Tuesday, January 8, 2013

प्रधानमंत्री के आश्वासन के बाद क्या मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी रुकेगी?


बाबरी मस्जिद गिराए जाने के 20 वर्ष बाद लगभग सभी उर्दू अखबारों ने इस पर विशेष रिपोर्ट प्रकाशित की और सम्पादकीय लिखे। दैनिक `सहाफत' में अतहर सिद्दीकी ने अपने विशेष लेख `परदे सियासत पर अगर शहाबुद्दीन न होते तो बाबरी मस्जिद शहीद नहीं होती' में स्थिति की समीक्षा की है। साथ ही उनके द्वारा नरेन्द्र मोदी को माफी दिए जाने पर लिखा है कि किसी व्यक्ति को यह अधिकार नहीं है कि वह दंगा पीड़ितों की ओर से उस अत्याचारी व्यक्ति को माफ करे। शहाबुद्दीन साहब। खुदा के लिए ऐसा फलस्फा आप मुस्लिम कौम को न पढ़ाएं जिसमें दूसरी बार बाबरी मस्जिद को शहीद करने का संदेह मौजूद हो। इसी अखबार ने बाबरी मस्जिद मुकदमे के संदर्भ में तीन किस्तों में सूरतेहाल को स्पष्ट कर बताया है कि मुकदमों में देर भी है और अंधेर भी। सीबीआई ने 9 फरवरी 2011 को सुप्रीम कोर्ट में अपील कर मांग की है कि हाई कोर्ट के इस आदेश को निरस्त करते हुए आडवाणी सहित 21 आरोपियों के खिलाफ बाबरी मस्जिद गिराने का षड्यंत्र और अन्य धाराओं में मुकदमा चलाया जाए। अभी इस अपील पर सुनवाई होनी है। मुकदमा चलने के बाद सबूत न होने के कारण बहुत से अपराधी छूट जाएंगे, वह अलग बात है लेकिन अभी यही तय नहीं हो रहा है कि किस आरोपी के खिलाफ किस-किस सेक्शन में कहां मुकदमा चलाया जाएगा। अब हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से कौन पूछेगा कि अदालतों में यह देर अंधेर नहीं तो फिर क्या है?
दैनिक `इंकलाब' में सईद अहमद खां ने बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद मुंबई दंगों के पीड़ितों पर चर्चा करते हुए लिखा है कि 20 साल बाद भी इंसाफ का रास्ता देख रहे हैं। मुंबई दंगा पीड़ितों के जख्म आज भी हरे हो जाते हैं जब 6 दिसम्बर आता है। पीड़ितों को सबसे ज्यादा शिकायत पुलिस और सरकार से है। उनके अनुसार एक तरफ जहां पुलिस ने दंगों के दौरान दंगाइयों की भूमिका निभाई, वहीं सरकार ने भी इनके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की है। जिसकी वजह से पीड़ितों को आज तक न्याय नहीं मिला और उन पर भय छाया हुआ है। `बाबरी मस्जिद घटना' पर इसी अखबार ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि बहुत से लोग गंभीरता के साथ ही यह सुझाव देते हुए मिलते हैं कि मुसलमान बाबरी मस्जिद घटना को भूल जाएं और शिक्षा एवं रोजगार द्वारा उस सामूहिक परिवर्तन को पकड़ें जो उन्हें इस देश में ज्यादा प्रभावी बना सकता है। जहां तक इस पहले सुझाव का मामला है कि मुसलमान बाबरी मस्जिद को भूल जाएं, तो यह संभव नहीं है क्योंकि बाबरी मस्जिद देश में लोकतंत्र और भाईचारे का एक अहम प्रतीक थी। इस घटना ने मुसलमानों को ही नहीं देशवासियों को भी झिझोड़ कर रख दिया था। यह सेकुलरिज्म पर विश्वास रखने वाले, देश के हर नागरिक का मसला है। इस बुनियाद पर यह भी कहना गलत न होगा कि यदि मुसलमान उसे भूल जाएं तब भी यह घटना भूली नहीं जा सकती। दूसरा सुझाव सौ फीसदी सही है कि मुसलमान शैक्षिक एवं आर्थिक पिछड़ेपन से निजात हासिल कर जिंदगी की दौड़ में न केवल आएं बल्कि खुद को भी मनवाएं।
दारुल उलूम देवबंद में भारतीय दर्शन के शिक्षक एवं जमीअत उलेमा हिन्द के प्रवक्ता मौलाना अब्दुल हमीद नोमानी ने आरएसएस के चेन्नई में हुए तीन दिवसीय सम्मेलन पर चर्चा करते हुए लिखा है कि आरएसएस के सिलसिले में यह बताने की जरूरत नहीं है कि उसकी सभी बुनियादें नकारात्मक और प्रयास का निशाना देश के एक विशेष वर्ग का उत्थान और उसे सत्तासीन बनाना है, जिसे वह हिन्दू राष्ट्र का नाम देता है। तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में आयोजित हुई इस बैठक के पहले सेशन में असम की हिंसा के शीर्षक से बंगलादेशी घुसपैठियों की चनौती को देशव्यापी स्तर पर बताने की कोशिश की गई है। इससे जाहिर है कि राष्ट्रीय स्तर पर मुस्लिम अल्पसंख्यकों के खिलाफ बहुसंख्यक में घृणा और संदेह पैदा करने का और रास्ता खुलेगा। पुलिस प्रशासन की भी इसमें पूरी मदद मिलेगी, जैसा कि आज तक देखा गया है। घृणा, हिंसा और संदेह के माहौल में जहां संघ को बहुसंख्यक समाज के संरक्षण के तौर पर पेश करने का मौका मिल जाता है वहीं आतंक के शिकार इसे अपनी पनाहगाह समझते हुए इसके करीब आ जाते हैं और यही आरएसएस की कामयाबी है। आरएसएस के अंग्रेजी मुखपत्र`आर्गनाइजर' के सम्पादकीय, डॉ. प्रवीन तोगड़िया का स्तम्भ और राष्ट्रीय कार्यकारिणी के चेन्नई अधिवेशन की पूर्ण रिपोर्ट से संघ के इरादों का पता चलता है। इस सिलसिले में हमें नहीं मालूम कि हमारा नेतृत्व किस हद तक संघ के मामले को गंभीरता से लेते हुए आने वाले दिनों में रणनीति बनाकर ऐसा काम करेंगे जिससे मुल्क व मिल्लत दोनों को फायदा हो।
मुस्लिम युवाओं की गिरफ्तारी को लेकर समाजवादी पार्टी नेता प्रोफेसर राम गोपाल यादव की अगुवाई में संसद में मुद्दा उठाने और इसके चलते संसद की कार्यवाही तीन बार रोकनी पड़ी, जबकि इसके एक दिन पूर्व 3 दिसम्बर को लोक जन शक्ति पार्टी के अध्यक्ष राम विलास पासवान की अगुवाई में 16 सांसदों के एक प्रतिनिधि मंडल ने प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह से मुलाकात कर उन्हें एक ज्ञापन दिया। इन सांसदों ने जांच एजेंसियों सीबीआई, पुलिस और अन्य एजेंसियों द्वारा मुस्लिम युवाओं की लगातार हो रही गिरफ्तारियों पर चिन्ता व्यक्त की। इस पर प्रधानमंत्री ने उन्हें भरोसा दिलाया कि आतंकी मामलों में पारदर्शिता और ईमानदारी से काम लिया जाएगा। दैनिक `हमारा समाज' ने `विश्वास दिलाने से कुछ नहीं होगा' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में  लिखा है कि सवाल यह पैदा होता है कि इन मुस्लिम युवाओं को कब तक इंसाफ मिलेगा और प्रधानमंत्री ने जो विश्वास दिलाया है, उस पर किस समय अमल किया जाएगा। हकीकत यह है कि ऐसी यकीनी दहानी अल्पसंख्यक विशेषकर मुसलमानों के बारे में कराई जाती रही हैं लेकिन उसके बाद हमारे देश के नेता यह भूल जाते हैं कि हम ने कब किस से क्या वादा किया था। समाजवादी पार्टी की मांग पर प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ने आकर कोई बयान नहीं दिया जबकि संसद की कार्यवाही को तीन बार स्थगित करना पड़ा। राज्यसभा में मुस्लिम युवाओं की रिहाई के सिलसिले में नारे लगाए गए लेकिन हमें अब भी सरकार की नीयत साफ नजर आती और हमें नहीं लगता कि इस तरह की यकीन दहानी के बाद बेगुनाह मुसलमानों की गिरफ्तारियों पर रोक लग जाएगी।
अरविन्द केजरीवाल द्वारा `आम आदमी पार्टी' के नाम से सियासी पार्टी के गठन पर सहरोजा `दावत' के सम्पादक परवाज रहमानी ने विख्यात स्तम्भ `खबरो नजर' में चर्चा करते हुए लिखा कि आम आदमी पार्टी के संस्थापक के अब तक बयानात और विचारों से यह धारणा गलत न होगी कि वह अपने प्रयासों में ईमानदार हैं। भ्रष्टाचार से परेशान हैं और उसे हर कीमत पर खत्म करना चाहते हैं। थोड़ा जज्बाती आदमी  हैं लेकिन आदमी काम के हैं। इसलिए उन्हें याद दिलाना उचित मालूम होता है कि वह बातचीत याद करें जो गत वर्ष जमाअत इस्लामी हिन्दू मुख्यालय में अमीर जमाअत मौलाना जलालुद्दीन उमरी ने उनसे की थी, जब वह अपनी टीम के साथ जमाअत मुख्यालय विचार-विमर्श के लिए आए थे। अमीर जमाअत ने उनकी टीम से कहा था कि भ्रष्टाचार सहित सभी बुराइयों पर काबू अल्लाह के सामने जवाबदेही की धारणा के बिना संभव नहीं है। अरविन्द ने स्वीकार किया कि फिलहाल यह पहलू हमारे सामने नहीं है। अब उन्हें इस पर जरूर विचार करना चाहिए। काम देखने में मुश्किल है लेकिन अगर समझ में आ जाए तो भ्रष्टाचार पर रोक का सबसे आसान रास्ता भी यही है।
थ�e � � � ��{ Р� � हो सकती है और क्या जो दल पायः सभी दल-वर्ग विशेष का मत पाने की आंकांक्षा में उससे दूरी बनाये हुए हैं-वे सरकार बनाते समय संयुक्त मोर्चा बनाने की दिशा में जाकर कांग्रेस के समर्थन से सरकार चलायेंगे। पिछले डेढ़ दशक में जो राजनीतिक नियत उतरकर सामने आई है उससे किसी पतिबद्धता की सांवना का आंकलन करना दिवास्वप्न देखने के समान ही होगा। लेकिन एक बात को-उत्तर पदेश के संदर्भ में- समझ लेना आवश्यक है वह यह कि मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्रित्व के समय 1989 में जनता दल का विभाजन होने के बाद उनकी सरकार के समर्थन में जब कांग्रेस खड़ी हुई तो वे अल्पमत में थे। उनकी सरकार कांग्रेस के सहारे कुछ महीने चली नारायण दत्त तिवारी विपक्ष के नेता थे। मुलायम सिंह यादव ने जिस तरह से सरकार चलायी वह वैसी ही थी जैसे आज अखिलेश की सरकार चल रही है। फलतः 1991 के चुनाव में विधानसभा में चौथे नंबर का सिर्फ 31 सीटें मिल पायी थी और कांग्रेस तब से उत्तर पदेश में राजनीति की मुख्यधारा से बाहर है। नारायण दत्त के नेतृत्व में मुलायम सिंह की सरकार को समर्थन न मुलायम सिंह के लिए शुभ रहा और ना ही कांग्रेस के लिए। नारायण दत्त तिवारी का ``आर्शीवाद'' वैसा ही जैसे विधान परिषद में स्थान पाने के लिए जे.ए. अहमद का कम्युनिस्ट पार्टी छोड़ मुलायम सिंह की शरण में जाना। लेकिन उन्हें कुछ भी नहीं मिला। तिवारी जी सुर्खियों में बने रहने के लिए चाहे जो उपकम करें। अब उनको जे.ए. अहमद की स्थिति पाप्त हो गई है। आज की राजनीति अवसरवादिता और सत्ता सुख भोगने का साधन मात्र होकर रह गई है इसलिए किसी भी चुनाव के बाद कोई पार्टी किस करवट बढ़ेगी इसकी गारंटी नहीं दी जा सकती।

मोदी की माफी पर मुस्लिम जमाअतों की नाराजगी


ज्वाइंट कमेटी आफ मुस्लिम आर्गनाइजेशन फार इम्पावरमेंट के संयोजक एवं पूर्व सांसद सैयद शहाबुद्दीन द्वारा गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को लिखे पत्र पर मुस्लिम जमाअतों ने एक स्वर में इसकी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इसे निरस्त कर दिया। मोदी को लिखे पत्र में सैयद शहाबुद्दीन ने लिखा कि गुजरात नरसंहार के लिए मोदी माफी मांगें और गुजरात विधानसभा चुनाव में 20 सीटें मुसलमानों को दें। गुजरात पीड़ितों को 1984 के सिख दंगों की तरह मुआवजा देने, बेघर हुए परिवारों का पुनर्वास और सुरक्षा, दंगों में तबाह होने वाले लगभग 300 धार्मिक स्थलों का दोबारा निर्माण, दंगों के लिए जेल में सजा काट रहे आरोपियों की बिना शर्त रिहाई। जमीअत उलेमा हिन्द, जमाअत इस्लामी हिन्द, आल इंडिया मिल्ली काउंसिल और आल इंडिया मुस्लिम मजलिस मुशावरत जैसे बड़े संगठनों ने सैयद शहाबुद्दीन के इस पत्र से खुद को अलग करते हुए कहा कि यह उनका व्यक्तिगत बयान था और इस बाबत हम लोगों से कोई मशविरा नहीं किया गया और न ही हमने सैयद शहाबुद्दीन को इस बात का अधिकार दिया था कि वह कोई फैसला करें। जमीअत प्रवक्ता अब्दुल हमीद नोमानी ने कहा कि ज्वाइंट कमेटी के तहत जो बैठक हुई थी वह आरक्षण के मुद्दे पर थी और इस पर सभी मुस्लिम संगठनों की सहमति थी। लेकिन अब जो पत्र लिखा गया है उसका इससे कोई संबंध नहीं है वह राजनीति से प्रेरित है। आल इंडिया मिल्ली काउंसिल के महासचिव डा. मोहम्मद मंजूर आलम ने तो आधिकारिक तौर से सैयद शहाबुद्दीन को पत्र भेजकर ज्वाइंट कमेटी आफ मुस्लिम आर्गनाइजेशन फार इम्पावरमेंट को भंग करने की मांग की है। विवाद उठते देख सैयद शहाबुद्दीन ने सफाई देते हुए कहा कि आफिस क्लर्प की गलती से ज्वाइंट कमेटी के लैटरपैड पर यह पत्र चला गया। चूंकि यह सब गलती में हुआ है इसलिए अब यह बात खत्म हो जानी चाहिए।
दैनिक `इंकलाब' (नार्थ) के सम्पादक शकील सम्शी ने `मोदी को माफी का ड्रामा' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखा कि गुजरात चुनाव से पूर्व मोदी को माफी दिए जाने का ड्रामा शुरू हो गया है। कुछ मुस्लिम संगठनों की ओर से मोदी को माफी दिए जाने की सोची-समझी मुहिम शुरू करने का मकसद हमारी समझ से बहुत दूर की प्लानिंग है, क्योंकि मोदी को माफ किए जाने या न किए जाने का गुजरात चुनाव पर कोई विशेष प्रभाव होने वाला नहीं है। वहां इससे पूर्व दो बार चुनाव हो चुके हैं और मोदी को चुनाव जीतने में कोई परेशानी नहीं हुई, न तो उनको मुसलमानों की कोई चिंता थी और न उनको रिझाने की कोशिश मोदी ने की। दोनों चुनाव में कोई ऐसा नारा नहीं दिया गया था कि मोदी को मुसलमान कट  कर दें। न तो भाजपा ने मुसलमानों से कहा और न मोदी ने कभी यह चाहा कि मुसलमान गुजरात दंगों के लिए मोदी को माफ कर दें। कुछ मुस्लिम संगठनों के दिल में मोदी की जो मोहब्बत जागी है, इसका कोई कारण दिखाई नहीं पड़ रहा है। इसलिए आम मुसलमान को यही लग रहा है कि इन संगठनों और भाजपा के बीच कोई बहुत बड़ी डील हुई है।
`शहाबुद्दीन बनाम नरेन्द्र मोदी' के शीर्षक से दैनिक `जदीद खबर' ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि साप्ताहिक `नई दुनिया' के सम्पादक शाहिद सिद्दीकी के बाद सैयद शहाबुद्दीन ऐसे लोकप्रिय मुस्लिम नेता हैं जिन्हें मोदी की मोहब्बत में तीखी प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ रहा है। नरेन्द्र मोदी फिलहाल गुजरात के चुनावी दंगल में हैं। अखबारी रिपोर्टों पर विश्वास किया जाए तो वह एक बार फिर गुजरात में भाजपा की सरकार को सत्ता में ला रहे हैं, बात सिर्प इतनी-सी नहीं है। मोदी की नजर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर भी है और जब तक उनकी छवि सही नहीं होगी तब तक वह इस कुर्सी पर नहीं पहुंच सकते। मोदी की छवि को सही करने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी यह है कि किसी तरह मुसलमानों को खींचतान कर उनकी झोली में डाल दिया जाए। आश्चर्यजनक बात यह है कि इस काम को मुसलमानों के ऐसे नेता और पत्रकार अंजाम दे रहे हैं जिन्हें एक समय में मुसलमानों का बड़ा विश्वास हासिल रहा है। इसे मुस्लिम कौम का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या कहा जाएगा।
समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के प्रधानमंत्री बनने की इच्छा रखने पर चर्चा करते हुए दैनिक `सियासी तकदीर' में जावेद कमर ने अपनी समीक्षा में लिखा है कि चुनावी घोषणा पत्र में मुलायम सिंह ने मुसलमानों से बड़े वादे किए थे लेकिन हमें बहुत अफसोस के साथ लिखना पड़ रहा है कि अब तक एक भी वादा पूरा नहीं हुआ।
एक अहम वादा आतंकवाद के झूठे आरोप में बंद मुस्लिम युवाओं की रिहाई का था। यह मामला अब अदालत तक जा पहुंचा है जिसने राज्य सरकार पर तीखे कटाक्ष किए हैं। आठ महीनों के दौरान दो और मुस्लिम युवाओं को राज्य में आतंकवाद के आरोप में गिरफ्तार किया जा चुका है।
अब इस तरह की बात भी सामने आ रही है कि मुस्लिम विरोधी अधिकारियों को पदोन्नति दी जा रही है। लखनऊ में रिहाई मंच के एक धरने को सम्बोधित करते हुए पूर्व सांसद और सीपीआईएम नेता सुभाषनी अली ने आरोप लगाया कि 1992 में कानपुर में हुए दंगों के दौरान एसएसपी रहते जिस एसी शर्मा ने खुलेआम दंगाइयों को संरक्षण दिया और जिसकी जांच के लिए आईएस माथुर आयोग गठित किया गया था उसे डीजीपी बना दिया गया। अखिलेश सरकार ने मांग के बावजूद नमेश आयोग की रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया। सरकार ने आईबी की रिपोर्ट को भी गंभीरता से नहीं लिया जिसमें कहा गया था कि राज्य में सांप्रदायिक दंगे हो सकते हैं। तो क्या समाजवादी भी मुसलमानों को भयभीत कर उनका वोट लेना चाहते हैं?
`कांग्रेस का चुनावी हथकंडा ः कैश फार वोट' के शीर्षक से दैनिक `प्रताप' के सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि यूपीए सरकार ने 2014 लोकसभा चुनाव की तैयारियां जोरशोर से शुरू कर दी हैं। वह अपने पुराने और आजमाए हुए फार्मूले पर काम करने जा रही है। केंद्र सरकार ने अपनी वोटें पक्की करने के लिए गरीबों को सीधे पैसे देने का फैसला किया है। कांग्रेस पार्टी को उम्मीद है कि जब सीधे लोगों के खाते में पैसा जमा होगा तो वह सारे घोटालों, भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी, बिजली, पानी, कानून अव्यवस्था सब को भूल जाएंगे और कांग्रेस पार्टी को 2014 के चुनाव में वोट दे देंगे। ऐसा संभव भी हो सकता है और नहीं भी। यूपीए सरकार की योजना सफल हुई तो देश में सब्सिडी का स्वरूप 2013 के अंत तक पूरा ही बदल जाएगा। लेकिन यह काम इतना आसान भी नहीं है, पेचीदगियों से भरा हुआ है। सब्सिडी के कैश ट्रांसफर यानि लाभार्थियों को सीधे नकद सहायता देने की योजना में राजनीतिक जोखिम भी है। ब्राजील के उदाहरण से यह कहा जाने लगा है कि नकद सब्सिडी सत्तारूढ़ दल को चुनावी फायदा पहुंचा सकती है। अनेक सामाजिक संगठनों ने नकद सब्सिडी को लेकर कई अंदेशे जताए हैं। इसमें सबसे अहम सवाल यह है कि गरीबों को नकद सब्सिडी देने  से यह कैसे सुनिश्चित किया जा सकेगा कि इसका मकसद के अनुरूप ही इस्तेमाल होगा?
`एफडीआई ः सरकार का नया आत्म विश्वास' के शीर्षक से हैदराबाद से प्रकाशित दैनिक `ऐतमाद' ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि एफडीआई पर करुणानिधि के फैसले से कांग्रेस को बड़ी राहत मिली है जबकि दूसरी दो पार्टियां समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जो बाहर से सरकार का समर्थन कर रही हैं, ने सरकार को बचाने का फैसला किया है। भाजपा और वाम मोर्चे की पार्टियों ने सरकारी नीतियों का सामूहिक रूप से विरोध किया है और चाहती हैं कि इस मुद्दे पर वोटिंग हो। इस मकसद के लिए इन जमाअतों ने संसद की कार्यवाही को ठप कर रखा है। सरकार बहस के लिए तैयार है। बहस के बाद वोटिंग होगी या नहीं, यह फैसला यूपीए ने स्पीकर के विवेकाधिकार पर छोड़ या है।

Monday, November 26, 2012

बाल ठाकरे और मुसलमान


अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के बर्मा दौरे पर चर्चा करते हुए दैनिक `जदीद मेल'ने अपने सम्पादकीय में लिखा है। उनके पहले शासनकाल में उनके प्रशासन की विदेश नीति का केंद्र मध्य पूर्व और अफगानिस्तान बने हुए थे लेकिन मालूम होता है कि अब उनके लिए एशिया बहुत अहम रहेगा। अमेरिकी राष्ट्रपति का दौरा केवल छह घंटे तक जारी रहा लेकिन फिर भी यह बहुत अहम है। गत वर्ष तक बर्मा विश्व बिरादरी में आलोचना का निशाना बना रहा और वह फौजी शासन एवं मानव अधिकार उल्लंघन के कारण नापसंद और अलोकतांत्रिक देश माना जाता था। ओबामा प्रशासन का कहना है कि इस दौरे का मकसद उन लोकतांत्रिक सुधारों का समर्थन करना है जो राष्ट्रपति थेन सेन ने बर्मा में शुरू की है लेकिन एक और मकसद यह भी है जिसका जिक्र नहीं किया जाता, वह है बर्मा में चीन के बढ़ते असर को कम करना। बर्मा और चीन के संबंधों का इतिहास बहुत अच्छा नहीं रहा है और दोनों के बीच हथियारों के बेचने और चीनी निवेश पर आधारित रहा है। दौरे की आलोचना करने वालों का यह भी कहना है कि शायद यह दौरा समय से पहले किया गया है। क्योंकि सुधार की प्रक्रिया पिछले साल से ही शुरू हुई थी और इस पर अमेरिका अपने लिए कोई विशेष मांग नहीं मनवा सका। बर्मा सरकार ने कुछ दिन पूर्व 452 कैदियों को माफी देने की घोषणा की थी लेकिन इनमें वह लोग शामिल नहीं हैं जिनको सियासी बुनियाद पर कैद किया गया है। `बर्मा की सरकार ने कुछ कैदियों को रिहा किया है जिनमें कोई सियासी कैदी शामिल नहीं। यह तो दौरे के लिए कोई अच्छी शुरुआत नहीं।' बर्मा में सत्ता और सियासी सुधार के बारे में अब भी बहुत कुछ स्पष्ट नहीं है। फौज की भूमिका कितनी कम हो सकी है, बर्मा के वर्तमान राष्ट्रपति सुधार के प्रति कितना गंभीर हैं, इन सवालों का जवाब किसी के पास नहीं है।
बर्मा में मुसलमानों के नरसंहार के हवाले से दैनिक `जदीद मेल' ने `ओबामा का म्यांमार का दौरा' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखा है कि बराक ओबामा ने म्यांमार के दौरे के दौरान कहा कि रोहगनियां मुसलमानों को राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल किया जाना चाहिए। निसंदेह उनके इस बयान से मुसलमानों को हार्दिक सुकून मिला होगा लेकिन गत चार वर्ष का अनुभव कहता है कि ओबामा मुसलमानों के हक में हमदर्द साबित नहीं हुए और इनकी कथनी करनी से मुसलमानों को मायूसी हाथ लगी है। गत चार साल के शासनकाल में ओबामा ने सबसे बड़े आतंकी देश इजरायल को फलस्तीनी मुसलमानों की हत्या करने की खुली छूट दे रखी है जब-जब इजरायल को घेरने की कोशिश की गई। अमेरिका वीटो कर गया और फलस्तीन मामला वहीं का वहीं उलझा रहा। गत एक सप्ताह से फिर इजरायली हमलों में तेजी आ गई है। ओबामा से जब फलस्तीनी मुसलमानों के बारे में कोई आशा नहीं की जा सकती तो फिर इनके इस बयान पर किस तरह विश्वास किया जा सकता है कि म्यांमार  में रोहगनियां मुसलमानों को राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल किया जाए। अपने चार वर्षीय शासनकाल में अपनी कथनी और करनी से अब तक यह साबित नहीं किया गया है कि वह मुसलमानों के हमदर्द हैं।
`इजरायल बनाम हमास लड़ाई खतरनाक मोड़ पर' के शीर्षक से दैनिक `प्रताप' के सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि मध्य पूर्व एशिया में गाजा पट्टी और इजरायल में पिछले कई दिनों से लड़ाई खतरनाक स्थिति में पहुंचती जा रही है। गत दिनों फलस्तीनी चरमपंथियों ने यरुशलम पर राकेट से हमला किया। फलस्तीनी संगठन हमास ने कहा कि इस राकेट का निशाना इजरायली संसद थी। पिछले कई दशकों में यह पहली बार है कि यरुशलम को निशाना बनाया गया और गाजा पट्टी से इस तरह का यह पहला हमला था। पिछले कई दिनों से हमास तथा इजरायल की तरफ से एक-दूसरे को निशाना बनाया जा रहा है और दोनों ही यह स्वीकार भी कर रहे हैं कि अंतर बस इतना है कि इजरायल डिफेंस फोर्स (आईडीएफ) इसे आतंकी ठिकानों पर किया गया हमला बता रहा है और हमास सहित अरब दुनिया या उससे जुड़े तमाम चरमपंथी संगठन इसे गाजा के निर्दोष लोगों के खिलाफ हमला मान रहे हैं। दोनों देशों द्वारा अपनाई जा रही गतिविधियों को देखते हुए यह कहना शायद गलत होगा कि इस स्थिति के लिए कोई एक दोषी है।
मुसलमानों के प्रति बाल ठाकरे का रवैया को लेकर दैनिक `जदीद खबर' में `बाल ठाकरे और मुसलमान' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखा है कि बाल ठाकरे की पूरी जिंदगी मुसलमानों की देशभक्ति पर सवालिया निशान लगाते गुजरी। वह अक्सर ऐसे बयान दागा करते थे जो भारतीय दंड संहिता के तहत काबिले गिरफ्त होते थे। उन पर कई बार मुकदमे भी कायम हुए लेकिन कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ सका क्योंकि उन्होंने कानून का क्रियान्वयन करने वाली संस्थानों पर यह भय कर रखा था कि यदि पुलिस ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई की तो पूरा महाराष्ट्र जल उठेगा। पुलिस और प्रशासन इसी भय से इनके खिलाफ कोई सख्त कदम नहीं उठा सके और इसी बुजदिली (कायरता) के नतीजे में बाल ठाकरे लॉ एंड आर्डर की मशीनरी पर हावी हो गए। बाल ठाकरे शिवसेना मुख्य पत्र `सामना' में भी अपने सम्पादकीय में अक्सर मुसलमानों के खिलाफ अंतिम स्तर की भड़काऊ लेखनी लिखा करते थे, यह उनकी सियासी मजबूरी थी क्योंकि उन्होंने अपनी सांप्रदायिकता की राजनीति से जिन लाखों शिव सैनिकों की फौज तैयार की थी उसकी मानसिक खुराक और हरारत बाला साहब के उत्तेजित बयान और भड़काऊ लेखनी से ही मिलती थी। दिलचस्प बात यह है कि मुसलमानों से दुश्मनी के बावजूद उन पर विश्वास भी करते थे। जिस समय उन्होंने अंतिम सांस ली तो उनके पास जो डाक्टर मौजूद था उसका नाम डॉ. जलील पारकर था। डॉ. जलील बाल ठाकरे का पांच साल से इलाज कर रहे थे और इनके परिवार को डॉ. जलील पर बड़ा भरोसा था। डॉ. जलील ठाकरे के साथ  दशहरे की पारंपरिक रैली में मंच पर मौजूद रहते थे ताकि आपातकाल स्थिति में उन्हें चिकित्सा सहायता पहुंचा सकें।
`कसाब को फांसी' के शीर्षक से दैनिक `राष्ट्रीय सहारा' ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि फांसी दिए जाने के लिए ऐसा समय चुना गया जिसके सियासी पहलू को देखने के लिए किसी मैगनीफाइट ग्लास की जरूरत नहीं है। कसाब को फांसी 21 नवम्बर को दी गई, संसद का अधिवेशन 22 नवम्बर से शुरू हो रहा है। इसका मतलब यह है कि संसद के अधिवेशन का पहला दिन बहुत दिलचस्प होगा। इस दिन सरकार के खिलाफ या तो कुछ कहा ही नहीं जा सकता और यदि कहा जा सकता है तो अच्छा ही कहा जा सकता है। कम से कम इस मुद्दे पर विपक्ष सरकार पर हमला नहीं कर सकता। विपक्ष के पास केवल एक मुद्दा अफजल गुरु की फांसी की मांग का रह गया, वह भी कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने छीन लिया है। इससे पहले कि कोई और अफजल गुरु का मामला उठाए, उन्होंने खुद ही उसकी फांसी की मांग कर दी।
इसमें कोई संदेह नहीं कि अजमल कसाब की फांसी से कांग्रेस आमतौर से और महाराष्ट्र कांग्रेस विशेष रूप से फायदा उठाने की कोशिश करेगी। महाराष्ट्र में बाल ठाकरे की मौत के बाद जो सियासी गैप पैदा हो गया, उसे भरने के लिए जनहित में कुछ लोकप्रिय कदम उठाए जाएं। अजमल कसाब को फांसी दिया जाना ऐसा ही कदम है क्योंकि इसकी फांसी की मांग केवल सियासी पार्टियां ही नहीं, वह लोग भी कर रहे थे जिनके अपने 26/11 हमले में मारे गए थे।

Sunday, November 18, 2012

क्या है इस्लामोफोबिया, कौन है इसके पीछे?


इस्लामोफोबिया पर विश्वस्तरीय चर्चा के बीच साप्ताहिक `नई दुनिया' ने `क्या है इस्लामोफोबिया? कौन है इसके पीछे?' के शीर्षक से एक विशेष अंक प्रकाशित किया है। इस अंक में उपरोक्त विषय पर विस्तृत चर्चा की गई है। वास्तव में 1990 के बाद इस्लामोफोबिया के ऊपर उठने का सबसे अहम कारण सोवियत यूनियन का बिखरना है। सोवियत यूनियन बिखर गया तो पश्चिम ने समझ लिया कि अब मुकाबला मुसलमानों से होगा और इस्लाम ही सबसे बड़ा खतरा होगा। पश्चिम ने इस्लाम को निशाना बनाया। इसी दौरान सोवियत यूनियन के जिहाद में ओसामा बिन लादेन आ चुका था। बाद में अमेरिका के खिलाफ उठ खड़ा हुआ और पश्चिम की इस्लाम दुश्मनी के लिए ओसामा बिन लादेन सबसे बड़ा बहाना बना। सभ्यताओं के टकराव के विषय पर बड़े-बड़े बुद्धिजीवियों और समीक्षाकारों ने उस समय यह दावा किया था कि इस्लाम और पश्चिम में खूनी टकराव बाकी है। इसे प्रचारित किया गया और इस पर अरबों डालर खर्च किए गए। जब इंटरनेट का दौर आया तो इंटरनेट पर इस्लामोफोबिया की जंग और ज्यादा बढ़ी। पश्चिम में इस्लामोफोबिया की मुहिम वास्तव में मुसलमानों की नई पीढ़ी की राह में रुकावटें पैदा करने की कोशिश है। 1997 में ब्रिटिश सरकार ने एक आयोग गठित किया जिसने ब्रिटिश मुसलमानों और इस्लामोफोबिया पर रिपोर्ट दी। रिपोर्ट के अनुसार इस्लामोफोबिया सब के लिए खतरनाक और ब्रिटेन के लिए चैलेंज है। इसके चलते ब्रिटेन में मुसलमानों को विभिन्न क्षेत्रों में भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है। साफ जाहिर होता है कि इस्लामोफोबिया के पीछे कोई ग्रुप नहीं बल्कि सरकारें भी हैं, अन्यथा आयोग ने जिन बातों का जिक्र वास्तविकता की श्रेणी में किया है वह अलग होतीं। आज इस्लामोफोबिया, ब्रिटेन हो अमेरिका या फ्रांस सबके लिए खतरनाक है, यह सोच और दृष्टिकोण दुनिया को एक बड़ी जंग की ओर ले जा रहा है।
विख्यात अंग्रेजी साहित्यकार एवं नोबल सरकार पुरस्कार से सम्मानित वीएस नायपाल को मुंबई में लेटरेरी फेस्टिवल में `लाइफ टाइम एचीवमेंट अवार्ड' दिए जाने के खिलाफ मशहूर ड्रामा निगार और हिदायत कार गिरीश कर्नाड के मोर्चा खोलने और अवार्ड दिए जाने के विरोध के चलते जिस तरह पूरा मामला बहस में आ गया है उस पर चर्चा करते हुए दैनिक `इंकलाब'  के सम्पादक शमीम तारिक ने अपने विशेष लेख `नायपाल और गिरीश कर्नाड' के शीर्षक से लिखा है कि इस बहस से हटकर कि अंग्रेजी उपन्यासकार वीएस नायपाल ने क्या लिखा और उनकी लेखनी में कौन से लेखनी फिक्शन की श्रेणी में आती है और कौन सी नहीं? या ड्रामा  निगार और हिदायत कार गिरीश कर्नाड ने लेटरेरी फेस्टिवल में नायपाल की जो आलोचना की वह किस तरह की थी, इस सवाल पर विचार किया जाना जरूरी है कि भारतीय सभ्यता को मुसलमानों ने कुछ दिया है या उसे बर्बाद किया है? गिरीश कर्नाड का दृष्टिकोण स्पष्ट है कि `नायपाल विदेशी हैं और उन्हें अपनी बात कहने की पूरी आजादी है लेकिन एक ऐसे व्यक्ति को पुरस्कार देने के लिए आखिर क्यों चुना गया जो भारतीय मुसलमानों पर धावा बोलने वाला, हमला करने वाला, लुटेरा, लूटमार करने वाला कहता है।' गिरीश कर्नाड ने बहुत सही कहा है कि पुरस्कार हासिल करने का मतलब यह नहीं है कि नायपाल को कुछ भी बोलने का हक हासिल हो गया हो।
`कुत्तों पर हुए हमलों के पीछे भी आतंकियों का हाथ' के शीर्षक से दैनिक `सियासी तकदीर' में `खबरों की खबर' स्तम्भ में जावेद कमर ने लिखा है कि अखबारी खबरों के मुताबिक गत कुछ महीने में मल्लापुरम (केरल) जिले में दर्जनों कुत्तों को निशाना बनाया गया है जिनमें से कुछ मर भी चुके हैं। इस मामले में पुलिस ने 6 मामले दर्ज किए हैं और 100 से अधिक लोगों से पूछताछ भी की है। आश्चर्यजनक बात यह है कि इंटेलीजेंस ब्यूरो ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि इन कार्यवाहियों में एक विशेष धार्मिक कट्टरपंथियों का हाथ हो सकता है। ताजा खबर यह है कि केरल पुलिस अब इसी रिपोर्ट की रोशनी में अपनी जांच आगे बढ़ा रही है। कुत्तों पर हमलों की घटनाएं ज्यादातर मुस्लिम बहुल क्षेत्र मल्लापुरम के गांव और कस्बों में हुई हैं। लेकिन पिछले दिनों इसी तरह की घटनाएं कोजीकोड और पुलकड़ जिलों में भी हुई हैं। तमिलनाडु की सीमा पर स्थित वयानंद जिले में ऐसे कम से कम 30 कुत्ते मिले हैं जिनकी गर्दनों पर तलवार के गहरे जख्म हैं। इसी बुनियाद पर यह खबरें फैलाई जा रही हैं कि केरल तमिलनाडु की सीमा पर जो घने जंगल हैं उनमें कहीं कट्टरपंथियों का प्रशिक्षण शिविर चल रहा है। तर्प दिया जा रहा है कि कुत्तों पर हमले प्रशिक्षण लेने वाले युवाओं से कराए जा रहे हैं ताकि उनके अंदर से भय निकल जाए और प्रशिक्षण के बाद जब वह बाहर निकलें तो उन्हें किसी की जान लेने में किसी प्रकार का संकोच न हो।
गुजरात विधानसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी द्वारा बरेलवी मसलक के लोगों की बैठक करने पर दैनिक `हमारा समाज' में अमीर सलाम खां ने लिखा है कि यह मुसलमानों को कमजोर करने के लिए भाजपा का नया हथकंडा है, मसलक के नाम पर भिड़ाने की कोशिश है। सूत्रों के मुताबिक गुजरात के शहर गांधी नगर में बरेलवी मसलक के लगभग 45 विशिष्ठ व्यक्तियों के साथ नरेन्द्र मोदी ने एक अत्यंत गोपनीय बैठक की। इस बैठक में गुजरात के अतिरिक्त पड़ोसी राज्यों महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान से भी उलेमा, सज्जादा नशीन और दरगाहों के जिम्मेदारों को बुलाया गया था। लगभग डेढ़ घंटे तक यह बैठक चली। मोदी ने इस बात पर जोर दिया कि बरेलवी पंत ही देश का वफादार है जिसकी कांग्रेस की ओर से लगातार अनदेखी हो रही है लेकिन अब  ऐसा नहीं होगा। बैठक के बाद ज्यादातर लोग इस बात को पचा नहीं पाए और एक बड़ी संख्या ने यह भांप लिया कि यह एजेंडा कहां से और क्यों लाया गया है। यह मुसलमानों को बांटने का वही एजेंडा है जो आरएसएस का है। बताया जाता है कि गुजरात विधानसभा चुनाव में इस बार मोदी अपने घर लगी आग से बहुत परेशान हैं जिसकी भरपाई वह मुसलमानों को बांट कर करना चाहते हैं।
उत्तर प्रदेश में आतंकवाद के आरोप में गिरफ्तार मुस्लिम युवकों को छोड़े जाने के फैसले पर दैनिक `प्रताप' के सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने अपने सम्पादकीय `किस कानून के तहत वापस लिए जा रहे हैं आतंकियों के मुकदमें' शीर्षक से लिखा है कि सपा के प्रदेश प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी ने कहा है कि आदेश देकर अखिलेश सरकार ने मुसलमानों के साथ किए गए चुनावी वादे को पूरा किया है। इनमें से ज्यादातर आरोपियों को 2007 में वाराणसी, गोरखपुर में हुए बम विस्फोट, रामपुर स्थित सीआरपीएफ कैम्प एवं लखनऊ, बाराबंकी और फैजाबाद में आतंकी हमले की साजिश में गिरफ्तार किया गया था। इनमें से कइयों ने अपनी गिरफ्तारी के औचित्य और स्थान को अदालत में चुनौती दे रखी है।
अखिलेश सरकार के इस फैसले पर प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है। राजनीतिक दृष्टि से भी और न्यायिक दृष्टि से भी। भाजपा ने इस आदेश को वोट बैंक का तुष्टीकरण का उदाहरण करार देते हुए कहा कि यह कदम कानून व्यवस्था का गला घोंटने जैसा है। उधर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रामपुर में सीआरपीएफ कैम्प पर हमला करने वाले आतंकियों से मुकदमा वापस लिए जाने पर प्रदेश सरकार से पूछा है कि वह किस कानून के तहत मुकदमे वापस ले रही है? अखिलेश सरकार के इस फैसले से सुरक्षा बलों के मनोबल पर असर पड़ सकता है।

ओबामा और उम्मीदें


अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में राष्ट्रपति बराक ओबामा के दोबारा चुनाव जीतने पर लगभग सभी उर्दू अखबारों ने खबरों के अलावा विशेष सम्पादकीय और लेख प्रकाशित किए हैं। दैनिक `इंकलाब' ने `ओबामा और उम्मीदें' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखा है कि ओबामा को यह जीत इसलिए हासिल हुई कि कांटे के इस मुकाबले में निर्णायक वोट उन अल्पसंख्यकों के थे जो हस्पानवी, लातीनी, अमेरिकी, एशियाई और मुस्लिम अमेरिकी कहलाते हैं। हस्पानवी अमेरिकियों ने उन्हें इसलिए वोट दिया कि ओबामा खुद भी हस्पानवी हैं। लातीनी अमेरिकियों ने उनके हाथ इसलिए मजबूत किए कि रोमनी अमेरिका के बहुसंख्यक वर्ग को लुभाने में लगे थे। एशियाई और मुस्लिम अमेरिकियों ने उन पर नए सिरे से इसलिए भरोसा किया कि मिट रोमनी इजरायल प्रेम में तेल  अबीब को ओबामा से ज्यादा सलामियां दाग रहे थे। अमेरिका के आम लोगों को ओबामा में गरीब और मध्यम वर्ग के हितों को साधने की इच्छा दिखाई दे रही थी जबकि रोमनी पूरी तरह पूंजीवादियों के हितों का संरक्षण करते दिखाई पड़ रहे थे। इन्हीं कारणों ने ओबामा की लाज रख ली और व्हाइट हाउस में चार साल और रहने को निश्चित किया। अमेरिकी कानून के मुताबिक कोई व्यक्ति दो ही बार राष्ट्रपति हो सकता है अर्थात् ओबामा को अब कोई अवसर नहीं मिलने वाला है, इसलिए अब उन्हें फैसला करना है कि इतिहास में किस तरह याद किया जाना पसंद करेंगे। न्यायप्रिय राष्ट्रपति या अपने पूर्व की तरह पक्षपाती, हिंसक और डिक्टेटर की हैसियत से।
हैदराबाद से प्रकाशित दैनिक `मुनसिफ' ने `ओबामा को दोबारा चुनाव' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव अमेरकी जनता के लिए तो विशेष महत्व रखते ही हैं लेकिन गैर अमेरिकियों और दुनिया के दूसरे देश भी इन चुनावी नतीजों पर गहरी नजर रखते हैं क्योंकि व्हाइट हाउस में तब्दीली की सूरत में कई नीतियों की तब्दीलियों की संभावना पैदा हो जाती है। आशा की जा रही है कि अगले वर्षों में दुनिया में स्टेटेजिक लिहाज से बड़ी तब्दीलियां होंगी। अफगानिस्तान से अमेरिकी और नाटो फौज की वापसी, ईरान और मध्य एशिया के मामलात, चीन जापान विवाद, उत्तरी कोरिया से चल रहा विवाद, मध्य पूर्व में बेचैनी और गृहयुद्ध से लेकर अफ्रीकी देशों में बेचैनी की लहर तक कई समस्याएं हैं जो हल की इच्छुक हैं। यही कारण है कि दुनियाभर की निगाहें राष्ट्रपति चुनाव पर लगी थीं ताकि इनकी रोशनी में आगे आने वाली संभावित तब्दीली से निपटने की तैयारी की जा सके। लेकिन ओबामा की जीत से हालात ज्यूं का त्यूं रहने की आशा है। जहां तक इस्लामी जगत से अमेरिकी संबंधों का सवाल है। पहली बार राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने न केवल गवानतामोबे कैद खाना बंद करने का वादा किया था बल्कि मिस्र की जामिया अजहर के ऐतिहासिक भाषण में अमेरिका और इस्लामी जगत के बीच बेहतर संबंधों का वादा किया था और एक स्वतंत्र फलस्तीन राज्य की स्थापना का सपना भी दिखाया था। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। इसके विपरीत उनकी हिंसक युद्ध नीतियों से इस्लामी जगत में नए महाज खुलने की शंकाएं बढ़ गई हैं।
दैनिक `जदीद मेल' ने `ओबामा का चुनाव' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के इतिहास पर चर्चा करते हुए लिखा है कि 2012 के राष्ट्रपति चुनाव में जीत के बाद राष्ट्रपति बराक ओबामा गत सौ साल में दूसरी पारी के लिए निर्वाचित होने वाले 7वें अमेरिकी राष्ट्रपति बन गए हैं। 1912 से अब तक अमेरिका में कुल 17 राष्ट्रपति सत्तासीन रहे जिनमें से उनका संबंध रिपब्लिक और 8 का डेमोकेटिक पार्टी से था। इन 17 राष्ट्रपतियों में से फ्रेंकिलन डीरोज ओल्ट अकेले राष्ट्रपति हैं जिन्होंने चार बार अमेरिकी राष्ट्रपति की कमान संभाली। पूर्व में लगातार दो बार राष्ट्रपति बनने वालों में बिल क्लिंटन, जॉर्ज डब्ल्यू बुश और रोनाल्ड रीगन शामिल हैं।
गत सौ साल में दूसरी बार राष्ट्रपति बनने का पहला अवसर विल्सन को 1917 में मिला। इनके शासनकाल में प्रथम विश्व युद्ध हुआ इसके बाद संयुक्त राष्ट्र परिषद का गठन हुआ।  बराक ओबामा से पूर्व दो बार चुने जाने वाले आखिरी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश थे जो 2001 में राष्ट्रपति बने और 2009 में ओबामा के राष्ट्रपति बनने तक इस पद पर रहे। बुश शासन काल में सितम्बर 2001 में अमेरिका के शहर न्यूयार्प में होने वाले हमलों के बाद आतंकवाद के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय युद्ध हुआ और यही युद्ध इनके शासन का केंद्र रहा।
दैनिक `राष्ट्रीय सहारा' में सहारा न्यूज नेटवर्प के एडीटर एवं न्यूज डायरेक्टर उपेन्दर राय ने पहले पेज पर प्रकाशित अपने विशेष सम्पादकीय के तहत `यह उम्मीद की जीत है' में लिखा है कि भारत की बिजनेस कम्युनिटी को ओबामा की जीत से बहुत उम्मीदें नहीं जगी हैं। भारत की आईटी कम्पनियों को चिंता है कि आउटसोर्सिंग के विरोध में अमेरिका में फिर आवाज उठाई जाएगी। आईटी विशेषज्ञों को आसानी से वीजा नहीं मिलेगा और इसका असर उनके मुनाफे पर पड़ेगा। लेकिन मेरे विचार से यहां बहुत बड़ी चिंता की बात नहीं है। हिन्दुस्तान की आईटी कम्पनियों में इतनी मजबूती आ गई है कि वह इस तरह के चैलेंजों को बर्दाश्त कर सकें। वैसे ओबामा के चार साल के शासन काल में अमेरिका में अपनी आईटी कम्पनियों का कारोबार बढ़ा ही है और कोई कारण नहीं है कि अगले चार साल में ऐसा नहीं होगा। मेरे विचार से ओबामा को देसी आईटी कम्पनियों को महीन चश्मे से नहीं देखा जा सकता। यह सच है कि भारत के लिए उन्होंने कुछ भी अलग नहीं किया है लेकिन उनका यह अप्रोच रहा है। किसी की सीधी मदद करने के बजाय उसकी तरक्की के रास्ते में रुकावट न पैदा करना। दूसरों की आजादी और स्वायत्तता करना और उनका यही अप्रोच दूसरे अमेरिकी राष्ट्रपतियों से बहुत अलग करता है। ओबामा के दूसरी बार राष्ट्रपति बनने पर हिन्दुस्तान पर क्या असर पड़ेगा। मेरे विचार से अच्छी बात यह है कि हमारे प्रधानमंत्री और अमेरिकी राष्ट्रपति की अच्छी कैमिस्ट्री है जिसका फायदा हमें मिलेगा और पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान में शांति व्यवस्था को बहाल करने की ओबामा की कोशिशें और तेज होंगी। अमेरिकी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की कोशिश तेज होगी और इसके चलते हमारे देश में विदेशी निवेश का फ्लो बढ़ेगा।
दैनिक `हिन्दुस्तान एक्सप्रेस' ने `फिर `गधा' जीत गया' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखा है कि अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में फिर गधा जीत गया और हाथी ने हार मान ली। अमेरिका में दो पार्टियों के बीच ही मुकाबला होता है क्योंकि यहां टू पार्टी व्यवस्था है जिसके तहत डेमोकेटिक पार्टी और रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार आमने-सामने हुआ करते हैं। डेमोकेटिक पार्टी जिसके बारे में है कि वह खुले विचारों की है ने ओबामा को अपना उम्मीदवार बनाया और उनका चुनाव चिन्ह `गधा' था जबकि मिट रोमनी रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार थे जिसके बारे में अमेरिकियों का विचार है कि यह कट्टरपंथी हैं इनका चुनाव चिन्ह `हाथी' था। राष्ट्रपति जंग में `हाथी' `गधे' से हार गया। अमेरिका में गधे को मेहनत, धैर्य, प्रयास का प्रतीक माना जाता है जबकि हमारे यहां यही गधा बेवकूफी का प्रवक्ता कहलाता है। बहरहाल देखने की बात यह होगी कि बराक हुसैन ओबामा की दूसरी पारी किस गधे के गुणों के करीब होती है।

`बढ़ती महंगाई के कारण गरीब को दो वक्त की रोटी के लाले'


`बढ़ती महंगाई के कारण गरीब को दो वक्त की रोटी के लाले' के शीर्षक से दैनिक`प्रताप' के सम्पादक अनिल नरेन्द्र ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि डीजल के दामों में वृद्धि का असर अब महंगाई पर दिखने लगा है और बुरी खबर यह है कि महंगाई की मार से पस्त हो चुके आम लोगों को निकट भविष्य में भी इससे निजात मिलने की खास संभावना नहीं है। उलटे आशंका है कि डीजल और पेट्रोल के दाम और बढ़ाने की तैयारी हो रही है और खाने-पीने की वस्तुओं की कीमतें अभी और बढ़ेंगी। कीमतों में हुई इस वृद्धि के बाद सितम्बर में थोक मूल्यों पर आधारित महंगाई दर 7.81 फीसदी पर पहुंच गई है। अगस्त में यह 7.55 फीसदी थी। एसोचैम के मुताबिक आठ महत्वपूर्ण खाद्य पदार्थों जिनमें दालें, गेहूं, चीनी, खाद्य तेल और दूध शामिल हैं, के दाम सितम्बर 2011 से सितम्बर 2012 के मध्य तक 18 फीसदी बढ़े जबकि इसकी तुलना में औसत आय बमुश्किल 10 फीसदी बढ़ी है। उद्योग मंडल द्वारा अपने अध्ययन में यह रेखांकित करना महत्वपूर्ण है कि आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति पक्ष की कमजोरी महंगाई की भयावहता को बढ़ा रही है।
इसकी एक बड़ी वजह कमजोर मानसून को भी बताया गया लेकिन इसके निदान हेतु यदि कदम उठाए भी गए तो उसका नतीजा महंगाई पर कहीं नजर नहीं आया। हमारा मानना है कि इस संप्रग सरकार की प्राथमिकताएं सही नहीं हैं। इसका एक उदाहरण मौजूदा आर्थिक विकास माडल में कृषि क्षेत्र की हो रही लगातार अनदेखी है।
कौमी काउंसिल बराए फरोगे उर्दू जुबान (नेशनल काउंसिल फार प्रमोशन आफ उर्दू लैंग्वेज) की कार्यप्रणाली पर केके खुल्लर की आलोचना के बाद उर्दू मासिक आईटी `नई शनाखत' के  पूर्व सम्पादक फिरोज हाशमी ने काउंसिल पर टीका टिप्पणी करते हुए लिखा है कि 1998 में जब काउंसिल डायरेक्टर ने काउंसिल से प्रकाशित नूरुल लुगात (शब्द कोश) को इन पेज उर्दू साफ्टवेयर में शामिल करने को कहा था और उस समय इन पेज से संबंधित उर्दू का काम मेरे जिम्मे था, मेरे पास आया तो मैंने इसके अध्ययन से यह निष्कर्ष निकाला कि यह शब्द कोश विश्वस्तरीय उर्दू साफ्टवेयर इन पेज में शामिल करने लायक नहीं है। इस नोट के साथ मैंने इस शब्द कोश के चारों खंड काउंसिल को वापस कर दिए। काउंसिल आज तक खुद भी कोई गुणवत्ता वाला साफ्टवेयर तैयार नहीं कर सकी है जिससे उर्दू प्रकाशन में उल्लेखनीय फर्प आया हो। हद तो यह है कि इन पेज उर्दू के लिए उर्दू में जो मैनवेल हमने तैयार किया था उसे कई व्यक्ति और संस्थान किताबी शक्ल में छाप रहे हैं। खुद काउंसिल भी अपने छात्रों के लिए इन पेज की गाइड बुक तैयार नहीं कर सकी है। 2000 में यह बात सामने आई कि जिस व्यक्ति ने काउंसिल की नौकरी के दौरान इन पेज मैनवेल को काट छांट कर गाइड बुक तैयार की थी, वही इसे फिर से भुनाने की कोशिश कर रहा है। यदि वह गाइड बुक इतनी ही गुणवत्ता वाली थी तो काउंसिल ने एक संस्करण के बाद उसे दोबारा क्यों नहीं छापा और इन पेज के मैनवेल को छाप कर क्यों इस्तेमाल कर रही है?
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को ब्रिटेन और अमेरिका द्वारा वीजा दिए जाने के समाचार पर `सहरोजा दावत' ने पहले पेज पर प्रकाशित `दंगों के दाग धुले नहीं तो संबंधों की बहाली क्यों?' के शीर्षक से अपनी समीक्षा में लिखा है कि गुजरात में विधानसभा चुनावों की घोषणा के बाद ब्रिटिश सरकार ने 2002 के गुजरात दंगों को जो वास्तव मुस्लिम नरसंहार थे, को बाई-बाई करते हुए नरेन्द्र मोदी को गुड मार्निंग कहा है और नए सिरे से संबंध बनाने के लिए पैंगे बढ़ाई हैं। नरेन्द्र मोदी को अमेरिका या ब्रिटेन के दौरे का वीजा देने पर पाबंदी की मांग न तो हिन्दुस्तानी मुसलमानों ने की थी और न इस फैसले में उनकी कोई भूमिका थी। यह उन देशों का अपना फैसला था। इसलिए मुसलमान न तो पाबंदी पर खुश थे और न अब मुलाकातों पर दुखी। वह इस पहलू पर जरूर सोच रहे हैं कि दुनिया में अब भी सरकारी स्तर पर मानवता का सम्मान करने और नरसंहार को अपराध मानने वाले मौजूद हैं। उन्हें यदि अफसोस है तो केवल इस बात पर कि उनकी यह सोच गलत साबित हो रही है और वह इसे अपने साथ एक धोखा समझ रहे हैं। एक बड़ा सवाल यह है कि किस बुनियाद पर मोदी के दौरों पर पाबंदी लगाई गई और सरकारी स्तर पर इनसे दूरी बनाई गई और अब दस साल बाद किस बुनियाद पर उन्हें गले लगाया जा रहा है। न तो दंगों के दाग अभी तक धुले हैं और न ही दंगों के सभी मामलों में मोदी को क्लीन चिट दी गई है।
अमेरिका और तालिबान के बीच बातचीत की नाकामी पर साप्ताहिक `अल जमीअत' के सम्पादक  मोहम्मद सालिम जामई ने प्रथम पेज पर प्रकाशित अपने विशेष लेख में लिखा है कि अमेरिका तालिबान में दो ग्रुप बनाकर और एक ग्रुप को आगे बढ़ाकर दुनिया को यह बताना चाहता है कि वह अफगानिस्तान में अकेले जो चाहे कर सकता है लेकिन बातचीत की नाकामी ने इसके दावे की पोल खोल दी है और वह स्वयं अपनी ही चाल में फंस गया है। समाचार के अनुसार यह मालूम होता रहा कि किसी अज्ञात स्थान पर दोनों पक्षों के बीच बातचीत का सिलसिला चल रहा है। खुद अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट की प्रवक्ता विक्टोरिया नोलैंड ने भी इन खबरों की तस्दीक करते हुए कहा था कि तालिबान बातचीत की मेज पर लौट सकते हैं और अमेरिका तालिबान से बातचीत का समर्थन करता है। अमेरिका ने तालिबान की मांगों के अनुसार ग्वानतामो कैद खाने से इनके कुछ साथियों को भी छोड़ दिया था लेकिन अब ऐसा मालूम होता है कि बातचीत का यह सिलसिला अब बंद हो गया है और मामला एक बार वहीं पहुंच गया है जहां से शुरू हुआ था। ओबामा प्रशासन को भी यह स्वीकार करना पड़ा कि वह तालिबान को बातचीत जारी रखने पर मनाने में नाकाम हो गया है और अब कोई कदम राजनीतिक स्तर पर 2014 के बाद ही उठाया जा सकेगा जब यूरोपीय देशों की ज्यादातर फौज अफगानिस्तान से बाहर हो जाएंगी। तालिबान की बातचीत के लिए पहली शर्त यही थी कि पश्चिमी देश अपनी फौजें अफगानिस्तान से निकाल लें इसके बाद ही बातचीत हो सकती है।
डॉ. मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली यूपीए मंत्रिमंडल में 17 नए चेहरों को शामिल किया गया है जिसमें चार मुस्लिम हैं और मुस्लिम मंत्री को उन्नति देकर उच्च पद पर पहुंचाया गया है। दैनिक `जदीद खबर' ने `केंद्रीय मंत्रिमंल में मुसलमान' के शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखा है कि मंत्रिमंडल में नए मंत्रियों के शामिल होने के बाद अब मनमोहन सरकार में मुस्लिम मंत्रियों की संख्या बढ़कर आठ हो गई है। अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री का चार्ज सलमान खुर्शीद से लेकर राज्यसभा के पूर्व चेयरमैन के. रहमान खां को दिया गया है जबकि सलमान खुर्शीद को उन्नति देकर विदेश मंत्री का पद दिया गया। सलमान खुर्शीद स्वतंत्र भारत के इतिहास में इस पद पर पहुंचने वाले पहले मुसलमान हैं। केंद्रीय मंत्रिमंडल में जिन तीन मुस्लिम मंत्रियों को शामिल किया गया है, उनमें तारिक अनवर एनसीपी कोटे से मंत्री बनाए गए हैं। अबु हाशिम खां चौधरी और असम की कबाइली मुस्लिम महिला रानी नारा का संबंध कांग्रेस पार्टी से है। मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल में शामिल अन्य मुस्लिम मंत्रियों में गुलाम नबी आजाद, फारुख अब्दुल्ला और ई. अहमद के नाम शामिल हैं।
गुलाम नबी आजाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं जबकि फारुख अब्दुल्ला और ई. अहमद का संबंध नेशनल कांफ्रेंस और मुस्लिम लीग से है। लोकसभा और राज्यसभा में कुल मुस्लिम सांसदों की संख्या लगभग 50 के करीब है जो कि उनकी आबादी के अनुपात में कम है। इन मंत्रियों की असली परीक्षा उस समय होगी जब यह मुस्लिम समस्याओं पर गंभीरता का प्रदर्शन करें। यह सभी मंत्री पार्टी एजेंडे से बंधे हुए हैं लेकिन उन्हें अपनी छाप छोड़ने के लिए कुछ बेहतर प्रदर्शन करना होगा।

`राबर्ट वाड्रा को आरोपों का सामना करना चाहिए'


प्रधानमंत्री पद के लिए नरेन्द्र मोदी की दावेदारी को संघ द्वारा निरस्त किए जाने पर दैनिक `हमारा समाज' ने अपने संपादकीय में लिखा है कि राजग की भारतीय जनता पार्टी को छोड़कर अन्य सभी पार्टियों को उस समय बड़ी ताकत मिली जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने प्रधानमंत्री पद के लिए नरेन्द्र मोदी की उम्मीदवारी को खारिज कर दिया। संघ का मानना है कि यदि नरेन्द्र मोदी का नाम प्रधानमंत्री के लिए आगे बढ़ाया जाता है तो भाजपा और संघ को इसका नुकसान उठाना पड़ेगा। भाजपा जिन मुद्दों  पर यूपीए और कांग्रेस को घेरती चली आई है और पूरे देश में यूपीए और कांग्रेस के खिलाफ भ्रष्टाचार और महंगाई के मुद्दे पर जनता को अपने पक्ष में करती रही है यह सभी मुद्दे मोदी के कारण खत्म हो जाएंगे और कांग्रेस एवं यूपीए को यह कहने का मौका मिल जाएगा। भाजपा ने नरेन्द्र मोदी का नाम पेश किया है वह गुजरात में मुस्लिम नरसंहार का जिम्मेदार है। इससे केवल मुसलमान ही नहीं बल्कि बहुत से हिन्दू वोटों का भी नुकसान होगा एवं मोदी के नाम पर एनडीए पार्टियां भी सहमत नहीं हैं। पर्दे के पीछे के इस खेल में एलके आडवाणी का हाथ साफ नजर आ रहा है क्योंकि वह एक लम्बे समय से प्रधानमंत्री पद पर पहुंचने की आशा रखते हैं लेकिन जिन सीढ़ियों पर चढ़कर वह प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं वह सीढ़ियां उन्हें आसमान से जमीन पर ला सकती हैं। नरेन्द्र मोदी भी आडवाणी के इस खेल को समझते होंगे। देखना यह है कि संघ के दरबार से मायूस होकर नरेन्द्र मोदी मौन धारण करते हैं या अपने ही लोगों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल बजाते हैं।
तालिबान द्वारा 14 साल की मासूम लड़की मलाला पर हमले की कड़े शब्दों में भर्त्सना एवं निंदा करते हुए काजी हुसैन अहमद ने साप्ताहिक `खबरदार' में लिखा है कि यह तो मानवता, इस्लामी शिक्षा और पख्तून परम्परा के भी खिलाफ है। मलाला पर हमले का अफसोसजनक पहलू यह है कि इसका पुण्य खुद हत्यारे ले रहे हैं। मासूम बच्ची को तीन साल पहले जब इसकी उम्र 11 साल थी, बीबीसी के एक नुमाइंदे ने एक वीडियो डिसमिस्ड स्कूल द्वारा दुनिया से परिचित कराया। यह वीडियो न्यूयार्प टाइम्स की वेबसाइट पर देखी जा सकती है जिसमें वह फर्जी दृश्य भी शामिल है कि एक व्यक्ति को भीड़ के सामने उलटा लिटाकर कोड़े मारे जा रहे हैं और यह मशहूर कर दिया कि तालिबानी औरतों को कोड़े मार रहे हैं। इस बच्ची के मुंह में यह बात डाल दी गई और यह न्यूज पर इंटरव्यू में प्रसारित हुआ कि बेनजीर, बापा खान और ओबामा मेरे आइडियल हैं। बेनजीर और बापा खान की हद तक तो ठीक है कि हमारे देश में बहुत से लोग उनके भक्त हैं लेकिन सवात की एक मासूम बच्ची के मुंह में यह बात डालना कि ओबामा मेरे आइडियल हैं किन तत्वों का कारनामा है जबकि ओबामा के हाथों अफगानिस्तान और पाकिस्तान दोनों जगह बहुत से लोग मारे जा रहे हैं जिसमें मासूम बच्चे और महिलाएं भी शामिल हैं। जहां तक तालिबान का मामला है उन्हें किसी ने इस्लाम के प्रतिनिधित्व के तौर पर स्वीकार नहीं किया है और न ही उनके सारे कामों का समर्थन किसी विख्यात दीनी जमाअत ने स्वीकार किया है।
`राबर्ट वाड्रा को आरोपों का सामना करना चाहिए' के शीर्षक से साप्ताहिक `चौथी दुनिया' के संपादक संतोष भारतीय ने अपने संपादकीय में लिखा है कि शायद राबर्ट वाड्रा को इस बात पर भरोसा है कि जनता उनके जुर्म की सारी कहानियां जानने के बाद भी चुन ली। राबर्ट वाड्रा ने अपनी वर्तमान बीवी प्रियंका गांधी  का भी नुकसान कर दिया है। प्रियंका गांधी अपने आगे राबर्ट वाड्रा शब्द लगाने से हिचकिचाती हैं लेकिन राबर्ट वाड्रा इस शब्द को बहुत लोकप्रिय करना चाहते हैं। लोगों को लगने लगा है कि शायद प्रियंका गांधी का दिमाग अपने भाई राहुल गांधी की तरह तेज और तकनीक अपने पति राबर्ट वाड्रा से ज्यादा फुल प्रूफ है। लोगों का इस तरह सोचना प्रियंका गांधी के लिए शुभ संकेत नहीं है। राबर्ट वाड्रा को कुछ अन्य सवालों के लिए भी तैयार रहना चाहिए। उदाहरण के तौर पर वह क्या हालात थे जिनकी वजह से उनके पति रायबरेली से उनकी सास के खिलाफ लोकसभा का चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो गए और वह भी भाजपा के टिकट पर। नामांकन की प्रक्रिया पूरी हो जाने के बावजूद अंतिम समय में चुनाव लड़ने से पीछे क्यों हट गए और इसके कुछ महीनों के अंदर उन्होंने आत्महत्या क्यों की? इसी तरह क्यों इनके भाई ने आत्महत्या की? इनकी बहन की मौत एक सड़क दुर्घटना में हुई और इनकी बहन के कई दोस्तों ने भी आत्महत्या कर ली? यह सभी संयोग हो सकते हैं, लेकिन इन संयोग के पीछे यदि कोई कहानी है तो वह कहानी अब राबर्ट वाड्रा के लिए परेशानियां पैदा कर सकती है।
`मुस्लिम पिछड़ेपन को दूर करने के लिए नौकरियों में आरक्षण' से दैनिक `अखबारे मशरिक' में आरिफ अजीज ने अपने लेख में लिखा है कि 1980 में इंदिरा गांधी ने मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों की स्थिति जानने के लिए डॉ. गोपाल सिंह की अगुवाई में एक हाई पावर पैनल कायम किया था जिसने अपनी रिपोर्ट में नौकरियों में आबादी के अनुपात में आरक्षण की सिफारिश की थी और पुलिस बल में भी आरक्षण पर जोर दिया था। सरकार जंगलों में रहने वाले भेल और आदिवासियों के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए प्रयासरत है लेकिन न तो मुसलमानों को स्वयं फिक्र है और न सरकार को। आपातकाल के समय इंदिरा गांधी मुसलमानों को आरक्षण देने के लिए तैयार हो गई थीं लेकिन जिन लोगों के सुपुर्द यह काम किया गया वह उसको आगे नहीं बढ़ा सके। 1984 के शुरू में असम के मुख्यमंत्री-हिथेश्वर सैकिया अपने राज्य के मुसलमानों को आबादी के अनुपात में 24 फीसदी आरक्षण देने पर तैयार हो गए थे लेकिन इस पर अमल नहीं हुआ, न ही इसके बाद बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री भगवत झा आजाद की यह घोषणा व्यावहारिक रूप ले सकी कि सरकारी नौकरियों में अल्पसंख्यकों के लिए दस फीसदी कोटा निर्धारित किया जाएगा। इसके लिए जरूरी था कि बिहार के सभी मुसलमानों को पिछड़ा मान लिया जाता, क्योंकि संविधान में ऐसी किसी पहल की गुंजाइश नहीं थी लेकिन यह काम बाद की राजीव सरकार चाहती तो कर सकती थी उसको संसद में बहुमत प्राप्त था।
`सुभाष पार्प में अवैध निर्माण पर हाई कोर्ट का साहसी, सराहनीय फैसला' के शीर्षक से दैनिक `प्रताप' में संपादक अनिल नरेन्द्र ने अपने संपादकीय में लिखा है कि दिल्ली हाई कोर्ट की स्पेशल बेंच  के जस्टिस संजय किशन, जस्टिस एमएल मेहता और जस्टिस राजीव शंकधर ने एक साहसी फैसला किया। मामला था दिल्ली के सुभाष पार्प में अवैध मस्जिद बनाने का। उल्लेखनीय है कि मेट्रो लाइन निर्माण के दौरान सुभाष पार्प में एक दीवार मिली थी, जिसे एक समुदाय ने कथित रूप से अकबराबादी मस्जिद का अवशेष बताते हुए वहां रातोंरात निर्माण कर दिया। इस मुद्दे को लेकर कुछ संगठन दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचे और इस अवैध निर्माण को हटाने की मांग की। हाई कोर्ट ने 30 जुलाई को पुलिस को यह अवैध निर्माण हटाने के लिए एमसीडी को फोर्स उपलब्ध करवाने का निर्देश दिया था।
बेंच ने स्पष्ट किया कि यदि उक्त स्थल पर सर्वे में मस्जिद हे की पुष्टि होती है तो भी वह संरक्षित इमारत होगी और ऐसे में वहां नमाज अदा करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। ऐसे में वहां नमाज अदा करने का सवाल ही नहीं है। हम हाई कोर्ट की पीठ का स्वागत करते हैं। सवाल एक अवैध निर्माण का ही नहीं बल्कि कानून की धज्जियां उड़ाने का भी है। ऐसे में रातोंरात कई पूजा स्थल खड़े हो जाएंगे। अब देखना यह है कि जो साहस हाई कोर्ट की स्पेशल बेंच ने दिखाया है, क्या दिल्ली पुलिस भी ऐसा ही साहस दिखाएगी?