने भोपाल गैस कांड पर भी सरकार की किरकिरी कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। फौजी जनरल की आयु विवाद पर इनकी भूमिका ने इस पद की गरिमा को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया। इन पर यह भी आरोप है कि उन्होंने अपने सुपुत्र ऐसाजी वाहनवती को फायदा पहुंचाने के लिए सरकारी निर्देशों की अवहेलना की। मामला वेदांता नामी कम्पनी से जुड़ा है। गृहमंत्री पी. चिदम्बरम इस कम्पनी के बोर्ड ऑफ डायरेर्क्ट्स में थे। गुलाम वाहनवती के सुपुत्र ऐसाजी वाहनवती इसके विधि विशेषज्ञ हैं। अगस्त 2010 में वेदांता ने घोषणा की कि वह केरन इंडिया लिमिटेड की 60 फीसदी हिस्सेदारी खरीदना चाहते हैं। यह फाइल उस समय के सालिसीटर जनरल वाहनवती के पास सीधे पहुंच गई। मामला गैस और पेट्रोलियम का था जिसका तरीका यह है कि किसी भी राज्य में स्थित पेट्रोल भंडार पर पहले ओएनजीसी का अधिकार होता है लेकिन यहां गुलाम वाहनवती के बेटे की वजह से वेदांता की फाइल सीधी केंद्र तक पहुंच गई। हालांकि इस मसले पर बाद में काफी विवाद भी हुआ और वाहनवती एवं कानून मंत्रालय को इस बात पर सफाई भी देनी पड़ी।
`सच गवारा क्यों नहीं होता!' के शीर्षक से दैनिक `जदीद मेल' में अपने सम्पादकीय में उत्तर प्रदेश पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी डीआईजी देवेन्द्र दत्त मिश्रा द्वारा लगाए गए आरोप पर चर्चा करते हुए लिखा है कि वह ईमानदार पुलिस अधिकारी हैं। पुलिस सेवा में आने के बाद से कई जिलों में एसपी रहकर उल्लेखनीय काम किया। इनकी बेहतर सेवा हेतु 1992 में उन्हें आईपीएस का दर्जा मिला। 2006 में उन्हें सैलेक्शन ग्रेड मिला और 2008 में उनको पदोन्नति देकर डीआईजी बना दिया गया। बेहद सादा जिन्दगी गुजारने वाले मिश्रा अचानक पागल कैसे हो गए, यह बात समझ से परे है। वह उसूलों के पक्के थे और ईमानदारी से अपना काम करते थे। शायद यही उनका पागलपन हो कि भ्रष्टाचार के समुद्र में रहकर उन्होंने गोता लगाना गवारा नहीं किया और जब सरकार और उसके अन्दर चल रहे घालमेल को मुंह से बाहर निकालना शुरू कर दिया तो उन्हें मानसिक रूप से पागल करार दे दिया गया। वह तो वही बातें कह रहे थे जो उत्तर प्रदेश सरकार के बारे में मशहूर हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो वर्तमान उत्तर प्रदेश सरकार के बारह मंत्री लोकायुक्त की जांच के घेरे में न होते। वह उसी भ्रष्टाचार को उजागर कर रहे थे जिसके सामने आने पर स्वयं मुख्यमंत्री को मजबूर होकर अपने मंत्रियों को मंत्रिमंडल से हटाना पड़ा है। इसलिए सरकार पर जो आरोप लगाए हैं उसके लिए किसी जांच की जरूरत नहीं है। इस कड़वी सच्चाई को हल्क में उतारने का जब साहस नहीं हुआ तो डीडी मिश्रा को पागल करार दे दिया गया।
सच्चर कमेटी के पांच साल पूरे होने पर दरभंगा (बिहार) के मिल्लत कॉलेज के प्रिंसिपल, डॉ. मुशताक अहमद ने इसकी समीक्षा करते हुए लिखा है कि अब जबकि देश के कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और 2014 में आम चुनाव होंगे तो समय-समय पर मुसलमानों को सुनहरा सपना दिखाया जा रहा है विशेषकर सच्चर कमेटी रिपोर्ट के हवाले से। सच्चर कमेटी के सदस्य सचिव अबु सालेह शरीफ ने भी बीते दिनों इस बात को स्वीकार किया है कि कमेटी जिस मकसद से बनाई गई थी और जिस मेहनत से कमेटी सदस्यों ने इस रिपोर्ट को तैयार किया था इस पर पानी फिर गया है। सच्चर कमेटी रिपोर्ट देश के मुसलमानों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक पिछड़ेपन को दूर करने से अधिक राजनैतिक प्रोपेगंडा ही साबित हुई है। केंद्र सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि इस रिपोर्ट से मुसलमानों को कुछ मिला हो या नहीं लेकिन यह सच्चाई तो सामने आ ही गई कि इस देश में स्वतंत्रता के 64 वर्षों के बाद भी वह दलितों से पिछड़े हैं। नवम्बर 2006 में जब कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सरकार के हवाले की थी तो मुसलमानों को यह आशा हो चली थी कि देर से ही शायद अब उनकी हालत सुधरने वाली है लेकिन जिस तरह से इसे राजनीतिक हथकंडा बनाया गया न केवल चिन्ताजनक है बल्कि उनके साथ एक बड़ा धोखा है।
उर्दू साप्ताहिक `चौथी दुनिया' ने भारत के अटार्नी `जनरल ई. वाहनवती का असली चेहरा' से प्रकाशित लेख में रुबी अरविन ने लिखा है कि वाहनवती ने न केवल 2जी स्पेक्ट्रम में सरकार की किरकिरी कराई है बल्कि वह पहले भी अपने फैसलों पर सरकार को परेशानी में डाल चुके हैं। ताजा मामला समाजवादी पार्टी सुप्रीमों मुलायम सिंह यादव की आमदनी से ज्यादा सम्पत्ति का सीबीआई में दर्ज मामला है। सुप्रीम कोर्ट के वकील विश्वनाथ चतुर्वेदी ने दिल्ली के तिलक मार्ग थाने में अटार्नी जनरल के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है जिसमें कहा गया है कि गुलाम वाहनवती ने सीबीआई पर इस बात के लिए दबाव डाला था कि वह मुलायम सिंह के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में चल रहे आमदनी से ज्यादा सम्पत्ति रखने वाले मामले को रफा-दफा करे। इसके अतिरिक्त वाहनवती ने भोपाल गैस कांड पर भी सरकार की किरकिरी कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। फौजी जनरल की आयु विवाद पर इनकी भूमिका ने इस पद की गरिमा को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया। इन पर यह भी आरोप है कि उन्होंने अपने सुपुत्र ऐसाजी वाहनवती को फायदा पहुंचाने के लिए सरकारी निर्देशों की अवहेलना की। मामला वेदांता नामी कम्पनी से जुड़ा है। गृहमंत्री पी. चिदम्बरम इस कम्पनी के बोर्ड ऑफ डायरेर्क्ट्स में थे। गुलाम वाहनवती के सुपुत्र ऐसाजी वाहनवती इसके विधि विशेषज्ञ हैं। अगस्त 2010 में वेदांता ने घोषणा की कि वह केरन इंडिया लिमिटेड की 60 फीसदी हिस्सेदारी खरीदना चाहते हैं। यह फाइल उस समय के सालिसीटर जनरल वाहनवती के पास सीधे पहुंच गई। मामला गैस और पेट्रोलियम का था जिसका तरीका यह है कि किसी भी राज्य में स्थित पेट्रोल भंडार पर पहले ओएनजीसी का अधिकार होता है लेकिन यहां गुलाम वाहनवती के बेटे की वजह से वेदांता की फाइल सीधी केंद्र तक पहुंच गई। हालांकि इस मसले पर बाद में काफी विवाद भी हुआ और वाहनवती एवं कानून मंत्रालय को इस बात पर सफाई भी देनी पड़ी।
Friday, October 28, 2011
`पेड न्यूज पर चुनाव आयोग की ऐतिहासिक पहल'
केंद्र सरकार द्वारा 1400 आईपीएस भर्ती के लिए डीएसपी और सेना के मेजर/कैप्टन रैंक के अधिकारी ही भाग ले सकेंगे, की प्रधानमंत्री कार्यालय के सुझाव पर मुस्लिम संगठनों ने आजित करते हुए इसे मुसलमानों के हक पर संवैधानिक डाका डालने के बराबर बतया है। दैनिक `सहाफत' ने जकात फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. सैयद जफर महमूद, जमाअत इस्लामी हिन्द अध्यक्ष मौलाना सैयद जलालुद्दीन उमरी, दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस राजेन्द्र सच्चर और ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस के कार्यवाहक अध्यक्ष एवं पाक्षिक अंग्रेजी `मिल्ली गजट' के सम्पादक डॉ. जफरुल इस्लाम खां के संयुक्त बयान को प्रकाशित कर इनके विचारों को प्रमुखता से उजागर किया है। बयान के अनुसार इस तरह की भर्ती के नतीजे में आईपीएस में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व अगले तीन-चार दशकों के लिए और भी कम हो जाएगा क्योंकि सशस्त्र बल में मुसलमानों का अनुपात आईपीएस से भी कम है और डीएसपी के पद पर मुसलमान गिनती के हैं। इंडियन पुलिस सर्विस और अन्य सिविल सर्विस में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व केवल 2.3 फीसदी है जबकि 2001 की जनगणना के अनुसार इनका अनुपात 13.4 फीसदी है। नए आईपीएस अधिकारियों की भर्ती के लिए ओपन परीक्षा न लेने का फैसला मुसलमानों के हित के खिलाफ होगी। इस फैसले से सरकारी रोजगार के समान अवसर के संवैधानिक हक की अवहेलना होती है जिसकी जमानत धारा 16 में दी गई है। जस्टिस सच्चर के अनुसार यह संविधान की धारा 15 के भी खिलाफ है जिसमें धर्म के आधार पर सरकार की ओर से भेदभाव वर्जित है।
`आडवाणी की आखिरी यात्रा' के शीर्षक से साप्ताहिक `नई दुनिया' ने पटना से अपने विशेष संवाददाता के हवाले से लिखा है कि आडवाणी जी गुजरात के बजाय बिहार को नमूना बता रहे हैं, मोदी के बजाय नीतीश कुमार को आइडियल मुख्यमंत्री कह रहे हैं, जो मोदी को अपने राज्य में घुसने नहीं देते और साफ-साफ कह देते हैं कि बिहार में इसका अपना मोदी मौजूद है। किसी अन्य मोदी की जरूरत नहीं है। आडवाणी की यात्रा गुजरात से शुरू हुआ करती थी लेकिन यह उनकी पहली यात्रा है जो पूरब से पश्चिम को हो रही है। यह देश के सोशलिस्ट नेता के जन्म स्थल से नई दिल्ली की ओर शुरू की गई है और इसको हरी झंडी जय प्रकाश नारायण के चेले नीतीश कुमार ने दिखाई है। सोमनाथ से अयोध्या की रथयात्राओं के लिए बदनाम आडवाणी की यात्रा हर बार देश में सांप्रदायिक वातावरण को खराब करती रही है लेकिन पहली बार वह भ्रष्टाचार जैसे गैर सांप्रदायिक मुद्दे पर यात्रा कर रहे हैं। विशेषज्ञों का यह विचार गलत नहीं है कि यह आडवाणी की आखिरी यात्रा है, उनके सामने करो या मरो की चुनौती है।
`पेड न्यूज पर चुनाव आयोग की ऐतिहासिक पहल' के शीर्षक से दैनिक `प्रताप' के सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश के दसौली विधानसभा क्षेत्र के विधायक उरमिलेश यादव पर तीन वर्ष तक चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगा दी है। आयोग ने अपने फैसले में कहा कि पेड न्यूज मामले पर आरोप साबित होने के चलते यादव पर 20 अक्तूबर 2011 से 19 अक्तूबर 2014 तक चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगा दी है। ऐसी स्थिति में उर्मिलेश यादव 2012 में होने वाले विधानसभा चुनाव में भाग नहीं ले सकेंगी। इसी सीट से योगेन्द्र कुमार ने भी इनके खिलाफ चुनाव लड़ा था। उन्होंने एक जुलाई 2010 को चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज कराई कि चुनाव से ठीक पहले 17 अप्रैल 2007 को उर्मिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश के दो बड़े हिन्दी दैनिक में अपने हक में समाचार प्रकाशित कराए हैं। इसी के साथ उन्होंने यह शिकायत प्रेस परिषद में भी दर्ज कराई थी। चुनाव आयोग ने इस मामले की जांच की और दोनों पक्षों की दलीलें भी सुनीं और तफ्तीश के बाद आयोग ने पाया कि उर्मिलेश ने चुनाव से ठीक पहले समाचार प्रकाशित कराने के लिए 21250 रुपये खर्च किए लेकिन इस खर्च को चुनावी खर्च में नहीं दिखाया गया था। उम्मीदवार को अपना प्रचार करने का पूरा हक है लेकिन उसे खर्च दिखाना पड़ेगा। ऐसी खबरें प्रकाशित करने वाले अखबारों और इलैक्ट्रॉनिक मीडिया को भी आखिर में यह लिखना और दिखाना होगा कि यह विज्ञापन है और वह भी पेड विज्ञापन। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण, झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा पर भी पेड न्यूज के आरोप हैं। इन दोनों नेताओं को भी चुनाव आयोग द्वारा नोटिस दिया जा चुका है। दैनिक `जदीद खबर' ने `मोदी के खिलाफ सुबूत' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में चर्चा करते हुए लिखा है कि गुजरात की जमीन पर मुसलमानों के नरसंहार में मोदी किस हद तक शरीक थे, इसका अभी तक कोई दस्तावेजी सुबूत सामने नहीं आ सका है। इस बाबत जकिया जाफरी की अपील पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित विशेष तफ्तीशी टीम ने भी नरेन्द्र मोदी के खिलफ ठोस सुबूत उपलब्ध करने से इंकार कर दिया था और ऐसा महसूस होने लगा था कि इतिहास के इस बड़े नरसंहार के सबसे बड़े अपराधी पर कोई आंच नहीं आएगी और वह अपनी गर्दन में बेगुनाही का हार डलकर इसी तरह इंसाफ और कानून का मजाक उड़ाता रहेगा। लेकिन अब अदालत के एक निरपेक्ष सलाहकार ने अपनी जांच में यह रहस्योद्घाटन किया है कि नरेन्द्र मोदी के खिलाफ मुकदमा चलाने के सुबूत मौजूद हैं। इन सुबूतों की बुनियाद पर मोदी के खिलाफ संगीन मुकदमा तो कायम नहीं हो पाएगा लेकिन सांप्रदायिक घृणा, भड़काऊ और जनता को हंगामे पर उसकाने जैसी धारा के तहत मुकदमा कायम हो सकता है। यदि ट्रायल कोर्ट ने विशेष वकील रामचन्द्रन के विचार को स्वीकार कर लिया तो मोदी के खिलाफ मुकदमे की कार्यवाही जल्द शुरू होगी।
`मोदी के खिलाफ शिकंजा' के शीर्षक से दैनिक `हिन्दुस्तान एक्सप्रेस' ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी एक बार फिर मुश्किल में दिखाई दे रहे हैं क्योंकि इनके खिलाफ धारा 153 और 163 के तहत मुकदमा चलाने की पैरवी कर दी गई है, इसके बावजूद यह नहीं कहा जा सकता कि गुजरात दंगों के मामले में मोदी के खिलाफ शिकंजा कसा ही जाएगा लेकिन अदालत के सलाहकार ने यह महसूस कर स्पष्ट कर दिया है कि मोदी का गुनाह माफी लायक नहीं है। इसके बावजूद एक बार फिर यह बात साफ हो गई है कि मोदी के लिए यह रिपोर्ट भारी पड़ सकती है। कल तक मोदी इस बात पर गर्व करते रहे हैं कि सुबूत न होने के आधार पर उन्हें क्लीन चिट मिल सकती है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की गठित कमेटी की रिपोर्ट की रोशनी में यह बात उभरकर सामने आ गई है कि मोदी को राहत दिया जाना अब संभव नहीं है। देखना यह है कि 10 वर्षों से इंसाफ की राह देख रहे पीड़ितों को कब इंसाफ मिलता है। `मुसलमानों के लिए आरक्षण दुश्वार, कांग्रेस का मायूस कुन जवाब' के शीर्षक से दैनिक `अखबारे मशरिक' ने कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अलवी के हवाले से लिखा है कि मुसलमानों के लिए आरक्षण का मामला बहुत गंभीर है जब इस मसले पर कोई फैसला लिया जाएगा तो मीडिया को सूचित कर दिया जाएगा। कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में मुसलमानों को आरक्षण देने का वादा किया था और कहा था कि केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के मॉडल पर विचार किया जाएगा। राशिद अलवी ने कहा कि घोषणा पत्र में बहुत सारे वायदे किए गए हैं। मुस्लिम आरक्षण भी इन वायदों में से एक है।
`आडवाणी की आखिरी यात्रा' के शीर्षक से साप्ताहिक `नई दुनिया' ने पटना से अपने विशेष संवाददाता के हवाले से लिखा है कि आडवाणी जी गुजरात के बजाय बिहार को नमूना बता रहे हैं, मोदी के बजाय नीतीश कुमार को आइडियल मुख्यमंत्री कह रहे हैं, जो मोदी को अपने राज्य में घुसने नहीं देते और साफ-साफ कह देते हैं कि बिहार में इसका अपना मोदी मौजूद है। किसी अन्य मोदी की जरूरत नहीं है। आडवाणी की यात्रा गुजरात से शुरू हुआ करती थी लेकिन यह उनकी पहली यात्रा है जो पूरब से पश्चिम को हो रही है। यह देश के सोशलिस्ट नेता के जन्म स्थल से नई दिल्ली की ओर शुरू की गई है और इसको हरी झंडी जय प्रकाश नारायण के चेले नीतीश कुमार ने दिखाई है। सोमनाथ से अयोध्या की रथयात्राओं के लिए बदनाम आडवाणी की यात्रा हर बार देश में सांप्रदायिक वातावरण को खराब करती रही है लेकिन पहली बार वह भ्रष्टाचार जैसे गैर सांप्रदायिक मुद्दे पर यात्रा कर रहे हैं। विशेषज्ञों का यह विचार गलत नहीं है कि यह आडवाणी की आखिरी यात्रा है, उनके सामने करो या मरो की चुनौती है।
`पेड न्यूज पर चुनाव आयोग की ऐतिहासिक पहल' के शीर्षक से दैनिक `प्रताप' के सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश के दसौली विधानसभा क्षेत्र के विधायक उरमिलेश यादव पर तीन वर्ष तक चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगा दी है। आयोग ने अपने फैसले में कहा कि पेड न्यूज मामले पर आरोप साबित होने के चलते यादव पर 20 अक्तूबर 2011 से 19 अक्तूबर 2014 तक चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगा दी है। ऐसी स्थिति में उर्मिलेश यादव 2012 में होने वाले विधानसभा चुनाव में भाग नहीं ले सकेंगी। इसी सीट से योगेन्द्र कुमार ने भी इनके खिलाफ चुनाव लड़ा था। उन्होंने एक जुलाई 2010 को चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज कराई कि चुनाव से ठीक पहले 17 अप्रैल 2007 को उर्मिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश के दो बड़े हिन्दी दैनिक में अपने हक में समाचार प्रकाशित कराए हैं। इसी के साथ उन्होंने यह शिकायत प्रेस परिषद में भी दर्ज कराई थी। चुनाव आयोग ने इस मामले की जांच की और दोनों पक्षों की दलीलें भी सुनीं और तफ्तीश के बाद आयोग ने पाया कि उर्मिलेश ने चुनाव से ठीक पहले समाचार प्रकाशित कराने के लिए 21250 रुपये खर्च किए लेकिन इस खर्च को चुनावी खर्च में नहीं दिखाया गया था। उम्मीदवार को अपना प्रचार करने का पूरा हक है लेकिन उसे खर्च दिखाना पड़ेगा। ऐसी खबरें प्रकाशित करने वाले अखबारों और इलैक्ट्रॉनिक मीडिया को भी आखिर में यह लिखना और दिखाना होगा कि यह विज्ञापन है और वह भी पेड विज्ञापन। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण, झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा पर भी पेड न्यूज के आरोप हैं। इन दोनों नेताओं को भी चुनाव आयोग द्वारा नोटिस दिया जा चुका है। दैनिक `जदीद खबर' ने `मोदी के खिलाफ सुबूत' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में चर्चा करते हुए लिखा है कि गुजरात की जमीन पर मुसलमानों के नरसंहार में मोदी किस हद तक शरीक थे, इसका अभी तक कोई दस्तावेजी सुबूत सामने नहीं आ सका है। इस बाबत जकिया जाफरी की अपील पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित विशेष तफ्तीशी टीम ने भी नरेन्द्र मोदी के खिलफ ठोस सुबूत उपलब्ध करने से इंकार कर दिया था और ऐसा महसूस होने लगा था कि इतिहास के इस बड़े नरसंहार के सबसे बड़े अपराधी पर कोई आंच नहीं आएगी और वह अपनी गर्दन में बेगुनाही का हार डलकर इसी तरह इंसाफ और कानून का मजाक उड़ाता रहेगा। लेकिन अब अदालत के एक निरपेक्ष सलाहकार ने अपनी जांच में यह रहस्योद्घाटन किया है कि नरेन्द्र मोदी के खिलाफ मुकदमा चलाने के सुबूत मौजूद हैं। इन सुबूतों की बुनियाद पर मोदी के खिलाफ संगीन मुकदमा तो कायम नहीं हो पाएगा लेकिन सांप्रदायिक घृणा, भड़काऊ और जनता को हंगामे पर उसकाने जैसी धारा के तहत मुकदमा कायम हो सकता है। यदि ट्रायल कोर्ट ने विशेष वकील रामचन्द्रन के विचार को स्वीकार कर लिया तो मोदी के खिलाफ मुकदमे की कार्यवाही जल्द शुरू होगी।
`मोदी के खिलाफ शिकंजा' के शीर्षक से दैनिक `हिन्दुस्तान एक्सप्रेस' ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी एक बार फिर मुश्किल में दिखाई दे रहे हैं क्योंकि इनके खिलाफ धारा 153 और 163 के तहत मुकदमा चलाने की पैरवी कर दी गई है, इसके बावजूद यह नहीं कहा जा सकता कि गुजरात दंगों के मामले में मोदी के खिलाफ शिकंजा कसा ही जाएगा लेकिन अदालत के सलाहकार ने यह महसूस कर स्पष्ट कर दिया है कि मोदी का गुनाह माफी लायक नहीं है। इसके बावजूद एक बार फिर यह बात साफ हो गई है कि मोदी के लिए यह रिपोर्ट भारी पड़ सकती है। कल तक मोदी इस बात पर गर्व करते रहे हैं कि सुबूत न होने के आधार पर उन्हें क्लीन चिट मिल सकती है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की गठित कमेटी की रिपोर्ट की रोशनी में यह बात उभरकर सामने आ गई है कि मोदी को राहत दिया जाना अब संभव नहीं है। देखना यह है कि 10 वर्षों से इंसाफ की राह देख रहे पीड़ितों को कब इंसाफ मिलता है। `मुसलमानों के लिए आरक्षण दुश्वार, कांग्रेस का मायूस कुन जवाब' के शीर्षक से दैनिक `अखबारे मशरिक' ने कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अलवी के हवाले से लिखा है कि मुसलमानों के लिए आरक्षण का मामला बहुत गंभीर है जब इस मसले पर कोई फैसला लिया जाएगा तो मीडिया को सूचित कर दिया जाएगा। कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में मुसलमानों को आरक्षण देने का वादा किया था और कहा था कि केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के मॉडल पर विचार किया जाएगा। राशिद अलवी ने कहा कि घोषणा पत्र में बहुत सारे वायदे किए गए हैं। मुस्लिम आरक्षण भी इन वायदों में से एक है।
Wednesday, October 26, 2011
मुस्लिम महापंचायत की अनॉप-शनॉप
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय संस्थापक सर सैयद अहमद के जन्म दिवस पर 17 अक्तूबर 2011 को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में आयोजित समारोह में केंद्रीय कानून एवं इंसाफ मंत्री सलमान खुर्शीद को शरीक नहीं होने दिया गया, पर चर्चा करते हुए दैनिक `अखबारे मशरिक' ने अखबार की पहली खबर बनाई है। अलीगढ़ के संवाददाता ए. समन सवॉ के हवाले से अखबार ने लिखा है कि सर सैयद का 194वां जन्म दिवस पारम्परिक जोश खरोश से मनाया जाना था। इस कार्यक्रम में मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति ने सलमान खुर्शीद को विशेष मेहमान क sतौर पर बुलाया था लेकिन उनका सपना एक डरावने ख्वाब की तरह बिखर गया। छात्र और शिक्षक संघ ने इसका विरोध करते हुए पहले ही घोषणा कर दी थी कि वह किसी भी कीमत पर सलमान खुर्शीद को इस समारोह में शरीक नहीं होने देंगे। सर सैयद कार्यक्रम शाम चार बजे शुरू होना था लेकिन वीसी लाज पर छात्र और शिक्षकों की भीड़ काले झंडे लिए हुए सलमान खुर्शीद मुर्दाबाद और वाइस चांसलर मुर्दाबाद के नारे लगा रही थी। जिला और प्रशासन ने स्थिति को देखते हुए केंद्रीय मंत्री को एक होटल में ठहरा दिया और इनको यूनिवर्सिटी में दाखिल होने की इजाजत नहीं दी। जिसके नतीजे में साम साढ़े छह बजे अर्थात् दो घंटे बाद वाइस चांसलर और रजिस्ट्रार किसी गोपनीय रास्ते से समारोह स्थल पर आए जहां रजिस्ट्रार ने बताया कि पुलिस ने सलमान खुर्शीद को यहां आने से रोक दिया है।
आल इंडिया उलेमा मशाएख के बैनर तले मौलाना मोहम्मद अशरफ द्वारा मुसलमानों के एक सप्रदाय को निशाना बनाए जाने पर दैनिक `हमारा समाज' में आमिर सलीम खां ने अपनी विशेष रिपोर्ट में लिखा है कि एमएलबी की सीट और कुछ विधानसभा टिकटों के लिए मौलाना मिल्लत में फूट डाल रहे हैं इसके लिए उन्होंने उत्तर प्रदेश की एक अहम राजनैतिक पार्टी के बड़े नेता से गोपनीय संधि भी की है। कुर्सी और कुछ टिकटों के बदले पूरे मुस्लिम समुदाय को बांटने की नीति अपना सकते हैं। गत दिनों दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस और फिर बाद में बरेली की महापंचायत को इसी पार्टी ने स्पांसर किया था। मौलाना अशरफ ने प्रेस कांफ्रेंस और महापंचायत में मिल्लत इस्लामिया के संबंध में जो विचार जाहिर किए हैं उससे सुन्नी उलेमा भी हैरान हैं। इस बात से हैरान नहीं होना चाहिए कि वह राजनैतिक कद बढ़ाने के लिए वहाबी विचारधारा के खिलाफ काम कर रहे हैं। सूत्रों के अनुसार प्रेस कांफ्रेंस के लिए दिल्ली का चयन भी इन नेता जी की गोपनीय बैठक और निर्देश का नतीजा था क्योंकि दिल्ली से जो बात चलेगी वह दूर तक चलेगी। दूसरी ओर मुरादाबाद में भी हुई महापंचायत में भी वही बातें सामने आई हैं जिससे मुसलमानों में काफी गुस्सा पाया जा रहा है।
मुरादाबाद की महापंचायत में वक्ताओं द्वारा अनॉप-शनॉप बातें करने पर मुसलमानों द्वारा तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की जारी है। दैनिक `सहाफत' ने अपनी पहली खबर में जमीअत उलेमा हिन्द (अरशद ग्रुप) के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी, दिल्ली उर्दू अकादमी के वाइस चेयरमैन प्रोफेसर अखतारुल वासे, जमाअत इस्लामी हिन्द सचिव मौलाना रफीक कासमी, जमीअत अहले हदीस के महासचिव मौलाना असगर इमाम मेहंदी खलफी और मुस्लिम मजलिस अमल के महासचिव राहत मदमूद चौधरी सहित अनेक बुद्धिजीवियों के विचारों को प्रमुखता से प्रकाशित कर उनकी निन्दा की है और उन्हें कुरआन एवं हदीस की शिक्षा से अनभिज्ञ बताया है। मुरादाबाद की मुस्लिम महापंचायत में जिस तरह मुसलमानों को सुन्नी वहाबी में विभाजित कर वहाबी सप्रदाय पर आरोप लगाया गया है, वह बिल्कुल बेबुनियाद हैं। राहत महमूद चौधरी के अनुसार इस तरह का आरोप तो आरएसएस, भाजपा, शिवसेना, बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद भी आज तक नहीं लगा सकी है। उन्होंने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया कि इस महापंचायत में सऊदी अरब में कब्रिस्तान और मस्जिद की अवमानना का तो जिक्र किया गया लेकिन देश में वीरान पड़ी मस्जिदों और बाबरी मस्जिद तक का कोई जिक्र नहीं किया गया।
मौलाना अरशद मदनी ने महापंचयात के आरोप को नकारते हुए स्पष्ट किया कि इस्लाम दुनिया में मुसलमानों को जोड़ने के लिए आया है, तोड़ने के लिए नहीं। इसलिए दारुल उलूम देवबंद से कभी कोई आवाज मिल्लत के किसी सप्रदाय को तोड़ने के लिए नहीं उठाई जाती है। जोड़ने की यह कोशिश 150 साल से जारी है और हम इसमें पूरी तरह कामयाब हैं।
`सूचना अधिकार पर तलवार' के शीर्षक से दैनिक `जदीद मेल' ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि सूचना का अधिकार एक बार फिर चर्चा में है और इसके कुछ बिन्दुओं पर फिर से विचार-विमर्श की बात की जा रही है। इस बार यह चिन्ता स्वयं प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा की ओर से की जा रही है। उनका कहना है कि इस कानून का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि इसके द्वारा ईमानदारी और सही ढंग से काम करने वाले लोग परेशान हों। प्रधानमंत्री की चिन्ता इसलिए है कि गत दिनों आरटीआई कार्यकर्ता द्वारा इस कानून के तहत प्रधानमंत्री कार्यालय से वह पत्र हासिल कर लिया गया था जो 2जी मामले में वित्त मंत्रालय ने उन्हें लिखा था जिसके बाद केंद्र सरकार संकट में पड़ गई थी। इसके अतिरिक्त जितने बड़े घोटाले सामने आए हैं उसमें सूचना अधिकार कानून का बड़ा योगदान है इसलिए सरकार अब इस कानून को कमजोर करना चाहती है। नौकरशाही व्यवस्था पर लगाम कसने वाला यह कानून अब सरकार के निशाने पर है।
दैनिक `प्रताप' में सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने `अन्ना और उनकी टीम पर चौतरफा हमला' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखा है कि अन्ना हजारे और उनकी टीम गत कुछ दिनों से चारों ओर से समस्याओं से घिरती जा रही है। एक-एक करके कई समस्याएं खड़ी हो गई हैं। उत्तर प्रदेश में अन्ना का संदेश लेकर दौरा कर रहे उनके सिपाहसालार अरविन्द केजरीवाल पर हमला हुआ। टीम अन्ना के दो वरिष्ठ सदस्य पीवी राजगोपाल और राजेन्द्र सिंह ने मुहिम के राजनैतिक रंग लेने पर कोर कमेटी से त्यागपत्र दे दिया है। कांग्रेस से सुलह कराने के प्रयासों पर उस समय पानी फिर गया जब समय देकर राहुल गांधी अन्ना के प्रतिनिधियों से नहीं मिले। रामदेव ने प्रशांत भूषण के खिलाफ मामला दर्ज करने की बात कही। अन्त में टीम अन्ना को एक झटका उस समय लगा जब सुप्रीम कोर्ट ने अन्ना के हिन्द स्वराज ट्रस्ट को मिलने वाले सरकारी पैसे का गलत इस्तेमाल की छानबीन के लिए सीबीआई की अर्जी को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया। अन्ना खुद तो बेदाग हैं लेकिन उनके साथी निश्चित रूप से अन्ना आंदोलन को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
आल इंडिया उलेमा मशाएख के बैनर तले मौलाना मोहम्मद अशरफ द्वारा मुसलमानों के एक सप्रदाय को निशाना बनाए जाने पर दैनिक `हमारा समाज' में आमिर सलीम खां ने अपनी विशेष रिपोर्ट में लिखा है कि एमएलबी की सीट और कुछ विधानसभा टिकटों के लिए मौलाना मिल्लत में फूट डाल रहे हैं इसके लिए उन्होंने उत्तर प्रदेश की एक अहम राजनैतिक पार्टी के बड़े नेता से गोपनीय संधि भी की है। कुर्सी और कुछ टिकटों के बदले पूरे मुस्लिम समुदाय को बांटने की नीति अपना सकते हैं। गत दिनों दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस और फिर बाद में बरेली की महापंचायत को इसी पार्टी ने स्पांसर किया था। मौलाना अशरफ ने प्रेस कांफ्रेंस और महापंचायत में मिल्लत इस्लामिया के संबंध में जो विचार जाहिर किए हैं उससे सुन्नी उलेमा भी हैरान हैं। इस बात से हैरान नहीं होना चाहिए कि वह राजनैतिक कद बढ़ाने के लिए वहाबी विचारधारा के खिलाफ काम कर रहे हैं। सूत्रों के अनुसार प्रेस कांफ्रेंस के लिए दिल्ली का चयन भी इन नेता जी की गोपनीय बैठक और निर्देश का नतीजा था क्योंकि दिल्ली से जो बात चलेगी वह दूर तक चलेगी। दूसरी ओर मुरादाबाद में भी हुई महापंचायत में भी वही बातें सामने आई हैं जिससे मुसलमानों में काफी गुस्सा पाया जा रहा है।
मुरादाबाद की महापंचायत में वक्ताओं द्वारा अनॉप-शनॉप बातें करने पर मुसलमानों द्वारा तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की जारी है। दैनिक `सहाफत' ने अपनी पहली खबर में जमीअत उलेमा हिन्द (अरशद ग्रुप) के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी, दिल्ली उर्दू अकादमी के वाइस चेयरमैन प्रोफेसर अखतारुल वासे, जमाअत इस्लामी हिन्द सचिव मौलाना रफीक कासमी, जमीअत अहले हदीस के महासचिव मौलाना असगर इमाम मेहंदी खलफी और मुस्लिम मजलिस अमल के महासचिव राहत मदमूद चौधरी सहित अनेक बुद्धिजीवियों के विचारों को प्रमुखता से प्रकाशित कर उनकी निन्दा की है और उन्हें कुरआन एवं हदीस की शिक्षा से अनभिज्ञ बताया है। मुरादाबाद की मुस्लिम महापंचायत में जिस तरह मुसलमानों को सुन्नी वहाबी में विभाजित कर वहाबी सप्रदाय पर आरोप लगाया गया है, वह बिल्कुल बेबुनियाद हैं। राहत महमूद चौधरी के अनुसार इस तरह का आरोप तो आरएसएस, भाजपा, शिवसेना, बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद भी आज तक नहीं लगा सकी है। उन्होंने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया कि इस महापंचायत में सऊदी अरब में कब्रिस्तान और मस्जिद की अवमानना का तो जिक्र किया गया लेकिन देश में वीरान पड़ी मस्जिदों और बाबरी मस्जिद तक का कोई जिक्र नहीं किया गया।
मौलाना अरशद मदनी ने महापंचयात के आरोप को नकारते हुए स्पष्ट किया कि इस्लाम दुनिया में मुसलमानों को जोड़ने के लिए आया है, तोड़ने के लिए नहीं। इसलिए दारुल उलूम देवबंद से कभी कोई आवाज मिल्लत के किसी सप्रदाय को तोड़ने के लिए नहीं उठाई जाती है। जोड़ने की यह कोशिश 150 साल से जारी है और हम इसमें पूरी तरह कामयाब हैं।
`सूचना अधिकार पर तलवार' के शीर्षक से दैनिक `जदीद मेल' ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि सूचना का अधिकार एक बार फिर चर्चा में है और इसके कुछ बिन्दुओं पर फिर से विचार-विमर्श की बात की जा रही है। इस बार यह चिन्ता स्वयं प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा की ओर से की जा रही है। उनका कहना है कि इस कानून का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि इसके द्वारा ईमानदारी और सही ढंग से काम करने वाले लोग परेशान हों। प्रधानमंत्री की चिन्ता इसलिए है कि गत दिनों आरटीआई कार्यकर्ता द्वारा इस कानून के तहत प्रधानमंत्री कार्यालय से वह पत्र हासिल कर लिया गया था जो 2जी मामले में वित्त मंत्रालय ने उन्हें लिखा था जिसके बाद केंद्र सरकार संकट में पड़ गई थी। इसके अतिरिक्त जितने बड़े घोटाले सामने आए हैं उसमें सूचना अधिकार कानून का बड़ा योगदान है इसलिए सरकार अब इस कानून को कमजोर करना चाहती है। नौकरशाही व्यवस्था पर लगाम कसने वाला यह कानून अब सरकार के निशाने पर है।
दैनिक `प्रताप' में सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने `अन्ना और उनकी टीम पर चौतरफा हमला' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखा है कि अन्ना हजारे और उनकी टीम गत कुछ दिनों से चारों ओर से समस्याओं से घिरती जा रही है। एक-एक करके कई समस्याएं खड़ी हो गई हैं। उत्तर प्रदेश में अन्ना का संदेश लेकर दौरा कर रहे उनके सिपाहसालार अरविन्द केजरीवाल पर हमला हुआ। टीम अन्ना के दो वरिष्ठ सदस्य पीवी राजगोपाल और राजेन्द्र सिंह ने मुहिम के राजनैतिक रंग लेने पर कोर कमेटी से त्यागपत्र दे दिया है। कांग्रेस से सुलह कराने के प्रयासों पर उस समय पानी फिर गया जब समय देकर राहुल गांधी अन्ना के प्रतिनिधियों से नहीं मिले। रामदेव ने प्रशांत भूषण के खिलाफ मामला दर्ज करने की बात कही। अन्त में टीम अन्ना को एक झटका उस समय लगा जब सुप्रीम कोर्ट ने अन्ना के हिन्द स्वराज ट्रस्ट को मिलने वाले सरकारी पैसे का गलत इस्तेमाल की छानबीन के लिए सीबीआई की अर्जी को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया। अन्ना खुद तो बेदाग हैं लेकिन उनके साथी निश्चित रूप से अन्ना आंदोलन को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
Friday, October 14, 2011
अन्ना हजारे का असली चेहरा
बीते सप्ताह विभिन्न राजनैतिक और सामाजिक घटनाओं सहित अनेक ज्वलंत मुद्दों पर उर्दू अखबारों ने अपना पक्ष रखा। अन्ना हजारे की मुहिम का विशेष रूप से नोटिस लिया। लगभग सभी उर्दू अखबारों ने इस पर सम्पादकीय लिखे और लेख प्रकाशित किए। हैदराबाद से प्रकाशित दैनिक `मुनसिफ' ने `अन्ना हजारे की कांग्रेस विरोधी अपील' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में चर्चा करते हुए लिखा है कि अन्ना हजारे की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम पर जनता की सकारात्मक प्रतिक्रिया कोई ढकी छिपी बात नहीं है। जन लोकपाल बिल के मंजूर किए न किए जाने पर कांग्रेस को वोट न देने की अपील का कांग्रेस गंभीरता से नोटिस ले। यदि इस अपील के नतीजे में भाजपा अगुवाई वाली एनडीए सत्ता में वापस होती है तो यह देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण ही कहलाएगा। दूसरी बात यह कि भाजपा कोई दूध की धूली पार्टी नहीं है। जब तक सत्ता हाथ नहीं आई यह अपनी साफ छवि का दावा करती रही लेकिन विभिन्न राज्यों और विशेषकर कर्नाटक में सत्ता संभालने के बाद भाजपा मुख्यमंत्री और मंत्रियों के अवैध खनन में विभिन्न घोटालों में लिप्त होना इस बात का सुबूत है कि भाजपा भी भ्रष्टाचार में लिप्त है। हजारे यदि कांग्रेस को वोट न देने की अपील के साथ-साथ भाजपा को भी वोट न देने की अपील करते तो सांप्रदायिक ताकतों के प्रति इनके झुकाव का संदेह दूर हो जाता। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। अन्ना को यह बात समझ लेना चाहिए कि इसी सत्ता भोग का फायदा उठाकर नरेन्द्र मोदी ने गुजरात में मुसलमानों का नरसंहार किया। हजारे जब अपने आपको गांधी उसूलों पर चलने वाला बताते हैं तो उनके लिए जरूरी है कि वह इस देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समूह को नजरंदाज न करें।
`...तो यह है अन्ना जी का असली चेहरा' के शीर्षक से सना उल्ला सादिक तैमी ने दैनिक `हमारा समाज' में प्रकाशित अपने लेख में लिखा है कि अन्ना हजारे के इस आंदोलन को लेकर कुछ वर्गों के अन्दर शुरू से एक प्रकार का असंतोष देखा गया, यदि साफ तौर पर कहा जाए तो मुसलमानों और दलितों ने लगभग इस पूरे आंदोलन से खुद को अलग रखा। व्यक्तिगत तौर पर हम न तो कांग्रेस को दूध की धुली हुई पार्टी समझते हैं और न ही हम इसके पक्षधर हैं कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध साथ न दें। यह तो लोकतंत्र का अपहरण करने जैसा है। अन्ना का कहना यह है कि भाजपा भी भ्रष्टाचार में वैसी ही लिप्त है जैसे अन्य राजनैतिक पार्टियां। ऐसा लगता है कि अन्ना जाने-अनजाने में किसी और के इशारों पर चल रहे हैं, वोट किसको देना है और किसको नहीं, यह फैसला हर भारतीय खुद कर सकता है। उनकी इस बात से अन्ना जी के चाहने वाले भी उनसे नाराज हो रहे हैं।
दैनिक `जदीद मेल' ने `गलत दिशा में आंदोलन' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखा है कि अन्ना हजारे हो या उनकी टीम के दूसरे सदस्य, उनकी बातों पर उसी समय विश्वास करेंगे जब वह राजनैतिक पार्टियों से समान दूरी बनाकर अपने आंदोलन को आगे बढ़ाएंगे। यह सही है कि किसी भी जन आंदोलन में शामिल होने के लिए कोई भी आगे आ सकता है लेकिन आंदोलन का नेतृत्व करने वालों का दामन पाक-साफ होना जरूरी है। यदि हरियाणा में कांग्रेस को कामयाबी हासिल हो जाती है तो फिर अन्ना हजारे की पोजीशन कमजोर पड़ जाएगी और वह इस आंदोलन को जन आंदोलन होने का भी दावा नहीं कर सकते और यदि कांग्रेस वहां से हार जाती है तो अन्ना हजारे पर भाजपा के संरक्षण का आरोप लगेगा। इसलिए दोनों स्थिति में अन्ना की ही हार होगी। चुनावी जंग में कूद कर अन्ना ने बड़ी गलती की है। लोकपाल बिल संसद के आगामी अधिवेशन में पेश होगा इसके अतिरिक्त कई अन्य बिल भी पेश होंगे जो भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल कानून के सहायक बनेंगे तो फिर आगामी अधिवेशन तक अन्ना को इंतजार करने में कोई हर्ज नहीं था। अब लोग इस बात को देख रहे हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ और चुनावी सुधारों को लागू करने में कौन ईमानदार है और कौन ड्रामेबाजी कर रहा है।
`अन्ना हजारे का आंदोलन, बिल्ली थैले से बाहर आ गई' के शीर्षक से दैनिक `इंकलाब' में `हिन्दुस्तान नाम' के अपने स्तम्भ में नाके किदवई ने लिखा है कि अन्ना हजारे की कांग्रेस दुश्मनी स्पष्ट है कि उन्होंने कांग्रेस हटाओ का तो नारा दिया लेकिन उत्तर प्रदेश जिसकी गिनती आज देश के भ्रष्टाचार राज्यों में की जाने लगी है और शायद मुख्यमंत्री मायावती सबसे बड़ी भ्रष्टाचारी राजनेता भी हैं। यूपी की मंत्रिपरिषद लगभग भ्रष्टाचार मंत्रियों पर आधारित है, मायावती अरबपति हैं तो उनकी मंत्रिपरिषद का हर व्यक्ति करोड़ों में खेल रहा है। उत्तर प्रदेश के लोक आयुक्त एनके मेहरोत्रा अब तक तीन मंत्रियों को भ्रष्टाचार, बेइमानी के संगीन मामलों में कसूरवार ठहरा चुके हैं। इन मंत्रियों को मायावती ने अपने मंत्रिपरिषद से निकाल बाहर भी कर दिया लेकिन खुद मायावती ने अभी तक अपनी जवाबदेही नहीं की है। अन्ना हजारे ने मायावती, बीएसपी के उम्मीदवारों को हराने की कोई अपील नहीं की और न ही अन्ना हजारे को मुलायम सिंह यादव और उनकी समाजवादी पार्टी नजर आ रही है जो अतीत से लेकर आज तक भ्रष्टाचार में डूबी हुई है। यही सूरते हाल भाजपा का है लेकिन इन पार्टियों को अन्ना हजारे ने छोड़ दिया है। इनको हराने की कोई अपील जारी नहीं की। इससे साफ जाहिर है कि अन्ना आंदोलन का मकसद कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर लाल कृष्ण आडवाणी अथवा नरेन्द्र मोदी जैसे नेता को प्रधानमंत्री का ताज पहनाना चाहते हैं।
दैनिक `सहाफत' ने अपने सम्पादकीय में अन्ना हजारे की मुहिम पर चर्चा करते हुए लिखा है कि अन्ना हजारे ने धमकी दी है कि आने वाले दिनों में कुछ राज्यों में जो चुनाव होने वाले हैं, उनमें वह उन सभी पार्टियों और उम्मीदवारों के खिलाफ चुनावी मुहिम में भाग लेंगे जो जन लोकपाल बिल के विरोधी हैं। आने वाले साल में जहां चुनाव होने हैं उनमें पांच राज्यों के अतिरिक्त मुंबई नगर निगम का चुनाव भी शामिल है। मुंबई नगर निगम का बजट कई राज्यों के बजट से ज्यादा बड़ा है। इसलिए हमें नहीं मालूम कि अन्ना हजारे की सूची में मुंबई निगम का चुनाव शामिल है या नहीं, यदि नहीं शामिल है तो बड़ी आश्चर्य की बात होगी क्योंकि इसका मतलब यह होगा कि अन्ना हजारे यह समझते हैं कि सारा भ्रष्टाचार विधानसभा और संसद तक सीमित है। नगर निगम भ्रष्टाचार से बिल्कुल पाक साफ होती है और यदि मुंबई नगर निगम भी इनकी सूची में शामिल हैं तो हमें यह भी नहीं मालूम कि शिवसेना और उसके उम्मीदवारों के प्रति इनका रवैया क्या होगा? मुंबई नगर निगम पर भाजपा-शिव सेना का कब्जा है। मुंबई की सड़कों के गड्ढे गवाह हैं कि मुंबई नगर निगम ने गत पांच सालों में कितना `शानदार' काम किया। शिव सेना एक बार नहीं कई बार अन्ना हजारे और उनके आंदोलन का मजाक बना चुकी है। देखना यह है कि शिव सेना और उसके उम्मीदवारों के खिलाफ चुनावी मुहिम चलाएंगे? यदि ऐसा नहीं होता है तो इसका मतलब यह है कि चिराग तले अंधेरा है।
`...तो यह है अन्ना जी का असली चेहरा' के शीर्षक से सना उल्ला सादिक तैमी ने दैनिक `हमारा समाज' में प्रकाशित अपने लेख में लिखा है कि अन्ना हजारे के इस आंदोलन को लेकर कुछ वर्गों के अन्दर शुरू से एक प्रकार का असंतोष देखा गया, यदि साफ तौर पर कहा जाए तो मुसलमानों और दलितों ने लगभग इस पूरे आंदोलन से खुद को अलग रखा। व्यक्तिगत तौर पर हम न तो कांग्रेस को दूध की धुली हुई पार्टी समझते हैं और न ही हम इसके पक्षधर हैं कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध साथ न दें। यह तो लोकतंत्र का अपहरण करने जैसा है। अन्ना का कहना यह है कि भाजपा भी भ्रष्टाचार में वैसी ही लिप्त है जैसे अन्य राजनैतिक पार्टियां। ऐसा लगता है कि अन्ना जाने-अनजाने में किसी और के इशारों पर चल रहे हैं, वोट किसको देना है और किसको नहीं, यह फैसला हर भारतीय खुद कर सकता है। उनकी इस बात से अन्ना जी के चाहने वाले भी उनसे नाराज हो रहे हैं।
दैनिक `जदीद मेल' ने `गलत दिशा में आंदोलन' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखा है कि अन्ना हजारे हो या उनकी टीम के दूसरे सदस्य, उनकी बातों पर उसी समय विश्वास करेंगे जब वह राजनैतिक पार्टियों से समान दूरी बनाकर अपने आंदोलन को आगे बढ़ाएंगे। यह सही है कि किसी भी जन आंदोलन में शामिल होने के लिए कोई भी आगे आ सकता है लेकिन आंदोलन का नेतृत्व करने वालों का दामन पाक-साफ होना जरूरी है। यदि हरियाणा में कांग्रेस को कामयाबी हासिल हो जाती है तो फिर अन्ना हजारे की पोजीशन कमजोर पड़ जाएगी और वह इस आंदोलन को जन आंदोलन होने का भी दावा नहीं कर सकते और यदि कांग्रेस वहां से हार जाती है तो अन्ना हजारे पर भाजपा के संरक्षण का आरोप लगेगा। इसलिए दोनों स्थिति में अन्ना की ही हार होगी। चुनावी जंग में कूद कर अन्ना ने बड़ी गलती की है। लोकपाल बिल संसद के आगामी अधिवेशन में पेश होगा इसके अतिरिक्त कई अन्य बिल भी पेश होंगे जो भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल कानून के सहायक बनेंगे तो फिर आगामी अधिवेशन तक अन्ना को इंतजार करने में कोई हर्ज नहीं था। अब लोग इस बात को देख रहे हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ और चुनावी सुधारों को लागू करने में कौन ईमानदार है और कौन ड्रामेबाजी कर रहा है।
`अन्ना हजारे का आंदोलन, बिल्ली थैले से बाहर आ गई' के शीर्षक से दैनिक `इंकलाब' में `हिन्दुस्तान नाम' के अपने स्तम्भ में नाके किदवई ने लिखा है कि अन्ना हजारे की कांग्रेस दुश्मनी स्पष्ट है कि उन्होंने कांग्रेस हटाओ का तो नारा दिया लेकिन उत्तर प्रदेश जिसकी गिनती आज देश के भ्रष्टाचार राज्यों में की जाने लगी है और शायद मुख्यमंत्री मायावती सबसे बड़ी भ्रष्टाचारी राजनेता भी हैं। यूपी की मंत्रिपरिषद लगभग भ्रष्टाचार मंत्रियों पर आधारित है, मायावती अरबपति हैं तो उनकी मंत्रिपरिषद का हर व्यक्ति करोड़ों में खेल रहा है। उत्तर प्रदेश के लोक आयुक्त एनके मेहरोत्रा अब तक तीन मंत्रियों को भ्रष्टाचार, बेइमानी के संगीन मामलों में कसूरवार ठहरा चुके हैं। इन मंत्रियों को मायावती ने अपने मंत्रिपरिषद से निकाल बाहर भी कर दिया लेकिन खुद मायावती ने अभी तक अपनी जवाबदेही नहीं की है। अन्ना हजारे ने मायावती, बीएसपी के उम्मीदवारों को हराने की कोई अपील नहीं की और न ही अन्ना हजारे को मुलायम सिंह यादव और उनकी समाजवादी पार्टी नजर आ रही है जो अतीत से लेकर आज तक भ्रष्टाचार में डूबी हुई है। यही सूरते हाल भाजपा का है लेकिन इन पार्टियों को अन्ना हजारे ने छोड़ दिया है। इनको हराने की कोई अपील जारी नहीं की। इससे साफ जाहिर है कि अन्ना आंदोलन का मकसद कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर लाल कृष्ण आडवाणी अथवा नरेन्द्र मोदी जैसे नेता को प्रधानमंत्री का ताज पहनाना चाहते हैं।
दैनिक `सहाफत' ने अपने सम्पादकीय में अन्ना हजारे की मुहिम पर चर्चा करते हुए लिखा है कि अन्ना हजारे ने धमकी दी है कि आने वाले दिनों में कुछ राज्यों में जो चुनाव होने वाले हैं, उनमें वह उन सभी पार्टियों और उम्मीदवारों के खिलाफ चुनावी मुहिम में भाग लेंगे जो जन लोकपाल बिल के विरोधी हैं। आने वाले साल में जहां चुनाव होने हैं उनमें पांच राज्यों के अतिरिक्त मुंबई नगर निगम का चुनाव भी शामिल है। मुंबई नगर निगम का बजट कई राज्यों के बजट से ज्यादा बड़ा है। इसलिए हमें नहीं मालूम कि अन्ना हजारे की सूची में मुंबई निगम का चुनाव शामिल है या नहीं, यदि नहीं शामिल है तो बड़ी आश्चर्य की बात होगी क्योंकि इसका मतलब यह होगा कि अन्ना हजारे यह समझते हैं कि सारा भ्रष्टाचार विधानसभा और संसद तक सीमित है। नगर निगम भ्रष्टाचार से बिल्कुल पाक साफ होती है और यदि मुंबई नगर निगम भी इनकी सूची में शामिल हैं तो हमें यह भी नहीं मालूम कि शिवसेना और उसके उम्मीदवारों के प्रति इनका रवैया क्या होगा? मुंबई नगर निगम पर भाजपा-शिव सेना का कब्जा है। मुंबई की सड़कों के गड्ढे गवाह हैं कि मुंबई नगर निगम ने गत पांच सालों में कितना `शानदार' काम किया। शिव सेना एक बार नहीं कई बार अन्ना हजारे और उनके आंदोलन का मजाक बना चुकी है। देखना यह है कि शिव सेना और उसके उम्मीदवारों के खिलाफ चुनावी मुहिम चलाएंगे? यदि ऐसा नहीं होता है तो इसका मतलब यह है कि चिराग तले अंधेरा है।
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