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Sunday, February 17, 2013

`संसद हमला इतना बड़ा और फांसी सिर्प एक को'


अफजल गुरू की फांसी पर चर्चा करते हुए दैनिक `इंकलाब' (नार्थ) के सम्पादक शकील शम्सी ने अपने स्तंभ में लिखा है कि अफजल गुरू को मकबूल भट की तरह फांसी के बाद जेल ही में दफन कर दिया गया। जाहिर है इसकी मौत पर कश्मीर के अलगाववादी लोगों में गम का माहौल है, क्योंकि  उनकी दृष्टि में अफजल गुरू तो एक मुजाहिद था, जिसने कश्मीरियत की लड़ाई  लड़ी। दुर्भाग्य से आतंकवाद अख्तियार करने वालों की दो तस्वीरें दुनिया के सामने होती हैं। एक वर्ग उनको अत्यंत खराब इंसान मानता है जबकि दूसरा वर्ग उनको हीरो का दर्जा देता है जैसा कि पंजाब में भी हो रहा है कि वहां की शिरोमणी अकाली दल की सरकार ऐसे लोगों को शहीद का दर्जा देती है जिन्होंने देश में आतंक का नंगा नाचा दिखाया। इंदिरा गांधी के हत्यारों की तस्वीर अमृतसर के धार्मिक स्थानों पर शहीद के तौर पर लगी हुई हैं। बेअंत सिंह के हत्यारे को जिंदा शहीद का दर्जा दिया गया है। ऐसी ही हमदर्दी अफजल गुरू के साथ कश्मीर के अलगाववादियों को है और इसी कारण वहां इतनी बेचैनी है कि सरकार को पूरी घाटी में कर्फ्यू लगाना पड़ा है। जहां तक अफजल गुरू को फांसी दिए जाने का सवाल है तो भारतीय सरकार ने न्यायिक प्रक्रिया को पूरी तरह साफ रखा है और इसी कारण सजा के आदेश पर अमल होने में इतनी ज्यादा देर लगी। हमारे विचार में देरी के कारण भारत की कानूनी व्यवस्था का सम्मान बाकी रहा।
दैनिक `राष्ट्रीय सहारा' ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि अफजल गुरू को फांसी दिया जाना कानून के सभी पहलुओं की कसौटी पर खरा उतरता है या नहीं, इस पर बहस की जा सकती है और शायद की भी जाए। लेकिन एक बात तय है कि इस अचानक फैसले के पीछे सियासी पहलू छुपा हुआ है। यह बात आमतौर पर जानी जाती है कि अफजल गुरू को फांसी न दिया जाना भाजपा और शिवसेना के हाथों में एक बहुत प्रभावी हथियार बन गया था, जिसका दोनों ने कांग्रेस के खिलाफ जी भर इस्तेमाल किया और यह कहकर किया कि अफजल गुरू को फांसी इसलिए नहीं दी जा रही है कि कांग्रेस आतंकवादियों के प्रति नरमी की नीति पर काम कर रही है। इस  बाबत इस तर्प को भी चुटकियों में उड़ा दिया जाता था कि अफजल गुरू ने राष्ट्रपति से दया की अपील की थी और इनकी अपील का नम्बर पहला नहीं था। इसके पूर्व अजमल कसाब के प्रति भी भाजपा और शिवसेना का यही दृष्टिकोण था। इसलिए जब अचानक कसाब को फांसी दी गई तो भाजपा और शिवसेना सन्नाटे में आ गईं। उनका एक अहम हथियार खत्म हो गया। भाजपा यूरोपीय यूनियन की ओर से नरेन्द्र मोदी का बायकाट खत्म किए जाने को अपनी लिए और नरेन्द्र मोदी के लिए शुभ साबित करने और प्रधानमंत्री पद के लिए नरेन्द्र मोदी की उम्मीदवारी मजबूत करने का फैसला कर चुकी थी। यदि अफजल गुरू की फांसी पर ब्रेकिंग न्यूज का दर्जा न अख्तियार कर लेती तो नरेन्द्र मोदी और उनके माध्यम से भाजपा मीडिया पर छाई रहती।
आल इंडिया मुस्लिम मजलिस मुशावरत (शहाबुद्दीन ग्रुप) के अध्यक्ष डॉ. जफरुल इस्लाम खां ने अपने बयान में कहा कि यह कानूनी और नैतिक स्तर पर जल्दबाजी में उठाया गया इंसाफ के विरुद्ध कदम है। अफजल ने बार-बार दावा किया था कि वह एक  पुलिस अधिकारी द्वारा भेजा गया था लेकिन इस दावे की कोई जांच नहीं की गई।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला भी विचारणीय है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि `इस दर्दनाक घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था और हमारा समाज सिर्प इस बात पर संतुष्ट होगा कि हमला करने वालों को फांसी की सजा दी जाए।'
`संसद हमला इतना बड़ा और फांसी सिर्प एक को क्यों ' के शीर्षक से सहरोजा  `दावत'ने लिखा है कि संसद के शीत सत्र के पूर्व मुंबई हमले के आरोपी अजमल कसाब को तुरन्त 21 नवम्बर 2012 को  पुणे की जेल में फांसी दे दी गई और अब इसके ठीक 79 दिन बाद अर्थात 9 फरवरी 2013 को संसद हमला केस में अफजल गुरू को फांसी दे दी गई और इसे भी कसाब की तरह जेल में ही दफन कर इस अध्याय को बंद कर दिया गया, यह भी संयोग है कि दोनों मामलों में केवल एक-एक व्यक्ति को फांसी दी गई, जबकि इस मामले को देश-विदेश में जिस तरह पेश किया गया था, केवल एक-एक व्यक्ति की फांसी एक तरह से उसका अपमान है। इसे सांकेतिक सजा कहकर अध्याय को बंद करना ही कहेंगे।
 हमला करने वालों को फांसी तो दे दी लेकिन यह सवाल आज भी अपनी जगह है, सुरक्षा में जिन से चूक हुई या हमले की रोकथाम में सुरक्षा एजेंसियां या सरकारें नाकाम हुईं, उनको कब सजा होगी, क्या केवल हमला करने वालों को घटनाओं के लिए जिम्मेदार ठहरा देना और केवल उनको ही सजा देना समस्या का हल है या जिन लोगों ने अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभाई, उसको भी सजा दिलाना जरूरी है।
`अफजल गुरू को फांसी दे दी गई और दी भी जानी चाहिए थी लेकिन इसमें इतनी जल्दी और छुपाने का तुक क्या है' के शीर्षक से कोलकाता और नई दिल्ली से प्रकाशित दैनिक `अखबारे मशरिक' ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि कांग्रेस 2014 के आम चुनाव से पूर्व आंतरिक सुरक्षा के हवाले से आतंकियों को फांसी पर लटका कर अपने सियासी हित को बढ़ावा दे रही है और यह कि इस समय वह 13 व्यक्ति जिन्हें फांसी पर लटकाया जाना है उनका किस्सा जल्द से जल्द खत्म कर वह वाहवाही लूटना चाहती है। संभव है कि इस विश्लेषण में कुछ सच्चाई भी हो लेकिन 13 व्यक्तियों को फांसी पर लटका कर कांग्रेस चुनावी किला नहीं जीत सकती। इसके बावजूद यह बात उल्लेखनीय है कि सरकार हर मामले में संदेह पैदा करती है। कसाब को फांसी देने में भी जल्दबाजी की गई। दिल्ली गैंगरेप की शिकार निर्भय को सिंगापुर ले जाने और उसके अंतिम संस्कार किए जाने तक यही स्थिति देखने को मिली। यह किसी जन हित सरकार की निशानी नहीं हो सकती कि वह जन हित मामलों को छुपाए और अपने कामों संदेह के घेरे में  लाए।
`कसाब बनाम अफजल ः एक आतंक का चेहरा तो दूसरा शैतानी दिमाग' के शीर्षक से दैनिक `प्रताप' के सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि संसद हमले के साजिशकर्ता अफजल गुरू की फांसी की खबर के साथ ही हर हिन्दुस्तानी के जेहन में एक और फांसी की अनदेखी तस्वीर कौंध जाती है। मुंबई पर कहर बरपाने वाले अजमल आमिर कसाब का कारनामा भले ही अलग हो लेकिन दोनों का इरादा एक था और अंजाम भी एक सा हुआ। एक ने देश के आर्थिक केंद्र को तो दूसरे ने राजनैतिक केंद्र को निशाना बनाया। इसमें से एक विदेशी था तो दूसरा देसी लेकिन दोनों की कमान पाकिस्तान में ही थी। दोनों को कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने फांसी पर लटकाया। दोनों ही मामलों में पाकिस्तान बार-बार अपनी किसी भी भूमिका से पूरी तरह इंकार करता रहा लेकिन उसकी भूमिका साफ थी।

Tuesday, January 8, 2013

एफडीआई और मुस्लिम अल्पसंख्यक


`अभी लंबी है एफडीआई की राह' के शीर्षक से दैनिक `पताप' के सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि वालमार्ट ने अमेरिकी सीनेट को दी गई अपनी रिपोर्ट में स्वीकार किया है कि उसने भारत में निवेश तथा अन्य लाबिंग गतिविधियों पर 2008 से अब तक 2.5 करोड़ डालर (लगभग 125 करोड़ रुपए) खर्च किए हैं। इसमें भारत में एफडीआई पर चर्चा से सम्बन्धित मुद्दा भी शामिल है। तिमाही के दौरान वालमार्ट ने अमेरिकी सीनेट, अमेरिकी पतिनिधि सभा, अमेरिकी व्यापार पतिनिधि (यूएसटीआर) और अमेरिकी विदेशी विभाग के समक्ष अपने मामले में लाबिंग की। अमेरिका में कंपनियों को किसी मामले में विभागों या एजेंसियों के समक्ष लाबिंग की अनुमति तो है लेकिन लाबिंग पर हुए खर्च की रिपोर्ट तिमाही आधार पर सीनेट में देनी होती है। इधर जैसी उम्मीद थी अमेरिका ने एफडीआई को मंजूरी देने के फैसले का स्वागत किया है। उसने कहा कि इससे दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग मजबूत होंगे। विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार के इस फैसले के मूर्त रूप लेने में अभी समय लगेगा। क्योंकि सरकार ने एक शर्त जोड़ी है जिसके अनुसार एफडीआई का कम से कम 50 फीसदी हिस्सा तीन साल के भीतर कोल्ड स्टोरेज के लिए जमीन खरीदने या किराये को इन्फास्ट्रक्चर खर्च नहीं माना जाएगा। सरकार ने मल्टीब्रांड रिटेल में एफडीआई पर भले ही सदन के दोनों सदनों की मंजूरी हासिल कर ली है लेकिन आम आदमी को विदेशी किराना स्टोर के लिए अभी इंतजार करना पड़ेगा।
`गुजरात के मतदाताओं की परीक्षा' के शीर्षक से हैदराबाद से पकाशित दैनिक `ऐतमाद'ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि गुजरात चुनाव के जो ओपिनियन पोल के नतीजे सामने आए हैं उनमें बताया गया है कि मोदी को स्पष्ट बहुमत हासिल होगा। भाजपा को ज्यादा सीटें मिलेंगी लेकिन इसके वोटों का पतिशत 2007 के मुकाबले घट जाएगा। 2007 में पार्टी ने 49.12 फीसदी वोट हासिल किए थे लेकिन नए पोल में वह 47 फीसदी वोट हासिल कर पाएगी। मोदी सरकार ने गुजरात में विकास से सम्बन्धित तथाकथित तहकीकात पर आधारित किताब छापी है जो सच्चाई के खिलाफ है। 2007 के चुनाव 2002 में गुजरात नरसंहार के बाद हुए थे जिसमें दो हजार से अधिक मुसलमानों की हत्या के लिए गुजरात सरकार जिम्मेदार थी। इस चुनाव के नतीजों ने मोदी के कैरियर को हमेशा के लिए खत्म करने की बजाय उन्हें एक नई जिंदगी दे दी। गुजरात के बहुसंख्यक समुदाय ने भाजपा विशेष कर मोदी के लिए वोट बैंक का काम किया। पधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह जब इस सच्चाई को पेश करते हैं कि गुजरात में अल्पसंख्यक खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं और मोदी की भेद-भाव पूर्ण नीतियों ने हिन्दुओं और मुसलमानों में एक दरार डाल दी है, तो यह सच्चाई नरेन्द्र मोदी को कड़वी मालूम होती है और वह पधानमंत्री पर आरोप लगाते हैं कि वह वोट बैंक की राजनीति कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि मोदी की वोट बैंक की सियासत पर किसी पकार की पतिकिया उन्हें पसंद नहीं इसलिए उन्होंने उलटे कांग्रेस पर जवाबी हमले शुरू कर दिए हैं। देखना यह है कि गुजरात के मतदाता नरेन्द्र मोदी से छुटकारा हासिल कर पाएंगे?
`फौज और पुलिस के हत्यारे अधिकारी' के शीर्षक से दैनिक `सहाफत' ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि मानव अधिकार से सम्बन्धित एक समूह और लापता व्यक्तियों के अभिभावकों के एक संगठन ने दावा किया है कि जम्मू-कश्मीर में फौज और पुलिस के सैकड़ों ऐसे व्यक्ति हैं जो मानव अधिकारों के उल्लंघन की गंभीर घटनाओं में लिप्त हैं, मुकदमा नहीं चलाया गया। यह दो ग्रुप हैं मानव अधिकार और इंसाफ के लिए इन्टरनेशनल पीपुल्स ट्रिब्यूनल और श्रीनगर में स्थित लापता लोगों के अभिभावकों के संगठन की तैयार की हुई रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि भारतीय फौज के तीन ब्रिगेडियर, कर्नल, तीन लेफ्टिनेंट कर्नल, 78 मेजर, 25 कैप्टन और केन्द्र के अर्धसैनिक बलों के 37 वरिष्ठ अधिकारी राज्य में विभिन्न अपराध और मानव अधिकारों के उल्लंघन के दोषी हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि मानव अधिकारों के उल्लंघन में हत्या, अपहरण, दुष्कर्म, हिंसा और जबरदस्ती गायब करने की घटनाएं शामिल हैं। यह रिपोर्ट राज्य के सरकारी कागजों की बुनियाद पर दो साल में तैयार हुई है। इस पर अभी सरकार की पतिकिया सामने नहीं आई है। गोतम नवलखा और पेस कान्पेंस में मौजूद लोगों ने बताया कि यह रिपोर्ट मुख्यमंत्री और पधानमंत्री को भेजी जा चुकी है ताकि आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई हो सके। दोनों ग्रुपों ने बताया कि वह आरोपियों के खिलाफ ठोस सबूत नहीं पेश कर सकते लेकिन इन लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए काफी शहादतें मौजूद हैं।
मुस्लिम युवाओं की गिरफ्तारी और सरकार के आश्वासन पर चर्चा करते हुए दैनिक`इंकलाब' ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि कांग्रेस के सिर पर इस समय चुनाव सवार है। 2012 के गुजरात चुनाव, 2013 के कुछ अहम विधानसभा चुनाव और फिर 2014 के आम चुनाव। इसके बावजूद इस सरकार को ज्यादा दिलचस्पी उन कामों से है जिनकी बुनियाद पर उसे समाचार पत्रों और टीवी की ब्रेकिंग न्यूज में जगह मिल जाए ताकि दुनिया को यह बताया जा सके कि वह सकिय है। पाकृतिक पाथमिकता के चयन की बजाय चुनावी सियासत को सामने रखकर तय की जा रही पथमिकता के चलते कांग्रेस और यूपीए सरकार काम करते हुए तो दिखाई दे रही हैं लेकिन समस्याएं हल नहीं होतीं। इस संदर्भ में जब हम आतंकी मामलों में पकड़े गए मुस्लिम युवाओं के बारे में सोचते हैं तो महसूस होता है कि बार-बार की याददहानी अपील और विरोध के बावजूद यूपीए सरकार इस विषय में चिलचस्पी नहीं ले रही है जबकि अब किसी संदेह की गुंजाइश नहीं रह गई है। कई मामलों में बिल्ली के थैले से बाहर आने के बाद भगवा संगठनों से जुड़े तत्व गिरफ्तार किए गए और कई दूसरे मामलों में सम्मानित अदालतों ने मुस्लिम युवाओं को बाइज्जत रिहा करके जांच एजेंसियों की भूमिका पर सवालिया निशान लगा दिए। 3 दिसम्बर को विभिन्न सियासी पार्टियों के 16 सांसदों के एक पतिनिधि मंडल ने पधानमंत्री से मुलाकात कर उनका ध्यान मुस्लिम युवाओं की गिरफ्तारी, कमजोर, मुकदमों, उनके साथ सख्त रवैया और बाइज्जत बरी होने के बावजूद उनके साथ सौतले व्यवहार की ओर दिलाया। पधानमंत्री ने गृहमंत्री एवं गृहसचिव को बुलाकर उनसे बात करने और एक मेकानिज्म तैयार करने का आश्वासन दिया है और अभी तक आश्वासन से आगे बात नहीं बढ़ सकी है। अब इस सरकार को कौन समझाए कि मुस्लिम युवकों की रिहाई भी इसके चुनावी हित में है।
`एफडीआई और मुस्लिम अल्पसंख्यक' के शीर्षक से `सहरोजा दावत' में मोहम्मद सिबगत उल्ला नदवी ने लिखा है कि क्या देश के मुसलमान भी इससे पभावित होंगे, इस बाबत कोई भी कुछ कहने को तैयार नहीं है। खुद मुसलमान भी इस पहलू से नहीं सोच रहे हैं। जब समाज का हर वर्ग सरकारी फैसले को अपने फायदे और नुकसान की दृष्टि से देख रहा है तो मुसलमान सोते रहते हैं और जब उन फैसलों के खतरनाक पभाव उन पर पड़ते हैं और उन्हें नुकसान होता हुआ दिखाई देता है तो उन्हें अफसोस करने का मौका भी नहीं मिलता है। जैसा कि सरकारी नौकरियों में इनकी हिस्सेदारी का हुआ। आजादी के समय सरकारी नौकरियों में इनकी जो हिस्सेदारी 35 फीसदी थी वह योजनावद्ध तरीके से घटते-घटते लगभग 2.5 फीसदी हो गई तो अब जाकर इनकी आखें खुली हैं लेकिन इस नुकसान की भरपाई की कोई सूरत नजर नहीं आ रही है। मुसलमानों के लिए पाइवेट सेक्टर के दरवाजे भी बंद करने की साजिश हो रही है। मुसलमानों के सामने नौकरी के अवसर कम हैं इनके सामने छोटे कारोबार करना और खुद को रोजगार से जोड़ना मजबूरी है। सच्चर कमेटी ने भी यह बात कही है कि मुसलमानों का अनुपात नौकरियों के मुकाबले खुद के रोजगार में ज्यादा है। पैसे की कमी से वह बड़ा कारोबार नहीं कर सकते। इसके लिए रिटेल कारोबार से जुड़े हैं। एफडीआई से संभव है कि कुछ रोजगार मिल जाए लेकिन बेरोजगार वालों का फीसदी ज्यादा होगा, बहुत से किसान भी मुसलमान हैं उनको भी नुकसान पहुंच सकता है।

Tuesday, September 18, 2012

`जुर्म एक तो सजा अलग-अलग क्यों?'


`हिन्दुत्वा सिपाही-गोगोई' के शीर्षक से दैनिक `जदीद मेल' ने अपने सम्पादकीय में असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई द्वारा `कम शिक्षित मुस्लिम घरों में ज्यादा बच्चे पैदा होते हैं' के बयान पर चर्चा करते हुए लिखा है कि असमी मुसलमानों के संबंध में गोगोई का यह बयान न केवल अफसोसजनक है बल्कि यह एक खतरनाक बयान है। संघ परिवार 1960 और 1970 के दशक से न केवल असम बल्कि पूरे देश के मुसलमानों के संबंध में यह प्रचार करा रहा है कि मुसलमानों के यहां ज्यादा बच्चे पैदा होते हैं। इस तरह के गलत बयान का मकसद हिन्दुओं में मुसलमानों के प्रति भय पैदा करना है। यदि किसी प्रकार की धारणा किसी एक समुदाय के बारे में दूसरे समुदाय के मन में बैठ जाए तो जब अल्पसंख्यकों पर हमले होते हैं और उनके लोग मारे जाते हैं तो बहुसंख्यक के लोग मानसिक रूप से संतोष और खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं। सिर्प इतना ही नहीं बल्कि अल्पसंख्यकों को मारने वालों को खुद अपना संरक्षक समझते हैं। गोधरा 2002 में साबरमती एक्सप्रेस में कारसेवकों के मारे जाने के बाद गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुजरात के मुसलमानों के खिलाफ यही रणनीति अपनाई थी जिससे वह गुजराती हिन्दुओं के न केवल हीरो बन गए थे बल्कि वह उनके अंगरक्षक भी कहे जाने लगे थे। गोगोई का मुसलमानों के खिलाफ गलत बयान देने का सियासी मकसद है इसके द्वारा वह आगामी चुनाव में मोदी की तरह हिन्दुत्व के हीरो बनकर उभरना चाहते हैं। उन्हें यह मालूम है कि उन्हें मुस्लिम वोट नहीं मिलने वाला है तो फिर क्यों न हिन्दू वोट बैंक को पूरी तरह अपने हक में कर लिया जाए। नरसिम्हा राव के बाद गोगोई दूसरे कांग्रेसी नेता हैं जो कांग्रेस के सेकुलर विचारों के बजाय खुलकर हिन्दत्ववादी विचारों की ओर झुके हैं। यह बात कांग्रेस और देश दोनों के लिए खतरनाक है।
दैनिक `जदीद खबर' ने `मुस्लिम आबादी का भय' के शीर्षक से लिखा है कि मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने अपने साक्षात्कार में इस धारणा को बेबुनियाद करार दिया है कि मुसलमान हमेशा कांग्रेस को वोट देते हैं। उन्होंने कहा कि मुसलमानों ने कभी भी 50 फीसदी से ज्यादा वोट कांग्रेस को नहीं दिया। उन्होंने इस बाबत मुस्लिम आबादी वाले 126 विधानसभा क्षेत्रों की समीक्षा भी पेश की। असम एक ऐसा राज्य है जो शुरू से ही मुस्लिम बहुल रहा है। यहां के मुसलमान गरीब और परेशानी की जिंदगी गुजारते रहे हैं। उस पर से उन पर बंगलादेशी होने का आरोप लगाकर उनकी हत्या की जाती है। असम में बोडो बहुल क्षेत्रों में मुसलमानों के खिलाफ वर्तमान हिंसा उन्हें मजबूर करना है ताकि वह इन आबादियों को खाली करके कहीं और जा बसें। यही कारण है कि  बड़े पैमाने पर उनके मकान जलाए गए, उनकी जमीनों पर कब्जा कर लिया गया और उन्हें कारोबार से वंचित कर दिया गया। ऐसे में राज्य के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई इनके जख्मों पर मरहम रखने के बजाय नमक छिड़कने का काम कर रहे हैं। मुसलमानों की आबादी को चिन्हित करके इसमें वृद्धि का प्रचार और इसके लिए अशिक्षा को जिम्मेदार बताना, वास्तव में एक सांप्रदायिक सोच है जिसका इजहार मुख्यमंत्री ने खुलकर किया है।
`महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे का बिहारियों के खिलाफ ऐलान जंग, केंद्र एवं राज्य सरकार मौन क्यों?' के शीर्षक से साप्ताहिक `अल जमीअत' में सम्पादक मोहम्मद सालिम जामई ने अपने विशेष  लेख में चर्चा करते हुए लिखा है कि राज ठाकरे के हौसले इतने बढ़ चुके हैं कि वह अब खुद को कानून से भी ऊपर की कोई चीज समझने लगा है, इसके बावजूद भी यदि हमारी केंद्र एवं राज्य सरकारें मौन हैं तो हम इसे देश व कौम के दुर्भाग्य के अतिरिक्त और क्या कह सकते हैं। राज ठाकरे की इस घृणित राजनीति को हवा देने वाले नेताओं को भी यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि संघी ढांचे में क्षेत्र का मसला अत्यंत खतरनाक साबित हुआ करता है। ऐसी सूरत में एक गुंडे और सिरफिरे व्यक्ति का संरक्षण खुद उनके लिए भी खतरनाक साबित होगा। यह मसला सिर्प महाराष्ट्र का नहीं है बल्कि पूरे देश का मसला बन चुका है। इसलिए केंद्र सरकार को भी इस पर विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए।
`जुर्म एक तो सजा अलग क्यों' के शीर्षक से `सहरोजा दावत' ने 1 सितम्बर 12 के एशियन ऐज में `द लिटिल मैग्जीन' के सम्पादक अतरादेव सेन द्वारा 29 अगस्त के सुप्रीम कोर्ट और अहमदाबाद की विशेष अदालत दोनों के फैसलों की समीक्षा के हवाले से लिखा है कि दोनों ही घटनाओं अर्थात् गुजरात के नरोदा पाटिया की सांप्रदायिक हिंसा और अजमल कसाब के आतंक ने पूरे देश को हिला दिया था, जिसका फैसले में भी जिक्र किया गया है लेकिन माननीय न्यायाधीशों ने नरोदा पाटिया की हिंसा के लिए 32 व्यक्तियों को आरोपी मानने के बावजूद केवल उम्रकैद की सजा सुनाई। इस हिंसा में 97 मुसलमानों को मौत के घाट उतार दिया गया था। इसके बावजूद मुसलमानों की हत्या करने वाले किसी अपराधी को मौत की सजा नहीं सुनाई गई। दूसरी तरफ गुजरात के ही गोधरा ट्रेन में आग लगने के आरोप में 11 मुसलमानों को यह सजा सुनाई जा चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात दंगों के अहम मुकदमों की जांच के लिए विशेष टीम गठित करते हुए यह टिप्पणी की थी कि दंगा आतंकवाद से ज्यादा खतरनाक है। फिर आतंकी और दंगा के मुकदमों में सजाओं का स्तर अलग क्यों है?
`और अब दिल्लीवासियों को बिजली का झटका' के शीर्षक से दैनिक `प्रताप' के सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि राजधानी वासी बिजली के बिलों से परेशान हैं, उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि यह हो क्या रहा है? हर कोई बिजली की खपत कम करने की कोशिश कर रहा है। बावजूद इसके बिजली का करंट बढ़ता जा रहा है। बिजली कम्पनियों के `पॉवर गेम' की वजह से उपभोक्ता को कम बिजली खर्च करने पर भी ज्यादा बिल अदा करना पड़ रहा है। बिजली टैरिफ के मुताबिक अगर एक महीने में 200 यूनिट से कम बिजली खर्च करेंगे तो प्रति यूनिट 3.70 रुपए देने होंगे और इसमें सरकार एक रुपए की सब्सिडी भी देती है। लेकिन अगर खर्च 200 यूनिट से ज्यादा और 400 यूनिट से कम है तो प्रति यूनिट 4.80 रुपए और इससे ज्यादा बिजली खर्च करने पर 6.40 रुपए देने होंगे। बिल दो महीने का एक साथ आता है।
अगर एक महीने में 195 यूनिट खर्च है और दूसरे महीने में 290 यूनिट है तब भी आपको 4.80 रुपए चुकाने पड़ेंगे। आरडब्ल्यूए के अनुसार बिजली कम्पनियां 10-15 करोड़ रुपए एक्स्ट्रा ले रही हैं। यह रिटेल लूट कर होलसेल फायदा जैसा है।