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Sunday, February 17, 2013

पाकिस्तान के उकसाने के पीछे असल मंशा क्या है?


`सीमा पर तनाव का हल क्या हो?' के शीर्षक से दैनिक `हमारा समाज' ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि सेना प्रमुख ने बहुत अच्छे अंदाज में पाकिस्तान को चेतावनी दी है लेकिन महसूस किया जाता है कि यह काफी नहीं है और पाकिस्तानी घुसपैठ और उसके बाद उनकी ओर से कोई जिम्मेदारी न लेने के रवैए पर बहुत सोचना और समझना होगा। इसका मतलब यह भी नहीं कि हमें पाकिस्तान के खिलाफ फौजी कार्रवाई ही कर देनी चाहिए और ताकत के इस्तेमाल से काम लेना चाहिए, यह भी मसले का कोई ठोस हल नहीं होता है क्योंकि इसके नतीजे दोनों देशों के लिए बहुत दर्दनाक और नुकसान पहुंचाने वाले होंगे। इसलिए यदि बातचीत से काम चले तो हर स्तर पर बातचीत के रास्तों को खुला रखना चाहिए और गम व गुस्सा को काबू में रखते हुए प्रभावी ढंग से मसले के हल की तलाश करनी चाहिए क्योंकि हम किसी भी तरह से कमजोर नहीं हैं बल्कि किसी भी तरह की कार्यवाही का जवाब देने की पूरी ताकत रखते हैं। कारगिल के मौके पर और उसके पूर्व 1971 में युद्ध छिड़ने पर दिखाया है। लेकिन दोनों देशों की जनता एक दूसरे के करीब और रिश्तों में मधुरता रखकर ही खुश होती है क्योंकि दोनों देशों की भाषा, संस्कृति और सभ्यता में जितनी समानता है शायद ही कहीं दो पड़ोसियों में देखने को मिले, यहां तक कि बंगलादेश, श्रीलंका, चीन और म्यांमार किसी में उतनी समानता नहीं है जितनी भारत और पाकिस्तान के बीच पाई जाती है।
`पाकिस्तान से मायूस है अमन का कारवां' के शीर्षक से दैनिक `राष्ट्रीय सहारा' में सहारा न्यूज नेटवर्प के एडीटर एवं न्यूज डायरेक्टर ओपेंदर राय ने अपने स्तंभ में लिखा है कि पाकिस्तान में इसी साल चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में वहां के सारे ग्रुपों में भारत विरोधी नारों की होड़ लगी है। इस हालत में हमारी फौज और हमारी सरकार को धैर्य से काम लेना होगा। जल्दबाजी में हम किसी ऐसे आपशन्स को न चुनें जिससे माहौल और  बिगड़ जाए। पाकिस्तान ऐसा नासूर है जिसका इलाज आपरेशन नहीं है। इसे मरहम पट्टी के साथ एंटी बायटेक के बोस्टर डोज की जरूरत है। हमें इन दोनों का इस्तेमाल करना चाहिए और चीर-फाड़ से बचना चाहिए। पाकिस्तान की शासकीय व्यवस्था में कई परतें हैं। बाहरी दुनिया के लिए सरकार के मुखिया वहां के राष्ट्रपति आसिफ अली हैं लेकिन पाकिस्तान में इस सिविल सरकार का शासन पर पूरी तरह से कंट्रोल नहीं है। दूसरी परत के मुखिया पाकिस्तान के आर्मी चीफ जनरल अशफाक परवेज कयानी हैं। कयानी ने आज तक इस सिविल सरकार के कामकाज में दखल नहीं दिया है लेकिन कयानी इस वर्ष सेवानिवृत्ति हो रहे हैं। इतिहास साक्षी है कि पाकिस्तान का कोई भी आर्मी चीफ आसानी से कुर्सी नहीं छोड़ता है। संभव है कि अपनी कुर्सी बचाने के लिए कयानी ऐसे हालात पैदा करने की कोशिश करें, जिससे आर्मी की भूमिका में वृद्धि हो जाए। हो सकता है कि भारत के साथ ताजा विवाद एक फौजी षड्यंत्र हो, जिसे कयानी की ओर से समर्थन मिल रहा हो और जिसके बारे में वहां की सिविलियन सरकार को भी न मालूम हो।
`नक्सली हिंसा के कारण और हल क्या हों?' के शीर्षक से कोलकाता और दिल्ली से एक साथ प्रकाशित होने वाले दैनिक `अखबारे मशरिक' ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि 1960 के दशक से शुरू हुई नक्सली हिंसा अभी खत्म नहीं हुई है और यह आज देश की सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है बल्कि एक लिहाज से सीमा पार से जारी आतंक से भी ज्यादा खतरनाक है। क्योंकि इसके पीछे जो गुमराह युवक सक्रिय हैं उनकी जड़ें हमारे कस्बों, देहातों और छोटे-छोटे गांवों में फैली हुई हैं। देश के लगभग दस राज्य इसकी लपेट में हैं। इस आतंक के खिलाफ बुद्धिजीवियों के विचार भी समय-समय पर सामने आए हैं जिसके मुताबिक नक्सलइज्म को ताकत के बल पर खत्म नहीं किया जा सकता है क्योंकि यह आर्थिक असमानता के कोख से पैदा हुई है और इसे एक सामाजिक मसले के तौर पर ही हल किया जाना चाहिए। नक्सली हिंसा को हल करने की दिशा में हमारा पहला कदम कबाइली क्षेत्रों से दलाली की परम्परा अथवा ठेकेदारी को बेदखल करना चाहिए, जिसका एक उदाहरण मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने तेंदू पत्ते से ठेकेदारी हटाकर और इस कारोबार को कबाइलियों को देकर किया था लेकिन छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार ने यह काम ठेकेदारों के सुपुर्द कर दिया जो इस कारोबार में फायदे के बजाय नुकसान बताते हैं क्योंकि खनन कर रही कम्पनियां अपने सीए से बनवाई बैलेंस शीट में सदैव घाटा दिखाती हैं। इसलिए उचित तरीका यही है कि खनन का फायदा कबाइलियों (आदिवासियों) को पहुंचाने के खनिज की हर टन पैदावार की रायलटी का एक हिस्सा उनको दिया जाए। इसी 1927 के अंग्रेजों के बनाए जंगल कानून को भी वापस लिया जाए इसके द्वारा आदिवासी जंगल पर अपने हक से वंचित हो गए हैं और यही उनको हिंसा द्वारा अपना हक लेने पर मजबूर करती है।
16 दिसम्बर को राजधानी दिल्ली में एक लड़की के साथ हुए सामूहिक बलात्कार और जघन्य हत्या के बाद से विरोध-प्रदर्शन  का सिलसिला जारी है। जिस तेजी से यह आंदोलन चल रहा है उसी तेजी से हर दिन दुक्रम की सजाएं अखबारों में पढ़ने को मिल रही हैं। सहरोजा `दावत' में मोहम्मद सिबगातुल्ला नदवी ने `बिगाड़ के सुधार के लिए धर्म एवं नैतिकता का सहारा लेना पड़ेगा' के शीर्षक से अपने लेख में लिखा है कि आज महिलाओं से दुष्कर्मों के लिए आजीवन कारावास अथवा फांसी की  बात कही जा रही है लेकिन यह सजा इसे रोक सकेगी, निश्चय ही नहीं, क्योंकि हत्या के लिए पहले से ही यह सजा निर्धारित है जब इस मामले में यह डर पैदा नहीं कर सका तो दुष्कर्म के मामले यह कैसे डर पैदा कर सकेगी। वास्तव में सारी खराबियों और बुराइयों की जड़ वह बिगाड़ है जो समाज में फैला हुआ है जिसके सुधार के  बजाय उसे कानून संरक्षण दिया जा रहा है। लोगों को मानवता, नैतिकता और धर्म का पाठ पढ़ाने के बजाय उस कानून का पाठ पढ़ाया जा रहा है जो खुद खामियों से भरा होता है वह दूसरों का सुधार क्या करेगा।
`सुप्रीम कोर्ट द्वारा खाप पंचायतों को फटकार' के शीर्षक से दैनिक `इंकलाब' के सम्पादक (नार्थ) शकील शम्सी ने अपने स्तंभ में  लिखा है कि खाप पंचायतें मोहब्बत की शादी, ईश्क और महिला आजादी के सख्त खिलाफ हैं, पुरुषों का वर्चस्व कायम करना उनका पहला दायित्व है। उनका मानना है कि दुष्कर्म की घटनाएं इसलिए होती हैं कि महिलाओं को आजादी मिल गई है। खाप पंचायतों की नजर में सबसे बड़ा गुनाह एक ही गोत्र में होने वाली शादियां हैं। खाप का संबंध न हो। खाप पंचायतों ने लड़कियों को जीन्स न पहनने की हिदायत दी जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने पंचायतों को आदेश दिया कि वह लड़कियों को जीन्स पहनने या मोबाइल रखने से मना नहीं कर सकती। जीन्स पहनने की इच्छुक और मोबाइल रखने की इच्छा रखने वाली लड़कियों को सुप्रीम कोर्ट के आदेश से काफी खुशी हुई होगी, लेकिन इस आदेश से उनकी समस्याएं हल हो जाएंगी, विश्वास से नहीं कहा जा सकता लेकिन आशा की एक किरण पैदा हुई है जो बहुत सी लड़कियों को एहसास महरूमी से  बचाएगी।
`पाकिस्तान के उकसाने के पीछे असल मंशा आखिर क्या है?' के शीर्षक से दैनिक`प्रताप' के सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि दरअसल हम तो इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि पाकिस्तान भारत के साथ एलओसी पर बढ़ रहे तनाव को कम करने में दिलचस्पी रखता ही नहीं। उसका कोई बड़ा गेम प्लान है जिसका मेंढर सेक्टर में दो भारतीय जवानों का सिर काटने की घटना एक हिस्सा है। अगर ऐसा न होता तो नियंत्रण रेखा पर तनाव कम करने के लिए मुश्किल से हुई फ्लैग मीटिंग से ठीक एक दिन पहले युद्ध विराम का फिर से उल्लंघन न करता। यही नहीं भारत ने पाकिस्तान पर ताजा आरोप लगाया कि दोनों देशों के बीच ब्रिगेडियर स्तर पर हुई फ्लैग मीटिंग के बाद से अब तक वह पांच दफा संघर्ष विराम का उल्लंघन कर चुका है। लिहाजा सोमवार को फ्लैग मीटिंग का जो नतीजा निकलना था वही निकला। यानी कुछ भी नहीं निकला। साफ है कि पाकिस्तान घुमा-फिराकर किसी भी तरह से इस मामले में तीसरे पक्ष की दखलअंदाजी चाहता है जबकि यह द्विपक्षीय मामला है। भारत सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वह किसी भी हालत में इसे अंतर्राष्ट्रीय नहीं होने देगा।