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Tuesday, January 8, 2013

दुष्कर्मियों को मौत की सजा


महिलाओं के प्रति बढ़ती हिंसा पर चर्चा करते हुए वरिष्ठ पत्रकार एम वदूद साजिद ने दैनिक `इंकलाब' के स्तंभ में लिखा है कि मैंने 12 वर्ष पूर्व एक महिला कामरेड नेता का साक्षात्कार लिया था। साक्षात्कार के दौरान महिलाओं का यौन शोषण और हिंसा पर चर्चा करते हुए उन्होंने पूछा था कि अरब देशों में इस तरह की घटनाएं क्यों नहीं होती हैं? कई गैर मुस्लिम नेता भी इस तरह का विचार व्यक्त करते रहे हैं। महात्मा गांधी ने अपराध, भ्रष्टाचार और अन्य सामाजिक बुराइयों पर काबू पाने के लिए हजरत उमर की खिलाफत (शासन) को पसंद किया था। ताजा घटनाक्रम में यहां के कुछ नेतागण दोषियों को फांसी की सजा देने की मांग कर रहे हैं। समाजवादी पार्टी के एक मुस्लिम सांसद ने संसद में बहस के बीच दोषियों को इस्लामी कानून के अनुसार सजा देने की मांग की। हत्या और लूटपाट की घटनाओं में शराब की बड़ी भूमिका होती है। सवाल यह है कि इस खराब चीज की पैदावार और उसे बेचने पर पूर्ण प्रतिबंध क्यों नहीं लगा दिया जाता? सरकार, नेता और अधिकारी इस कारोबार से अरबों रुपए कमाते हैं। दिल्ली की मुख्यमंत्री और गृहमंत्री ऐसी घटनाओं को रोकने के प्रयासों में व्यस्त हैं लेकिन किसी ने भी शराब के पीने पर पाबंदी के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा। शायद भारत में शराब पर प्रतिबंध इसलिए भी नहीं लगाया जा सकता क्योंकि इस्लाम ने इसे हराम करार दिया है। वरिष्ठ पत्रकार शकील शम्शी ने सही लिखा है कि मुस्लिम मोहल्लों में महिलाएं पूर्ण संरक्षण के साथ घूमती हैं जबकि अन्य इलाकों में महिलाएं रात नौ बजे के बाद घरों से बाहर नहीं निकल सकतीं।
दुष्कर्मियों को सजा ए मौत दिए जाने की मांग पर दैनिक `राष्ट्रीय सहारा' ने `क्या सजा ए मौत वास्तविक इलाज है' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखा है कि इस पर विचार क्यों नहीं किया जाता कि यह घृणित कार्य समाज में शामिल कुछ व्यक्तियों की आपराधिक मानसिकता के कारण होते हैं अथवा हमारे समाज में ऐसी कोई बुराई आ गई है जिसका इलाज शायद सजा ए मौत भी  नहीं है। टीवी पर ऐसे शो दिखाए जाते हैं जिनमें बताया जाता है कि शादी से पूर्व आपसी संबंध बना लेने में कोई खराबी नहीं है, मर्द और औरत शादी के बिना भी मियां-बीवी की तरह एक-दूसरे के साथ रह सकते हैं। अदालतें भी अब लिव इन रिलेशनशिप को स्वीकार करने लगी हैं। जब गुजरात जैसे राज्यों में एक मर्द को दूसरी औरत को रखना कानूनी संरक्षण हासिल हो जाता है तो आम सोच कन्फ्यूज हो जाती है। गुजरात विधानसभा ने वर्षों पूर्व यह कानून पास किया था कि एक शादीशुदा मर्द दूसरी औरत भी रख सकता है, लेकिन इससे शादी करना गैर कानूनी होगा क्योंकि हिन्दू मैरिज एक्ट के तहत एक से ज्यादा बीवी रखना जुर्म माना जाएगा। दिल्ली के विजय चौक पर जिस गुस्से का इजहार हुआ, वह बिल्कुल सही है उसी दिन कालेज के एक छात्र ने अपनी क्लासफेलो को इसलिए चाकू मार दिया कि उसने शारीरिक संबंध बनाने की इजाजत नहीं दी। विरोध प्रदर्शन करने वालों को यह नहीं भूलना चाहिए कि सिर्प कानून इस मानसिकता का इलाज नहीं है।
पाकिस्तान के विदेश मंत्री रहमान मलिक के भारत दौरे पर चर्चा करते हुए हैदराबाद से प्रकाशित दैनिक `मुनसिफ' ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि कुल मिलाकर उनका दौरा दोनों देशों के लिए बड़ी कामयाबी के तौर पर साबित नहीं हुआ। ऐतिहासिक आसान वीजा व्यवस्था पर हस्ताक्षर से जनता को क्या फायदा पहुंचेगा, यह तो आने वाला समय ही बताएगा लेकिन इसकी कार्यप्रणाली में आसानी से व्यवसाय के लिए नए अवसर जरूर पैदा किए हैं। इस एक सकारात्मक कदम के अलावा दोनों देशों के नेतागण अन्य मुद्दों पर गंभीरता से बातचीत करने में नाकाम रहे। मेहमान मंत्री ज्यादातर भारत को आतंकी समस्याओं से संबंधित मसलों को विवादित करने की कोशिश करते रहे जिससे यह जाहिर होता है कि पड़ोसी देश इन मामलों से निपटने के लिए गंभीरता से बातचीत के लिए तैयार नहीं है। मलिक के उलटे-सीधे बयानों ने भारतीय शासकों को नाराज कर दिया जबकि भारत दौरे पर आने से पूर्व मलिक ने कहा था कि वह दोनों देशों के बीच संबंधों को और बेहतर बनाने के इच्छुक हैं। ऐसी भड़काऊ टिप्पणी के कारण दौरे के खत्म होने से पूर्व दोनों देशों के विदेश मंत्रियों ने संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस को भी संबोधित नहीं किया। इस समय दोनों देशों की समस्याओं में कई समानता पाई जाती है और यदि इस बाबत गंभीरता का प्रदर्शन नहीं किया गया तो यह समस्याएं हम पर और छा जाएंगी जिसके नतीजे हम 50 साल से भी अधिक समय से देख रहे हैं।
`अब इजरायल करेगा हिन्दुस्तान की सुरक्षा' के शीर्षक से साप्ताहिक `नई दुनिया' ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि गत कुछ वर्षों के दौरान भारत को लगभग 9 बिलियन डालर के हथियार बेचने वाला अमेरिका हक्का-बक्का खड़ा है, क्योंकि इजरायल ने आधुनिक सुरक्षा व्यवस्था और हथियारो पर आकर्षित पेशकश के साथ भारत को अमेरिकी हथियारों का सौदा खत्म करने पर मजबूर कर दिया है। आश्चर्य की बात यह है कि फलस्तीन के संबंध में हिन्दुस्तान के स्पष्ट दृष्टिकोण के बावजूद हिन्दुस्तान से दूरी बनाने की बजाय इजरायल नजदीकी चाहता है क्योंकि उसकी नजर हिन्दुस्तान के रक्षा बजट पर है जो इजरायल की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का काम करेगी। वर्तमान में भारत एशिया में इजरायल से व्यवसाय करने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश है।
अमेरिकी खुफिया विभाग के मुताबिक `इस्लामी आतंकवाद 2030 तक खत्म हो सकता है' पर `सहरोजा दावत' में सम्पादक परवाज रहमानी ने अपने बहुचर्चित स्तंभ `खबरो नजर' में चर्चा करते हुए लिखा है कि टाइम्स आफ इंडिया में प्रकाशित यह रिपोर्ट बताती है कि पूर्ण रूप से इसके खत्म होने की संभावना नहीं है बल्कि इसका क्षेत्र आर्थिक और वित्तीय आतंक के रूप में और फैल सकता है। अमेरिका की नेशनल इंटेलीजेंस कौंसिल की इस रिपोर्ट का नाम है `ग्लोबल ट्रेंडस 2020'। इसमें विभिन्न पहलुओं से विश्व रुझानों का जायजा लिया गया है और आगामी 18 सालों में होने वाली घटनाओं की भविष्यवाणी भी की गई है। इस रिपोर्ट द्वारा दरअसल अमेरिका दुनिया को यह बताना चाह रहा है कि वह अगले 18 वर्षों में क्या करने वाला है। रिपोर्ट के अनुसार वह विरोधी देशों की अर्थव्यवस्था को कमजोर बल्कि तबाह और दोस्त देशों की अर्थव्यवस्था पर कंट्रोल करने वाला है। `इस्लामी आतंक' से लड़ने के नाम पर दुनिया के विभिन्न भागों में अपने एजेंटों द्वारा हिंसक घटनाएं करवाएगा। इसके लिए इस्लामी ग्रुपों को जिम्मेदार करार देकर इस्लाम और मुसलमानों के खिलाफ अपनी शैतानी मुहिम को और तेज करेगा। वह जानते हैं कि इस्लामी व्यवस्था आएगी तो अपने साथ ब्याज रहित अर्थव्यवस्था लाएगी जो अमेरिका और यहूदियों की ब्याज आधारित प्रणाली को खत्म कर देगी। इसीलिए दुनिया को इस्लाम से भयभीत करने के लिए अमेरिका नए-नए तरीके इस्तेमाल कर रहा है।
`ब्लादिमीर पुतिन भारत आपका सम्मान करता है, स्वागत करता है' के शीर्षक से दैनिक`प्रताप' के सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने भारत यात्रा के दौरान 42 सुखोई लड़ाकू विमानों और 71 मीडियम लेफ्ट हेलीकाप्टर के चार अरब डालर मूल्य के रक्षा सौदों पर हस्ताक्षर किए। इसके तहत रूस के आधुनिकतम सुखोई-30 एमकेआई युद्धक विमानों का भारत में उत्पादन होगा तथा रात में सैन्य कार्यवाही करने में सक्षम 71 सैनिक हेलीकाप्टर रूस से खरीदे जाएंगे। रूसी राष्ट्रपति और भारतीय प्रधानमंत्री ने दोनों देशों की 13वीं शिखर बैठक में द्विपक्षीय संबंधों पर भी चर्चा की। इस दौरान दोनों देशों के बीच रणनीतिक व व्यापारिक संबंधों को और मजबूत करने के लिए करीब 10 समझौतों पर करार हुए। ब्लादिमीर पुतिन हमारे सम्मान के हकदार हैं। वर्ष 2000 में सत्ता संभालने के बाद उन्होंने भारत-रूस संबंधों को येल्तसिन युग से बाहर निकालकर एक नई दोस्ती की शुरुआत की है।

महिलाओं पर बढ़ता अत्याचार, कानून से ज्यादा समाज सुधार की जरूरत


समाजवादी पार्टी द्वारा संसद में मुस्लिम आरक्षण उठाए जाने की मांग पर चर्चा करते हुए दैनिक `सियासी तकदीर' में जावेद कमर ने अपनी समीक्षा में लिखा है कि सलमान खुर्शीद के समय में 4.5 फीसदी जो आरक्षण दिया गया था सरकार उसमें वृद्धि करने के लिए तैयार नहीं है वह तो ओबीसी कोटे को लागू करने के लिए संवैधानिक संशोधन करने पर ही तैयार नहीं हैं। गत दिनों कांग्रेस के ही एक वरिष्ठ  नेता रशीद मसूद ने राज्यसभा में जब इस बाबत एक लिखित सवाल किया तो अल्पसंख्यक मामलों के राज्यमंत्री न्योंग अरंग ने इसका जवाब नहीं में दिया था। एक बड़ा तर्प यह दिया जा रहा है कि मंडल आयोग के सुझाव पर पिछड़े वर्गों को जो 27 फीसदी आरक्षण दिया गया था उसमें मुसलमानों की पिछड़ी जातियां शामिल हैं और उन्हें इसका फायदा भी मिल रहा है लेकिन सच्चाई यह है कि 27 फीसदी में मुसलमानों के लिए कोई कोटा निर्धारित नहीं है। इसलिए उन्हें इससे कोई फायदा नहीं मिल पा रहा है। हमें दुख इस बात पर है कि जब यह कोटा निर्धारित किया गया था तो उस समय हमारे किसी नेता ने सरकार से यह पूछने का साहस क्यों नहीं किया कि हमें हक की जगह भीख क्यों दी जा रही है। अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री के. रहमान की प्रेस कांफ्रेंस में जब किसी पत्रकार ने उनका ध्यान मुलायम सिंह यादव की मांग की ओर दिलाया तो उनका कहना था कि कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में जो वादा किया है वह हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता है। हमने अपने घोषणा पत्र में मुसलमानों को केरल और कर्नाटक की तर्ज पर आरक्षण देने का वादा किया है उनकी आबादी की बुनियाद पर नहीं। के. रहमान खां की जुबानी मनमोहन सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वह मुसलमानों को उनका हक नहीं भीख ही दे सकती है, तो क्या मुसलमान इस भीख को कुबूल करने के लिए तैयार हैं?
केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे द्वारा यह कहने पर आईपीएस अधिकारी एएस इब्राहिम को आईबी का डायरेक्टर सोनिया गांधी की वजह से  बनाया है, पर चर्चा करते हुए `सहरोजा दावत' ने लिखा है कि शिंदे ने यह कहकर आईपीएस अधिकारी की योग्यता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। इसके जरिये उन्होंने सोनिया की खुशी हासिल करने की कोशिश की तो दूसरी ओर मुसलमानों पर एहसान जताया और उन्हें उनकी हैसियत बता दी कि वह बिना आशीर्वाद के किसी उच्च पद पर नहीं पहुंच सकते। लेकिन इसी के साथ उन्हें  यह भी बताना चाहिए कि अब तक मुसलमान इस एजेंसी का हेड नहीं बन सका तो उसका जिम्मेदार कौन था? यदि यह मान लिया जाए कि इब्राहिम की उन्नति में किसी की भूमिका है, तो सरकार की होगी, उसमें सोनिया गांधी की क्या भूमिका? दूसरी बात यह है कि एक दो मुसलमानों को उच्च पदों पर पदासीन कर देने से क्या मुसलमानों की समस्याएं हल हो जाएंगी? इनके पास क्या अधिकार होते हैं या उन्हें कौन-सी ऐसी जादू की छड़ी दी जाती है कि उनकी वजह से मुसलमानों के काम आसानी से हो जाएंगे। मुसलमानों की समस्याएं हल होंगी तो नीति और सोच में तब्दीली से, जिसके लिए सरकार कभी तैयार नहीं होती। गृहमंत्री आईबी का मुस्लिम हेड बनाने का केडिट तो ले रहे हैं लेकिन यह क्यों नहीं बताते कि इससे मुस्लिम कौम का क्या भला होगा।
`क्या 21 दिसम्बर को दुनिया खत्म हो जाएगी?' के शीर्षक से दैनिक `अखबारे मशरिक' में नजीम शाह ने अपने लेख में लिखा है कि 21 दिसम्बर को दुनिया खत्म हो जाएगी, यह आस्था एक प्राचीन सभ्यता `माया' के मानने वालों का है। यह लैटिन अमेरिका के अधिकतर देशों की सबसे प्राचीन सभ्यता में गिनी जाती है। यह सभ्यता हजरत ईसा की पैदाइश से  बहुत पहले से इस दुनिया में मौजूद थी। मैक्सिको के कुछ नागरिक अब भी प्राचीन माया भाषा बोल सकते हैं। माया कौम भाषा, गणित और नक्षत्र विज्ञान में बहुत शिक्षित थी। इस सभ्यता के अनुयायियों ने अमेरिका में लिखने की शुरुआत की जबकि इनके लिखने का तरीका मिस्र की सभ्यता से मेल खाता है। माया सभ्यता के कैलेंडर में 18 महीने और हर महीने में 20 दिन होते हैं अर्थात् साल में 360 दिन। वास्तव में इनके बनाए हुए कैलेंडर आज के ईस्वी कैलेंडर से बहुत ज्यादा सही हैं। इस सभ्यता का बड़ा कारनामा इनका कैलेंडर माना जाता है। माया कौम पर शोध करने वालों का मानना है कि यह दुनिया पांच युगों में बंटी है और माया लोग चौथे युग में जी रहे हैं। उनके कैलेंडर के अनुसार 21 दिसम्बर को चौथा युग खत्म हो जाएगा और पांचवां युग शुरू होगा। कयामत (प्रलय) के बारे में इस्लामी आस्था अन्य धर्मों की धारणा को निरस्त करती है। इस्लामी आस्था के अनुसार कयामत के बारे में अल्लाह ही जानता है कि कब आएगी?
दुष्कर्म की बढ़ती घटनाओं पर दैनिक `सहाफत' ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि `फांसी इलाज नहीं है।' दुष्कर्म की सामूहिक घटना जो गत रविवार को हुई उस पर गुस्से का इजहार करते हुए मांग की गई कि अपराधियों को फांसी दी जाए लेकिन क्या इस भावुक मांग पर अमल संभव है। हमारा देश चूंकि अपनी मर्जी से लोकतांत्रिक बना है इसलिए कानून द्वारा बताई गई प्रक्रिया को पूरा किए बिना किसी को सजा नहीं दी जा सकती। सरकार ने फैसला किया है कि मुकदमों की सुनवाई के लिए जल्द फैसला करने वाली `फास्ट ट्रैक' अदालतें कायम की जाएं, इस तरह जल्द फैसला हो सकेगा लेकिन क्या गुंडों में इससे भय पैदा हो सकेगा? अपराध के पहलू से हटकर विचार करने की जरूरत है कि हमारे समाज में औरत की क्या हैसियत है। आम विचार यही है कि औरत ऐसी मशीन है जिसके द्वारा ज्यादा से ज्यादा रकम वसूली जा सकती है। दहेज विरोधी कानून बनने के  बावजूद औरत की हालत खराब बनी हुई है। घर के अन्दर टीवी पर और सिनेमा में औरत को जिस अंदाज में दिखाया जाता है उससे युवाओं का प्रभावित होना स्वाभाविक है। संसद में बहस के दौरान किसी ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि औरत की हद से ज्यादा बढ़ी आजादी उसके लिए हानिकारक हो सकती है। लिव इन पार्टनर के फैशन ने औरत के सम्मान को खत्म कर दिया है। औरत अपनी मर्जी से अपनी इज्जत किसी के हवाले कर सकती है। को-एजुकेशन से बिगाड़ शुरू होता है और आजादी से लड़के-लड़कियों के मिलने-जुलने और संबंधों से समाज बिखर जाता है। इन घटनाओं को रोकने के साथ-साथ समाज सुधार पर भी नजर डालनी जरूरी है।
`मुलायम व अखिलेश को दिया सुप्रीम कोर्ट ने तगड़ा झटका' के शीर्षक से दैनिक`प्रताप' के सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि यह फैसला मुलायम और अखिलेश के लिए राजनीतिक दृष्टि से असहज स्थिति जरूर पैदा करेगा और बाद में केंद्र सरकार के साथ उनके रिश्तों के लिए भी महत्वपूर्ण साबित होगा। मुख्य न्यायाधीश अल्तमश कबीर व न्यायमूर्ति एचएल दत्तू ने गुरुवार को मुलायम सिंह की याचिका को ठुकराते हुए मुलायम, अखिलेश और प्रतीक यादव के खिलाफ सीबीआई की प्रारम्भिक जांच के फैसले को बरकरार रखा है। पीठ ने कहा है कि सीबीआई अपनी जांच उसे सौंपेगी, केंद्र सरकार को नहीं। इस फैसले ने सूबे की सियासत को हवा दे दी है। एक ओर जहां इसे अब सियासी चश्मे से देखते हुए सीबीआई के अब तक हुए इस्तेमाल के मद्देनजर समाजवादी पार्टी द्वारा कांग्रेस को समर्थन दिए जाने की नई मजबूरी माना जा रहा है, वहीं उत्तर प्रदेश में बहुमत की सरकार बनने के बाद दिल्ली की गद्दी पर राज करने का सपना देखने वाले मुलायम सिंह यादव की उम्मीदों पर पानी फिर गया है। यह भी तय हो गया है कि भ्रष्टाचार के सवाल पर चारों ओर से घिरी कांग्रेस को सपा की ओर से तीर और ताने नहीं सहने होंगे। भाजपा ने तो अखिलेश यादव से इस्तीफा मांगते हुए डिम्पल यादव को मुख्यमंत्री बनाने का सुझाव तक दे डाला है।

Monday, August 6, 2012

`सलमान खुर्शीद मिल्ली संगठनों को साइड लाइन करने की परम्परा छोड़ दें'


`अन्ना के आंदोलन को पब्लिक रिस्पांस की कमी' के शीर्षक से दैनिक `प्रताप' में सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने अपने सम्पादकीय में स्थिति की समीक्षा करते हुए लिखा है कि जंतर-मंतर पर अनशन कर रही टीम अन्ना के समर्थकों में लगातार कमी आ रही है, कम से कम अनशन स्थल पर भीड़ का अभाव है। भीड़ के लिए तरसते अन्ना के आंदोलन में थोड़ी जान बाबा रामदेव ने आकर पूंकी। इस दयनीय स्थिति के लिए टीम अन्ना खुद ही जिम्मेदार है। वह पहले दिन से न केवल भ्रमित दिख रही है बल्कि अपने भ्रम का प्रदर्शन कर रही है। पहले कहा गया कि जन लोकपाल के लिए आंदोलन है फिर स्टैंड बदल गया और केंद्र सरकार के 15 भ्रष्ट मंत्रियों को निशाने पर लाया गया। इस सूची में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी को भी शामिल कर लिया गया। इससे जनता थोड़ी गुमराह हो गई और जनता में आंदोलन के प्रति थोड़ा मोह भंग हो गया। आम जनता इस भ्रष्टाचार से अच्छी तरह परिचित है और इस नतीजे पर पहुंचती जा रही है कि वर्तमान राजनीतिक माहौल में कोई ठोस सुधार नहीं हो सकता। जरूरत तो इस बात की है कि टीम अन्ना खुद आत्म मंथन करे कि आखिर क्यों जनता उनके आंदोलन से उत्साहित नहीं? क्यों यह उत्साह कम होता जा रहा है? अन्ना आंदोलन में भीड़ की कमी से बेशक सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी प्रसन्न होगी पर उसे यह नहीं समझना चाहिए कि भ्रष्टाचार का मुद्दा ही समाप्त हो गया है। भ्रष्टाचार से निपटने में यह सरकार पहले भी असफल थी और आज भी है।
`बर्मा के मुसलमानों से सबक लो' के शीर्षक से मोहम्मद आसिफ इकबाल ने दैनिक`जदीद मेल' में  लिखा है कि बर्मा के मुसलमान प्राचीन नाम `रोहंग' की बुनियाद पर खुद को `रोहंगिया' कहलाते हैं। यह यहां के असली नागरिक हैं और 2006 में एक अनुमान के अनुसार इनकी संख्या 30 फीसदी से भी अधिक थी। बर्मा के रोहंगिया के मुसलमानों की संख्या 8 लाख है जो नागरिकता के अधिकार से भी वंचित कर दिए गए हैं और उन्हें गंदी बस्तियों तक सीमित कर दिया गया है जिनमें वह जानवरों से भी खराब जिंदगी गुजार रहे हैं। शाहजहां का बेटा शाह शुजा औरंगजेब से पराजित होकर बर्मा भाग गया। अहिंसा के प्रचारक बौद्ध बादशाह ने इसकी मजबूरी का फायदा उठाते हुए पनाह देने के बदले उसकी दौलत और बेटी मांगी थी। इंकार पर इसी अहिंसक बादशाह ने शाह शुजा के सभी साथियों की हत्या कर दी थी। 17वीं सदी में हुए इस नरसंहार के बाद से आज तक मुसलमानों की किसी न किसी बहाने हत्या का सिलसिला जारी है। बर्मा जिसे बौद्ध राज्य कहा जाता है, में मुसलमानों को मोबाइल फोन इस्तेमाल करने पर प्रतिबंध है जिसके पास मोबाइल फोन पकड़ा गया उस पर 10 साल और 25 लाख रुपये जुर्माना किया जाता है। इस के विपरीत बौद्धों और मगों को इसकी खुली छूट है। मोबाइल के इस्तेमाल पर अब तक हजारों मुसलमानों को शहीद किया जा चुका है। यह घटनाएं उन बौद्धों की हैं जिनके मत में जानवरों और कीड़ों तक को मारना बुरा समझा जाता है। वहां मुसलमानों को इस आधार पर मारा जा रहा है कि वह मुसलमान हैं।
`सलमान खुर्शीद वक्फ विधेयक को हलके में न लें' के शीर्षक से दैनिक `हमारा समाज'में आमिर सलीम खां ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि पार्टी हाई कमान ने मिल्ली एवं सामाजिक संगठनों के सुझावों के बिना वक्फ संशोधन विधेयक को संसद में पेश न करने की हिदायत दी है। मंत्री महोदय से कहा गया है कि यदि वक्फ संशोधन विधेयक 2010 में संगठनों के सभी सुझावों के लिए और समय चाहिए तो संसद के मानसून सत्र में इस विधेयक को पटल पर रखने की कोई जल्दी नहीं होनी चाहिए बल्कि वक्फ जायदादों के संरक्षण के लिए उचित कानून की जरूरत है। ज्ञात रहे वक्फ संशोधित विधेयक 27 अप्रैल 2010 को जल्दबाजी में लोकसभा से पास कराया गया था लेकिन जब वह विधेयक राज्यसभा के पटल पर रखा गया तो उसका कड़ा विरोध हुआ जिसके नतीजे में अगस्त 2010 को विचार-विमर्श हेतु सलेक्ट कमेटी के हवाले कर दिया गया। तथा कथित तौर पर सलमान खुर्शीद मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, जमीअत उलेमा हिंद, आल इंडिया मिल्ली काउंसिल, आल इंडिया मुस्लिम मजलिस मुशावरत, मुस्लिम पालिटिकल काउंसिल आफ इंडिया, वकीलों का संगठन सामना, नेशनल हेरीटेज प्रोटेक्शन काउंसिल और विशेष रूप से पर्सनल लॉ बोर्ड के सुझावों को रद्दी की टोकरी में डाल देना चाहते हैं। जिसके लिए उन्हें पार्टी हाई कमान की ओर से सरल भाषा में समझा दिया गया है कि वह मिल्ली संगठनों को साइड लाइन करने की अपनी परम्परा को छोड़ दें।
`कोकराझार में लीपापोती से काम नहीं चलेगा, समस्या का हल निकालना चाहिए' के शीर्षक से दैनिक `अखबारे मशरिक' ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि 20 जुलाई को असम के कोकराझार में  बोडो और मुसलमानों के बीच हुई हिंसक घटना को लेकर राज्य के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई को हर तरफ से निशाना बनाया जा रहा है कि इनकी सुस्ती और लापरवाही से कोकराझार के दंगे बड़ी तेजी से बढ़े और अन्य जिलों को भी अपनी चपेट में ले लिया एवं स्वयं कोकराझार पहुंचने के बजाय उन्होंने कई मंत्रियों को वहां भेज दिया जो वहां जमे रहे। मुख्यमंत्री के कहने में यह बड़ी सच्चाई है कि केंद्र सरकार ने फौज भेजने में देरी की एवं केंद्रीय गुप्तचर एजेंसी ने भी अपने दायित्व को पूरी तरह नहीं निभाया और सरकार को फीड बैक नहीं दिया। बोडो और स्थानीय मुसलमानों में नस्ली और सांप्रदायिक हिंसा का इतिहास बहुत पुराना है। यही कारण है कि मामूली बात पर भी हिंसा भड़क उठती है और स्थिति काबू से बाहर हो जाती है। इसका वास्तविक हल यह है कि मुसलमानों और बोडो के आपसी संबंधों में बिगाड़ के  बजाय दोस्ती पैदा करने की कोशिश की जाए और शांति व्यवस्था को सौ फीसदी निश्चित किया जाए। फौज तो शांति स्थापना के बाद वहां से चली जाएगी। यह स्थानीय पुलिस का कर्तव्य होगा कि वह जख्मी दिलों पर मरहम रखे इसके बिना सांप्रदायिक सौहार्द नहीं हो सकता।
दैनिक `राष्ट्रीय सहारा' ने `विषय बहुत सही, तरीका बिल्कुल गलत' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में अन्ना अनशन पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि अन्ना ने जो मुद्दे उठाए हैं, वह हर भारतीय की हृदय की आवाज है। लेकिन इन समस्याओं, मुद्दों को सरकार से मनवाने के लिए अन्ना हजारे और उनकी टीम ने जो रणनीति अख्तियार की है, आम भारतीय उसे सही नहीं समझता है। वैसे भी अन्ना टीम कई अंदरूनी विरोधाभास के साथ मैदान में उतरी है। एक तरफ तो उसके पुराने साथी दूर-दूर नजर नहीं आ रहे हैं जिन्होंने इंडिया अगेंस्ट करप्शन को परवान चढ़ाया। आज आमिर खां, संतोष हेगड़े और स्वामी अग्निवेश न केवल अनुपस्थित हैं बल्कि अभी तक उन्होंने अन्ना हजारे के समर्थन में कोई बयान भी जारी नहीं किया है। दूसरी तरफ अन्ना तहरीक के एक बड़े समर्थक नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा कर रहे हैं। अन्ना हजारे खुद भी एक बार नरेन्द्र मोदी की तारीफ का नतीजा भुगत चुके हैं। इसलिए अब कोई दूसरा विवाद नहीं चाहते। अन्ना तहरीक से जुड़े एक समर्थक द्वारा नरेन्द्र मोदी की तारीफ करने से यह सवाल खड़ा हो गया है कि यह पूरी तहरीक किसी विशेष राजनीतिक मकसद से तो नहीं चलाई जा रही है।

Sunday, August 5, 2012

`मुसलमान आतंकवादी नहीं, आतंकवाद के शिकार हैं'


`उत्तर  प्रदेश में दंगाइयों के लिए छूट क्यों' के शीर्षक से दैनिक `इंकलाब' यूपी के ब्यूरो चीफ फजुलुर्रहमान ने अपने लेख में उत्तर प्रदेश की सांप्रदायिक हिंसा, आगजनी और सरकार की सुस्ती एवं लापरवाही पर चर्चा करते हुए लिखा है कि प्रतापगढ़ प्रशासन ने यदि प्रवीण तोगड़िया को सभा करने की इजाजत नहीं दी थी तो उन्हें रोकने की कार्यवाही की जानी चाहिए थी या फिर दलित बस्ती में कुछ समय के लिए जाने की इजाजत देकर वापसी की व्यवस्था करनी चाहिए था लेकिन हुआ यह कि प्रवीण तोगड़िया और इसके साथ 10 हजार से अधिक की भीड़ अस्थान गांव पहुंच गई और पुलिस के मात्र दो-चार जवान ही मौजूद थे। वहां जो कुछ हुआ उसे स्थानीय लोगों ने बयान करते हुए कहा कि शांति व्यवस्था नाम की कोई चीज नजर नहीं आती। रोजा रखे हुए 10/20 मुसलमान दरगाह में दुबके बैठे थे और अपनी खैर मना रहे थे। आतंक पैदा करने वालों को समाजवादी पार्टी की सरकार और उसकी पुलिस एवं प्रशासन से ऐसी छूट और ऐसी आजादी आश्चर्यजनक है। ऐसे अराजक माहौल में यह आशा रखना कि प्रवीण तोगड़िया के खिलाफ कोई मुकदमा दर्ज किया गया होगा, बेकार है। इसके विपरीत अपने घरों को लौटने वाले पीड़ितों के पुनर्वास में रुकावटें खड़ी की जा रही हैं। जिन आतंकियों ने आग लगाई उनके खिलाफ नामजद मुकदमा दर्ज होने के बावजूद उनकी गिरफ्तारी नहीं हो रही है और अब स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि यह सांप्रदायिक तत्व अपने आकाओं की मदद से अस्थान गांव के पीड़ितों का जीवन मुश्किल किए हैं। इससे तो यही अंदाजा होता है कि सरकार कहीं न कहीं किसी दबाव में काम कर रही है।
`दंगा पर रोक लगाइए' के शीर्षक से दैनिक `जदीद मेल'  ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि उत्तर प्रदेश और असम में दंगों की आग भड़कने के बाद यह स्पष्ट है कि भारत में एक बार फिर से दंगों की राजनीति शुरू हो चुकी है। सांप्रदायिकता की राजनीति करने वालों ने खुद को मुस्लिम संरक्षक कही जाने वाली कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के अधीन दंगों की राजनीति कर मुसलमानों के साथ-साथ इन दोनों पार्टियों को भी निशाना बनाया है। 2004 में यूपी सरकार के बाद देश में दंगों का सिलसिला लगभग टूट गया था। लेकिन दंगों की वापसी ने फिर देश में चिन्ताजनक स्थिति पैदा कर दी है। इस संदर्भ में खुद को सेक्यूलर कहने वाली कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का यह दायित्व है कि  वह अपने-अपने शासित राज्यों में सांप्रदायिकता से निपटे और दंगों पर रोक  लगाए। यदि यह पार्टियां ऐसा नहीं करती हैं तो 2014 में मुसलमान नाराज होकर घर बैठ जाएंगे और इन दोनों  पार्टियों को नुकसान होगा जो संघ और भाजपा के लिए हितकारी होगा।
`मुसलमान आतंकवादी नहीं, आतंकवाद के शिकार' के शीर्षक से दैनिक `हमारा समाज'में यूसुफ रामपुरी ने अपने समीक्षात्मक लेख में लिखा है कि इसमें संदेह नहीं कि आतंकवाद के शिकार दुनिया के सभी वर्ग हैं लेकिन सबसे ज्यादा इसका शिकार मुसलमान हैं। मुसलमानों पर यह आरोप इतनी बार लगाया गया कि मुसलमानों के अतिरिक्त सभी वर्ग अब उन्हें आतंकवादी ही ख्याल करते हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उनकी छवि को आतंकवाद के तौर पर पेश की गई है। लेकिन यदि इस आरोप का विश्लेषण किया जाए तो सच्चाई सामने आती है कि मुसलमान आतंकवादी नहीं बल्कि आतंकवाद के शिकार हैं। कहीं इनका कबाइली आतंक का सामना है, कहीं सांप्रदायिक एवं नस्ल परस्ती पर आधारित आतंक का सामना है तो कहीं धार्मिक कट्टरता का सामना है और कहीं राज्य आतंक का सामना है। विश्व ताकतें जिस तरह उन पर अत्याचार कर रही हैं उसे आतंकवाद की श्रेणी से अलग नहीं माना जा सकता। इसके अलावा विभिन्न स्थानों और विभिन्न देशों में विभिन्न कौमें मुसलमानों के साथ भेदभाव करते हुए उन्हें सांप्रदायिकता की आग में झोंक रही हैं, उसे भी आतंकवाद से अलग नहीं किया जा सकता। `मुसलमानों की गिरफ्तारी के लिए अपहरण का तरीका ही बहुत कुछ बता देता है' के शीर्षक से `सह रोजा दावत' ने लिखा है कि इसका मकसद मुसलमानों को सजा दिलाना नहीं बल्कि उन्हें बदनाम करके उनका जीना मुश्किल करना और पूरे परिवार एवं मुस्लिम बहुल क्षेत्र को तबाह करना होता है। एक और मामले में 12 साल तक बिना किसी जुर्म के जेल की सजा काटकर 6 मुस्लिम युवक बाइज्जत बरी हुए लेकिन अफसोस कि उनकी रिहाई न तो खबर बन सकी और न कुसूरवार पुलिस वालों के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई की गई। राष्ट्रीय मीडिया जो मुसलमानों की गिरफ्तारी की खबर को बढ़ाचढ़ा कर छापने में एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश करता है उपरोक्त घटना की इस तरह अनदेखी की गई जैसे कुछ हुआ ही नहीं। 12 वर्ष पूर्व जब प्रतिबंधित एसआईएम को बदनाम करने की सरकारी मुहिम अपनी चरम सीमा पर थी, मस्जिदों पर एक पोस्टर चिपकाने के मामले पर इतना शोर मचाया गया जैसे देश पर पहाड़ टूट पड़ा है। मध्य प्रदेश पुलिस ने 6 मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार किया। गिरफ्तार युवकों का मुकदमा लड़ रहे परवेज आलम का कहना है कि इस केस में शुरू से खामियां रहीं। एक तो झूठे आरोप लगाए गए और पांच साल बाद चार्जशीट दाखिल की गई। मुकदमे में अलग से चार्ज भी गलत तरीके से लगाया गया। इस तरह 6 आरोपियों को कोई जुर्म न करने के आरोप में 12 साल जेल की सजा काटनी पड़ी। पुलिस यह साबित नहीं कर सकी कि इनका सिमी से कोई संबंध था और न वह यह स्पष्ट कर सकी कि मस्जिद पर लगाया गया पोस्टर का मैटर देशद्रोही था।
`कांग्रेस किस हद तक गठबंधन धर्म निभाने को तैयार है?' के शीर्षक से दैनिक `प्रताप'के सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने अपने सम्पादकीय में चर्चा करते हुए लिखा है कि संप्रग सरकार की समस्याएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। एक तरफ तो सरकार के गठबंधन साथियों ने सरकार और कांग्रेस पार्टी की नाक में दम कर रखा है, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के अन्दर भी अब घमासान मच गया है। राकांपा पहले से ही नाराज चल रही है और अब तो उसके नेताओं ने कांग्रेस नेतृत्व को चुनौती देना आरम्भ कर दी है। शरद पवार के नेतृत्व वाली पार्टी ने यह भी संकेत दिया है कि अगर वह केंद्र सरकार से अलग होते हैं तो उसका असर महाराष्ट्र गठबंधन पर भी पड़ेगा। राकांपा महाराष्ट्र में कांग्रेस सरकार के साथ 13 साल से गठबंधन में है। अभी यह तकरार थमी भी नहीं थी कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान के खिलाफ उन ही के कांग्रेस विधायकों ने उनकी शिकायत हाई कमान से कर दी। कांग्रेस की मुश्किल यह होती जा रही है कि पार्टी को केंद्र और प्रादेशिक स्तर पर परस्पर विरोधाभासी राजनीति से जूझना पड़ रहा है।

पब्लिक स्कूलों में मुस्लिम बच्चों के दाखिले पर दिल्ली सरकार ने खींचे हाथ


कोलकाता से प्रकाशित उर्दू दैनिक `आजाद हिन्द' ने `देश में हिन्दुत्व व्यवस्था के क्रियान्वयन की फिर कोशिश' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखा है कि विश्व में भारत की पहचान एक सेक्यूलर देश के तौर पर की जाती है लेकिन इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता कि स्वाधीनता पूर्व से ही देश में एक ऐसी शक्ति है जो घृणा और हिंसा के आधार पर हिन्दुत्व नामी विचारधारा के लिए सक्रिय है। कई गैर मुस्लिम बुद्धिजीवी जिनमें भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रय गृह एवं वित्त मंत्री जसवंत सिंह भी शामिल हैं, का दावा है कि पाकिस्तान की मांग भी जनसंघी शक्तियों के सक्रियता की प्रतिक्रिया में की गई थी, अन्यथा मोहम्मद अली जिन्ना हिन्दू-मुस्लिम एकता के बड़े समर्थक थे। स्वाधीनता के बाद इन जनसंघी शक्तियों का मनोबल और बढ़ गया और बड़े स्तर पर देश को हिन्दू राष्ट्र में तब्दील करने की कोशिश की जाने लगी। गांधी जी का वध, बाबरी मस्जिद की शहादत, सांप्रदायिक दंगों के दौरान एक लाख से अधिक मुसलमानों की मौत पर अरबों-खरबों की बर्बादी इसी हिन्दू राष्ट्र बनाने की मुहिम का हिस्सा है। लेकिन यहां की जनता बधाई की पात्र है जिन्होंने घृणा और हिंसा के आधार पर देश की सेक्यूलर व्यवस्था से खिलवाड़ करने वालों को निरस्त कर दिया।
इसके बावजूद कुछ तथाकथित हिन्दू कौम परस्त संगठन ताकतें अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रही हैं। अभी हाल में गोवा में एक पांच दिवसीय सम्मेलन हिन्दू जागरण समिति के नेतृत्व में हुआ है जिसमें देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने पर विचार-विमर्श हुआ। यह बात ध्यान रहे कि यह सब वह संगठन हैं जिनसे जुड़े दर्जनों व्यक्ति आतंकवाद के आरोप में गिरफ्तार हैं। एक दूसरी खबर राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात से है कि यहां कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां पर ऐसे बोर्ड लगे हैं कि `आपका हिन्दू राष्ट्र में स्वागत है।'
महाराष्ट्र की जेलों में बन्द मुसलमानों पर महाराष्ट्र अल्पसंख्यक आयोग की इच्छा पर टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस द्वारा कराए गए सर्वे पर चर्चा करते हुए दैनिक`सहाफत' में अनीस अहमद खां ने लिखा है कि 141 पेज की इस सर्वे रिपोर्ट में कहा गया है कि महाराष्ट्र की जेलों में बन्द 96 फीसदी मुस्लिम कैदियों पर न तो किसी आपराधिक गिरोह के साथ संबंध का आरोप है और न ही किसी आतंकवादी संगठन के साथ सम्पर्प का। वहीं 25 फीसदी ऐसे भी हैं जिनका कोई वकील भी नहीं हैं। महाराष्ट्र में मुस्लिम कैदियों पर अत्याचार का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि 38 फीसदी मुस्लिम कैदियों को उनके परिवार से मिलने नहीं दिया जाता जो कि डीके बासु गाइडलाइंस का खुला उल्लंघन है। केवल 44 फीसदी कैदियों को ही अपने परिवार से मिलने की इजाजत है। अफसोस की बात तो यह है कि 33 फीसदी कैदियों को तो यह भी नहीं पता कि वह अब किस जेल में बन्द हैं जबकि 61 फीसदी कैदियों से तो एनजीओ भी नहीं मिलती हैं। वहीं एक अहम बात यह भी है कि ऐसे 50 फीसदी मुसस्लम कैदियों की 2012-13 में रिहाई होने वाली है जिनके लिए महाराष्ट्र अल्पसंख्यक आयोग के पास पुनर्वास की कोई योजना नहीं है। सर्वे करने वाले प्रोफेसर विजय राघवन और प्रोफेसर डॉ. रौशनी नायर के अनुसार इनमें से ज्यादातर झूठे मामलों में फंसाए गए मुसलमान हैं या फिर ऐसे हैं जिन्होंने पुलिस अत्याचार के खिलाफ उच्चाधिकारियों से शिकायत कर रखी थी।
लोक जन शक्ति पार्टी महासचिव अब्दुल खालिक द्वारा दिल्ली के पब्लिक स्कूलों में मुस्लिम बच्चों को दाखिला नहीं देने पर 4 फरवरी 2012 को अपनी एक रिपोर्ट में सरकार का ध्यान दिलाया था जिस पर राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने संज्ञान लेते हुए मामले को देखने के लिए आयोग सदस्या सैयदा इमाम को जिम्मेदारी दी थी। दैनिक`जदीद मेल' में मोहम्मद अहमद खां की रिपोर्ट के अनुसार आयोग सदस्या और मुख्यमंत्री दिल्ली के इस बाबत हुई बैठक में कोई नतीजा नहीं निकला। सूत्र बताते हैं कि मुख्यमंत्री ने इस पूरे मामले पर अपनी असमर्थता व्यक्त करते हुए कहा कि सरकार इस मामले में बेबस है और वह किसी तरह का दबाव पब्लिक स्कूलों पर नहीं बना सकती। पाठकों को बता दें कि स्कूलों में भेदभाव से जुड़े मामलों का जवाब देने में भी मुख्यमंत्री को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने अपने जवाब में असली सवाल का जवाब देने के बजाय अपनी सरकार का अल्पसंख्यकों से संबंधित उन उपलब्धियों को उजागर करने की कोशिश की थी जो कागजों में हैं, लेकिन जमीन पर उनका कोई वजूद नहीं है।
`ममता के बंगाल में मुसलमान' के शीर्षक से साप्ताहिक `चौथी दुनिया' में डॉ. कमर तबरेज ने अपने लेख में लिखा है कि ममता बनर्जी ने 75 हजार मुस्लिम बच्चों को एजुकेशन लोन और छात्रवृत्ति देने का ऐलान तो किया ही साथ उन्होंने पिछड़े वर्गों के विकास मंत्री ओपेन्दर नाथ बिस्वास को गत महीने यह जिम्मेदारी सौंपी है कि वह एक महीने के अन्दर सरकार को रिपोर्ट दें कि मुस्लिम ओबीसी के अन्दर ऐसे कितने लोग हैं, जिनको सरकारी नौकरियों में पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण दिया जा सकता है। ममता का तर्प है कि बुद्धादीप भट्टाचार्य की पिछली सरकार ने मुस्लिम ओबीसी के लिए 10 फीसदी आरक्षण की घोषणा तो कर दी लेकिन कानूनी तौर पर उसे क्रियान्वित करना मुश्किल है। इसीलिए उन्होंने अपने मंत्री को मुस्लिम ओबीसी की सही स्थिति जानने के लिए सर्वे कराने का आदेश दिया है। यहां कांग्रेस और ममता बनर्जी के काम करने के तरीकों में फर्प स्पष्ट नजर आता है। कांग्रेस पांच राज्यों के चुनाव पूर्व 4.5 फीसदी मुस्लिम आरक्षण की घोषणा यह जानते हुए की कि धर्म के नाम पर मुसलमानों को आरक्षण दिया ही नहीं जा सकता। कांग्रेस को ममता बनर्जी से सबक लेने की जरूरत है।
दैनिक `राष्ट्रीय सहारा' में मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार सईद हमीद `सीआईए आधुनिक युग की ईस्ट इंडिया कम्पनी' के शीर्षक से लिखे अपने लेख में लिखते हैं। बड़ी विचित्र बात है कि जो देश आतंकवाद के खिलाफ जंग और मादक पदार्थों के खिलाफ जंग के नाम पर बड़ी-बड़ी मुहिम चला रहे हैं और पूरी दुनिया को अपनी फौजों के जूतों तले रौंद रहे हैं, उन पर ही यह आरोप बार-बार लगाया जा रहा है कि दुनिया में आतंक और मादक पदार्थों की स्मगलिंग के वही जिम्मेदार हैं जो ग्लोबलाइजेशन, वर्ल्ड आर्डर और अन्य नामों की आड़ लेकर एक बार फिर पूरी दुनिया पर अपना शासन स्थापित करना चाहते हैं। यह और बात है कि कल तक इस टोले का नेतृत्व ब्रिटिश के हाथों में था और अब अमेरिका  इस टोले का नेता बन चुका है। अफगानिस्तान आज निशाना क्यों बना हुआ है। तालिबान की मुल्ला उमर की सरकार का दोष यह था कि उसने अफगास्तान में मादक पदार्थों की पैदावार बिल्कुल खत्म कर दी थी तो क्या इस काली कमाई से तबाही, बर्बादी फैलाने की इजाजत दी जा सकती है?

Friday, June 8, 2012

`कैसे रुकेंगी मुस्लिम युवाओं की बेजा गिरफ्तारियां'


`भारतीय जनता पार्टी में जारी संकट' पर चर्चा करते हुए उर्दू दैनिक `प्रताप' ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि इन दिनों भाजपा में जो संकट चल रहा है वह भाजपा का नहीं बल्कि वह स्पष्ट रूप से संघ का संकट है, संघ के द्वारा पैदा किया गया है और संघ के लिए पैदा किया गया है। संघ बिल्कुल नहीं चाहता कि भाजपा में कोई नेता इतना लोकप्रिय बन जाए कि वह संघ के नेताओं से कभी न दबे और उसका हस्तक्षेप बर्दाश्त न करें। सच तो यह है कि भाजपा में एक की वजह से ही कोई लोकतंत्र नहीं है और जो भी लोकतंत्र दिख रहा है वह संघ निर्देशित है और संघ का कार्यक्षेत्र लगातार सिकुड़ रहा है इसलिए वह अपने लाभ की इकाई मानकर भाजपा पर नियंत्रण बनाए रखना चाहता है और यह तभी सम्भव है जब आडवाणी जैसे नेताओं को नियंत्रित या अलग-थलग करके निप्रभावी कर सके और अपने इसी उद्देश्य के लिए उन्होंने अपने मोहरे सक्रिय कर दिए हैं। किन्तु सवाल यह है कि जो भाजपा सरकार को सोनिया गांधी का मोहरा बताकर सरकार की आलोचना करती है उसे क्या अधिकार है कि वह सरकार का पावर सेंटर किसी और को बताकर सरकार की आलोचना करे। आखिर भाजपा का भी पावर सेंटर तो संघ है। संघ के अधिनायकवाद एवं कांग्रेस वंशवादी अधिनायकवाद में फर्प क्या है? शायद इस सवाल का जवाब भाजपा और संघ दोनों के पास नहीं है किन्तु यह सवाल उससे पूछा जरूर जाएगा क्योंकि आंतरिक लोकतंत्र का तो दोनों पार्टियों में आभाव है।
`भाजपा का संकट, मोदी और आरएसएस' के शीर्षक से दैनिक `सहाफत' ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि इन दिनों भाजपा के अन्दर जो कुछ हो रहा है उसका प्रभाव सभी राज्यों की यूनिटों पर पड़ा है। लाल कृष्ण आडवाणी जो भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं, ने अपने ब्लाग पर लिखा था कि देश की जनता यूपीए की मनमोहन सरकार से नाराज है तो भाजपा से भी उसे उम्मीद नहीं है, क्योंकि मीडिया ने घोटालों के लिए यूपीए सरकार को कठघरे में खड़ा किया तो भाजपा इसका फायदा उठाने में बुरी तरह नाकाम रही और इसकी अगुवाई वाला राजग इन हालात में भी खरा साबित नहीं हुआ। आरएसएस मुखपत्र `पाञ्जन्य' में कहा गया है कि उड़ीसा, हरियाणा, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और पश्चिमी बंगाल में भी मोदी पार्टी के वोटों को बढ़ाने में कामयाब रहेंगे। मोदी को लेकर आरएसएस कुछ भ्रम में है। गुजरात दंगों में अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि मोदी ने राज धर्म नहीं निभाया। अब मोदी की तुलना उन ही से की जा रही है इससे स्पष्ट है कि संघ के लोग मानसिक रूप से भ्रमित नजर आ रहे हैं और उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि मोदी और भाजपा के बारे में क्या किया जाए।
वरिष्ठ पत्रकार शकील रशीद ने दैनिक `हमारा समाज' में प्रकाशित अपने लेख `कैसे रुकेंगी मुस्लिम युवाओं की बेजा गिरफ्तारियां' में चर्चा करते हुए लिखा है कि भारत न इस्लाम दुश्मन देश न मुस्लिम दुश्मन देश बल्कि एक सेकुलर देश है। लेकिन इस देश के मुसलमानों की एक बड़ी संख्या भय एवं आतंक के साए में जिन्दगी गुजारने पर बिल्कुल उसी तरह विवश है जैसे कि किसी `मुस्लिम दुश्मन' देश के मुसलमान। गत 15 वर्षों से यहां मुस्लिम युवाओं की गिरफ्तारियों का एक ऐसा सिलसिला शुरू है जिसने इस देश के मुसलमानों में `भय की मानसिकता' पैदा कर दी है। मौलाना अरशद मदनी और मौलाना महमूद मदनी से लेकर मौलाना सैयद अहमद बुखारी और जफरुल इस्लाम खां तक मुस्लिम नेतागणों और मुस्लिम बुद्धिजीवियों का मानना है कि पुलिस को मुसलमानों के खिलाफ योजनाबद्ध तरीके से इस्तेमाल किया जा रहा है। एक मकसद तो यह है कि मुसलमानों को उन्नति से रोका जाए और दूसरा मकसद यह है कि उच्च शिक्षा के रास्ते में रुकावट डाली जाए। इसका नतीजा यही निकलेगा कि मुस्लिम पीछे हो जाएंगे। मुसलमानों को `हाशिए' पर पहुंचाने के इस खेल में हमारी खुफिया एजेंसियां तो शामिल हैं ही शासक वर्ग भी शामिल है। हेमंत करकरे के बाद न कोई `हिन्दू आतंकवादी' गिरफ्तार किया गया और न ही हेमंत करकरे की तफ्तीश को आगे बढ़ाया गया। कई ऐसी घटनाएं हुईं जिनकी छानबीन होनी चाहिए थी। 2009 में जलगांव और कोहलापुर आदि से भारी मात्रा में बम और विस्फोटक सामग्री के साथ गैर मुस्लिमों की गिरफ्तारी हुई और 2010 में कोहलापुर और औरंगाबाद में कुछ लोग पकड़े गए, लेकिन सबके सब रिहा कर दिए गए। ऐसा क्यों किया गया, कोई जवाब देने वाला नहीं है। उलेमा कोई `समाधान' नहीं बता पा रहे हैं। हां कुछ फतवे जरूर आए हैं कि इस्लाम में आतंकवाद हराम है लेकिन यह फतवे मुसलमानों की गिरफ्तारी को नहीं रोक सके हैं।
 कोलकाता के वरिष्ठ पत्रकार सैयद अली ने दैनिक `अखबारे मशरिक' के अपने स्तंभ में `क्या एटीएस का गठन मुसलमानों को तबाह करने के लिए किया गया है' के शीर्षक से लिखा है कि बेकसूर मुसलमानों की अंधाधुंध गिरफ्तारी के खिलाफ अब दिल्ली से दरभंगा तक हाहाकार मची हुई है, रैलियां निकाली जा रही हैं लेकिन गिरफ्तारियां नहीं रुक रही हैं। देश की खुफिया एजेंसियां विशेषकर एटीएस ने पूरे मुस्लिम क्षेत्रों में ऐसा आतंक फैला रखा है कि तौबा ही भली। पहले आईएसआई, लश्कर तैयबा, जैश मोहम्मद और हूजी का नाम लेकर इसके साथ मुसलमानों का रिश्ता जोड़ा जाता था आजकल इंडियन मुजाहिद्दीन जैसा संगठन तलाश कर लिया गया है। आज तक यह पता नहीं चला कि इंडियन मुजाहिद्दीन कौन हैं, कहां पाए जाते हैं और हैं भी या केवल पुलिस की मानसिक पैदावार है। पुलिस को छूट मिली हुई कि वह जो चाहें करें उनसे कोई पूछताछ नहीं हो सकती। इनके खिलाफ बोलने और इन पर मुकदमा चलाने वाला कोई नहीं है और कानून में भी यह कमी है कि पुलिस झूठे आरोप लगाकर किसी की भी जिन्दगी बर्बाद कर दे। गिरफ्तार कर बन्द कर दे लेकिन अदालत में उसे पेश न करे और जब पेश करे तो सबूत पेश करने में असमर्थ हो और उसे रिहा कर दिया जाए लेकिन पुलिस के खिलाफ कोई कार्रवाई न हो कि उसने झूठे आरोप की बुनियाद पर किसी को क्यों बन्द कराया और न किए गुनाह की सजा दिलाई।
वरिष्ठ टिप्पणीकार एवं भारतीय दर्शन के विशेषज्ञ मौलाना अब्दुल हमीद नोमानी ने दैनिक `इंकलाब' के अपने स्तंभ में `संघ का फलसफा और मोदी की सुनामी देश को कहां ले जाएगी?' के शीर्षक से लिखा है कि आश्चर्यजनक बात है कि मोदी के आफिस और ड्राइंग रूम में विवेकानंद का फोटो लगा हुआ है लेकिन वह उनका सही हवाला देकर बात करने के बजाए सरकार को आगे बढ़ाने और देश के आम घाटे में लाने पर ज्यादा जोर दे रहे हैं। यदि मोदी माडल देश में कामयाब हो जाएगा तो इसका नक्शा और दिशा क्या होगी। भाजपा और संघ के लोग बहुत पहले से सेकुलर व्यवस्था के खिलाफ योजनाबद्ध तरीके से मुहिम चला रहे हैं। राज्यसभा में भाजपा सदस्य बलबीर पुंज की शायद ही कोई लेखनी ऐसी हो जिसमें सेकुलरों को निशाना न बनाया जाता हो।

Friday, April 6, 2012

दिल्ली निगम चुनाव में बटला हाउस मुठभेड़ बना मुद्दा

बीते सप्ताह विभिन्न राष्ट्रीय मुद्दों सहित दिल्ली में नगर निगम चुनाव और जमीअत उलेमा हिंद के मुख्यालय में जमीअत के दो धड़ों में कहासुनी को लेकर उर्दू अखबारों ने विशेष फोकस किया है। पेश है इस बाबत कुछ उर्दू अखबारों की राय

दैनिक `सहाफत' में मोहम्मद आतिफ ने `नगर निगम चुनाव में बटला हाउस इंकाउंटर बना मुद्दा' के शीर्षक से चर्चा करते हुए अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि दिल्ली के मुस्लिम बहुल क्षेत्र जामिया नगर में दो वार्ड जाकिर नगर (205) और ओखला (206) हैं। यह वार्ड भले ही कई बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं लेकिन दोनों सीटों पर ज्यादातर उम्मीदवार सितम्बर 2008 में हुए इंकाउंटर को फर्जी इंकाउंटर मानते हुए अहम मुद्दा बना रहे हैं। जाकिर नगर से कुल 25 उम्मीदवार मैदान में हैं। यहां वर्तमान पार्षद शोएब दानिश फिर से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं तो दिल्ली और अहमदाबाद के सिलसिलेवार बम धमाकों के आरोप में गिरफ्तार 26 वर्ष के जियाऊ&रहमान ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में हैं। जियाऊ&रहमान की मुहिम की कमान संभाले अमानत उल्लाह ने कहा कि हम ने अदालत से इजाजत लेकर ही उन्हें उम्मीदवार बनाया है। इसे आतंकवादी कहा जा रहा है लेकिन इसे अभी अदालत ने कुसूरवार नहीं बताया है। हम आज भी दिल्ली धमाकों के आरोप में पकड़े गए युवाओं को बेकसूर मानते हैं। स्थानीय विधायक आसिफ मोहम्मद खां का कहना है कि चूंकि सरकार ने इस इंकाउंटर की जांच कराने से इंकार कर दिया है इसलिए हम नगर निगम चुनाव में एक उम्मीदवार की हैसियत से इसके समर्थन करने पर एक दृष्टिकोण अख्तियार करने के लिए मजबूर हैं। उन्होंने कहा कि हम जनता की अदालत में जाएंगे और लोकतांत्रिक तरीके से जवाब देंगे। दूसरी ओर पार्षद शोएब दानिश बटला हाउस इंकाउंटर को चुनावी मुद्दा नहीं मानते। उन्होंने कहा कि बटला हाउस मुठभेड़ के मामले को लेकर कुछ लोग व्यक्तिगत फायदा उठा रहे हैं। चुनावी मुद्दा बनाने से युवाओं को इंसाफ नहीं मिलेगा।

`नगर निगम चुनाव जियाऊ&रहमान के कारण कांग्रेस की नींद हराम' के शीर्षक से दैनिक `जदीद मेल' में मोहम्मद अहमद खां ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि 2008 में जिस समय 12 लोगों के साथ जियाऊ&रहमान को गिरफ्तार किया गया था, उस समय वह जामिया मिलिया इस्लामिया का एक छात्र था। सामाजिक कार्यकर्ता फिरोज बख्त अहमद का कहना है कि यह क्षेत्र पहले से ही ब्लैक लिस्टेड है। अगर जिया यहां से जीत जाता है तो यह क्षेत्र के लिए चिंताजनक होगा और बाहर यह पैगाम जाएगा कि यहां के लोग आतंकवादियों का समर्थन करते हैं। जियाऊ&रहमान के कारण क्षेत्र में काफी हलचल है। एक ओर जहां आम लोगों में इसको लेकर उत्साह पाया जा रहा है वहां वर्तमान विधेयक आसिफ मोहम्मद खां और लोक जन शक्ति पार्टी नेता अमानतुल्ला का एक प्लेट फार्म पर आ जाने से कांग्रेस की नींद हराम हो गई है।

दैनिक `इंकलाब' ने `जियाऊ&रहमान की सियासी पार्टियों के बाद अब बहुत सी मिल्ली संगठनों ने भी अपने समर्थन की घोषणा की' के शीर्षक से मोहम्मद रजा फराज ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि लोक जन शक्ति पार्टी और राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल सहित सियासी पार्टियों और स्थानीय आरडब्लूए के समर्थन के बाद अब बहुत सी मिल्ली संगठनों ने भी समर्थन की घोषणा की है। जामिया नगर फेडरेशन के महासचिव मुशरिफ हुसैन का कहना है कि यह चुनाव बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि पूरे देश की निगाह बटला हाउस चुनाव पर है। इस चुनाव से इस बात का फैसला होना है कि जनता जियाऊ&रहमान को आतंकवादी मानती है या बेकसूर।

आल इंडिया मुस्लिम मजलिस मुशावरत (सालिम ग्रुप) के अध्यक्ष डा. अनवारुल इस्लाम कहते हैं कि जियाऊ&रहमान को जो लाबी चुनाव में ला रही उनकी नियतों पर भरोसा नहीं किया जा सकता लेकिन उनका समर्थन करेंगे। जियाऊ&रहमान के पिता अबुर्दरहमान का कहना है कि पुलिस विभाग ने हमारे बच्चों सहित सैकड़ों मुस्लिम युवाओं की जिंदगी को बर्बाद किया है। चुनाव में यदि हमारा बेटा जीत जाता है तो इन जैसे सभी युवाओं को हौसला मिलेगा और उम्मीद की एक आसा पैदा होगी।

दैनिक `हिन्दुस्तान एक्सप्रेस' ने `दिल्ली बम धमाके का तथाकथित आरोपी भी मैदान में' के शीर्षक से लिखा है कि जियाऊ&रहमान को 2008 के सीरियल बम ब्लास्ट के बाद बटला हाउस इकाउंटर में गिरफ्तार किया गया था। इस इंकांउटर में इसके दो साथी सहित दिल्ली पुलिस इस्पेक्टर मारे गए थे। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने इस इंकाउंटर को फर्जी बताया था लेकिन गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने दिग्विजय के दावे को नकारते हुए इनकाउंटर को सही बताया था। 2008 से जेल में बंद जियाऊ&रहमान अपनी बेगुनाही को साबित करने के लिए नगर निगम चुनाव लड़ने के लिए मैदान में उतरा है। जियाऊ&रहमान साबरमती जेल में बंद है और शायद वह अकेला उम्मीदवार है जो जेल से 15 अप्रैल को होने वाले चुनाव में लड़ रहा है। जमाअत इस्लामी हिंद के अध्यक्ष मौलाना जलाल उद्दीन उमरी ने कहा कि चूंकि अदालत ने इजाजत दे दी है वह चुनाव लड़ सकता है, क्या वह उसका समर्थन करते हैं के सवाल पर उन्होंने कहा कि लोगों को खुद फैसला लेना चाहिए।

सिलसिलेवार बम धमाकों के आरोप से 14 साल बाद बरी होने वाले मोहम्मद आमिर खां ने आल इंडिया मिल्ली काउंसिल के राष्ट्रीय अधिवेशन `युवाओं की रक्षा' में अपनी आप बीती सुनाते हुए कहा ः वैसे तो मुस्लिम संगठन युवाओं की गिरफ्तारी का विरोध करते नजर आते हैं लेकिन गिरफ्तार युवाओं की रिहाई के लिए अच्छा वकील तक उपलब्ध और परिवार की देखभाल करने में कोई भूमिका यह मुस्लिम संगठन नहीं निभाती हैं। दैनिक `राष्ट्रीय सहारा' ने `14 साल न करने वाले गुनाह की सजा काटने वाले आमिर की नसीहत' के शीर्षक से आगे लिखा है कि जब मुझे गिरफ्तार किया गया था तब कोई भी मुस्लिम संगठन सामने नहीं आया। किसी वकील ने मुकदमा लड़ने की पेशकश नहीं की। मां बीमार रही, पिता गुजर गए लेकिन किसी संगठन ने कोई खबर नहीं ली।

आमिर के इस वक्तव्य पर एनए शिबली ने दैनिक `हिन्दुस्तान एक्सप्रेस' में अपनी रिपोर्ट में खुलासा करते हुए लिखा कि जमाअत इस्लामी हिंद ने भी मोहम्मद आमिर को केवल सपना ही दिखाया, जबकि जमाअत इस्लामी हिंद ने एक प्रेस कांफ्रेंस में अध्यक्ष मौलाना जलाल उद्दीन उमरी ने एक सवाल के जवाब में कहा था कि हम ने आमिर को आर्थिक सहायता दी और आगे भी देंगे लेकिन आमिर ने यह कहकर चौंका दिया कि मुझसे पहले दिन जमाअत की जो टीम मिलने आई थी उस ने मुझे दो हजार रुपये दिए थे। इसके बाद से न तो जमाअत की ओर से मुझे कोई फोन आया और न किसी ने मेरी कोई मदद की। इसका मतलब तो यह हुआ कि उमरी ने प्रेस कांफ्रेंस के दौरान जो कहा वह गलत है।

Friday, February 17, 2012

`नई दिल्ली बम विस्फोट खुद इजराइल ने कराया है'

प्रधानमंत्री निवास के पास हुए बम विस्फोट को लेकर जहां विभन्न मुस्लिम संगठनों ने इजराइल द्वारा किया जाना बताया वहां उर्दू अखबारों ने इस पर सम्पादकीय भी लिखे। मुस्लिम संगठनों के पदाधिकारियों के बयानों को दैनिक `इंकलाब' ने प्रमुखता से प्रकाशित किया है। जामा मस्जिद यूनाइटेड फोरम के अध्यक्ष यह्या बुखारी ने कहा है कि इसमें संदेह नहीं कि ईरान पर हमले का माहौल बनाया जा रहा है। ईरान इस तरह का धमाका कर छिछोरी हरकत नहीं करता। सारी दुनिया इजराइल के बारे में अच्छी तरह जानती है। इस हमले में इजराइल का ही हाथ है। वह ईरान को बदनाम करके इस पर हमले का माहौल बना रहा है। ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल महासचिव डॉ. मोहम्मद मंजूर आलम ने इस मानवता विरोधी घटना की निन्दा करते हुए कहा कि यह मैग्नेटिक बम विस्फोट है। इससे पूर्व यह विस्फोट ईरान में किया गया था जिसमें ईरान का एक वैज्ञानिक मारा गया था।
आज का विस्फोट इसको चिन्हित करता है। इस तरह का विस्फोट के विशेषज्ञ सीआईए और मोसाद हैं। मुस्लिम पॉलिटिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. तसलीम रहमानी ने कहा कि इस धमाके की जांच कराई जाए तो इसमें इजराइल का ही हाथ निकलेगा। ईरान और इजराइल की लड़ाई में भारत का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। मजलिस उलेमा हिन्द के अध्यक्ष मौलाना सैयद कल्बे जव्वाद ने कहा कि ईरान पर इस तरह का आरोप लगाना बिल्कुल गलत है क्योंकि ईरान कभी आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त नहीं रहा है। इजराइल दूतावास की कार में जो धमाका किया गया है वह इजराइल ने खुद ही कराया है। वैलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया के महासचिव डॉ. सैयद कासिम रसूल इलियास ने कहा कि इजराइल बुनियादी तौर पर आतंकी देश है। इसने विभिन्न देशों में आतंक फैला रखा है। दूसरे देशों में आतंक फैलाना इसका मिजाज है। आज की घटना इजराइल के किए की प्रतिक्रिया हो सकती है।
यह भी संभव है कि यह विस्फोट भी इसी ने कराया हो। इसके लिए हर चीज संभव है वह इस तरह के षड्यंत्र में लिप्त रहता है। जमाअत उलेमा हिन्द महासचिव मौलाना महमूद मदनी ने विस्फोट की भर्त्सना करते हुए कहा कि आज के धमाके और अरब देशों एवं ईरान में वहां के वैज्ञानिकों को मारे जाने वाले धमाकों में समानता पाई जाती है। इजराइल आज की तारीख में आतंकवाद का द्योतक बन चुका है। इस संदर्भ में इस तरह के विस्फोट से बहुत से अर्थ निकाले जा सकते हैं।
`बेशक धमाका दिल्ली में हुआ पर निशाने पर इजराइल' के शीर्षक से दैनिक `प्रताप' के सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने अपने सम्पादकीय में चर्चा करते हुए लिखा है कि प्रधानमंत्री निवास से महज 400 मीटर की दूरी पर सोमवार दोपहर इजराइली दूतावास की कार में जोरदार विस्फोट हो गया। धमाके के बाद कार में आग लग गई जिससे उसमें सवार एक इजराइली महिला अधिकारी सहित चार लोग घायल हो गए। मोटरसाइकिल सवार आतंकी ने मैग्नेटिक डिवाइस (स्टिकी बम) से चलती इनोवा गाड़ी में धमाका किया। पुलिस अधिकारियों के मुताबिक जिस तरह के बम का इस्तेमाल इस हमले में हुआ है वह पहली बार देखा गया है। इसे स्टिकी बम कहा जाता है, जिसके चलते इसे किसी वाहन पर चिपका दिया जाता है। इसमें चिपकन का काम बम के साथ लगी मैग्नेट यानि चुम्बक करती है जो कार की लोहे की बॉडी पर हल्के से छूते ही सख्ती से चिपक जाती है। दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक इसमें प्लास्टिक विस्फोटक का इस्तेमाल हल्केपन के लिए किया गया है। साथ ही बम फटने की टाइम सेटिंग मैकेनिज्म भी अपने में नया है।
इस प्रकार के बम का इस्तेमाल होना सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती है। अब तक इस तरह के बमों का उपयोग ईरान और कुछ अरब देशों में होता पाया गया है। सूत्रों की मानें तो दिल्ली में हुए इस हमले में नाइट्रेग्लिसरीन, सल्फर व पोटेशियम क्लोरेट का इस्तेमाल किया गया है। अरब देशों और इजराइल के बीच की लड़ाई में अब भारत भी आ गया है। ईसाई बनाम इस्लाम लड़ाई आज की नहीं, हजारों वर्ष पुरानी है। ईरान पर किसी भी समय अब इजराइल-अमेरिका हमला कर सकते हैं। कहीं दिल्ली के इस विस्फोट से मामले और ज्यादा न बढ़ जाए?
`झूठ के सुपर पॉवर' के शीर्षक से दैनिक `इंकलाब' ने सम्पादकीय में लिखा है कि नई दिल्ली में इजराइली उच्चायोग की कार धमाके का शिकार हुई ही थी कि तेल अबीब ने तेहरान को जिम्मेदार करार दिया जैसे उसके पास धमाके की जांच, धमाका होने के पहले से ही मौजूद ही हो या फिर उसे मालूम हो कि ऐसी कोई घटना होने वाली है। इसीलिए इधर घटना हुई और उधर उसने तेजी से ईरान को दोषी ठहरा दिया। अतीत की घटनाओं पर विचार किया जाए तो मालूम होता है कि तुरन्त आरोप लगाना आतंकी ताकतों का काम है। मकसद यह होता है कि झूठ इतनी बार बोला जाए कि हर कोई इसे सच मान ले। अमेरिकी राष्ट्रपति जब मुस्लिम जगत को संबोधित करता है तो यह साबित करने में लगा रहता है कि उसके हृदय में मुस्लिम जगत का दर्द कूट-कूट कर भरा है, लेकिन उसका आतंक? मुस्लिम देशों के खिलाफ उसका आतंक कभी नहीं रुकता। नई दिल्ली में होने वाले बम धमाके के पीछे ईरान विशेषकर हिजबुल्ला का हाथ देख लिया (क्योंकि वह वही हाथ देखना चाहता था) और अब देखिए किस तरह वाशिंगटन भी पैंतरा बदलता है। इन ताकतों की आंख में ईरान एक लम्बे समय से खटक रहा है। इसलिए किसी न किसी बहाने से उसे निशाना बनाने और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अकेला करने की कोशिश की जा रही है। इसके लिए भी झूठ का सहारा लिया जा रहा है और इसी का प्रचार किया जा रहा है, यह भूलकर कि तेहरान यदि चाहे तो मिनटों में तेल अबीब को तिगनी का नाच नचा दे।
दैनिक `राष्ट्रीय सहारा' ने `इजराइली सरकार की आपराधिक अन्तरआत्मा' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में चर्चा करते हुए लिखा है कि इजराइली प्रधानमंत्री बिनजामिन नेतनयाहू ने पहले यह बयान दिया कि इन घटनाओं में ईरान का हाथ है, लेकिन चन्द मिनटों में अपना बयान बदल दिया और कहा कि इन घटनाओं को लेबनान की हिजबुल्ला ने अंजाम दिया है। बयान की यह अचानक तब्दीली इजराइली सरकार की अजीब व गरीब लगती है जिसका दावा है कि मोसाद विश्व की सबसे अच्छी गोपनीय एजेंसी है। क्या दुनिया की बेहतरीन एजेंसी यह भी पता नहीं लगा सकी कि इन वारदातों में किसका हाथ है?
लेकिन बयान की यह तब्दीली रसमी नहीं है, सोची-समझी रणनीति का नतीजा है। इजराइल बड़े जोर-शोर से यह प्रचार कर रहा है कि हिजबुल्ला 9/11 जैसे बड़े आतंकवादी हमले की तैयारियां कर रहा है। नई दिल्ली और तेल बेसी में हमले किसने किए यह तो नहीं मालूम, लेकिन इन घटनाओं की रोशनी में इजराइल विशेषकर मोसाद को यह जरूर अहसास हो जाना चाहिए कि कभी-कभी जैसे को तैसा जवाब भी मिल सकता है।