Monday, February 28, 2011

राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय घटनाक्रम का ब्यौरा देते उर्दू अखबार

बीते दिनों अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों की बैठक का स्थगन होना, मिस्री क्रांति की आंच अरब देशों तक और भारत-पाक वार्ता सहित राष्ट्रीय स्तर पर आरुषि हत्याकांड, कश्मीर मामला, सुप्रीम कोर्ट द्वारा समान नागरिक कानून न बनाने पर केंद्र को फटकार जैसे अनेक मुद्दे समाचार पत्रों में छाए रहे। पेश हैं इस बाबत उर्दू के कुछ अखबारों की राय।

दैनिक `राष्ट्रीय सहारा' ने `त्रिकोणीय बातचीत के स्थगन' को चर्चा का विषय बनाते हुए लिखा है। अमेरिका, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों की इस महीने प्रस्तावित त्रिकोणीय बैठक का स्थगन इस बात का संकेत है कि अमेरिका ने रेमंड डेविस को हत्या के आरोप में पाकिस्तान में गिरफ्तारी के बाद उसकी रिहाई के लिए पाकिस्तान पर दबाव बढ़ा दिया है। वैसे अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने बैठक के स्थगन का कारण पाकिस्तान में हुई राजनैतिक उठापठक को बताया है। अमेरिका की इस बात पर विश्वास करना मुश्किल है क्योंकि इन परिवर्तन के कारण ही विदेश मंत्री की कुर्सी गंवाने वाले शाह महमूद कुरैशी पहले ही कह चुके हैं कि उन्हें रेमंड को रिहा न करने की कीमत अदा करनी पड़ रही है। अमेरिका के लिए किसी देश से 60 वर्ष की दोस्ती के मुकाबले अपने नागरिक के हित ज्यादा अहम हैं। चाहे वह नागरिक किसी देश के कानून की नजर में अपराधी ही क्यों न हो। अमेरिकी नीति को जानने वाले यह बात अच्छी तरह समझ सकते हैं कि अमेरिका के लिए सभी अंतर्राष्ट्रीय मूल्यों और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों एवं मर्यादा से ज्यादा अहम इसके अपने हित हैं। अपने एक अधिकारी की गिरफ्तारी पर अमेरिका किस हद तक जा सकता है इसका दूसरा सबूत त्रिकोणीय बातचीत का स्थगन है।

`भारत-पाक बातचीत शांति के लिए' के शीर्षक से दैनिक `जदीद मेल' ने लिखा है। यह अत्याधिक सुखद समाचार है कि भारत-पाकिस्तान के विदेश सचिव आपसी बातचीत द्वारा पेचीदा समस्याओं को अब दोबारा से हल करेंगे। वास्तव में यह सकारात्मक प्रक्रिया काफी लम्बे समय से चल रही थी लेकिन मुंबई में 26/11 को पाकिस्तान के आतंकवादियों ने जब विभिन्न स्थानों पर हमला किया जिसमें बहुत से भारतीय नागरिकों सहित विदेशी नागरिक भी मारे गए थे। उसको लेकर राष्ट्र में एक तीखी प्रक्रिया थी जिसके चलते भारत ने पाकिस्तान से जारी बातचीत को बन्द कर दिया था। लेकिन अब दोनों देशों ने बातचीत शुरू करने की इच्छा व्यक्त की है। इसलिए आशा की जा सकती है कि आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच कड़वाहट खत्म होना शुरू हो जाएगी। दोनों देशों के शासकों को इस दिशा में कदम उठाने के लिए सबसे पहले वीजा को आसान कर देना चाहिए। जब इस तरह एक-दूसरे से सम्पर्प बढ़ेगा तो उनमें परस्पर लगाव पैदा होगा और इसके बाद जब कभी किसी के साथ आतंकवाद की घटना होगी तो दोनों देश की जनता इसके खिलाफ उठ खड़ी होगी। पाकिस्तान जो आज कल अराजकता और आतंकवाद में उलझा हुआ है ऐसे नाजुक समय में हमें पाकिस्तान को आतंकवाद से लड़ने में मदद देने की जरूरत है ताकि वहां शांति का वातावरण बन सके। इस बातचीत के शुरू हेन से आशा है कि सियाचीन, कश्मीर और आतंकवाद जैसी समस्या हल होगी और यह दोनों देशों की जनता के लिए शांति का पैगाम होगा। हमारे विचार से भारत-पाक बातचीत अब केवल बातचीत न हो बल्कि शांति के लिए हो।

`मिस्री दुनिया से पूरे अरब जगत को सबक लेना चाहिए' के शीर्षक सै दैनिक `अखबारे मशरिक' ने लिखा है। जिस समय मिस्र में मुबारक के खिलाफ विद्रोह आंदोलन अपनी चरम सीमा पर था उसकी छाया शाम, लेबनान, सऊदी अरब, यमन और खाड़ी देशों पर पड़ रही थी। इस महीने के शुरू में शाम में भी विद्रोह की लहर शुरू हुई थी जिसे तत्काल दबा दिया गया। सऊदी अरब में विपक्ष शाह अब्दुल्लाह से एक राजनैतिक पार्टी बनाने की मांग कर रहा है जबकि उरदन में विरोध प्रदर्शन के बाद प्रधानमंत्री मारूफ बखीत ने राजनैतिक सुधार लाने की घोषणा की है। यमन के अध्यक्ष अली अब्दुल्ला सालेह ने जनता के दबाव के आगे हथियार रखते हुए घोषणा कर दी है कि वह आगामी राष्ट्रपति चुनाव नहीं लड़ेंगे। कतर में भी मिस्री क्रांति की गूंज सुनी जा रही है। बहरीन में भी विरोध प्रदर्शन करती रैलियां हो रही हैं।

ट्यूनीशिया और मिस्र में सफल जन आंदोलन के नतीजे में अत्याचार और भ्रष्टाचार के खिलाफ जो लहर चली है उसकी रोशनी में अरब देशों ने सुधार की ओर ध्यान देना शुरू कर दिया है। लेकिन यह सुधार दिखावा नहीं बल्कि वास्तविक और बुनियादी होना चाहिए। जो देश जनता की इच्छाओं का सम्मान करते हुए सुधारों को जगह देंगे वह कायम रहेंगे और जो ऐसा नहीं करेंगे उनका हश्र ट्यूनीशिया और मिस्र जैसा होगा। हालात जिस ओर इशारा कर रहे हैं उसे समझने और उसकी रोशनी में नया रास्ता अपनाने की जरूरत है।

`रबरो नजर' ने अपने स्तम्भ में `सहरोजा दावत' ने `न्यायाधीशों की चिन्ता' पर चर्चा करते हुए लिखा है। समान नागरिक कानून के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट सरकार को इस से पूर्व कम से कम दो बार लताड़ चुकी है। गैर मामूली बात 8 फरवरी के आब्जर्वेशन की यह थी कि `केंद्र को केवल हिन्दुओं के पर्सनल लॉ में तब्दीली से दिलचस्पी है, अन्य धार्मिक समुदाय के पर्सनल लॉ में कोई तब्दीली नहीं की जाती...।'

9 फरवरी 2011 के टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार न्यायाधीशों ने यह भी कहा, `पर्सनल लॉ में कानूनी हस्तक्षेप और संशोधन के मामले में हिन्दू समुदाय उदारवादी है जबकि अन्य समुदाय में यह नहीं है और यह स्थिति अल्पसंख्यकों के अन्दर सेकुलर मूल्यों की कमी का द्योतक है।' अखबार लिखता है कि मामला देश की सबसे बड़ी अदालत का है इसलिए ज्यादा कुछ नहीं कहना चाहिए। लेकिन पिछले कुछ समय में न्यायाधीशों के संबंध कुछ खबरें ऐसी आई हैं जो मीडिया और कानून के क्षेत्र में चर्चा का विषय बनीं।

माननीय न्यायाधीश इनता तो जरूर जानते होंगे, भले ही इससे सहमत न हों कि समान नागरिक कानून एक राजनैतिक नारा है और हिन्दुत्व राजनीति का भारी स्रोत, अन्यथा इसकी कोई वास्तविकता नहीं है। इसका ब्लूप्रिंट आज तक पेश नहीं किया। यदि हिन्दू समुदाय अपने पारिवारिक कानूनों के लिए उदारवादी हुए हैं तो यह उसकी कमजोरी है, दूसरे धर्म इसके लिए जिम्मेदार नहीं।

`चुनावी सुधार की कोशिश' पर चर्चा करते हुए दैनिक `सियासत' ने लिखा है। मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी की यह चिन्ता विचारणीय है कि सभी राजनैतिक पार्टियां राजनीति में अपराधीकरण के खिलाफ हैं। यह जानकर भी दुख होता है कि देश की 99 फीसदी राजनैतकि पार्टियां चुनाव सुधारों के खिलाफ हैं।

इस संदर्भ में चुनाव आयुक्त ने चुनाव को निष्पक्ष बनाने के लिए चुनाव सुधारों का बेड़ा उठाया है उससे यह पता चलाना जरूरी है कि चुनाव के लिए धन, बल और माफिया को कैसे खत्म किया जाए। अतीत में भी एक से अधिक बार दिशानिर्देश बनाए गए या उन पर विचार किया गया कि राजनीति में अपराधीकरण को कैसे रोका जाए और अपराधी व्यक्तियों को चुनाव में भाग लेने की इजाजत न दी जाए लेकिन सच्चाई यही है कि हजार प्रयासों के बावजूद चुनाव को अपराधीकरण से पाक करने में सफलता नहीं मिली है। अब कानून मंत्रालय के चुनाव सुधार की कोशिश इस माहौल में किस हद तक कामयाब होगी, यह तो समय ही बताएगा।

Saturday, February 26, 2011

`गोधरा ः यह इंसाफ नहीं है'

बीते दिनों अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर गोधरा पर विशेष अदालत का फैसला, जामिया मिलिया इस्लामिया को अल्पसंख्यक दर्जा दिए जाने एवं सरकार द्वारा भ्रष्टाचार की जांच के लिए जेपीसी गठित करने की घोषणा जैसे अनेक मुद्दे चर्चा का विषय रहे। पेश है इस बाबत हुई उर्दू के कुछ अखबारों की राय।

`गोधरा ः यह इंसाफ नहीं है' के शीर्षक से दैनिक `हिन्दुस्तान एक्सप्रेस' ने लिखा है। हम इसको इंसाफ नहीं कह सकते। बेशक यह मेरे पिता और उन सभी आरोपियों की बेगुनाहों की जीत है जिनको गलत तरीके से फंसाया गया था लेकिन इनकी जिंदगी के जो आठ साल सलाखों के पीछे बीत गए, जिन परेशानियों का सामना इनको और इनके परिवार को करना पड़ा, इसकी भरपायी कौन करेगा और क्या यह संभव है? यह शब्द मौलाना हुसैन उमरजी के बेटे उमर सईद के हैं जिन्होंने गोधरा कांड में अपने पिता की गिरफ्तारी के बाद गोधरा से अहमदाबाद और दिल्ली (निचली अदालत से सुप्रीम कोर्ट) तक पिछले आठ सालों में किस-किस दरवाजे को नहीं खटखटाया, कहां-कहां इंसाफ की गुहार नहीं लगाई। अब आठ साल बाद साबरमती जेल में कायम विशेष अदालत ने फैसला सुनाया तो सुबूत न होने के आधार पर उनकी रिहाई का आदेश जारी कर दिया। निश्चय ही उमर सईद का यह सवाल कि क्या इसी को इंसाफ कहते हैं कि आपको गलत तरीके से गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया जाए। आपकी जिंदगी की कीमती साल, आपका भविष्य और आपके परिवार को तबाह कर दिया जाए, फिर वर्षों बाद फैसला सुनाया जाए कि हमारे पास अपराध का कोई सुबूत नहीं है। भारत के माथे पर इतना ही बड़ा कलंक है जितना बड़ा कलंक गोधरा कांड और इसके बाद के दंगे हैं। जब देश की न्यायिक व्यवस्था ही सवालों के घेरे में आ जाए और कानून की जिस कार्यवाही में एक नहीं दर्जनों बेगुनाहों की जिंदगियां तबाह हो जाया करें, इस व्यवस्था मे पीड़ितों के हित की बात करना बेवकूफी है। यदि आरोपियों को आदलत ने इसलिए छोड़ दिया कि प्रतिवादी के पास कोई छोटे से छोटा सुबूत नहीं था।

`गोधरा ट्रेन घटना' के शीर्षक से दैनिक `ऐतमाद' ने लिखा है। गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन घटना को अहमदाबाद की विशेष अदालत ने षड्यंत्र की थ्योरी को स्वीकार किया है। गुजरात पुलिस की जांच भी इस थ्योरी के तहत की गई, चूंकि अदालत से इस थ्योरी का अनुमोदन हासिल करना था और इसी आधार पर विशेष अदालत ने 31 व्यक्तियों को सजा दी और दूसरे 63 व्यक्तियों को आरोप मुक्त कर दिया। आश्चर्य तो यह है कि इस सूची में गोधरा ट्रेन घटना के अहम आरोपी मौलवी उमरजी भी शामिल हैं। राज्य सरकार की ओर से गठित स्पेशल इन्वेस्टीगेशन टीम ने मौलवी उमरजी के संबंध में जो वक्ता भी हैं, यह कहा कि उन्होंने अपने चार सहयोगियों को एस-6 बोगी को जिसमें कारसेवक थे, गोधरा ट्रेन में आग लगाने के लिए प्रोत्साहित किया था। लेकिन षड्यंत्र के असली अपराधी को ही जब बरी कर दिया गया है तो इस षड्यंत्र की अगुवाई किसके हाथ में थी और आरएसएस की ओर से कौन सक्रिय था। यह बात भी सामने नहीं आ सकी है। सेशन अदालत का फैसला दूसरे अर्थों में गुजरात दंगों की जिममेदारी से नरेन्द्र मोदी को छुटकारा दिलाने के सिवाय कुछ नहीं है। अभी यह सवाल बाकी है कि क्या सभी पीड़ितों को इंसाफ मिला है?

`गोधरा की गुत्थी' के तहत दैनिक `इंकलाब' ने लिखा है। 27 फरवरी 2002 को साबरमती एक्सप्रेस में लगने वाली आग अचानक लगी थी या षड्यंत्र का नतीजा था। इस सवाल पर गत नौ वर्ष से बहस हो रही है। इस पर दो सितम्बर 2004 को गठित की गई यूसी बनर्जी कमीशन ने 17 जनवरी 2005 को पेश होने वाली रिपोर्ट में कहा था कि साबरमती एक्सप्रेस में लगने वाली आग संयोगवश अर्थात् अचानक थी इसके पीछे कोई षड्यंत्र नहीं था। तीन मार्च 2002 को नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा गठित किए गए नानावती कमीशन ने 18 सितम्बर 2008 में पेश हेने वाली अपनी रिपोर्ट में यूसी बनर्जी रिपोर्ट का खंडन करते हुए कहा था कि आग संयोगवंश नहीं बल्कि इसके पीछे दो दिन पहले तैयार की गई वह षड्यंत्र था जिसे क्रियान्वित करने के लिए पेट्रोल खरीदा गया और फिर उसे बोगी में उढेला गया या कुछ बयानात के अनुसार दो व्यक्ति डिब्बे में दाखिल हुए जिन्होंने आग लगाई। 31 व्यक्तियों को अपराधी बताने और षड्यंत्र थ्योरी को स्वीकार किए जाने की बात चिंताजनक है। यदि ट्रेन में लगने वाली आग वास्तव में षड्यंत्र का नतीजा था तो क्या अहमदाबाद फोरेंसिक लैबोरेट्री ने रिपोर्ट गलत दी थी? क्या यूसी बनर्जी कमीशन की रिपोर्ट झूठ का पुलिंदा थी क्या दिल्ली की गैर सरकारी संगठनों `हेजारडर्स खेंटर' के विशेषज्ञों की वह रिपोर्ट अर्थहीन थी जिसने षड्यंत्र को निरस्त किया था और जो सिद्धार्थ वरद राजन (`दी हिंड' 22 जनवरी 2005) के अनुसार अब तक की सबसे ठोस रिपोर्ट है।

`गोधरा घटना पर अदालती फैसला' के शीर्षक से दैनिक `राष्ट्रीय सहारा' ने लिखा है। इस फैसले के संबंध में विभिन्न प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। भाजपा इस बात को लेकर खुश है कि अदालत ने 27 फरवरी 2002 के साबरमती ट्रेन घटना को षड्यंत्र मानकर इसके और मोदी सरकार के दृष्टिकोण को सही साबित किया है। जबकि कांग्रेस अभी तक यह तय नहीं कर पा रही है कि क्या दृष्टिकोण अपनाया जाए। यही कारण है कि इसके विभिन्न नेताओं और मंत्रियों की प्रतिक्रियाओं में सीधे कहने से बचा जा रहा है। षड्यंत्र के मुख्य आरोपी मौलवी उमरजी और अन्य बरी होने वाले आरोपियों के घर वाले खुश हैं तो दूसरी तरफ गुजरात की नरेन्द्र मोदी सरकार इस मामले में अपील का इशारा दे रही है। लेकिन अदालत के इस फैसले ने कई सवाल भी खड़े किए हैं और इन सवालों का सीधा संबंध गोधरा घटना से नहीं बल्कि अदालती व्यवस्था और ऐसे मामलों में सरकार और राजनेताओं की नीयत से है। सरकार और राजनेता किस तरह ऐसे मामलों को अपने हित के लिए इस्तेमाल करते हैं इसका सुबूत भागलपुर दंगे, मेरठ और मलियाना के 1987 दंगे और 1984 में दिल्ली में होने वाले सिख दंगे हैं। इसी तरह मुंबई दंगों की जांच के लिए बने श्रीकृष्णा रिपोर्ट पर अभी तक सरकार की ओर से कोई कार्यवाही नहीं हुई है। गोधरा मामले के बाद अहमदाबाद में हुए मुस्लिम विरोधी दंगों का फैसला अभी होना बाकी है जिसमें लगभग 1200 व्यक्ति (जिनमें अधिक मुसलमान) थे, मारे गए थे। इनके अपराधी आज भी घूम रहे हैं।

`गोधरा का इंसाफ' के तहत दैनिक `हमारा समाज' ने लिखा है। अदालत ने जो फैसला सुनाया है उसका सम्मान करना सब का कर्तव्य है लेकिन इससे आम लोगों को मायूसी का सामना करना पड़ा है। 9 वर्षों तक जेल में गुजारने के बाद यदि किसी को बेकसूर करार दिया जाए तो यह इंसाफ नहीं इंसाफ का खून है।

जो व्यक्ति बिना किसी अपराध के 9 साल तक जेल में बन्द हो तो उस पर क्या गुजरी होगी, का अंदाजा लगाया जा सकता है। गुजरात पुलिस ने इतनी बड़ी संख्या में मुसलमानों को गिरफ्तार करके घृणा का जो सुबूत पेश किया है वह अत्याचार के इतिहास का खराब समय माना जाएगा। अब एक अहम सवाल यह है कि क्या इसके बाद हजारों मुसलमानों के कातिलों के जिम्मेदारों को भी सजा मिल सकेगी? और मिलेगी तो कब? इसका हश्र भी मुंबई दंगों और बम धमाकों की तरह तो नहीं होगा कि 1992 में होने वाले दंगों के दोषी तो खुलेआम घूमते रहें और 1993 के बम धमाके के तथाकथित जिम्मेदारों को सजा सुना दी जाए? ऐसा संभव है, इसलिए कि इस देश में इसकी मिसाल मौजूद है।

Monday, February 21, 2011

ब्याज रहित आर्थिक व्यवस्था के फायदे

प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के मलयेशिया दौरे के दौरान वहां के प्रधानमंत्री दातु नजीब बिन तुन हाजी अब्दुल रज्जाक ने इसलामी बैंकिंग की महत्ता को उजागर करते हुए उसे आर्थिक मंदी से उबरने का विकल्प बताया। जिस पर प्रधानमंत्री ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया से इन पर विचार कर सभावनाएं तलाश करने का भरोसा दिलाया है। बहरहाल, आरबीआई के वर्तमान नियमों के तहत इसलामी कानून पर आधारित ब्याज रहित प्रणाली की कोई व्यवस्था नहीं है। वर्ष 2004 में संप्रग सरकार ने सत्ता संभालने के बाद आरबीआई के ऑपरेशन मैनेजर आनंद सिंह की अगुवाई में एक कमेटी बनाई थी, जिसमें देश-विदेश के आर्थिक विशेषज्ञ शामिल थे। उस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में यह बताया कि देश में इसलामी बैंकिग के लिए वर्तमान कानून में काफी संशोधन करना होगा, जो संभव नहीं है।
इसके बाद एक दूसरी कमेटी प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार रघुराजन राम की अध्यक्षता में गठित की गई। कमेटी में विभिन्न बैंकों के प्रतिनिधियों सहित आर्थिक विशेषज्ञ शामिल थे।

इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में ब्याज रहित प्रणाली का स्वागत करते हुए इसे शुरू करने का सुझाव दिया, लेकिन सरकार इस पर मौन है। आम तौर पर इस प्रणाली को इसलामी बैंकिग के नाम से प्रचारित किया जाता है, लेकिन रघुराजन कमेटी ने ब्याज रहित शब्दावली का इस्तेमाल किया है। ब्याज रहित बैंकिंग प्रणाली इसलामी सिद्धांतों पर आधारित व्यवस्था है और अरब जगत में तेल की खोज के बाद यह शुरू हुई। इसमें दरअसल ब्याज की कोई व्यवस्था नहीं है। इस प्रणाली का बुनियादी मकसद आर्थिक रूप से लोगों को शोषित होने से बचाना और दौलत को एक हाथ में जमा होने से रोकना है।
ब्याज रहित बैंकिंग प्रणाली में निवेशकर्ता को ब्याज नहीं दिया जाता है, बल्कि लाभ या हानि की सूरत में उसका हिस्सा तय किया जाता है। मुसलमान, जिनकी आबादी अपने देश में 15 फीसदी है, केवल ब्याज के चलते बैंकों या वित्तीय संस्थानों में निवेश नहीं करते, क्योंकि इसलाम ने ब्याज को हराम बताया है। हालांकि ऐसा नहीं कि यह व्यवस्था केवल मुसलमानों के लिए ही उपयोगी होगी। इसका लाभ समाज के सभी वर्गों को होगा, क्योंकि ब्याज के नाम पर लोगों का खूब शोषण होता है। एक अनुमान के मुताबिक, केरल में पांच हजार करोड़ से ज्यादा का निवेश ऐसा है, जो बैंकों में पड़ा है। ऐसा इसलिए, क्योंकि इन रकमों के मालिक ब्याज वाले कारोबार में अपना पैसा नहीं लगाना चाहते हैं। लिहाजा यह पैसा बाजार में नहीं आ रहा है।
वर्ष 2007-08 के बजटीय आंकड़ों से यह खुलासा हुआ कि देश का हर नागरिक 22,000 रुपये का कर्जदार है। विद्रूप है कि यह पैसा उसने नहीं लिया, सरकार ने लिया है। सरकार पर उसकी देनदारी है, जिसकी भरपाई वह टैक्स लगाकर करेगी। यदि इस कर्ज की समीक्षा की जाए, तो इसमें अधिकतर वह राशि है, जो विदेशी कर्ज को समय पर अदा न करने की सूरत में ब्याज के रूप में लगी है। आलम यह है कि एलआईसी जैसी ब्याज देने वाली कंपनी भी मुसलिम देशों में ब्याज रहित बीमा योजनाएं पेश कर रही हैं, लेकिन अपने देश में यह संभव नहीं हो पा रहा है।
ब्याज रहित बैंकिंग प्रणाली की लोकप्रियता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि यह विश्व के विकसित मुल्कों में भी सफलतापूर्वक काम कर रही है। फ्रांस के अखबार चैलेंज ने अपने संपादकीय में लिखा है, ‘वर्तमान ब्याज आधारित पूंजीवाद व्यवस्था दुनिया को तबाही की ओर ले जा रही है। लिहाजा आर्थिक मंदी से निकलने के लिए कुरआन शरीफ का अध्ययन आवश्यक है।’
आज विश्व के करीब 500 इसलामी बैंकों द्वारा वार्षिक 1,000 अरब डॉलर का कारोबार होता है। 2020 तक इसके 4,000 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। यदि अपने देश में यह प्रणाली शुरू की जाती है, तो इस पूंजी का कुछ हिस्सा इधर भी आ सकेगा, जो अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के साथ समाज को शोषण से भी बचाएगा। यह खुशी की बात है कि केरल उच्च न्यायालय ने इसलामी बैंक खोलने की मंजूरी देकर इस राह को और आसान बना दिया है।

Monday, February 14, 2011

अल्ला के दरबार में पांच सितारा होटल

किसी उपासना स्थल का निर्माण एवं उसकी देखभाल और वहां आने वाले आगंतुकों का विशेष रूप से ध्यान रखना हर लिहाज से सराहनीय कार्य है। यदि वह उपासना स्थल केंद्रीय दर्जा रखता हो तो उसका महत्व और भी बढ़ जाता है। ऐसे में उपासना स्थल की देखभाल करने वालों से यह आशा की जाती है कि वे निःस्वार्थ भाव से यह काम करें। कोई ऐसा काम न करें जिससे उसकी अध्यात्मिकता और पवित्रता पर आंच आए। बात चाहे जिस धर्म अथवा संप्रदाय की हो, हर जगह यही भावना पाई जाती है। इस मामले में किसी भी धर्म में कोई भेद-भाव नहीं है। पवित्रता के प्रभावित होते ही आध्यात्मिकता का पहलू भी कमजोर पड़ने लगता है जो किसी भी लिहाज से एक सभ्य समाज के लिए शुभ संकेत नहीं है।
इस परिप्रेक्ष्य में सऊदी अरब के शहर मक्का में स्थित ‘खाना-ए-काबा’ (अल्लाह का घर) और उसकी देखभाल करने वालों की सक्रियता से इसकी महत्ता का अनुमान भली भांति लगाया जा सकता है। मुसलमानों के लिए यह स्थल बहुत महत्वपूर्ण है। इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक स्तंभ के तौर पर इसका उल्लेख मिलता है। हर साल अरबी महीने जिलहिज्जा में यहां हज संपन्न होता है। विश्व भर से मुसलमान यहां आकर हज करते हैं और कुर्बानी देते हैं। आर्थिक रूप से संपन्न हर मुसलमान के लिए जीवन में एक बार उस घर तक जाना अनिवार्य है। काबा भौगोलिक दृष्टि से दुनिया के मध्य में स्थित है। हज के दिनों को छोड़कर बाकी दिनों में विश्व भर से मुसलमान उमरा करने यहां आते हैं। इस लिहाज से पूरे साल ही यहां चहलपहल और गहमागहमी रहती है।
हज के लिए हर साल लगभग 25 लाख व्यक्ति काबा में हाजिरी के लिए उपस्थित होते हैं। अकेले भारत से एक लाख से अधिक लोग हज कमेटी के माध्यम से हज के लिए जाते हैं। जबकि प्राइवेट आपरेटरों के माध्यम से जाने वाले लोगों की संख्या इसके अतिरिक्त है जो लगभग 50 हजार के करीब है। सऊदी सरकार ने हज के दौरान जहां हाजी आते हैं, बढ़ती भीड़ को देखते हुए उन स्थानों का विस्तार किया है। यहां तक कि हाजियों के रहने के लिए पुराने भवनों को तोड़कर नए भवन बनाए जा रहे हैं। इससे हाजियों को और भी आसानी हो रही है। लेकिन इसी के साथ काबा के चारों तरफ जिस तरह ऊंचे टावर वाले होटल और भवन बनाए जा रहे हैं, वह आम मुसलमानों के लिए चिंता का विषय है। यह होटल साधारण होटल नहीं है बल्कि इनका स्तर फाइव स्टार होटल से भी ज्यादा अर्थात फाइव प्लस है। ये होटल सभी जन सुविधाओं से लैस पश्चिमी तर्ज पर आधारित हैं। जिनमें पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति का जलवा है। खाना-ए-काबा जो जमीन पर है, चारांे तरफ से घिरी इमारतों के बीच कैसा लगेगा और क्या उसकी पवित्रता बाकी रहेगी! इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। गत कुछ दशकों से काबा स्थित मक्का शहर में एक नया इनफ्रास्ट्रक्चर परवान चढ़ रहा है, जिसमें होटल से लेकर शापिंग मॉल आदि सभी हैं। एक प्रकार से यहां हज इंडस्ट्री वजूद में आ रही है। और जब किसी जगह इंडस्ट्री वजूद में आती है अथवा कोई वस्तु बाजार में चल पड़ती है तो एक नया वर्ग वजूद में आता है। दोनों ही परिस्थितियों में मुनाफा कमाने एवं कारोबारी मानसिकता का पैदा होना आवश्यक है। सच तो यह है कि कारोबारी मानसिकता ही चीजों को व्यापारी शक्ल प्रदान करती है।
सऊदी सरकार जो हाजियों की सेवा तत्परता से करती है। बदलते परिदृश्य में उसकी सोच भी बदलती जा रही है। निःस्वार्थ सेवा भाव की जगह व्यापारी मानसिकता बढ़ती जा रही है। इसके लिए नए-नए उपाय और योजनाएं बनाई जा रही हैं। काबा के चारों तरफ जिस तेजी से ऊंची-ऊंची इमारतें और होटल बनाए जा रहे हैं। वह आम हाजियों की पहुंच से दूर होंगे, क्योंकि इन होटलों में वही हाजी ठहर सकेगा जो अपनी जेब ढीली करने के लिए तैयार होंगे। जबकि आम हाजी जिसका अपना एक सीमित बजट है, वह यहां ठहर नहीं सकता। हज कमेटी ऑफ इंडिया के वाइस चेयरमैन हसन अहमद ने भी इस बात को स्पष्ट किया कि हज के दौरान सऊदी अरब में निवास अब महंगा हो गया है। यदि हाजी काबा से करीब रहना चाहे तो उसे और ज्यादा खर्च करने के लिए तैयार रहना चाहिए। सऊदी सरकार ने ऐसा कर उस मानसिकता को भुनाने की कोशिश की है, जो काबा से करीब ठहरना चाहते हैं। इससे जहां उनकी मनोकामना पूरी होगी वहीं सऊदी सरकार की भी आमदनी बढ़ेगी। काबा के चारों तरफ बन रहे होटल और भवन आम लोगों के नहीं हैं। उन्हें इस क्षेत्र में किसी तरह के निर्माण कार्य करने की इजाजत भी नहीं है। यह अधिकार सिर्फ शाही परिवार को है। वे ही इन होटलों अथवा भवनों के मालिक हैं।
जहां तक खाना-ए-काबा का मामला है। इसकी मर्यादा के चलते ही इसके ऊपर से जहाज नहीं गुजरता है। लेकिन जब आसमान छूती इमारतें इसे चारों तरफ से घेर लेंगी तो क्या इसकी मर्यादा बचेगी, यह सवाल मुसलमानों को परेशानी किए हुए है। काबा जिसे हरम भी कहते हैं, उसके करीब एक 595 मीटर लंबी इमारत है जो 1952 फुट ऊंचे टावर की शक्ल का है और सबसे ऊंची है। इसी पर दुनिया की सबसे बड़ी घड़ी मक्का रायल क्लॉक टावर लगी है। दूसरे टॉवर का काम भी जोरों पर है। अगर यह जिस दिन पूरी तरह तैयार हो गया उस दिन काबा पूरी तरह ढक जाएगा।
काबा का मान-सम्मान हर मुसलमान के लिए सर्वोपरि है। इसे भंग करने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती, चाहे वह व्यक्तिगत स्तर पर हो अथवा सामूहिक स्तर पर या किसी सरकार द्वारा हो। हाजियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए सऊदी सरकार का दायित्व है कि वह इनके लिए नए भवन व होटल बनाए। लेकिन वह काबा से 100-150 किलोमीटर दूर हो।
व्यापारी मानसिकता केवल शासक वर्ग में ही नहीं है, अब इसके कीटाणु नागरिकों में भी फैल गए हैं। काबा में नमाज पढ़ने की इच्छा हर मुसलमान की होती है। जब वह वहां पहुंच जाता है तो उसकी कोशिश होती है कि आगे की पंक्ति में बैठे। इसके लिए कुछ सऊदी नागरिकों ने अपने लोगों को लगा दिया कि वह आगे की पंक्तियों में जा-ए-नमाज (जमीन पर बिछा कर नमाज पढ़ने वाला कपड़े का टुकड़ा) बिछा कर बैठ जाए। जब कोई संपन्न हाजी उस व्यक्ति को इस जगह के बदले कुछ रुपए दे देता तो वह जगह उसके हवाले कर दी जाती। यह एक कारोबार की शक्ल में जारी था। पांच समय की नमाज एवं इतने बडे़ काबा में जहां एक साथ एक लाख से अधिक लोग नमाज पढ़ सकते हैं, जगह घेर कर पैसा वसूल करना अच्छा व्यापार था। काबा में केवल हज के समय ही भीड़ नहीं रहती है बल्कि वहां तो साल के 12 महीने ही भीड़-भाड़ और चहल-पहल रहती है। इसका रहस्योद्घाटन उस समय हुआ जब कुछ लोगों ने इस तरह पैसा वसूल करने की शिकायत की। जिसके बाद सरकार सक्रिय हुई और उन्होंने इसका संज्ञान लिया। लेकिन सवाल यह है कि जब व्यापारी सोच की मानसिकता सत्ता वर्ग में आ गई है तो आम नागरिक उससे कैसे बच सकेगा!
बात ज्यादा पुरानी नहीं है जब व्यवस्था को पुण्य कार्य समझते हुए भारतीय मुसलमानों द्वारा सऊदी अरब में निवास के लिए भवन निःशुल्क उपलब्ध कराए जाते थे। अपनी-अपनी हैसियत के अनुसार कई भारतीय मुसलमानों ने इस तरह की व्यवस्था कर रखी थी, जिन्हें रूबात कहा जाता है। अब इन पुराने भवनों को तोड़कर नया बनाया जा रहा है। लेकिन इसमें भारतीय मुसलमानों की भूमिका नहीं के बराबर है। यह ज्यादातर शाही परिवार के सदस्यों की मिल्कियत है। ये उन्हें किराए पर देने के लिए अपने एजेंट रखते हैं जो विभिन्न देशों से आने वाले हाजियों को इन भवनों में रहने के लिए तैयार करते हैं, जिस पर उसे कमीशन मिलता है। हज कमेटी ऑफ इंडिया पर भी यह आरोप है कि वह शाही परिवार के सदस्यों की कम सुविधा वाली भवनों को ज्यादा किराए पर हाजियों के लिए लेती है। साथ ही हाजियों से जिस श्रेणी का किराया वसूल किया जाता है, उन्हें वहां न ठहरा कर अत्यंत घटिया मकान में ठहराया जाता है। इस संबंध में हज प्रतिनिधि मंडल में गए हैदराबाद के जस्टिस फखरूद्दीन ने अपनी आपत्ति दर्ज कराते हुए इसकी जांच की मांग की है। हज के दौरान आम तौर पर हाजियों के निवास को लेकर अक्सर शिकायतें आती हैं, जिसकी कोई सुनवाई नहीं होती है। उसे यह कह कर ठंडा करने की कोशिश की जाती है कि हज एक तरह का परिश्रम है, इसके रास्ते में जो परेशानी एवं कठिनाई आए उसे हंसते हुए बर्दाश्त करना चाहिए। इस तरह अपने दायित्वों का निर्वाह करने के बजाए हाजियों की भावनाओं का शोषण किया जाता है।

Saturday, February 12, 2011

`मुस्लिम देशों में जनता की नाराजगी है या इस्लामी बेदारी'

बीते सप्ताह राष्ट्रीय स्तर पर भ्रष्टाचार का मुद्दा चर्चा में छाया रहा जबकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले घटनाक्रम के चलते मिस्र में इंकलाब की दस्तक ने सभी मुद्दों को पीछे छोड़ दिया। राष्ट्रीय समाचार पत्रों की तरह उर्दू के अखबारों ने इस पर अपने सम्पादकीय लिखे और आलेख प्रकाशित किए। पेश है इस बाबत कुछ उर्दू अखबारों की राय।
हैदराबाद से प्रकाशित दैनिक `सियासत' ने `मिस्र में टकराव' के शीर्षक से लिखा है। राष्ट्रपति मिस्र हुस्नी मुबारक को हटाने की कोशिश, अरब देशों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया के किस ढांचे में ले जाएगी इसका अनुमान काहिरा के तहरीर स्क्वायर पर एकत्र लाखों की भीड़ को न हो। लेकिन अरब देशों को यह विश्वास हो गया है कि मध्य पूर्व में जन आंदोलन के पीछे कोई न कोई ताकत जरूर है। 2009 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने काहिरा दौरे में लोकतंत्र के लिए मजबूत केस पेश करते हुए जनता में जो प्रेरणा पैदा की, यह उसी श्रृंखला की कड़ी समझी जा रही है। हुस्नी मुबारक ने मिस्र के हालात के लिए अखवानुल मुसलेमीन को जिम्मेदार ठहराया है तो सत्ता के हस्तांतरण के लिए यह कट्टरपंथी संगठन जनता में किस हद तक विकल्प साबित हो सकेगा, यह कहना मुश्किल है। काहिरा के तहरीर स्क्वायर पर एकत्र होकर विरोध करने वालों में मिस्र के आम नागरिक और मध्य वर्गीय से संबंध रखने वाले भी शामिल हैं। शांतिपूर्ण ढंग से विरोध करने वाली जनता यह अच्छी तरह जानती है कि इनके देश के लिए कट्टरपंथी वर्ग एक मात्र हल नहीं है क्योंकि अखवानुल मुसलेमीन को गलत दिनों होने वाले चुनाव में 30 फीसदी वोट ही मिले थे।
कानपुर, फतेहपुर और लखनऊ से एक साथ प्रकाशित दैनिक `अनवारे कौम' ने `भय का शिकार' शीर्षक से लिखा है। मिस्र के इंकलाब की विशेष बात यह है कि वहां की इस्लाम समर्थक पार्टी `अखवानुल मुसलेमीन' बहुत तेजी से आगे बढ़ रही है। यह वह पार्टी है जिसके हजारों कार्यकर्ताओं, उलेमा और बुद्धिजीवियों को मिस्र की गैर इस्लामी सरकारों ने फांसी पर चढ़ाया और कत्ल किया। राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक के प्रतिद्वंद्वी मोहम्मद अल-बरदाई से इस पार्टी ने कहा है कि वह उनका साथ देगी इस तरह इस बात की संभावना पैदा हो गई है कि मिस्र में इस्लाम समर्थकों की सरकार कायम हो जाए। इस बदलती हुई स्थिति से इस्राइल, अमेरिका तो परेशान हैं ही फ्रांस और ब्रिटेन जैसे इस्लाम विरोधी देश भी बहुत परेशान हैं। उत्तरी अफ्रीका के देश मिस्र में इंकलाब विशेष तौर पर यूरोप के देशों को भी प्रभावित कर सकता है, क्योंकि कई दिनों से चलने वाले प्रदर्शनों ने मिस्र की अर्थव्यवस्था को गड़बड़ा दिया है। दैनिक उपभोग की वस्तुओं के दाम आसमां से बातें कर रहे हैं। इस बात का संदेह पैदा हो गया कि नहर स्वेज बन्द कर दी जाएगी यदि यह बन्द कर दी गई तो सारी दुनिया में तेल की कीमतें आसमां छूने लगेंगी क्योंकि हर दिन पचास जहाज तेल लेकर इस नहर से गुजरते हैं विशेष रूप से यूरोप में जिनता भी तेल सप्लाई होता है वह इसी तरफ से आता है। मिस्र तेल पैदा करने वाला देश नहीं है लेकिन नहर स्वेज एक ऐसी नहर है जो छह हजार किलोमीटर की दूरी को कम करती है और तेल से लदे हुए जहाजों को इसी नहर से गुजरना पड़ता है तभी वह यूरोप में दाखिल हो सकते हैं। इससे साफ स्पष्ट है कि हुस्नी मुबारक के खिलाफ बगावत से यूरोप अत्याधिक प्रभावित होगा, वाणिज्य दृष्टि से भी और वैचारिक दृष्टि से भी मिस्र का यह इंकलाब बहुत अहम है।
कोलकाता और दिल्ली से एक साथ प्रकाशित दैनिक `अखबारे मशरिक' ने `इंकलाब मिस्र को सही दिशा देने और उसकी दशा निर्धारित करने की जरूरत' के तहत लिखा है। मिस्र के राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक का समय खत्म हो गया है और समय की मांग है कि उन्हें सत्ता से अलग हो जाना चाहिए लेकिन वह शरारती बच्चों की तरह जिद पर अड़े हुए हैं। बदहवासी में उन्होंने पुलिस के सिपाहियों को वर्दी उतारकर तहरीर स्क्वायर में प्रदर्शनकारियों पर हमला करने के लिए भेज दिया। मुबारक को समझना चाहिए था कि देश में पुलिस कोई बड़ी ताकत नहीं है, असल ताकत फौज की है जो एक संगठित इकाई है। लेकिन वह उनका साथ देने के बजाय प्रदर्शनकारियों की समर्थक बन गई है। जगह-जगह पुलिस और जनता में तो झड़पें देखने में आईं लेकिन फौज और प्रदर्शनकारियों में कोई टकराव नहीं है। फौज ने स्पष्ट कर दिया है कि वह जनता पर गोलियां नहीं चलाएगी।
वास्तविक लोकतंत्र केवल चुनाव करा देने का नाम नहीं है। मजा तो जब है जब इसका फायदा आम आदमी तक पहुंचे और उसे अतीत और वर्तमान स्पष्ट फर्प महसूस हो। इस उद्देश्य के लिए पूरा लोकतांत्रिक ढांचा नए सिरे से खड़ा करना होगा। हुस्नी मुबारक से छुटकारा पाने के बाद विपक्षी नेताओं को सिर जोड़कर बैठना होगा और जनता की भावनाओं को ध्यान रखते हुए न केवल संविधान को नए सिरे से बनाना होगा बल्कि देश में लोकतांत्रिक समस्याओं का जाल बिछाना होगा।
दैनिक `राष्ट्रीय सहारा' में शकील शम्सी ने अपने स्तंभ `क्या मिस्र में लोकतंत्र ला सकेगी अखवानुल मुसलेमीन'? में लिखा है। मिस्र के नेताओं ने विभिन्न तरह की झूठी घटनाएं अखवान आंदोलन के नाम जोड़कर मिस्र की जनता को गुमराह करने की बहुत कोशिशें कीं लेकिन अखवानुल मुसलेमीन की लोकप्रियता में कमी आने के बजाय दिन प्रतिदिन बढ़ती गई और नतीजा यह हुआ कि मिस्र की जनता सड़कों पर आ गई और आज पहली बार दुनिया में यह बात कही जा रही है कि अखवान को बातचीत में शरीक किया जाना चाहिए। विचित्र संयोग है कि 12 नवम्बर 1949 को हसनुल बन्ना को शहीद किया गया और इसके तीस साल बाद 11 फरवरी को ईरान में इस्लामी क्रांति आई और वहां लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम हुई और फिर एक बार हसनुल बन्ना के शहीदी दिवस के आसपास ही एक और मुस्लिम देश में लोकतंत्र का चिराग जलने वाला है लेकिन पश्चिम के षड्यंत्र के चलते मिस्र में लोकतंत्र का फूल खिलने में विलम्ब हो रहा है। अखवानुल मुसलेमीन के नेतृत्व ने बहुत सूझबूझ का परिचय देते हुए अभी तक स्वयं को जन आंदोलन के पीछे रखा है अन्यथा पश्चिमी मीडिया अब तक इस आंदोलन को अलकायदा और तालिबान से जोड़ चुके होते।
`सहरोजा दावत' ने मुस्लिम देशों में यह नाराजगी है या इस्लामी बेदारी? के शीर्षक से लिखा है। अरब, मध्य एशिया और उत्तरी अफ्रीका के मुस्लिम देशों में जन चेतना की जो लहर देखने को मिल रही है और जिस तरह एक के बाद एक मुस्लिम देशों में सरकार विरोधी प्रदर्शन हो रहे हैं। उसे अधिकतर जीडीपी, गरीबी एवं बेरोजगारी और आर्थिक सुधारों के शीशे से देख रहे हैं। कुछ लोग मानव अधिकार और अभिव्यक्त की आजादी और परिवारवाद के संदर्भ में देख रहे हैं। पश्चिमी मीडिया भी लगभग इसी तरह की सोच रखता है और वह शुरू से इन पहलुओं को पेश कर रहा है। लेकिन विश्व में एक ऐसा वर्ग भी है जो इस जन चेतना को इस्लामी बेदारी बता रहा है। उसका कहना है कि जनता की समस्याएं और सरकार से शिकायत सही है। इससे किसी को इंकार नहीं लेकिन यदि यही सच्चाई होती तो विश्व स्तर की आर्थिक संकट के समय जब अमेरिका सहित सभी यूरोपीय एवं पश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्था पटरी से उतर गई थी। एक के बाद एक दुनिया की बड़ी से बड़ी आर्थिक संस्था दीवालिया हो गई, मध्य पूर्व के किसी भी देश अमेरिका और यूरोप जैसे हालात क्यों नहीं पैदा हुए, जो प्रदर्शन अब हो रहे हैं वह प्रदर्शन आर्थिक संकट के समय क्यों नहीं हुए। अचानक इतने बड़े स्तर पर एक साथ कई देशों में जन चेतना की यह लहर कैसे चल पड़ी?

Thursday, February 10, 2011

दारूल उलूम- साख पर आंच

किसी चिंतक ने सच ही कहा है कि इतिहास अपने आपको दोहराता है। ठीक यही मामला देवबद स्थित अंतरराष्ट्रीय शिक्षण संस्था दारुल उलूम का है। लगभग तीस साल के बाद यह दूसरा मौका है जब दारुल उलूम के मोहतमिम (कुलपति) पद को लेकर विवाद अपनी चरम सीमा पर पहुंच चुका है। अतीत में हुए इस विवाद के चलते ही दारुल उलूम का विभाजन हुआ था। दारुल उलूम की मजलिस शूरा (कार्यकारिणी) के फैसले की बुनियाद पर ही उसके मोहतमिम कारी मोहम्मद तैयब ने दारुल उलूम (वक्फ) बनाकर अपनी राह अलग पकड़ी और जमीअत उलेमा हिंद के अध्यक्ष मौलाना असद मदनी की दारुल उलूम पर पकड़ मजबूत हो गई। कहा जाता है कि ऐसा कांग्रेस की नीति के चलते हुआ क्योंकि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी मुसलमानों की एकजुटता को खत्म कर उन्हें कमजोर करना चाहती थीं। वर्तमान विवाद को इस प्ररिप्रेक्ष्य से अलग कर नहीं देखा जा सकता। फर्क केवल इतना है कि तब मजलिस शूरा ने मदनी परिवार के हक में अपना मत दिया था और अब तीस साल बाद उसने मदनी परिवार को दारुल उलूम से बेदखल कर दिया है।
दारुल उलूम के मोहतमिम मौलाना मरगूर्बुरहमान के निधन के बाद 10 जनवरी को मजलिस शूरा ने अपनी बैठक में बहुसंख्यक मतों के आधार पर मौलाना गुलाम मोहम्मद वस्तानवी को दारुल उलूम के मोहतमिम की जिम्मेदारी सौंपी थी। 21 सदस्यीय शूरा में 4 सदस्यों का निधन हो चुका है, जिनका चुनाव किया जाना बाकी है। जबकि तीन सदस्य किन्हीं कारणों से बैठक में शरीक नहीं हुए। इस तरह 14 सदस्यों में से 8 ने मौलाना वस्तानवी को मोहतमिम बनाने के पक्ष में वोट दिया। चार सदस्यों ने इनके प्रतिद्वंद्वी जमीअत उलेमा हिंद के दूसरे घडे़ के अध्यक्ष एवं दारुल उलूम के शिक्षक और मौलाना वस्तानवी के रिश्तेदार मौलाना अरशद मदनी के पक्ष में और दो सदस्यों ने दारुल उलूम के नायब मोहतमिम मौलाना अब्दुल खालिक मदरासी के पक्ष में अपना मत दिया। साफ और निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया से हताश मौलाना अरशद मदनी के एक रिश्तेदार एवं शूरा सदस्य मौलाना अब्दुल अलीम फारूकी ने यह शिगूफा छोड़ दिया कि मौलाना वस्तानवी कासमी नहीं है। इस पद पर किसी कासमी को ही आसीन करना चाहिए। बतातें चलें कि दारुल उलूम से शिक्षा प्राप्त करने वालों को कासमी कहा जाता है। ऐसा वह मौलाना मोहम्मद कासिम नानोतवी द्वारा दारुल उलूम का गठन किए जाने की याद में अपने नाम के आगे लगाकर करते हैं। कोई कासमी मोहतमिम हो, दारुल उलूम का संविधान इस बाबत मौन है। मोहतमिम के चयन का पूरा अधिकार मजलिस शूरा को दिया गया है।
मजलिस शूरा के इस फैसले की अभी स्याही सूखी भी नहीं थी कि मौलाना वस्तानवी के अतीत के कुछ कामों को लेकर विवाद खड़ा हो गया। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ को दिए साक्षात्कार में मौलाना वस्तानवी ने कहा कि गुजरात में मुसलमानों के साथ भेद-भाव नहीं किया जा रहा है। राज्य में मुसलमानों की आर्थिक स्थित अच्छी है। उन्होंने यह भी कहा कि 8 वर्ष पूर्व हुए दंगों को अब याद करने का औचित्य नहीं है। मौलाना वस्तानवी को गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थन में बयान देने की जरूरत क्यों महसूस हुई? इसे लेकर मुसलमानों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि क्या चर्चा में बने रहने के लिए दारुल उलूम का इस्तेमाल किया जा रहा है। पूर्व में मौलाना मरगूर्बुरहमान के समय इसकी शुरुआत हो चुकी थी लेकिन तब वह एक सीमित दायरे में थी। अब जिस तरह खुल कर राजनीतिक बयानबाजी हो रही है, उससे आम मुसलमानों की नाराजगी बिल्कुल स्वाभाविक है। राजनैतिक पार्टियां जिस तरह दिल्ली स्थित जामा मस्जिद को अपने हित के लिए इस्तेमाल करती हैं बिल्कुल उसी तरह दारुल उलूम का इस्तेमाल किया जा रहा है। जानकारों को इस बात पर आश्चर्य है कि मोलाना वस्तानवी गुजरात जाने के बाद दारुल उलूम की बाबत कहने के बजाए मोदी के राज्य में मुसलमान खुशहाल हैं और वह उन्नति कर आगे बढ़ रहे हैं, जैसे बयान दे रहे हैं। इससे उनकी दिलचस्पी का अनुमान लगाया जा सकता है।
बात यहीं खत्म नहीं हुई बल्कि एक उर्दू दैनिक ‘सहाफत’ ने पहले पेज पर उस फोटो को छापकर उन्हें कठघरे में खड़ा कर दिया, जिसमें महाराष्ट्र के एक मंत्री को मौलाना वस्तानवी के हाथों एक मूर्ति पेश करते दिखाया गया था। यह फोटो कोई साल भर पहले के एक कार्यक्रम का है। इस फोटो ने मौलाना वस्तानवी के खिलाफ माहौल बनाने में अहम भूमिका निभाई। दारुल उलूम के कुछ शिक्षकों ने भी इस बयान को दारुल उलूम की साख को नुकसान पहुंचाने वाला बताया। साथ ही दारुल उलूम की मजलिस शूरा से अपने फैसले पर पुनर्विचार का अनुरोध किया। तनजीम मुहिब्बान दारुल उलूम, देवबंद ने तो शूरा के फैसले पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया। तनजीम के महासचिव मौलाना अरशद रजा कासमी बिजनौरी ने शूरा से सवाल किया है कि क्या दारुल उलूम इतना बांझ हो गया है कि इससे पढ़कर निकलने वाले उलेमा में से कोई नहीं मिल सका कि उसे दूसरी संस्था के पढ़े हुए को लेना पड़ा।
पूरे मामले में नाटकीय मोड़ तब आया जब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनैतिक सलाहकार अहमद पटेल जिनका संबंध भी गुजरात से है और वे मौलाना वस्तानवी के करीबी रिश्तेदार हैं, का बयान उक्त उर्दू दैनिक में प्रकाशित हुआ। जिसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि दारुल उलूम का मोहतमिम किसी योग्य व्यक्ति को बनाया जाए। मौलाना वस्तानवी इस पद के लायक नहीं हैं। उन्होंने अपने इस बयान में मौलाना वस्तानवी के पुत्र मुफ्ती हुजैफा के दावे को भी निरस्त कर दिया, जिसमें उसने कहा था कि अहमद पटेल उसके नाना हैं और गुजरात एवं महाराष्ट्र की कांग्रेस इकाई में वह जो चाहते हैं, वही होता है। पटेल ने यह भी कहा कि जो व्यक्ति मोदी का दोस्त हो सकता है वह मेरा कैसे हो सकता है।
इसी बीच मौलाना वस्तानवी ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि टाइम्स ऑफ इंडिया का जो बयान उनसे संबंधित बताया जा रहा है, उसे तोड़ मोड़कर पेश किया गया है। मैं ऐसी कोई बात जो दारुल उलूम देवबंद और अपने बुजुर्गों की परंपरा एवं मान-सम्मान के खिलाफ है, को सोच भी नहीं सकता। मूर्ति के संबंध में उन्होंने कहा कि यह उनके दुश्मनों का षड्यंत्र है। वस्तानवी ने कहा कि गत वर्ष नवंबर में ईद मिलन समारोह के अवसर पर जिसमें हिंदू और मुस्लिम दोनों शरीक थे, उन्हें महाराष्ट्र के एक मंत्री को मोमेंटो पेश करना था। उस पर तस्वीर बनी हुई थी, वह मूर्ति नहीं थी। उन्होंने जोर देकर कहा कि तस्वीर और मूर्ति में बड़ा फर्क है। जो लोग इस तस्वीर को मूर्ति कह रहे हैं, वह गलत कह रहे हैं।
मौलाना वस्तानवी दीनी शिक्षा के साथ ही आधुनिक शिक्षा में दक्षता रखते हैं। वे गुजरात के निवासी हैं। वे गुजरात एवं महाराष्ट्र में कई कॉलेज एवं मदरसे चला रहे हैं जिनमें हजारों लड़के शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। मजलिस शूरा ने उनका चयन एक ऐसे समय में किया है जब मदरसों की विचारधारा को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस चल रही है। दूसरी ओर उनके करीबी रिश्तेदार मौलाना अरशद मदनी जो मदनी परिवार के मुखिया हैं, की कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह से मुलाकात को कांग्रेस एजेंडा को लागू करने के संदर्भ में देखा जा रहा हैं। जानकर मानते हैं कि अहमद पटेल पहले वस्तानवी के समर्थक थे। उन्होंने इसलिए पाला बदला कि वस्तानवी के दारुल उलूम में आने से मुसलमानों को कांग्रेस के करीब लाने में परेशानी होगी। इसके विपरीत मौलाना अरशद मदनी के आने से उत्तर भारत में मुसलमानों को कांग्रेस से जोड़ने में कामयाबी मिलेगी। चर्चा यह भी है कि 10 जनपथ से इसका ब्लू प्रिंट तैयार हो गया है? लेकिन ऐसा कैसे होगा? क्या मजलिस शूरा जिसने मौलाना अरशद मदनी के खिलाफ फैसला दिया था, पर राजनैतिक दबाव डाला जाएगा या फिर उसमें जो जगहें खाली हैं, उन पर ऐसे लोगों को लाने की कोशिश होगी जो इस मिशन को पूरा करने में अपना सहयोग देंगे। ऐसे ही सवालों पर सबकी निगाहें लगी हुई हैं।